सलोक शेख़ फ़रीद जी, अंग 1381

SGGS, Ang
1381
सलोक शेख़ फ़रीद जी (निरंतर)
राग: सलोक खण्ड · रचयिता: शेख़ फ़रीद जी
पढ़ने का समय: लगभग 8 मिनट
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सलोक 41 ॥ फरीदा कोठै धुकनि न दीजीऐ बाहरि जाणु बेरारणु ॥ जो जो आइआ चलीआ ओहु इकु इकु बाहरारणु ॥41॥

फ़रीद एक guest-and-host metaphor। “कोठै धुकनि न दीजीऐ।” अपने घर के अन्दर दौड़ने मत दो। “बाहरि जाणु बेरारणु।” बाहर जान, उतर पड़ने वाला है।

यानी जो भी आदमी “अंदर” आता है, उसको यह मत समझो कि स्थायी है। वो भी “बाहर” जाने वाला है।

“जो जो आइआ चलीआ।” जो जो आया, चला गया। “ओहु इकु इकु बाहरारणु।” वो हर एक “बाहर निकलने वाला” था।

फ़रीद observe कर रहे हैं कि यह दुनिया एक guest-house है। हर रिश्ता, हर व्यक्ति, अस्थायी guest है। तू उन्हें अपना “permanent” मत समझ।

यह बहुत स्नेहहीन लगता है, मगर वास्तव में यह सबसे loving stance है। जब आप जानते हैं कि हर रिश्ता temporary है, हर interaction precious बन जाती है। तू pressure नहीं डालता, तू enjoy करता है।

दिल्ली के समाज में हम रिश्तों को “permanent” बनाने में बहुत invest करते हैं। फ़रीद कह रहे हैं, यह illusion है। हर रिश्ता एक “बेरारणु” guest है। उसे honour दो, और जाने दो।

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सलोक 42 ॥ फरीदा बिन कीस मरूआ नेहु लागा ॥ जो दिल खोलइ सो साइं नालि अनहागा ॥42॥

फ़रीद एक intimate confession कर रहे हैं। “बिन कीस मरूआ नेहु लागा।” बिना “कीस” (lock, या किसी और रूप) के, “मरूआ” (मुर्दा, या मरने वाला) से नेह लग गया।

यह कमाल है: एक मरने वाले से प्यार। कौन है यह? साईं। हरि।

“जो दिल खोलइ सो साइं नालि अनहागा।” जो दिल खोलता है, वो साईं के साथ “अनहागा” (बिना cover के, full disclosure में)।

फ़रीद कह रहे हैं: साईं के साथ रिश्ता “without lock” वाला है। दिल पूरा खोलना है। कोई private chamber नहीं।

यह intimacy है जो human relationships में possible नहीं। हम insaani रिश्तों में अक्सर कुछ बचा कर रखते हैं, कुछ rooms locked रखते हैं। मगर हरि के सामने “सब खोल दो।”

सूफ़ी “अनहागा” यानी “without veil”। ख़ुदा के सामने हर veil उतर जाता है। यह vulnerable लगता है, मगर यही असली connection है।

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सलोक 43 ॥ फरीदा कूकेंदिआ चांगेंदिआ मीस्केल मारेंदिआ ॥ इकि सोई दहड़ुगि अरि उठि अमेरि बोलेंदिआ ॥43॥

फ़रीद scenes of suffering describe कर रहे हैं। “कूकेंदिआ चांगेंदिआ।” चीख़ते, चिल्लाते। “मीस्केल मारेंदिआ।” “मीस्केल” (मिस्कीन, ग़रीब) मारते हुए।

यह दुनिया का scene है: कोई चीख़ रहा है, कोई दूसरे को मार रहा है, कोई ग़रीब हो रहा है।

“इकि सोई दहड़ुगि अरि उठि अमेरि बोलेंदिआ।” कुछ सो रहे हैं, कुछ उठ कर “अमेर” (boasting) में बोल रहे हैं।

