कथा · 15
वीतहव्य का प्रवेश
बूढ़े ऋषि ने सोचा – मरूँ तो ऐसे मरूँ कि मरूँ ही नहीं। एक पीपल के नीचे बैठ गए। फिर एक-एक करके खुद को समेटा। यह कथा एक मार्गदर्शिका है, मरने की कला की।
ऋषि वीतहव्य बहुत बूढ़े हो चले थे। शरीर थक गया था। हड्डियाँ चटखती थीं। दृष्टि कमज़ोर थी। बाल पूरे सफ़ेद। चेहरा सिकुड़ गया।
वो जानते थे कि अब अंत निकट है।
उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया। बोले, “बेटो, मैं अब विदा ले रहा हूँ। मगर साधारण मरण नहीं। मैं समाधि लूँगा। जब तक मेरा शरीर चलता, मैं जानता हूँ। उसके बाद – मेरा शरीर अपने आप गिरेगा। तब मेरी अंतिम क्रिया करना।”
शिष्यों ने रोए। पाँव छुए।
“गुरुजी, मगर समाधि क्या?”
“बेटो, मैं तुम्हें दिखाता हूँ। ध्यान से देखो।”
पीपल के नीचे
वो अपनी कुटिया से बाहर आए। आश्रम के बाहर एक बड़ा पीपल का पेड़ था। वर्षों पुराना। उसके नीचे एक चटाई बिछाई। पद्मासन में बैठ गए। हाथ ज्ञान-मुद्रा में। आँखें थोड़ी मूँदी।
शिष्य चारों ओर बैठ गए। चुप।
वीतहव्य ने पहले एक लंबी साँस ली। फिर साँस को नियंत्रित किया।
“बेटो, अब मैं अपनी इंद्रियों से चेतना खींच रहा हूँ। पहले आँख से।”
पहली विदाई: आँख
उन्होंने अपनी आँखें खुली रखीं, मगर देखना बंद किया।
आँखें थीं, पुतलियाँ थीं, सब चालू था। मगर उनके भीतर का “देखने वाला” हट गया। दृश्य भर गया धुँधलेपन से। फिर ख़ालीपन।
“देखो,” उन्होंने धीरे से कहा। “आँख वही है। मगर मैं उसमें नहीं।”
शिष्यों ने देखा। आँखें खुली थीं, मगर निशब्द।
दूसरी विदाई: कान
“अब कान।”
आसपास की आवाज़ें थीं – पेड़ पर पंछी, हवा का सरसर, पास के नदी की कलकल, शिष्यों की साँस।
मगर वीतहव्य ने कान से चेतना खींच ली।
“मैं अब नहीं सुन रहा। कान काम कर रहे हैं। ध्वनि उन तक पहुँच रही है। मगर सुनने वाला हट गया है।”
एक शिष्य ने उन्हें ज़ोर से पुकारा – “गुरुजी!”
वीतहव्य ने उत्तर नहीं दिया। मगर वो ज़िंदा थे। बस सुनने वाला कहीं नहीं था।
तीसरी विदाई: त्वचा
“अब त्वचा।”
हवा शरीर को छू रही थी। हलकी ठंडक थी। एक पत्ती गिरी, उनके कंधे पर।
मगर वीतहव्य को अब महसूस नहीं हो रहा था। शरीर वहीं था, चमड़ी वहीं थी। मगर स्पर्श का बोध हट गया।
“छूने वाला हट गया,” उन्होंने कहा। “अब छू भी लो, मुझे कुछ नहीं होगा।”
चौथी विदाई: जीभ
“जीभ।”
मुँह में पुरानी खुश्की का स्वाद था। एक शिष्य ने उनके होंठ पर शहद लगाया – मीठा। मगर वीतहव्य को कुछ नहीं हुआ।
“स्वाद हट गया।”
पाँचवीं विदाई: नाक
“नाक।”
आसपास का अगरबत्ती का धुआँ। पीपल की पत्तियों की हलकी सी गंध। नदी की।
“सूँघने वाला हट गया। साँस आ रही है, मगर गंध नहीं।”
पाँचों इंद्रियों से वो हट गए। मगर अभी और था।
छठी विदाई: मन
“अब मन से।”
वीतहव्य ने मन की हलचल की ओर ध्यान दिया।
मन में जो भी विचार उठ रहे थे – पुरानी यादें, छोटी कल्पनाएँ, शिष्यों के बारे में सोच – वो सब धीमे होते गए। फिर रुक गए।
“मन में अब कुछ नहीं चल रहा। बिल्कुल शांत।”
एक शिष्य ने पूछा, “गुरुजी, यह कैसे?”
