कथा · 31
विदुरथ का सपना: सपने के भीतर सपना
राजा विदुरथ अपने राज्य के लिए लड़ रहे थे, और उन्हें पता तक नहीं था कि वो ख़ुद किसी और के सपने के भीतर हैं। मरते समय ऊपर से एक आहट उन तक पहुँची, और उसके बाद सिन्धु ने उन्हें मरे हुए से फिर उठते देखा।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या एक सपने का राजा सच में लड़ सकता है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, लीला की कथा में जो विदुरथ थे, उनकी कहानी एक अलग रूप में भी सुनी जा सकती है। विदुरथ अपने आप में एक राजा थे, पर वो किसी और के सपने में थे। फिर भी उनका युद्ध असली था, उनका घाव असली था, और उनकी मृत्यु भी असली थी।”
राज्य

विदुरथ एक राजा थे। उनका राज्य बड़ा था, उनकी सेना बड़ी थी, उनकी रानी दूसरी लीला थीं, और उनके मन्त्री वफ़ादार थे।
विदुरथ युवा थे, शायद बीस-इक्कीस बरस के। उनकी दाढ़ी अभी पूरी नहीं आई थी, होंठों के ऊपर बस मूँछों की एक पतली रेखा थी।
उनकी एक आदत थी कि जब वो किसी की बात सुनते, तो दाहिने हाथ की उँगलियाँ अपनी कलाई पर पड़ी सोने की कड़ी पर थपकी देते रहते। यही उनके सोचने का स्वर था।
विदुरथ नहीं जानते थे कि वो किसी और के सपने में हैं। वो ख़ुद को अपनी ही कथा का नायक समझते थे।
राज्य में सब अच्छा था। प्रजा सुखी थी, खज़ाना भरा था, और सीमाएँ सुरक्षित थीं। पर एक समस्या थी।
सीमा
राज्य की एक सीमा पर एक दूसरा राज्य था, जिसके राजा का नाम सिन्धु था।

सिन्धु बूढ़े थे, उनकी दाढ़ी पूरी सफ़ेद हो चुकी थी, पर उनकी आँखें अब भी किसी युवा की तरह तेज़ थीं। उनके पास एक बड़ी सेना थी, और उन्हें विदुरथ का राज्य चाहिए था।
आख़िर चाहिए क्यों था? यह कथा बहुत पुरानी थी। सिन्धु के पिता और विदुरथ के पिता के बीच बहुत बरस पहले एक झगड़ा हुआ था।
झगड़ा एक सीमा-नदी पर था, उस नदी पर जो दोनों राज्यों के बीच बहती थी। बात यह थी कि उस पर अधिकार आख़िर किसका है।
समय के साथ दोनों पिता चल बसे। विदुरथ के पिता अपने बेटे से कह गए थे कि नदी हमारी है, और ठीक वही बात सिन्धु के पिता भी अपने बेटे से कह गए थे।
विदुरथ ने नदी अपने पास रखी, और सिन्धु ने इसे कभी नहीं माना। बहुत बरस तक वो इस बात पर चुप रहे, पर अब सिन्धु बूढ़े हो चले थे, और उन्होंने मन में सोचा कि मेरा समय निकलता जा रहा है, और इस झगड़े का हल मुझे अपने ही जीवन में, अपने पिता के लिए, कर लेना है।
और इसी सोच के साथ सिन्धु की सेना सीमा पर इकट्ठा होने लगी।
तैयारी
विदुरथ ने यह ख़बर सुनी।
सुनते ही उन्होंने तुरन्त अपने मन्त्रियों को बुलवा भेजा।
रात को राज-सभा जुटी। बहुत से दीप जल रहे थे। मन्त्री और सेनापति बैठे थे, और बीच में विदुरथ थे।
विदुरथ ने मन्त्री की ओर देखकर पूछा – “सिन्धु आख़िर अब क्यों आए?”
