सलोक भगत कबीर जी, अंग 1368

SGGS, Ang
1368
सलोक भगत कबीर जी
राग: सलोक खण्ड · रचयिता: भगत कबीर जी
पढ़ने का समय: लगभग 7 मिनट
ang-1368-salok-65

सलोक 65 ॥ कबीर ऐसा जोगु न देखिओ भाई ॥ रमि रमि घालै घालै बदले ओए न जाई ॥65॥

कबीर एक paradox observe कर रहे हैं। “ऐसा जोगु न देखिओ।” ऐसा “जोग” (योग, या association) नहीं देखा। “भाई” भाई।

क्या ऐसा जोग? जो ख़ुद को मारता है, बार-बार, मगर बदलता नहीं।

“रमि रमि घालै घालै।” बार-बार रमता है, बार-बार घालता है (नष्ट करता है)। “बदले ओए न जाई।” मगर असली में बदलता नहीं।

कबीर देख रहे हैं: एक आदमी spiritual practice करता है, बहुत intense। ध्यान, उपवास, मन्त्र, सब। मगर अन्दर से वही पुराना ego, वही पुरानी आदतें।

यह सबसे common spiritual problem है। practice को quantity में measure करते हैं (“मैंने 1000 mantras किए”) मगर quality (अन्दर का बदलाव) देखना भूल जाते हैं। कबीर इस disconnection को point कर रहे हैं।

दिल्ली में हम spiritual courses करते हैं, retreats में जाते हैं, होम वापस आते हैं, और कुछ हफ़्ते बाद वही पुराना insanity। कबीर पूछ रहे हैं, “क्या असली में कुछ बदला?” अगर नहीं, तो अभ्यास का formula बदलना होगा।

ang-1368-salok-66

सलोक 66 ॥ कबीर साकत ते सूकर भले राखहि आछा गाउ ॥ उह साकत बपुरा मरि गइआ कोई न लैहै नाउ ॥66॥

कबीर एक shocking comparison कर रहे हैं। “साकत ते सूकर भले।” साकत से सूकर (सूअर) बेहतर हैं। “राखहि आछा गाउ।” वो गाँव को अच्छा रखते हैं।

सूअर क्या करते हैं? वो गाँव की गंदगी खाकर साफ़ करते हैं। एक सेवा देते हैं। कबीर कह रहे हैं, साकत से बेहतर हैं, क्योंकि साकत कुछ नहीं देता।

“उह साकत बपुरा मरि गइआ।” वो बेचारा साकत मर गया। “कोई न लैहै नाउ।” कोई उसका नाम नहीं लेता।

सूअर मरने पर लोग कम-से-कम खाते हैं (कुछ communities में)। साकत के मरने पर कुछ बचता ही नहीं, न प्रेरणा, न memory, न उपयोग।

यह तीखी बात है, मगर कबीर purposefully तीखा है। वो कह रहे हैं, अगर तू religious नहीं, कोई बात नहीं। मगर अगर तू “साकत” है (दूसरों को नीचा देखने वाला, ख़ुद को ऊँचा मानने वाला, कुछ contribute नहीं करने वाला), तू सूअर से भी बदतर।

यह 600 साल पहले lower-caste critique से बचने की कोशिश थी। कबीर अक्सर “साकत” शब्द जाति-व्यवस्था के context में use करते थे। आज भी “लोगों को नीचा दिखाने वाले” sense में valid है।

ang-1368-salok-67

सलोक 67 ॥ कबीर कूकरु भौंकना करंत न पावै काम ॥ रूख की छाइआ ले गइआ काल न पावै बाम ॥67॥

कबीर एक practical metaphor दे रहे हैं। “कूकरु भौंकना।” कुत्ता भौंकता है। “करंत न पावै काम।” मगर कुछ नहीं कर पाता।

गली का कुत्ता रात भर भौंकता है। हर गुज़रने वाले पर। मगर सुबह तक न कुछ हुआ, न कुछ बदला। सिर्फ़ शोर।

“रूख की छाइआ ले गइआ।” पेड़ की छाँव खींची चली जा रही है (समय के साथ)। “काल न पावै बाम।” काल (समय, मृत्यु) रुकता नहीं।

कबीर एक scene paint कर रहे हैं। एक कुत्ता दिन भर भौंकता है। पेड़ की छाँव सूर्य के साथ धीरे-धीरे खिसक रही है। समय गुज़र रहा है।