वीतहव्य ने धीरे से कहा, “विचारों को रोको नहीं। बस उन्हें देखते रहो। वो अपने आप शांत हो जाते हैं। जब देखने वाला उनसे जुड़ा नहीं, तो वो टिकते नहीं।”
सातवीं विदाई: बुद्धि
“अब बुद्धि।”
निर्णय की क्षमता, फ़र्क़ करने की क्षमता – वो भी छूटी।
“क्या यह सही है, क्या वो ग़लत – यह सब बुद्धि का काम है। अब मैं कुछ नहीं तय कर रहा। बस हूँ।”
आठवीं विदाई: अहंकार
“और अब – ‘मैं वीतहव्य हूँ’ – यह विचार भी।”
उन्होंने एक गहरी साँस ली। आख़िरी “मैं” को छोड़ा।
उनके चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कान आई। फिर वो भी ग़ायब।
अब केवल चेतना बची। बिना किसी विषय के। बिना किसी रूप के। बिना किसी “मैं” के।
समाधि
वो उस अवस्था में बैठे रहे।
दिन बीते। सूरज उठा, ढला। फिर उठा, ढला।
शिष्यों ने उन्हें छुआ – वो सख़्त थे, मगर मरे नहीं थे। साँस इतनी धीमी कि कोई नहीं देख सकता था कि वो जी रहे हैं।
हफ़्ते बीते। महीने।
शिष्य पहले हर रोज़ आते। फिर हफ़्ते में एक बार। फिर भूल गए।
बारिश आई। बर्फ़ गिरी। हवा चली।
पंछियों ने उनके सिर पर घोंसला बनाया। एक चिड़िया का परिवार आया। बच्चे पैदा हुए। बड़े हुए। उड़ गए। फिर नए बच्चे।
एक बेल चढ़ी। उनके कंधे पर। उनके हाथ पर। धीरे-धीरे उनकी पूरी देह को ढक दिया।
चींटियाँ आईं। एक छोटा घोंसला बनाया उनकी हथेली में। फिर निकल गईं।
उनकी देह पत्थर सी हो गई। मगर भीतर – चेतना अभी भी थी।
कितने युग बीते, यह कहना मुश्किल है। शायद कई।
अंतिम वापसी
एक दिन – जब आख़िरी समय आया – वो लौटे।
थोड़ी सी चेतना देह में डाली। एक पल के लिए। एक पल के लिए वो वीतहव्य फिर से बने।
देह ने एक हलकी हलचल की। एक छोटी साँस आई।
उन्होंने बेल को महसूस किया। पंछियों के घोंसले को। चींटियों को।
एक मुस्कान आई।
“बहुत समय बीता।”
फिर उन्होंने वो आख़िरी चेतना भी छोड़ी। शरीर ढह गया। बेल ने उसे थामा। फिर देह धीरे-धीरे मिट्टी में मिल गई।
वीतहव्य चले गए, मगर मरे नहीं। वो कहीं नहीं गए। बस “वो” नहीं रहे। चेतना अपने स्रोत में मिली।
एक छात्र पास से गुज़रा। पीपल के नीचे एक मूर्ति देखी – शांत, सीधी, बेल से ढकी। सोचा यह कोई पुरानी मूर्ति है। हाथ जोड़े और चला गया।
उसी रात उस छात्र को सपने में एक शांत बूढ़ा मिला। बूढ़े ने एक छोटी सी बात कही – “बेटा, मरना भी एक कला है। मैंने सिखाई। तुम भी सीखो जब समय आए।”
छात्र ने सपने में हाथ जोड़े। सुबह उठा। उस दिन से वो भी ध्यान करने लगा।
मार्ग
वीतहव्य की कथा एक मार्ग है। अगर कोई मरना चाहे – असली मरना, सजगता के साथ – तो यह कथा सिखाती है।
आठ चरण – आँख, कान, त्वचा, जीभ, नाक, मन, बुद्धि, अहंकार। एक के बाद एक। हर एक से चेतना खींचो। हर एक को पीछे छोड़ो।
आख़िर में जो बचता है – वो शुद्ध चेतना। वही असली है। वही कभी मरती नहीं।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, मरना भी एक कला है। वीतहव्य ने मरना सिखाया। उन्होंने मरते हुए भी जीना सीखा। बस जीना देह में नहीं था, उससे ऊँचे में था।
“और एक बात – यह कला सिर्फ़ मरने के लिए नहीं। यह कला रोज़ की भी है। हर रात सोते समय एक बार यह करो। आठ चरण से होकर। तब नींद बस नींद नहीं रहेगी, समाधि बन जाएगी।”
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