मन्त्री बोले – “महाराज, सिन्धु बहुत बूढ़े हो चले हैं। उनके पिता और आपके पिता के बीच जो झगड़ा था, उसे उन्होंने अपने पूरे जीवन भर सम्हाल कर रखा है, और अब वो उसे हल कर लेना चाहते हैं।”
विदुरथ का हाथ कलाई की कड़ी पर पहुँचा और उस पर एक थपकी पड़ी। फिर वो बोले – “मैं उनसे ख़ुद मिलूँगा। पहले एक दूत भेजेंगे, सन्धि की बात लेकर।”
सेनापति बोले – “महाराज, मुझे नहीं लगता कि सिन्धु सन्धि करेंगे।”
विदुरथ बोले – “फिर भी, एक बार बात तो करनी ही होगी।”
दूत
दूत गए, और एक सप्ताह बाद लौटे।
विदुरथ ने उन्हें देखकर कहा – “बोलो, क्या हुआ?”
दूत बोले – “महाराज, सिन्धु सन्धि से साफ़ मना करते हैं।”
दूत ने आगे कहा – “वो कहते हैं कि यह बात जीत से हल होगी, सन्धि से नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि हमारी सेना अधिकार-नदी के दूसरे किनारे पर है, और उन्हें वो किनारा भी चाहिए।”
विदुरथ कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “तो युद्ध।”
यह सुनकर मन्त्री ने धीरे से सिर झुका लिया।
विदुरथ अपने कक्ष में लौटे, जहाँ रानी उनकी राह देख रही थीं।
रानी ने पूछा – “महाराज, क्या निर्णय हुआ?”
विदुरथ बोले – “युद्ध।”
रानी ने पूछा – “आप ख़ुद जाएँगे? पर क्यों आप?”
विदुरथ बोले – “क्योंकि यह मेरा युद्ध है, मेरे पिता का झगड़ा है, और इसका हल भी मेरा ही है। मैं अपनी सेना के पीछे छिप नहीं सकता।”
रानी ने बस इतना कहा – “लौटिए।”
विदुरथ बोले – “लौटूँगा।”
रात
उस रात विदुरथ भर नहीं सोए। उन्होंने अपनी तलवार पर तेल लगाया, उसे कपड़े से पोंछा, फिर तेल लगाया, फिर पोंछा। हर युद्ध से पहले यही उनकी आदत थी।
रानी पास बैठीं और एक मटकी में हलदी का पानी घोलने लगीं।
रानी बोलीं – “महाराज, आपके बाज़ू पर वो पुरानी चोट है। मैं उस पर यह हलदी लगा दूँ।”

रानी ने हलदी लगाई, और लगाते हुए उनके हाथ हलके से काँप गए।
विदुरथ ने रानी का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा – “रानी, आपने कभी मेरे साथ युद्ध की बात नहीं की।”
रानी बोलीं – “नहीं, महाराज। मैंने जान-बूझकर नहीं की, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि आप जाने से पहले अपनी रानी से उलझें।”
विदुरथ बोले – “रानी, आप सचमुच समझदार हैं।”
रानी ने सिर झुकाकर कहा – “महाराज, मेरे लिए बस एक चीज़ करिए।”
विदुरथ बोले – “बोलिए।”
रानी बोलीं – “लौटिए।”
विदुरथ ने चुपचाप यह वचन मान लिया।
सुबह
सुबह सेना चल पड़ी। विदुरथ अपने रथ पर थे और उनकी सेना उनके पीछे।
रानी द्वार पर खड़ी रहीं। उन्होंने पीछे मुड़कर विदुरथ को एक बार देखा, फिर अपनी आँखें झुका लीं। विदुरथ आगे बढ़ गए।
रास्ते में
रथ चलता रहा। विदुरथ अपने रथ पर थे और सेना उनके पीछे चलती रही।
सेना बड़ी थी, जिसमें हाथी, घोड़े, पैदल और तीरंदाज़ सब थे। विदुरथ ने अपने पीछे एक नज़र दौड़ाई, तो दूर तक बस लोग ही लोग दिखे।
हर सैनिक किसी न किसी का बेटा था, किसी का पति, किसी का पिता। विदुरथ ने सोचा कि मैं इन्हें युद्ध में ले जा रहा हूँ, और इनमें से बहुत से लौटकर नहीं आएँगे। यह सोच कठिन थी, पर उन्होंने उसे अपने भीतर ही दबा रखा।
बीच रास्ते में सेना एक नदी के किनारे रुकी। रात उतर आई, और सैनिकों ने आग जलाई, खाना पकाया और आपस में बातें कीं।
विदुरथ अपने रथ से उतरकर सैनिकों के बीच चले गए।

एक बूढ़े सैनिक के पास बैठकर उन्होंने पूछा – “भाई, तुम्हारा नाम क्या है?”