फ़रीद बहुत compactly पूरी मानवीय condition दिखा रहे हैं। दुख, हिंसा, बेखुदी, और boasting, यह सब साथ-साथ चल रहा है।

यह existential observation है। हर मुहल्ले में हर समय यह सब हो रहा है। कोई रो रहा है, कोई हँस रहा है, कोई सो रहा है, कोई चिल्ला रहा है।

फ़रीद का stance: observe करो। judgment मत दो। पूरी ज़िंदगी ऐसी ही है। और इस सब के बीच एक “साईं” है जो सब देख रहा है। तू भी देख। और अपने आप को इस storm में मत खो।

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सलोक 44 ॥ फरीदा दुख सुख इकु करि देखु करि कागलु कागलु बेकरारु ॥ खेहलि कागलु मु बहलिआ बंतीआ मुख खुआर ॥44॥

फ़रीद का equanimity-instruction। “दुख सुख इकु करि देखु।” दुख और सुख को एक समझ कर देख। “करि कागलु कागलु बेकरारु।” बेकरार (anxious) कागज़ कर के।

यह challenging line है। फ़रीद कह रहे हैं, अपनी anxiety को “कागलु कागलु” (कागज़-कागज़, यानी एक letter, एक list) बना कर देख।

यानी अपनी चिन्ताओं को outside कर। उन्हें कागज़ पर लिखो। फिर देखो वो कितनी छोटी हैं।

“खेहलि कागलु मु बहलिआ।” खेल कर कागज़ बहुत बना लिया। “बंतीआ मुख खुआर।” बातें मुँह से, “खुआर” (शर्म) से।

फ़रीद कह रहे हैं, मैंने बहुत letters लिखे (शायद literal साईं को letters), बहुत बातें मुँह से कीं। मगर अब “खुआर” feel होता है। शर्म आती है।

यह उत्तम self-awareness है। फ़रीद admit कर रहे हैं, “मैंने बहुत words use किए हैं। बहुत हो गया। अब चुप।” यह क़ीमती moment है।

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सलोक 45 ॥ फरीदा रति लघि कीआ कूअ ओह सजड़े दूरि भए ॥ हीन तुलाणे लोग नेड़े नेहु छुरी मनहु लाहै ॥45॥

फ़रीद एक interesting reversal describe कर रहे हैं। “रति लघि कीआ कूअ।” रात (अंधेरे) में कुआँ (well) किया। “ओह सजड़े दूरि भए।” वो “सजड़े” (सजे हुए, सजन) दूर हो गए।

यानी अंधेरे में कुआँ खोदा (कोशिश की), मगर सजन दूर रहे।

“हीन तुलाणे लोग नेड़े।” “हीन” (कमतर, ख़राब) लोग नज़दीक रहे। “नेहु छुरी मनहु लाहै।” नेह (प्यार) को छुरी (knife) से मन से उतार दिया।

फ़रीद observe कर रहे हैं: सजन (अच्छे लोग, हरि-संग वाले) दूर रहते हैं। कमतर लोग पास रहते हैं। और अंत में सब प्रेम मन से कट जाता है।

यह pessimistic observation है। मगर purposeful। फ़रीद कह रहे हैं, यह “हीन” लोगों की company अपने आप होती है (effortless), मगर “सजन” की company के लिए effort चाहिए।

और एक psychological point: जब “सजन” दूर हैं, असली प्रेम हम मन से ही उतार देते हैं। हम कह देते हैं, “अब क्या प्यार-व्यार, सब practical बात करो।” यह defense mechanism है। मगर loss है।

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सलोक 46 ॥ फरीदा गोरां सेइ निमाणीआ बहसनि रूह ॥ सुणि न हुणी सुणावे रहै तदी ख़ूब ॥46॥

फ़रीद क़ब्रिस्तान-imagery use कर रहे हैं। “गोरां सेइ निमाणीआ।” “गोरां” (क़ब्रें) के साथ “निमाणी” (नम्र) हो जाओ। “बहसनि रूह।” बैठेगी रूह।

