← संग्रह
क्रियाएँ
योग और वेदान्तमन, जागरण और अद्वैत

वीतहव्य: समाधि, पुनरागमन और निर्वाण

कथा · 13

वीतहव्य: समाधि, पुनरागमन और निर्वाण

विन्ध्य की एक कन्दरा में वीतहव्य ने मन और इन्द्रियों की गति को विवेक की दृष्टि से परखा। तीन सौ वर्ष की समाधि के बाद भी उनकी कथा समाप्त नहीं हुई। शरीर में पुनरागमन, छह दिन की दूसरी समाधि, दीर्घ जीवन्मुक्त जीवन और अन्ततः प्रणव में विश्रान्ति तक यह प्रसंग ज्ञान की परिपक्वता का विस्तृत वृत्तान्त है।

विन्ध्य में एक दूसरी दृष्टि

वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा, “जिस विचार का संकेत मैंने अभी किया, उसे ब्रह्माजी ने विन्ध्याचल पर मुझसे कहा था। अब एक और दृष्टि सुनो। महामुनि वीतहव्य ने इसी का आश्रय लेकर परम पद प्राप्त किया।”

वीतहव्य को सांसारिक व्यापार में आधि, व्याधि और भ्रम की लम्बी परम्परा दिखाई देने लगी। बाहरी उपलब्धियाँ मन को कुछ समय के लिए व्यस्त रखती थीं, फिर उसी असन्तोष की ओर लौटा देती थीं। इस अनुभव से उनका वैराग्य गहरा हुआ। वे दिगम्बर भाव से पर्वतों की कन्दराओं में विचरते रहे और निर्विकल्प समाधि के योग्य एकान्त की खोज करते रहे।

एक समय उन्होंने अपनी गौर कुटी छोड़ दी और केले के पत्तों से श्याम कुटी बनाई। भूमि पर कुश बिछाया, उसके ऊपर मृगचर्म रखा और पद्मासन में बैठ गए। ग्रीवा सीधी थी, शरीर सहज रूप से स्थिर था। उन्होंने इन्द्रियों को विषयों से समेटा और मन की वृत्ति को भीतर की ओर मोड़ा।

एकान्त मिल गया था, पर मन अपनी पुरानी चाल पर था। कभी गन्ध की ओर जाता, वहाँ से हटाया जाता तो रस की ओर दौड़ पड़ता। रस से लौटाने पर रूप, शब्द अथवा स्पर्श उसका नया आश्रय बन जाते। वीतहव्य ने देखा कि उसकी गति तरंगों में पड़े सूखे पत्ते जैसी है। क्षण भर बाद वह किसी दूसरी डाल पर जा बैठे वानर की तरह नया विषय पकड़ लेता है।

उन्होंने मन को सम्बोधित किया, “तुम इन विषयों में किस तृप्ति की आशा रखते हो? रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श अपने स्वभाव से जड़ हैं। इनके पीछे भागती इन्द्रियाँ भी साधन मात्र हैं। बार बार ग्रहण करने पर तुम्हारी प्यास बढ़ती है और शान्ति दूर होती जाती है। अपनी गति को देखो और उस चेतना की ओर लौटो जिसके प्रकाश में यह सारा व्यापार दिखाई देता है।”

मन और इन्द्रियों से संवाद

वीतहव्य का विचार धीरे धीरे मन के दावे तक पहुँचा। मन अपने को कर्ता, भोक्ता और देह का स्वामी मानता था। मुनि ने उससे कहा, “तुम्हारी प्रत्येक चेष्टा साक्षी आत्मा के प्रकाश में जानी जाती है। उस प्रकाश को अपनी उपलब्धि मान लेने से तुम्हें स्वतन्त्र सत्ता का अभिमान हुआ। देह के सुख और दुःख को अपना कहने की आदत भी इसी अभिमान से बनी।”

उन्होंने साधारण उपकरणों का उदाहरण दिया। दराँती घास काटती हुई दिखाई देती है। वह उसे चलाने वाले हाथ की शक्ति से ही काट पाती है। तलवार प्रहार का साधन है, उसका अपना कोई संकल्प नहीं होता। पात्र से जल पिया जाता है, फिर भी पीने की क्रिया पात्र की नहीं कही जाती। इसी प्रकार मन और इन्द्रियाँ चेतना के उपकरण हैं। उनके व्यापार को देखकर उनमें स्वतन्त्र कर्तापन मान लेना विवेक की भूल है।