सैनिक बोला – “दत्त।”
विदुरथ बोले – “दत्त, तुमने अब तक कितने युद्ध देखे हैं?”
बूढ़ा सैनिक बोला – “महाराज, मैंने तीन युद्ध देखे हैं। एक आपके पिता के समय, एक चचेरे राजा के समय, और एक हमारे पड़ोसी से। यह चौथा होगा।”
विदुरथ ने पूछा – “डर लगता है?”
बूढ़ा बोला – “महाराज, पहले बहुत लगता था, पर अब नहीं। उम्र के साथ डर अपने आप कम हो जाता है।”
विदुरथ ने पूछा – “क्यों?”
बूढ़ा बोला – “क्योंकि बहुत बार मरते-मरते बचा, पर मरा नहीं। बहुत बार ज़ख़्मी हुआ, पर ठीक हो गया। अब लगता है कि कुछ भी हो जाए, मैं तो हूँ ही।”
विदुरथ ने पूछा – “और तुम्हारा परिवार?”
बूढ़ा बोला – “महाराज, मेरी पत्नी है और चार बच्चे, तीन बेटे और एक बेटी।”
विदुरथ ने पूछा – “वो डरते हैं?”
बूढ़ा बोला – “महाराज, बहुत। हर बार जब मैं युद्ध में जाता हूँ, मेरी पत्नी रात भर नहीं सोती।”
विदुरथ कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “दत्त, मैं लौटूँगा तो तुम्हारे परिवार से ज़रूर मिलूँगा।”
बूढ़ा बोला – “महाराज?”
विदुरथ बोले – “हाँ, अगर मैं लौटा।”
बूढ़े ने सिर झुकाकर कहा – “महाराज, धन्यवाद।”
विदुरथ उठकर अपने रथ के पास लौट आए।
उस रात भी उन्हें नींद नहीं आई। बहुत सोचते रहे कि बहुत से सैनिक मरेंगे, और यह मेरी ज़िम्मेदारी है।
मैदान
मैदान बड़ा था।
एक तरफ़ विदुरथ की सेना थी और दूसरी तरफ़ सिन्धु की। दोनों सेनाओं के बीच सूखी ज़मीन की एक खाली पट्टी पड़ी थी।

विदुरथ अपने रथ पर खड़े थे। उन्होंने सामने सिन्धु को देखा, उस बूढ़े राजा को, जो एक हाथी पर सवार थे और जिनके हाथ में राज-दण्ड था।
और युद्ध शुरू हुआ।
पहले ऊँचे स्वर में बाजे बजे, फिर शंख गूँजे, और फिर हाथी आगे बढ़े।
हाथियों के पाँवों के नीचे ज़मीन काँप उठी।
विदुरथ ने अपने रथ के घोड़े रोके और तलवार खींच ली।
दोनों ओर के हाथी टकराए, और एक भारी गर्जना उठी।
विदुरथ के सबसे बड़े हाथी ने सिन्धु के हाथी की सूँड पकड़ ली, और दोनों हाथियों के पाँव ज़मीन में गहरे धँस गए। उन पर बैठे सैनिकों ने भाले चलाए, और विदुरथ का सैनिक पहले गिरा, नीचे, हाथियों के पाँवों के बीच। यह देखकर विदुरथ के चेहरे पर पीड़ा की एक रेखा उभर आई।
फिर दोनों ओर से घुड़सवार टूट पड़े। इतनी धूल उठी कि कुछ देर तक कुछ भी दिखाई न दिया, और जब धूल बैठी तो मैदान पूरी तरह बदल चुका था।
विदुरथ अपने रथ से उतर पड़े, क्योंकि अब पैदल ही लड़ना था।
तलवार
विदुरथ ने अपनी तलवार चलाई। पहला सैनिक आया और मारा गया, दूसरा आया और मारा गया, तीसरा आया और वह भी मारा गया।
तभी उनके बाज़ू पर एक ज़ख़्म लगा, ठीक उसी पुराने ज़ख़्म के पास जहाँ रानी ने हलदी लगाई थी। विदुरथ एक पल रुककर देखे कि ज़ख़्म से ख़ून बह रहा था, पर ज़्यादा नहीं। और वो फिर आगे बढ़ गए।
सिन्धु ने यह देखा, और अपने सबसे विश्वासी सैनिकों से कहा – “विदुरथ को पकड़ो।”
सिन्धु के सैनिक विदुरथ की ओर बढ़े।
विदुरथ ने उन्हें आते देखा और अपनी तलवार उठा ली।