यानी जा कर क़ब्रिस्तान में बैठो। नम्र हो कर। रूह बैठेगी।

सूफ़ी practice में “मुराकबा” (meditation) क़ब्रिस्तान में होता था। फ़रीद उसी practice को encourage कर रहे हैं।

“सुणि न हुणी सुणावे रहै तदी ख़ूब।” सुनो, जो “हुनी” (अब) सुनाई दे, वही “ख़ूब” (बेहतर) है।

क़ब्रिस्तान में बैठो, और देखो: जो नीचे हैं, वो कुछ बोल नहीं रहे। मगर एक silent message है। “मैं भी कभी तेरे जैसा था, अब यहाँ हूँ।” यह “अनकहा” message ही सबसे बड़ा teacher है।

दिल्ली में हम अक्सर मरने वाले के बारे में बोलते हैं, “वो लम्बी ज़िंदगी जिया” या “वो जल्दी चला गया।” मगर सच यह है कि सब मर रहे हैं। जा कर lodi gardens के बग़ल में जो क़ब्रें हैं, वहाँ बैठो। यह सबसे bracing meditation है।

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सलोक 47 ॥ फरीदा गोरां सेइ ज लधे केह सिखोहु एमेदारी ॥ नरकि सिमरंदे मसकीन सूल नाही केरुहारी ॥47॥

पिछले सलोक का continuation। “गोरां सेइ ज लधे।” क़ब्रों से जो “लधे” (पाया, सीखा)। “केह सिखोहु एमेदारी।” क्या सीखो “एमेदारी” (ईमानदारी)।

यानी क़ब्रिस्तान से ईमानदारी सीखो। मरने वाले अपने जीवन के बारे में अब झूठ नहीं बोलते।

“नरकि सिमरंदे मसकीन।” “मसकीन” (मसकीन-दिल, विनम्र) नरक का स्मरण करते हैं। “सूल नाही केरुहारी।” सूल (शूल, दुख) नहीं करता है।

विनम्र आदमी नरक का सोचता है। यानी वो अपनी ज़िम्मेदारी, अपनी ग़लतियों के बारे में सोचता है। यह “morbid” नहीं, यह “honest” है।

और जो ऐसा सोचता है, उसको “सूल” नहीं होता। यानी आख़िर में वो pain नहीं भोगता। क्यों? क्योंकि time पर realised कर लिया।

फ़रीद का formula: “विनम्रता + नरक का स्मरण = बचाव।” यह bizarre लगता है, मगर मॉडर्न psychology में भी यही: humility + awareness of mortality = balanced life।

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सलोक 48 ॥ फरीदा साही नीनदड़ी सूचे जिनी आइ ॥ सीस उतारि जिवारिले लागी मांगै आइ ॥48॥

फ़रीद sufi-style intimate confession। “साही नीनदड़ी सूचे जिनी आइ।” साईं की “नीनदड़ी” (नींद, छोटी सी रात) “सूचे” (सच में) “जिनी आइ” (जिनको आ गयी)।

यानी किस-को साईं की निकटता आ गयी? जिनको आयी, उनकी ज़िंदगी बदल गयी।

“सीस उतारि जिवारिले लागी मांगै आइ।” सिर उतार कर “जिवारिले” (जीवन के) “लागी मांगै आइ” (मांग पूरी करने आए)।

यह सूफ़ी का सबसे intense statement है। साईं की लौ लग गयी? तो सिर “उतार” कर दे। यानी अपने आप को पूरा समर्पित कर। फिर मांग पूरी होगी।

सिर “उतारना” यहाँ literal नहीं। यह ego का त्याग है। मगर imagery violent है, ताकि we understand the intensity।

गुरु नानक भी कहते हैं, “जब चाहे शीश दे।” यह उसी thinking line में है। एक ख़ास relationship में, सिर भी कमतर है।