“मन,” उन्होंने भीतर कहा, “तुम्हारी आकृति संकल्प से बनती है और वासना उसे बार बार दृढ़ करती है। अज्ञान तुम्हारा मूल है। विवेक के प्रकाश में वह मूल सूखने लगता है। तब आत्मा को सिद्ध करने के लिए किसी दूसरी वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती। वह स्वयंप्रकाश है और तुम्हारी प्रत्येक गति का साक्षी है।”

यह संवाद दीर्घ और क्रमिक था। वीतहव्य अपने अनुभव की हर परत को देखते चले गए। मन की चंचलता के साथ इच्छा, चिन्ता, लोभ, क्रोध, मोह और भय उठते थे। राग और द्वेष देह को अपनी ओर खींचते थे। शुभ गुणों के लिए स्थान संकुचित होता जाता था।

विवेक गहरा हुआ तो भीतर की दशा बदलने लगी। वासना का आवरण हल्का पड़ा। समता, शान्ति, क्षमा, करुणा, मैत्री और सन्तोष स्वाभाविक रूप से प्रकट हुए। वीतहव्य के अनुभव में आत्मा की स्थिरता स्वयंसिद्ध थी। मन का कोलाहल शान्त होने पर वही स्थिरता स्पष्ट दिखाई दी।

उन्होंने कहा, “चिन्ता का ताप उतर गया है। चित्त की कल्पित स्वतन्त्रता अब अपना प्रभाव खो चुकी है। मैं उस निर्मल चेतना में स्थित हूँ जो आरम्भ और अन्त से रहित है। इसी में मन का विश्राम है और इसी में इन्द्रियों की दौड़ समाप्त होती है।”

तीन सौ वर्ष की समाधि

इस निश्चय के साथ वीतहव्य विन्ध्याचल में किसी झरने के निकट की कन्दरा में समाधिस्थ हुए। इन्द्रियों की वृत्तियाँ भीतर लौट आईं। प्राण और मन का स्पन्द क्रमशः शान्त हो गया। उनके नेत्र आधे मुँदे थे और नासिका के अग्रभाग पर उनकी मन्द ज्योति अधखिले कमलों जैसी दिखाई देती थी। शिर, ग्रीवा और शरीर एक सीध में थे। उनकी आकृति शिला पर उकेरी हुई प्रतिमा जैसी स्थिर थी।

विन्ध्य की कन्दरा में गहन समाधि में प्रवेश करते वीतहव्य

ऋतुएँ आती रहीं। मेघ बरसे, गर्जना हुई और पर्वतों पर जलधाराएँ बहती रहीं। वन में पशुओं का स्वर उठा, आखेट के समय राजाओं और उनके दल का कोलाहल गूँजा, वानर पुकारे, हाथी चले, वनाग्नि लगी, पत्थर गिरे, वायु चली और धूप पड़ी। वीतहव्य की समाधि अविचल रही। वर्षा की मिट्टी और धूल शरीर को ढकती गई। ऊपर घास उग आई और वह देह पर्वत में दबी शिला के समान दिखाई देने लगी।

दीर्घ समाधि के समय मिट्टी, धूल और घास से ढकता वीतहव्य का शरीर

इसी अवस्था में तीन सौ वर्ष बीत गए, मगर समाधि के अनुभव में वह अवधि आधे मुहूर्त जैसी लगी। तब चित्त में हल्का स्पन्द उठा। प्राण अभी निस्पन्द थे और शरीर मिट्टी में दबा था। उस प्रथम स्पन्द में वीतहव्य ने अपने को कैलास पर कदम्ब वृक्ष के नीचे देखा। वहाँ उन्होंने सौ वर्ष मौन, निर्मल और जीवन्मुक्त भाव से बिताए। फिर सौ वर्ष विद्याधरों के बीच विचरे। इसके बाद पाँच युगों का अनुभव हुआ और इन्द्र का पद दिखाई दिया, जहाँ देवता उन्हें प्रणाम कर रहे थे। फिर एक कल्प तक वे चन्द्रधार सदाशिव के गण के रूप में, समस्त विद्याओं के ज्ञाता और त्रिकालदर्शी होकर विचरते दिखाई दिए।

