विदुरथ का सपना

कथा · 31

विदुरथ का सपना: सपने के भीतर सपना

राजा सोया तो ऋषि बना। ऋषि सोया तो राजा बना। उठने पर पता नहीं चला कौन कौन है। फिर एक ने कहा – दोनों भी और कोई नहीं भी।

राजा विदुरथ नींद में थे। महल के सोने के पलंग पर लेटे थे। बाहर पहरेदार चहलक़दमी कर रहे थे।

नींद में उन्होंने एक सपना देखा।

सपने में वो वन में थे। एक ऋषि की कुटिया में। ऋषि का नाम कौंदिन्य। बहुत साधना करते थे। राजा-वगैरा नहीं थे।

सपने में राजा को लगा कि वो कौंदिन्य ही हैं। उन्होंने वर्षों तप किया। मगर कौंदिन्य भी थक जाते थे। एक रात वो भी सोए।

कौंदिन्य के सपने में एक राजा था। बड़े राज्य का। सोने के सिंहासन पर बैठा। नाम विदुरथ।

विदुरथ ने राज्य चलाया। न्याय किया। बहुत सालों बाद वो भी सोए।

विदुरथ का सपना जागा।

राजा विदुरथ ने आँखें खोलीं।

उनका सिर घूमा। उन्हें कुछ नहीं समझ आया।

“मैं कौन हूँ?”

“मैं विदुरथ हूँ, जो ऋषि कौंदिन्य का सपना देख रहा था?”

“या मैं कौंदिन्य हूँ, जो विदुरथ का सपना देख रहा था?”

“या दोनों किसी और के सपने में हैं?”

उन्होंने अपना हाथ देखा। राजा का हाथ। अंगूठियाँ पहनी। मुलायम, साफ़।

“मैं विदुरथ हूँ।” मगर इतना यक़ीन से नहीं कह पाए।

उठे। महल में घूमे। सब कुछ वैसा ही था। मंत्री दौड़े आए। “महाराज, अच्छी नींद आई?”

विदुरथ ने धीरे से कहा, “हाँ। अच्छी नींद।” मगर भीतर ही भीतर वो जानते थे – कुछ बदल चुका है।

उन्होंने एक ऋषि को बुलवाया। पूरी कथा सुनाई।

“ऋषिवर, बताइए – कौन सच्चा है? विदुरथ या कौंदिन्य?”

ऋषि ने धीरे से कहा, “महाराज, दोनों सच्चे हैं। और दोनों झूठे हैं।”

“यह कैसे?”

“विदुरथ के लिए कौंदिन्य सपना है। कौंदिन्य के लिए विदुरथ सपना है। दोनों अपने ख़ुद के लिए सच्चे हैं। दूसरे के लिए सच्चे नहीं हैं।”

“तो असली क्या है?”

“वो जो दोनों को देख रहा है। वो जो विदुरथ की नींद में जागता है। वो जो कौंदिन्य की नींद में जागता है। वो जो आपके पूछने में अब जागा हुआ है। वो असली है।”

“वो कौन है?”

ऋषि मुस्कुराए। “वो आप हैं। मगर वो विदुरथ नहीं हैं। न कौंदिन्य। न दोनों। न कोई। बस चेतना।”

विदुरथ ने आँखें मूँदीं। बहुत देर तक चुप बैठे रहे।

जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो उनके भीतर एक बदलाव था। अब वो विदुरथ-होने को इतना सच नहीं मानते थे। वो जानते थे कि किसी न किसी की नींद में वो भी एक सपना हो सकते हैं।

मगर इस बात ने उन्हें डराया नहीं। बल्कि हलका कर दिया।

राजा रहे, मगर हलके राजा। फ़ैसले लिए, मगर बंधे नहीं। ज़िम्मेदारी निभाई, मगर बोझ नहीं उठाया।

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, हम जिसे जागृत जीवन कहते हैं, वो भी किसी सपने का हिस्सा हो सकता है। और हम जिसे सपना कहते हैं, वो भी किसी का जीवन हो सकता है। पर्तें ख़त्म नहीं होतीं। मगर पर्तों के पीछे जो देख रहा है, वो एक है। उसे पकड़ो, बाक़ी सब छोड़ दो।”

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