और implicit point: जैसा कुत्ता, वैसा साकत। बहुत बोलता है, कुछ करता नहीं। और बीच में time भागता जा रहा है। ज़िंदगी पूरी “भौंकने” में चली जाती है।

WhatsApp groups, Twitter, debates पर सोचो। बहुत भौंकना, बहुत noise, बहुत opinions। मगर ज़मीन पर कुछ नहीं बदलता। और हमारी “रूख की छाइआ” (ज़िंदगी का समय) पर pe lagatar खिसकती जा रही है।

ang-1368-salok-68

सलोक 68 ॥ कबीर कागद की ओबरी मसु के करम कपाट ॥ पाहन बोरी पिरथमी पंडित पाड़ी बाट ॥68॥

कबीर शास्त्रीय brahmin culture पर powerful satire कर रहे हैं। “कागद की ओबरी।” कागज़ की “ओबरी” (छोटी सी छत, या hut)। “मसु के करम कपाट।” स्याही के कर्म (formulas) के दरवाज़े।

यानी pandit एक छोटी हुजरी में बैठा है, कागज़ की दीवारों के बीच, स्याही से लिखी formulas पर तालाबन्द।

“पाहन बोरी पिरथमी।” पाषाण (पत्थर की मूर्तियाँ) से पृथ्वी डूब रही है। “पंडित पाड़ी बाट।” पंडितों ने रास्ता “पाड़” दिया (तोड़ दिया, या रास्ता दिखा रहे हैं, double meaning)।

कबीर सीधे criticism: pandits ने पूरी पृथ्वी पर stone-idols भर दिए हैं। और वो ख़ुद कागज़-स्याही की एक छोटी सी दुनिया में जी रहे हैं।

यह 15वीं सदी का post-religion observation है। Religion महलों, मन्दिरों, formulas, idols में बँट गया है। असली “हरि” से कोई कनेक्शन नहीं।

आज भी relevant है। हर religion में अब “industry” है। महल जैसे gurdwaras, gold-plated मन्दिर, sermons की recordings, online courses। फिर भी असली अनुभव rare है। कबीर 600 साल पहले यही pattern point कर गए।

ang-1368-salok-69

सलोक 69 ॥ कबीर कालि करंता अबहि करु अब करता सुइ ताल ॥ पाछै कछू न होइगा जउ सिर परि आवै काल ॥69॥

कबीर का सबसे urgent वाला सलोक। “कालि करंता अबहि करु।” कल जो करना है, अभी कर। “अब करता सुइ ताल।” “अब” करते जो हो, “सुइ ताल” (तत्काल, अभी की अभी)।

यह क्या है? procrastination का anti-thesis। हम सब “कल” को defer करते हैं। कबीर कह रहे हैं, यह बेकार है।

“पाछै कछू न होइगा।” बाद में कुछ नहीं होगा। “जउ सिर परि आवै काल।” जब काल (मौत) सर पर आ जाएगी।

जब मौत के moment में हो, कुछ नहीं हो सकता। आज जो करना है, अभी कर।

यह practical instruction है। कौनसा काम तू कल पर टाल रहा है? कौनसा रिश्ता तू अगले हफ़्ते repair करेगा? कौनसी spiritual practice तू retirement के बाद शुरू करेगा? कबीर कह रहे हैं, अभी कर। काल कब आएगा, पता नहीं।

गुरु अर्जन की सुखमनी में भी यही bell-ring: “अउध घटै दिनसु रैनारे।” आयु घट रही है, दिन और रात दोनों मिल कर। कबीर ने इस urgency का seed बोया।

देखें: सुखमनी साहिब अष्टपदी 5 closing, “करउ बेनंती सुनहु मेरे मीता संत टहल की बेला”
ang-1368-salok-70

सलोक 70 ॥ कबीर ऐसा कोई न जनमिओ हमरै घरि आवै ॥ हम कउ बोलनहारु जिसकउ हम कउ अपनै रंगि लावै ॥70॥

कबीर एक loneliness express कर रहे हैं। “ऐसा कोई न जनमिओ।” ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ। “हमरै घरि आवै।” जो मेरे घर आए।