श्रीराम ने इस असाधारण क्रम पर प्रश्न किया। वसिष्ठ ने समझाया कि चित्त संकल्परूप है। उसमें देश, काल और पहचान का जैसा प्रबल संस्कार उठता है, अनुभव उसी रूप में विस्तृत हो जाता है। ज्ञानी उस सम्पूर्ण दृश्य को आत्मा में उठती अनुभूति की तरह देखता है। वीतहव्य के भीतर उठी यह दीर्घ यात्रा मन के संस्कार की अनुभूत अभिव्यक्ति थी। समाधिस्थ देह उसी समय विन्ध्य की कन्दरा में पड़ी रही।

सूर्य के सारथी अरुण

श्रीराम ने पूछा, “गुरुदेव, विन्ध्याचल में मिट्टी से ढका उनका शरीर फिर किस दशा में रहा?”

वसिष्ठ ने कहा कि वीतहव्य ने अपने पूर्व शरीरों पर दृष्टि डाली। कई शरीर नष्ट हो चुके थे। विन्ध्य की कन्दरा वाला शरीर अभी सुरक्षित था। वर्षा का प्रवाह उसे कुछ दूर बहा ले गया था। पीठ पर कीचड़ की परत जम गई थी और देह मिट्टी, काश तथा तृणजाल में गहरी धँसी थी। मुनि ने पहले सोचा कि उसे उसी दशा में रहने दिया जाए। फिर भीतर यह बोध उठा कि उस देह के प्रारब्ध का कुछ वेग शेष है। उसे उचित रूप से निकालना भी उसी स्वाभाविक क्रम का भाग है।

वीतहव्य सूक्ष्म पुर्यष्टक रूप से आकाशमार्ग में उठे, सूर्य मण्डल में वायु की तरह प्रवेश किया और सूर्य भगवान को प्रणाम किया। सूर्य ने उनके आगमन का आशय जान लिया। उन्होंने अपने सारथी अरुण से कहा कि विन्ध्य की कन्दरा में दबे मुनि के शरीर को बाहर निकाल दें।

अरुण का शरीर हाथी के समान विशाल बताया गया है और उनके नख पर्वत की कठोर भूमि को विदीर्ण करने में समर्थ थे। वे कन्दरा में पहुँचे और मिट्टी में गड़े शरीर को सावधानी से निकाल लिया। वीतहव्य ने सूक्ष्म रूप से अपनी देह में प्रवेश किया, अरुण को प्रणाम किया और अरुण ने भी उन्हें आदर दिया। दोनों अपने अपने मार्ग पर चले गए।

मुनि का शरीर कीचड़ से भरा था। वे एक निर्मल सरोवर पर गए। उसके कुमुद तारों जैसे खिले थे और बाल सूर्य की लालिमा जल पर उतर रही थी। वीतहव्य ने उसमें डुबकी लगाकर शरीर को स्वच्छ किया। फिर सन्ध्या कर्म किया और सूर्य भगवान की पूजा की। तप से दीप्त देह फिर शोभित हुई। मैत्री, समता, सन्तोष और मुदिता उनके व्यवहार में सहज रूप से उपस्थित थे। इन गुणों के प्रति भी कोई स्वामित्व भाव नहीं था।

छह दिन और एक दीर्घ जीवन्मुक्त जीवन

कुछ दिन बीतने के बाद समाधि की प्रेरणा फिर उठी। वीतहव्य विन्ध्य की उसी कन्दरा में लौटे और अचल होकर बैठे। उन्होंने मन तथा इन्द्रियों से कहा कि अस्ति और नास्ति की कल्पना अब शान्त हो चुकी है। आत्मा की समान सत्ता में उनका चित्त विश्राम पा चुका है।

इस बार समाधि छह दिन चली। जागने पर उन्हें यह अवधि क्षण भर जैसी लगी। इसके बाद वे जीवन्मुक्त होकर विचरते रहे। चलते, बैठते और इन्द्रियों से व्यवहार करते हुए उनकी समता बनी रही। प्रिय और अप्रिय, दोनों अनुभवों के बीच चित्त सम रहा। ग्रहण और त्याग की आग्रहपूर्ण वृत्ति शान्त थी।