पहला सैनिक आया, और विदुरथ ने अपनी तलवार उसके सीने में उतार दी।
दूसरा आया, और तलवार उसके गले पर पड़ी।
तीसरा आया, और तलवार उसके पेट में धँस गई।
पर इसी बीच एक चौथा सैनिक पीछे से आ पहुँचा।
भाला
वो बहुत जवान था, शायद विदुरथ से भी छोटा। उसके हाथ में एक भाला था, और उसके चेहरे पर वही जोश था जो उन जवान सैनिकों में होता है जिन्हें मरने का डर अभी छुआ तक नहीं होता।
उसने अपना भाला उठाया।
विदुरथ ने उसे देखा तक नहीं था, क्योंकि उनकी तलवार उस समय तीसरे सैनिक पर थी।
भाला हवा में बहुत तेज़ी से छूटा।
और भाला विदुरथ के सीने में जा लगा।
विदुरथ ठिठक गए, और उनकी तलवार धीरे से नीचे आ गई।
उन्होंने एक हाथ भाले की ओर बढ़ाया, और दूसरा हाथ अब भी तलवार पर ही था।

उन्होंने आकाश की ओर देखा। आकाश साफ़ था, और बहुत ऊँचाई पर एक अकेला बादल तैर रहा था।
(और उसी क्षण विदुरथ को एक अजीब-सी बात महसूस हुई।)
(उन्हें लगा कि यह आकाश उन्होंने कहीं पहले देखा है, बहुत पहले, शायद किसी और के सपने में। शायद वो ख़ुद कोई और थे, जो इस विदुरथ को दूर से देख रहा था। यह बात उनके भीतर बस एक पल ठहरी और फिर चली गई।)
(पर एक पल के लिए वो बात थी ज़रूर।)
उसी क्षण विदुरथ को अपनी पत्नी याद आ गईं, उनका चेहरा, उनके हाथ, उनकी वो हलदी।
और तभी एक पल को उन्हें अपनी पत्नी का चेहरा भी अजीब लगा, जैसे वो उनकी पत्नी थीं और साथ ही उनमें किसी और पत्नी की एक छाया भी थी, जैसे एक ही चेहरे में दो स्त्रियाँ हों।
(विदुरथ ने मन में कहा – “यह क्या?”)
पर अब सोचने का समय नहीं था।
फिर वो गिर पड़े, रथ के पास, ज़मीन पर।
गिरते-गिरते उन्हें कहीं बहुत दूर से एक हलकी-सी आवाज़ सुनाई दी।
“विदुरथ, यह सब तो एक चित्र है।”
विदुरथ ने यह सुना, पर उत्तर देने का समय नहीं था।
और उनकी आँखें बन्द हो गईं।
मौन
सिन्धु ने यह सब दूर से देखा। एक पल को वो ठहर गए, फिर उन्होंने सिर हिलाकर आदेश दिया – “सेना रोको।”
युद्ध धीरे-धीरे थम गया।
सिन्धु अपने हाथी से उतरे और विदुरथ के देह के पास पहुँचे।

उन्होंने उन पर एक कपड़ा डाला और पुकारा – “महाराज विदुरथ।” पर देह ने कोई जवाब नहीं दिया।
सिन्धु कुछ देर मौन रहे, फिर बोले – “महाराज विदुरथ, मेरे पिता और आपके पिता का झगड़ा तो हल हो गया, पर इस कीमत पर। यह झगड़ा इतनी कीमत के लायक़ था ही नहीं।”
सिन्धु की आँखों में उस समय कुछ ऐसा था जो उनकी सेना ने पहले कभी नहीं देखा था, एक थकान, और शायद एक पछतावा।
फिर सिन्धु ने अपने सैनिकों से कहा।
“विदुरथ का शव सम्मान के साथ उनके राज्य भेज दो।”
बीच में
विदुरथ का देह वहीं पड़ा था, पर उनकी आत्मा कहीं और जा पहुँची थी।
बहुत दूर एक कमरा था, जहाँ एक स्त्री बैठी थी, और उसके सामने एक मृत पुरुष का शव रखा था।
विदुरथ की आत्मा उसी कमरे में जा पहुँची।
उस स्त्री ने आँख खोली।

उसने सरस्वती को देखा, और फिर अपने भीतर एक नई चेतना को महसूस किया। विदुरथ की आत्मा अब उस कमरे में थी, पर अभी उसे इसका कुछ पता नहीं था।
