वीतहव्य का प्रवेश

कथा · 15

वीतहव्य का प्रवेश

बूढ़े ऋषि ने सोचा कि मरूँ तो ऐसे मरूँ कि मरूँ ही नहीं, और एक पीपल के नीचे बैठकर उन्होंने एक-एक करके खुद को समेट लिया। यह कथा मरने की कला की एक मार्गदर्शिका है।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, मरना कैसा होगा?”

“राम, मरना हर एक के लिए अलग है। पर एक ऋषि थे, वीतहव्य, जिन्होंने मरने को एक धीमी विदाई बना लिया, अपने एक-एक अंग को धन्यवाद देकर फिर उसे छोड़ते गए। उनकी कथा सुनो।”

ऋषि

Rich painterly classical-Indian color illustration of the aged sage Vitahavya, white hair and beard with rudraksha mala, performing a fire yajna outside his thatched hermitage beside a cave high on a towering Himalayan mountain, sacred fire and offering vessels, snow peaks and a silver river below, warm dawn light; no text, no watermark, dignified

वीतहव्य एक ऋषि थे, जिनकी कुटिया एक बहुत ऊँचे पर्वत पर, एक गुफा के पास थी। बहुत बरस तक उन्होंने यज्ञ किए, पूजा की और मन्त्र पढ़े।

फिर एक दिन उन्हें यह लगने लगा –

मैं यह सब बहुत बरस से कर रहा हूँ, पर मेरी प्यास अब भी वैसी की वैसी है। यह कर्म-काण्ड मुझे वहाँ नहीं ले जा रहा जहाँ मैं सचमुच जाना चाहता हूँ।

तब उन्होंने यज्ञ रोक दिया, पूजा रोक दी और मन्त्र भी रोक दिए, और गुफा में बैठकर आँखें बन्द कर लीं।

Rich painterly classical-Indian color illustration of sage Vitahavya seated in deep meditation inside his dim mountain cave, eyes closed in self-inquiry, an oil lamp glowing beside him, faint translucent images of body, restless mind and passing thoughts dissolving around him as he turns inward to ask who he truly is; no text, no watermark, dignified

उन्होंने भीतर की ओर आत्म-विचार शुरू किया कि आख़िर मैं कौन हूँ।

क्या मैं यह देह हूँ? नहीं, क्योंकि देह तो हर पल बदलता रहता है। क्या मैं यह मन हूँ? नहीं, क्योंकि मन भी निरन्तर बदलता रहता है। क्या मैं ये विचार हूँ? नहीं, क्योंकि विचार तो आते-जाते रहते हैं।

तो फिर मैं क्या हूँ?

वीतहव्य ने अपने भीतर एक स्थिर चीज़ देखी, हर विचार का साक्षी, जो हर भाव से अलग था, पर हर भाव में था।

वही मैं हूँ।


वीतहव्य उस चेतना में स्थिर हुए, और बहुत बरस तक समाधि में रहे।

विदाई

एक दिन उन्हें लगा कि अब मुझे यह देह छोड़ देना चाहिए। पर वो इसे छोड़ें तो कैसे छोड़ें? इस देह को यूँ धक्का देकर तो नहीं छोड़ा जा सकता था, क्योंकि यही वह देह था जिसने बहुत बरस तक उनकी सेवा की थी।

तब वीतहव्य ने सोचा कि मैं इसे ठीक से, पूरे आदर के साथ विदा दूँगा।

Rich painterly classical-Indian color illustration of sage Vitahavya seated in padmasana under a tree by his cave, gazing tenderly down at his own feet which glow with a soft fading light as he gives them a grateful farewell, faint luminous outlines of other limbs waiting in a circle around him, a small fire altar nearby; no text, no watermark, dignified

उन्होंने अपने पैरों से शुरू किया – “पैरों, तुमने मुझे पहाड़ पर चढ़ाया और बहुत बरस मेरे साथ चले। अब मुझे चलने की ज़रूरत नहीं। तुम जाओ।”

उनके पैरों की संवेदना धीमी हुई, फिर रुक गई।

“जाँघों, तुमने मुझे बहुत बरस तक आसन पर स्थिर बैठाया। अब जाओ।”

जाँघों की संवेदना धीमी हुई।

“पेट, तुमने बहुत बरस तक मेरा भोजन पचाया और मुझे ऊर्जा दी। अब जाओ।”

पेट शान्त हुआ।

“हाथों, तुमने यज्ञ की लकड़ी रखी, मन्त्र की पुस्तकें पकड़ीं और बहुत प्रणाम किए। अब जाओ।”

हाथों की संवेदना धीमी हुई।


“छाती।”

“तुमने बहुत बरस तक, लाखों साँसें लीं। अब और साँस की ज़रूरत नहीं। जाओ।”