वीतहव्य अगस्त्य मुनि के पुत्र थे। उनका यह जीवन्मुक्त जीवन बीस हजार और सात सौ वर्ष तक चला।

इतनी दीर्घ अवधि के बाद वीतहव्य ने हिमालय की एक कन्दरा में प्रवेश किया। पद्मासन बाँधा, हाथ जोड़े और अपने जीवन के परिचित भावों तथा साधनों को आदरपूर्वक विदा देने लगे। उनका स्वर कटुता से रहित था। जिन अनुभवों ने विवेक को परिपक्व किया, उन सबके प्रति कृतज्ञ स्मृति थी।

अन्तिम प्रणाम

वीतहव्य ने राग को सम्बोधित किया, “तुम्हारे साथ मैंने दीर्घकाल तक विवेक से रहित क्रीड़ा की। अब निरागता और निर्द्वेषता में विश्राम करो। तुम्हें मेरा प्रणाम।” भोग को स्मरण करते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि उसकी लालसा ने परम पद की स्मृति ढक दी थी। अब वह लालसा अपना अधिकार खो चुकी थी।

दुःख को प्रणाम करते समय उनका भाव विशेष कोमल था। “तुम्हारे आने पर आत्मपद की इच्छा जागी,” उन्होंने कहा, “तुम्हारे उपदेश ने विवेक को तीखा किया और उसी विवेक ने तुम्हारी सीमा दिखा दी। तुम्हारा कल्याण हो।”

उन्होंने मातृरूप तृष्णा को विदा दी, जो अनेक जन्मों तक साथ रही थी। कामदेव को प्रणाम किया, जिसका बहिर्मुख वेग अन्तर्मुख होते ही शान्त हो गया। सुकृत को याद किया, जिसने नरक से उठाकर स्वर्ग के अनुभवों तक पहुँचाया था। दुष्कृत को भी स्मरण किया, जिसके क्षेत्र में दुःख के फल मिले। मोह से कहा कि भय और बन्धन के जिन रूपों में वह साथ रहा, वे अब समझ में आ चुके हैं।

फिर उन्होंने गिरिकन्दरा को प्रणाम किया, जहाँ दीर्घ तप हुआ था। बुद्धि और विवेक को धन्यवाद दिया, क्योंकि उनके सहारे संसार बन्धन ढीला पड़ा। तपस्वी के पुराने दण्ड और तुम्बे को विदा दी। देह से कहा, “रक्त और मांस का यह पिंजर बहुत काल तक मेरा सहचर रहा। इसी में विवेक का उदय हुआ और इसी के माध्यम से परम पद की पहचान मिली। तुम्हें मेरा प्रणाम।”

उन्होंने संसार के व्यवहारों को स्मरण किया। अनेक कर्म, देश और अवस्थाएँ उनके अनुभव में आ चुकी थीं। अन्त में इन्द्रियों, प्राणों और मन से बोले, “हमारा चिरकाल का संयोग अब पूर्णता पर पहुँचा है। तुम अपने अपने मूल में विश्राम करो।”

शक्तियों का अपने स्रोतों में लौटना

वीतहव्य ने नेत्रों की ज्योति को सूर्य मण्डल में लीन होने दिया। गन्ध की शक्ति पृथ्वी में लौटी। प्राण का स्पन्द वायु में, शब्द आकाश में, मन चन्द्रमा में और जिह्वा की रस शक्ति अपने मूल रस तत्त्व में शान्त हुई। लकड़ी चुकने पर अग्नि की ज्वाला शान्त होती है, तेल समाप्त होने पर दीपक स्थिर हो जाता है और सूर्यास्त के साथ दिन का प्रकाश सिमटता है। उसी सहजता से मन और इन्द्रियों का व्यापार विराम की ओर गया।