और क्या चाहिए कबीर को? “हम कउ बोलनहारु।” मुझ से बोले। “जिसकउ हम कउ अपनै रंगि लावै।” जो मुझे अपने ही रंग में रंग ले।

कबीर genuine company की तलाश में हैं। कोई जो मुझे अपने (हरि के) रंग में रंग दे। यह guru की तलाश है।

और implicit: कबीर खुद कहते हैं, ऐसा कोई जनमा नहीं। यानी असली गुरु बहुत rare है। हर pandit, हर ख़ानक़ाह वाला, हर तीर्थ-पुरोहित, यह सब “रंग में रंगने वाले” नहीं हैं। वो सिर्फ़ रास्ते की धूल देते हैं।

दिल्ली में spiritual market बहुत बड़ा है। हर gali में कोई “guru” है, हर WhatsApp group में कोई “guide” है। कबीर कह रहे हैं, असली रंगने वाला rare है। उसे ढूँढ़ने में पूरी ज़िंदगी लग सकती है।

मगर एक positive note: कबीर ख़ुद इस search में थे, और उन्हें रामानन्द जी मिले। यानी search successful भी हो सकती है। मगर expect मत करो कि वो आसान होगी।

ang-1368-salok-71

सलोक 71 ॥ कबीर एते मुए मूए मोहि किआ करौ कहु हमारि ॥ हमरै घरि नित आइहै सो हम कौ खिमा करु ॥71॥

कबीर एक desperate prayer कर रहे हैं। “एते मुए मूए मोहि किआ करौ कहु हमारि।” इतने सारे मरे, मरे, मुझ का क्या करूँ, मेरे बारे में क्या कहूँ?

यानी मैंने देखा है कि इतने लोग मर गए, अब मेरा क्या? मेरी ज़िंदगी का क्या?

और एक request: “हमरै घरि नित आइहै।” मेरे घर रोज़ आओ। “सो हम कौ खिमा करु।” मुझे क्षमा करो।

किस से बात कर रहे हैं? साईं, हरि। कबीर कह रहे हैं, रोज़ मेरे घर आओ (मेरे दिल में आओ), और मेरी ग़लतियाँ माफ़ करो।

यह intimate prayer है। कबीर अकेले रात को अपने साईं से बात कर रहे हैं। यह पाखंडी performance नहीं, यह confession है।

और यह सबसे relatable भी है। हर इन्सान को आख़िर में यह realisation आती है: “मैंने बहुत ग़लतियाँ की हैं। माफ़ करो।” कबीर कह रहे हैं, यह humble request हमेशा खुली है। आओ, घर में, हर रोज़।

ang-1368-salok-72

सलोक 72 ॥ कबीर मेरी जोबन गई बीति राम रहिओ नाहि ॥ जे ता आना उनि सहै तेरे करम कहाहि ॥72॥

कबीर सबसे honest self-account दे रहे हैं। “मेरी जोबन गई बीति।” मेरा यौवन (जवानी) बीत गया। “राम रहिओ नाहि।” मगर राम नहीं रहा (नहीं मिला)।

यह confession है। कबीर कह रहे हैं, मैंने पूरी जवानी spent कर ली, मगर राम तक नहीं पहुँचा।

“जे ता आना उनि सहै।” अगर तू दूसरा (राम) उन (पाप-कर्म) को सहे (बर्दाश्त करे)। “तेरे करम कहाहि।” तब तेरे “कर्म” (अच्छे, सही actions) कहाएँगे।

यानी अगर हरि तेरी ग़लतियों को बर्दाश्त कर ले, तभी तेरे “कर्म” valid हैं। यानी हरि की कृपा के बिना, अपने कर्मों पर भरोसा करना बेकार है।

यह कबीर की सबसे dependant theology है। कर्म-कर्म-कर्म कह रहे हैं हम, मगर अंत में कर्म हरि की कृपा से ही valid होते हैं। दूसरा कोई कर्म-कर्म कहता है, असली flow कृपा का है।

गीता के “मामेकं शरणं व्रज” (18.66) से matching। दोनों कह रहे हैं, अंत में सब छोड़, सिर्फ़ शरण ले। कबीर अपनी पंजाबी-bhojpuri ज़बान में same बात कह रहे हैं।

देखें: गीता 18.66, “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज”
ang-1368-salok-73