(यह वही लीला थीं। वसिष्ठ ने यह कथा राम को पहले सुनाई थी। विदुरथ की कथा का यह पक्ष असल में लीला की कथा का अंग था, पर इस कथा के लिए विदुरथ की अपनी कहानी यहीं ठहर जाती है।)
विश्राम
बहुत बाद में, जब लीला ने सब समझ लिया और सरस्वती ने वर दिया, तब विदुरथ की आत्मा फिर से अपने देह में लौट आई।
युद्ध-स्थल पर विदुरथ का देह जाग उठा।
सिन्धु अब भी वहीं खड़े थे। उन्होंने अभी-अभी विदुरथ का शव उनके राज्य भेजने के लिए तैयार करवाकर एक रथ पर रखवाया था, और रथ चलने ही वाला था।
तभी विदुरथ ने आँख खोली।

रथ-चालक ने सबसे पहले यह देखा, और तेज़ डर भरी आवाज़ में चिल्लाया – “महाराज! देह जाग गया!”
सिन्धु ने यह सुना और जहाँ के तहाँ रुक गए, बहुत देर तक रुके रहे।
फिर वो रथ के पास आए।
विदुरथ रथ पर बैठे थे। उनके बाज़ू पर अब भी ज़ख़्म था और सीने पर भाले का निशान, पर वो जीवित थे। उनकी आँखें खुली थीं और छाती धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी।
सिन्धु ने उन्हें टकटकी लगाकर देखा।
वो बहुत बूढ़े राजा थे, बहुत बरस के सैनिक, तीन युद्ध जीत चुके और न जाने कितनी मृत्यु देख चुके। पर ऐसा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था।
सिन्धु के हाथ काँप उठे, उनके चेहरे का एक हिस्सा थोड़ा सिकुड़ गया, और उन्होंने अपने पीछे ज़मीन पर एक हाथ टेक लिया, सहारे के लिए।
सिन्धु बोले – “महाराज विदुरथ, मैंने आपको गिरते देखा था। भाला आपके सीने में उतरा था। आपका देह यहाँ बहुत देर तक पड़ा रहा, और मैंने ख़ुद आप पर कपड़ा डाला था।”
विदुरथ बोले – “हाँ, मुझे सब पता है।”
सिन्धु कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “तो फिर यह कैसे हुआ?”
विदुरथ हलकी मुस्कान के साथ बोले – “महाराज, यह बात मैं ख़ुद भी पूरी तरह नहीं समझता। पर मैं कहीं और चला गया था, और फिर लौट आया।”
सिन्धु ने पूछा – “कहाँ गए थे?”
विदुरथ बोले – “एक स्त्री के पास, जो मेरे ऊपर बैठी थी। एक बिलकुल अलग ही दुनिया थी।”
सिन्धु ने आँखें सिकोड़कर कहा – “महाराज, यह बात मेरी समझ में नहीं आती।”
विदुरथ बोले – “मेरी समझ में भी नहीं आती।”
सिन्धु बहुत देर तक चुप रहे, फिर उन्होंने अपने सिर पर हाथ रखा, बूढ़े आदमी की एक पुरानी आदत।
सिन्धु बोले – “महाराज विदुरथ, मैंने आपको मारा, मैंने आपको मरते देखा, मैंने ख़ुद आप पर कपड़ा ओढ़ाया, और अब आप मेरे सामने जीवित बैठे हैं। मैं अपनी पूरी ज़िन्दगी इस बात को नहीं समझ पाऊँगा।”
विदुरथ बोले – “महाराज सिन्धु, शायद हम सब किसी न किसी के सपने में हैं, और जब वो कोई जागता है, तो हम सब भी बदल जाते हैं।”
सिन्धु कुछ देर मौन रहे, फिर बोले – “महाराज, मेरे पिता का झगड़ा यहीं ख़त्म। अब मैं सन्धि चाहता हूँ।”
विदुरथ बोले – “हाँ, मैं भी।”
दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। सिन्धु के हाथ अब भी हलके से काँप रहे थे।
घर