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सलोक 49 ॥ फरीदा थीउ पवाही दभु ॥ जे सांई लोड़हि सभु ॥49॥

फ़रीद का सबसे short और सबसे profound सलोक। “थीउ पवाही दभु।” “दभु” (दूब घास) के “पवाही” (पवित्र, simple) हो जा।

“जे सांई लोड़हि सभु।” अगर साईं को सब चाहता है।

यह क्या metaphor है? दूब घास (durva grass) सबसे common, सबसे humble plant है। ज़मीन पर बिछती है। पैरों के नीचे आती है। हर जगह उगती है। मरती नहीं (resilient है)।

फ़रीद कह रहे हैं, अगर तू साईं की सबकुछ चाहता है (पूरी कृपा), तो दूब बन जा। नीचे रह। सब के पैरों के नीचे आ। मगर अंदर से deeply rooted रह।

यह सबसे beautiful sufi instruction है। power नहीं चाहिए, fame नहीं चाहिए, recognition नहीं चाहिए। दूब बन जा। फिर हर चीज़ अपने आप मिलेगी।

सोचो: दूब को कोई plant नहीं करता, मगर वो हर बागीचे में होती है। दूब के बारे में कोई नहीं बोलता, मगर सब उस पर चलते हैं। दूब बहुत simple है, मगर वो सबसे tough है। फ़रीद कह रहे हैं, ऐसा बन।

देखें: सुखमनी साहिब अष्टपदी 12, “सुखी बसै मसकीनीआ”
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सलोक 50 ॥ फरीदा थीउ पवाही दभु जे सांई लोड़हि सभु ॥ इकु छिजहि बिआ लताड़ीअहि पाही न दुजै फभु ॥50॥

पिछले सलोक का explanation। “थीउ पवाही दभु जे सांई लोड़हि सभु।” वही, दूब बन जा अगर साईं चाहिए।

और फिर: “इकु छिजहि बिआ लताड़ीअहि।” एक “छिजहि” (छीना जाए, उखाड़ा जाए), दूसरे “लताड़ीअहि” (कुचले जाएँ)। “पाही न दुजै फभु।” “पाही” (paahi, घास का गुच्छा) में दूसरा कोई “फभु” (अच्छाई, beauty) नहीं।

फ़रीद दूब के लाइफ़ describe कर रहे हैं। एक तरफ़ कोई उसे उखाड़ रहा है। दूसरी तरफ़ कोई उसे कुचल रहा है। और हर पाही (समूह) में कोई और बात नहीं, सब को यही treatment मिलती है।

यह दूब का lot है। और फ़रीद कह रहे हैं, अगर तू साईं का सच में चाहने वाला है, तो यह treatment accept कर।

यह बहुत honest statement है। sufi path कोई easy nahi है। तुझे उखाड़ा जाएगा, कुचला जाएगा। बहुत बार। और तुझे फिर भी “दूब-समान” रहना है, हरा और resilient।

फ़रीद को ख़ुद यह अनुभव हुआ था। बहुत persecution, बहुत हिजरत, बहुत poverty। और हर बार वो दूब की तरह वापस आते। यह सलोक उनका lived experience है, theory नहीं।

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सलोक 51 ॥ फरीदा भंनी घड़ी सवंनवी ट्रुटी नागर लज ॥ अजरायलु फरेसता कै घरि नाठी अज ॥51॥

फ़रीद मौत का scene paint कर रहे हैं। “भंनी घड़ी सवंनवी।” “सवंनवी” (सोने की) घड़ी “भंनी” (टूट गयी)। “ट्रुटी नागर लज।” “नागर” (नागरीक, शहरी) “लज” (lajja, इज्ज़त) “ट्रुटी” (टूटी)।

यानी जब मौत आती है, सोने की घड़ी (precious बात) भी टूट जाती है। शहर की इज्ज़त भी टूट जाती है।

“अजरायलु फरेसता।” अज़राईल फ़रिश्ता (मौत का देवदूत)। “कै घरि नाठी अज।” आज किसके घर में आया है।

यह powerful image है। अज़राईल आज किसी न किसी घर में जा रहा है। हर रोज़। यह question हम सब को पूछना चाहिए: “मेरे घर कब?”