सलोक 73 ॥ कबीर मनहु न मोरिओ रुठि कै राम संगि न आइ ॥ जोग किआ ता पाईऐ जा साधहि सहजि सुभाइ ॥73॥

कबीर एक common mistake describe कर रहे हैं। “मनहु न मोरिओ रुठि कै।” मन से नहीं मोड़ा (बदला), रूठ कर। “राम संगि न आइ।” राम के साथ नहीं आया।

यानी आदमी मन रूठ गया है, intellectual position से बदल लिया है, मगर इसमें राम के साथ नहीं आया। यह fake conversion है।

“जोग किआ ता पाईऐ जा साधहि सहजि सुभाइ।” “जोग” तब मिलता है जब “सहज सुभाव” (natural way) से साधा जाए।

कबीर के लिए “सहज” critical word है। forced spirituality नहीं चलती। एक आदमी जो ज़बरदस्ती meditation बैठाता है, ज़बरदस्ती mantras पढ़ता है, उसका जप काम नहीं करता।

सहज क्या? वो जो natural हो, जैसे साँस लेना। बिना effort। बिना struggle। एक state जहाँ अध्यात्म and ज़िंदगी अलग नहीं।

यह Zen-like statement है। प्रसिद्ध Zen aphorism: “Before enlightenment, chop wood, carry water. After enlightenment, chop wood, carry water.” कबीर का “सहज सुभाव” वही है।

देखें: अष्टावक्र गीता प्रकरण 13: यथासुख, “अहम् आसे यथासुखम्”
ang-1368-salok-74

सलोक 74 ॥ कबीर सतिगुर सूरमे बाहिआ बानु जु एकु ॥ लागत ही भुइ गिरि परिआ परा करेजे छेकु ॥74॥

कबीर एक military image use कर रहे हैं। “सतिगुर सूरमे।” सच्चे गुरु (सूरमा, योद्धा)। “बाहिआ बानु जु एकु।” एक तीर बहाया।

सच्चा गुरु एक तीर मारता है। बस एक।

“लागत ही भुइ गिरि परिआ।” लगते ही ज़मीन पर गिर पड़ा। “परा करेजे छेकु।” करेजे में छेद हो गया।

यह कमाल का image है। गुरु का एक शब्द, एक upadesh, एक तीर की तरह। शिष्य पर लगा, और शिष्य ज़मीन पर गिर पड़ा (अहंकार ख़त्म)। करेजे में छेद, यानी अन्दर तक पहुँचा।

फ़र्क़ देखिए: ख़राब गुरु बहुत बातें करता है, सब superficial। सच्चा गुरु एक बात कहता है, और वो असली target hit करती है।

दिल्ली के spiritual circuit में हम बहुत teachings सुनते हैं। अधिकतर एक कान से अन्दर, दूसरे से बाहर। मगर कभी एक बात ऐसी आती है कि अन्दर तक धमाका करती है। पूरी ज़िंदगी बदल जाती है। वो असली “तीर” था। कबीर उसी moment की बात कर रहे हैं।

ang-1368-salok-75

सलोक 75 ॥ कबीर सतिगुर सूरमे बाहिआ बानु जु बाहि ॥ बेधिआ अंग सरीर सिउ लागत ही मरि जाइ ॥75॥

पिछले सलोक का continuation। फिर वही सच्चा गुरु, तीर बहाने वाला।

“बेधिआ अंग सरीर सिउ।” शरीर के अंगों को बेधा। “लागत ही मरि जाइ।” लगते ही मर जाता है।

यानी सच्चा गुरु का “तीर” अंग-अंग में जाता है, और शिष्य “मर” जाता है। यह ego-death है।

कबीर कई बार इस moment की बात करते हैं। “ऐसी मरनी जो मरै बहुरि न मरना होइ।” गुरु के तीर से जो मरता है, वो ऐसा ही मरना है।

यह violent metaphor है, मगर purposeful। कबीर कह रहे हैं, असली spiritual transformation gentle नहीं होता। यह violent है। एक तीर अन्दर जाता है, और तू मरता है (पुराना मरता है)।

दुनिया में soft spirituality बिकती है, “feel good,” “manifest your dreams,” “abundance mindset”। कबीर का स्कूल यह नहीं। यह hardcore है। गुरु तीर बहाता है, तू मरता है। फिर नया जन्म, नया जीवन।