छाती धीमी हुई और साँस अब बहुत हलकी रह गई।

“गला, तुमने मन्त्र पढ़े, स्तोत्र गाए और बहुत प्रार्थना की। अब जाओ।”

गला शान्त हुआ।

“होंठ, तुमने बहुत बरस तक मेरे शब्द बाहर लाए और बहुत बात की। अब और बात नहीं। जाओ।”

होंठ शान्त हुए।

“आँखें, तुमने बहुत बरस तक मुझे यह सारी सृष्टि दिखाई, पहाड़, पेड़, सूरज, चाँद, फूल और लोग। अब और देखने की ज़रूरत नहीं। जाओ।”

आँखें बन्द हुईं।

“कान, तुमने बहुत बरस तक मुझे ब्रह्म की बात, मन्त्र, हवा और नदी सुनाई। अब जाओ।”

कान शान्त हुए।

“मन, तुमने बहुत बरस तक मुझे विचार दिए, बहुत प्रश्न और बहुत उत्तर। अब और मन की ज़रूरत नहीं। जाओ।”

मन शान्त हुआ।


वीतहव्य अब बस चेतना मात्र रह गए थे। देह वहीं बैठा था, पर वो उसमें नहीं थे; मन भी वहीं था, पर वो उसमें भी नहीं थे। वो बस वही साक्षी-चेतना थे।

Rich painterly classical-Indian color illustration of sage Vitahavya's serene seated body in stillness slowly being covered by earth and fallen leaves until a small mound forms over him, mountain forest around, a faint radiant aura suggesting his witness-consciousness spread everywhere yet nowhere, soft golden twilight; no text, no watermark, dignified

लोगों ने उन्हें कई बरस तक यूँ ही बैठे देखा। उनका देह वहीं बैठा रहा और उस पर धीरे-धीरे मिट्टी जमने लगी, पत्ते उसके चारों ओर आ गिरे, और देखते ही देखते उनके देह के चारों ओर मिट्टी की एक पूरी पहाड़ी बन गई।

पर वीतहव्य की चेतना तो कहीं और थी, हर जगह थी और साथ ही कहीं भी नहीं थी।

बहुत बरस बाद एक तपस्वी उस पहाड़ पर आए, और उन्होंने वो मिट्टी की पहाड़ी देखकर उसकी मिट्टी हटानी शुरू की। भीतर एक देह बैठा था, जिसकी आँखें बन्द थीं और चेहरा शान्त था।

तपस्वी बोले – “वीतहव्य।”

पर देह ने कोई जवाब नहीं दिया।

तपस्वी बोले – “नहीं देंगे जवाब। आप अब वहाँ नहीं हैं जहाँ जवाब देने की ज़रूरत हो।”

तपस्वी ने फिर मिट्टी डाली, उस पहाड़ी पर प्रणाम किया और चले गए।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मरना ऐसा भी हो सकता है?”

“राम, हो सकता है। पर इसके लिए जीवन में ही उस चेतना से जुड़ना ज़रूरी है जो देह से अलग है। तब मरते समय देह को धीरे से, एक-एक अंग को विदाई देकर छोड़ा जा सकता है।”

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5.82-87 पर आधारित है। वीतहव्य का अपने देह से एक-एक अंग की विदाई लेना, यह शास्त्र की सबसे ध्यानमयी कथाओं में से है। यह मृत्यु के साधनात्मक रूप का सबसे विस्तृत वर्णन है।

दर्शन-दृष्टि

वीतहव्य पूजा और यज्ञ छोड़ देते हैं। एक गुफा में आत्म-विचार में बैठते हैं। समाधि इतनी गहरी कि उनका देह मिट्टी और कीचड़ से ढक जाता है। फिर वो धीरे-धीरे अपने देह के एक-एक अंग को आभार देकर विदा करते हैं, हाथ, पैर, आँख, कान, साँस, सब को। कथा यह कहती है कि देह से अलगाव त्याग नहीं, एक प्रकार का प्रेम-पूर्वक विसर्जन है, और जब अंग-अंग आभार के साथ छूटते हैं तो वो अनुष्ठान बन जाता है।

रमण महर्षि (1879-1950) ने अपनी Self-Enquiry (Vichara Sangraham, 1901) में दिखाया कि देह-मैं का बोध हटाने के लिए देह से लड़ना नहीं, उसे अपने स्थान पर रख देखना है, कि वो उपकरण है, मैं नहीं। वीतहव्य की प्रक्रिया इसी का अनुष्ठानिक रूप है। हर अंग को छूकर, उसका धन्यवाद कहकर, उसे उसकी जगह रखकर, वो अपनी पहचान धीरे-धीरे अंग से चेतना की ओर खींच लाते हैं।