फ़रीद का message: तेरी “सोने की घड़ी” (शरीर, सम्पत्ति, success) यह सब अज़राईल के एक visit में बर्बाद हो जाएगी। इज्ज़त, हैसियत, सब कुछ छूट जाएगा।

इसलिए: time पर ख़ुदा से connection बना। ज़िंदगी एक call-and-response है। अज़राईल जब call करेगा, तू response के लिए तैयार रहे।

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सलोक 52 ॥ फरीदा जे जाणा सहु नंढरा तां थोड़ा माणु करेउं ॥ जे जाणा सहु वडिआ तां विचि अंगडी छुपिआ रहेउं ॥52॥

फ़रीद एक dilemma describe कर रहे हैं। “जे जाणा सहु नंढरा।” अगर जानता कि “सहु” (साईं) “नंढरा” (छोटा-सा, बिना अहमियत वाला) है। “तां थोड़ा माणु करेउं।” तो थोड़ा “माणु” (अभिमान) करता।

“जे जाणा सहु वडिआ।” अगर जानता कि साईं बड़ा है। “तां विचि अंगडी छुपिआ रहेउं।” तो “अंगडी” (अंगिकर, गोद) में छुपा रहता।

फ़रीद कह रहे हैं: मैं नहीं जानता मेरा साईं कैसा है। अगर वो छोटा है, तो मैं अहंकार कर सकता हूँ। अगर वो बड़ा है, तो मैं छुप जाऊँगा।

और implicit: चूँकि वो “बड़ा” है, मैं छुप कर रहता हूँ। यह humility है, fear नहीं।

यह एक interesting tension है। हम कभी सोचते हैं हम “जानते” हैं ख़ुदा को, यह वो वो है। फ़रीद कह रहे हैं, मुझे पता नहीं। और इस “पता न होने” में मेरा proper attitude है: छुप कर रहो, नम्रता से।

modern arrogance: “मैं spiritual हूँ, मैं know करता हूँ।” फ़रीद कह रहे हैं, यह arrogance ही proof है तू नहीं जानता। असली knower छुप कर रहता है।

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सलोक 53 ॥ फरीदा जे जाणा लड़ु छिजणा पीडी पाईं गंढि ॥ तै जेवडु मै नाहि को सभु जगु डिठा हंढि ॥53॥

फ़रीद एक tactical observation। “जे जाणा लड़ु छिजणा।” अगर जानता कि “लड़ु” (कपड़े का छोर, या रिश्ता) “छिजणा” (टूटेगा)। “पीडी पाईं गंढि।” तो पहले से ही गाँठ बाँधता।

यानी अगर पहले से पता हो कि कुछ टूटेगा, तो रोकथाम की गाँठ बाँधी जा सकती है।

“तै जेवडु मै नाहि को।” तेरे (साईं) जैसा मेरे लिए कोई नहीं। “सभु जगु डिठा हंढि।” पूरा जग देख कर “हंढ” गया (घूम कर देख लिया)।

फ़रीद कह रहे हैं, पूरा जग देखा, खंगाला, मगर तेरे जैसा कोई नहीं मिला।

यह सूफ़ी का सबसे intimate declaration है। हर रिश्ता टूट सकता है, मगर तेरे साथ “गंठ” बाँधी है, यह नहीं टूटेगी।

क्या यह romantic? हाँ, मगर सूफ़ी way में। साईं और भक्त के बीच का प्रेम सबसे intimate होता है। यह marriage सबसे permanent है।

फ़रीद यहाँ अपनी पूरी ज़िंदगी का summary दे रहे हैं। बहुत traveling, बहुत experience, बहुत interactions। और conclusion: साईं ही unique है।