विदुरथ अपने राज्य लौट आए। दूसरी लीला ने उनकी देखभाल की और उनके बाज़ू तथा सीने के ज़ख़्मों पर हलदी लगाई। बहुत बरस तक उन्होंने उन ज़ख़्मों को सम्हाला।
विदुरथ कई बरस और राज्य करते रहे, पर अब उनके भीतर एक नई समझ बैठ चुकी थी।
वो जानते थे कि मैं किसी और के सपने में हूँ, पर मेरा सपना भी असली है। मेरा युद्ध असली था, मेरा घाव असली था, मेरी मौत असली थी, और मेरा जागना भी असली था।
यह बात विदुरथ ने अपनी पत्नी को कभी नहीं बताई। पर अब वो जो भी करते, उसमें एक नया हलकापन रहता, जैसे सब कुछ असली भी था और साथ ही कुछ भी नहीं था।
अन्त
बहुत बरस बीत गए, और विदुरथ बूढ़े हो चले।
एक रात वो अपनी रानी के पास सोए थे, और नींद में उन्हें एक सपना आया।

सपने में वो एक छोटी-सी झोंपड़ी में थे, बहुत बूढ़े, और उनके पास एक बहुत बूढ़ी स्त्री बैठी थी। उसका नाम… विदुरथ ने सोचा, अरुन्धती?
उस स्त्री ने मुस्कुराकर कहा – “पति।”
विदुरथ बोले – “देवी।”
स्त्री बोली – “समय आ गया।”
विदुरथ ने इसे चुपचाप स्वीकार कर लिया।
सपने में विदुरथ का देह छूट गया।
और उसी क्षण रानी के पास सोते हुए विदुरथ का देह भी छूट गया।
रानी सुबह उठीं, तो विदुरथ नहीं थे। रानी बहुत देर तक रोती रहीं।
पर एक पल को उन्हें अपने भीतर एक हलकी-सी आवाज़ सुनाई दी – “रानी, मैं कहीं और से आया था और कहीं और जा रहा हूँ। पर हम कभी अलग नहीं थे, हम एक ही चेतना के दो रूप थे।”
रानी ने यह सुना और चुपचाप इसे मन में बैठा लिया।
इसके बाद बाक़ी बरस वो ख़ुद राज्य चलाती रहीं, बहुत बरस तक।
फिर एक दिन वो भी चली गईं।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मेरा भी जीवन…”
वसिष्ठ बोले – “राम, ज़रा सोचो।”
राम ने कुछ देर सामने बहते पानी की ओर देखा, फिर बोले – “गुरुदेव, विदुरथ का युद्ध, उनका घाव, उनकी मृत्यु, वो सब असली थे।”
वसिष्ठ बोले – “हाँ।”
राम बोले – “पर एक स्तर पर वो किसी और के सपने में थे।”
वसिष्ठ बोले – “हाँ।”
राम ने पूछा – “तो ये दोनों एक साथ कैसे सच हो सकते हैं?”
वसिष्ठ बोले – “राम, चेतना के लिए ‘असली’ और ‘सपना’ दो अलग चीज़ें नहीं हैं, दोनों उसी के दो रूप हैं। तुम जब किसी सपने में होते हो, तो वो तुम्हारे लिए असली ही होता है, और जब तुम जागते हो, तो वही सपना बन जाता है। विदुरथ को मृत्यु से पहले पीड़ा हुई, और वो पीड़ा असली थी, उनके शरीर की संवेदना असली थी, उनकी अन्तिम सोच भी असली थी। पर जब लीला ने उन्हें देखा, तो वो एक सपने में थे। दोनों ही सच हैं।
“विदुरथ के लिए उनका जीवन असली था, पर लीला के लिए वो एक चित्र-लोक भर था। दोनों ही सही हैं, और यही चेतना का स्वरूप है।”
राम कुछ देर इस बात को भीतर उतारते रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, विदुरथ की कथा सुनकर मेरे भीतर कुछ भारी-सा उतर आया है।”
वसिष्ठ ने पूछा – “क्या?”
राम बोले – “मुझे लग रहा है कि मेरा युद्ध भी एक दिन आएगा।”
वसिष्ठ कुछ देर मौन रहे, फिर बोले – “राम, हाँ।”
राम ने पूछा – “कब?”