उनका मन शब्दब्रह्म प्रणव के ध्यान में लगा। बाहरी और भीतरी, स्थूल और सूक्ष्म विषय क्रमशः शान्त हुए। प्रकाश की वृत्ति उठी और विलीन हुई। तम का संस्कार भी शान्त हुआ। अभाव की सूक्ष्म धारणा छूटी तो चेतना उस सहज स्थिति में पहुँची जिसकी उपमा जन्मे हुए शिशु की विषय ज्ञान से रहित निर्मलता से दी गई है। फिर सुषुप्ति सदृश सत्तामात्र और उससे आगे तुरीय विश्रान्ति का अनुभव हुआ।

वीतहव्य ने अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रा के क्रम से प्रणव की ध्वनि का अनुसरण उस मौन तक किया जहाँ शब्द का आधार भी शान्त हो जाता है। उस एक परम सत्य के लिए ब्रह्म, विज्ञान, ईश्वर, शिव, विष्णु, परमशक्ति, काल और आत्मा जैसे अनेक नाम कहे गए हैं। नामों की विविधता उसी अविभाज्य अनुभूति की ओर संकेत करती है।

परम विश्रान्ति में उनका शरीर शीतकाल में वृक्ष से गिरे सूखे पत्ते की तरह भूमि पर गिर पड़ा। शरीर रूपी वृक्ष के हृदय रूपी नीड़ में रहने वाला प्राण पक्षी चिदाकाश में पहुँच गया।

वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा, “वीतहव्य की यह विचारपूर्ण कथा मैंने तुम्हें सुनाई। इसका मनन अपनी निर्मल बुद्धि से करो। ज्ञान अज्ञान और बन्धन के कारणों को समाप्त करता है और साधक अपने स्वभाव में विश्राम पाता है।”

श्रीराम के प्रश्न और वसिष्ठ का उत्तर

कथा पूरी होने पर श्रीराम के मन में तीन प्रश्न उठे। वीतहव्य के पास सूर्य मण्डल तक जाने और देह में पुनः प्रवेश करने की शक्ति कैसे आई? मिट्टी में दबा शरीर तीन सौ वर्ष तक नष्ट क्यों नहीं हुआ? चित्त के शान्त होने पर मैत्री और करुणा जैसे गुण किस प्रकार बने रहे?

वसिष्ठ ने पहले सिद्धि और आत्मज्ञान का भेद समझाया। आकाश गमन, सूक्ष्म प्रवेश और अन्य असाधारण सामर्थ्य अपने अपने योग, मन्त्र, द्रव्य, क्रिया, काल और अभ्यास से प्रकट होते हैं। आत्मज्ञान का फल आत्मा में तृप्ति है। वीतहव्य की सूर्य मण्डल तक पहुँचने की क्षमता उनके पूर्व साधन से आई थी। ज्ञान के परिपक्व होने पर उस शक्ति के प्रति उनकी कोई आकांक्षा शेष नहीं रही।

शरीर की रक्षा के विषय में वसिष्ठ ने समता और निस्पन्दता का कारण दिया। वीतहव्य के प्राणों का भीतर और बाहर चलने वाला स्पन्द शान्त था। चित्त भी क्षोभ से रहित था। हिंसा के भाव से समीप आने वाले जीव उस समता के प्रभाव में अपनी हिंसक वृत्ति खो देते थे। वसिष्ठ के अनुसार ऐसी निस्पन्द अवस्था में योगी का शरीर सहस्र वर्ष तक भी अपनी दशा में रह सकता है। इसी कारण सिंह, भेड़िये और सियार शरीर को भक्षण नहीं कर सके और पृथ्वी में दबे होने पर भी शरीर सुरक्षित रहा।

मैत्री और करुणा के प्रश्न पर वसिष्ठ ने भुने हुए बीज की उपमा दी। जीवन्मुक्त का मन व्यवहार के लिए उपस्थित रहता है। उसमें बन्धन का नया अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति शान्त हो चुकी होती है। ऐसे चित्त में मैत्री, करुणा और समता सहज गुणों की तरह खिलते हैं। विदेहमुक्ति में चित्त का वह व्यवहारिक रूप भी शान्त हो जाता है। इस प्रकार वीतहव्य की समाधि, उनका पुनरागमन, जीवन्मुक्त आचरण और अन्तिम निर्वाण एक ही परिपक्व ज्ञान की क्रमिक अवस्थाएँ हैं।

English