वसिष्ठ बोले – “यह तो पता नहीं, पर तुम्हारी कथा में एक बड़ा युद्ध छिपा है।”
राम बोले – “यह सोचकर ही मुझे डर लग रहा है।”
वसिष्ठ बोले – “राम, डर लगना स्वाभाविक है। पर एक बात याद रखना। विदुरथ ने अपनी सेना के उस बूढ़े सैनिक से बात की थी, याद है? उस बूढ़े ने कहा था कि उम्र के साथ डर कम हो जाता है।”
राम बोले – “हाँ।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह बात तुम्हें आज मान लेने की ज़रूरत नहीं। पर एक दिन तुम ख़ुद जान जाओगे कि जब तुम बहुत कुछ सह लोगे, तब डर अपने आप कम हो जाएगा।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, एक और प्रश्न है। विदुरथ की मृत्यु, वो भाला, वो जवान सैनिक, मुझे लगता है वो दृश्य अब भी मेरे भीतर बसा हुआ है।”
वसिष्ठ बोले – “राम, अच्छी कथा ऐसी ही होती है। उसे सुनकर लगे कि तुम ख़ुद वहीं मौजूद थे।”
राम कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, मेरा अन्त कैसे होगा?”
वसिष्ठ कुछ देर मौन रहे, फिर बोले – “राम, यह प्रश्न आज नहीं।”
राम ने पूछा – “क्यों?”
वसिष्ठ बोले – “क्योंकि अगर मैं तुम्हें बता दूँ, तो तुम्हारा सारा जीवन उसी ओर बँध जाएगा। बेहतर है कि तुम अपनी कथा खुली रखो। जो होगा, सो होगा।”
राम बोले – “गुरुदेव, समझ गया। पर एक बात तो बता दीजिए।”
वसिष्ठ ने पूछा – “क्या?”
वसिष्ठ बोले – “राम, तुम्हारा अन्त शान्ति से होगा।”
राम ने पूछा – “पक्का?”
वसिष्ठ बोले – “पक्का।”
राम बोले – “गुरुदेव, यह सुनकर मुझे राहत मिली।”
राम बहुत देर तक सामने बहते पानी की ओर देखते रहे।
फिर राम ने पूछा – “गुरुदेव, विदुरथ की पत्नी, वो दूसरी लीला, उनका क्या हुआ?”
वसिष्ठ कुछ देर मौन रहे, फिर बोले – “राम, दूसरी लीला बहुत बरस तक विदुरथ के साथ रहीं। फिर एक दिन विदुरथ चले गए। पर दूसरी लीला ने अपना जीवन नहीं छोड़ा, वो रानी बनी रहीं, अपने बच्चों को सम्हाला और बहुत बरस तक राज्य चलाया।”
राम ने पूछा – “और उनका अन्त?”
वसिष्ठ बोले – “राम, उनका अन्त भी शान्ति से ही हुआ। एक रात अपने कक्ष में सोते समय उन्होंने अपनी मृत्यु को सामने आते देखा, मुस्कुराईं, और फिर उनकी साँस ठहर गई।”
राम बोले – “गुरुदेव, ये कथाएँ मुझे कुछ सिखा रही हैं।”
वसिष्ठ ने पूछा – “क्या?”
राम बोले – “कि मृत्यु इतनी डरने वाली बात नहीं है।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह सीख बहुत बरस के बाद ही भीतर बैठती है। पर अभी से इस पर सोचना अच्छा है।”
बाहर रात उतर आई थी, और राम ने एक हलकी जम्हाई ली।
राम बोले – “गुरुदेव, अब मैं चलूँ।”
वसिष्ठ बोले – “चलो, राम।”
दोनों उठे और घर की ओर चल पड़े।
रास्ते में राम ने एक छोटे बच्चे को देखा, जो ज़मीन पर एक छड़ी से कुछ बना रहा था।
बच्चे ने राम को देखकर कहा – “राजकुमार जी।”
राम बोले – “बेटा।”
बच्चा हलके से मुस्कुराकर फिर अपने काम में लग गया, और राम तथा वसिष्ठ आगे बढ़ चले।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, वो बच्चा क्या बना रहा था?”
वसिष्ठ बोले – “शायद कोई राज्य, शायद कुछ और।”
राम ने पूछा – “अपनी कल्पना से?”
वसिष्ठ बोले – “हाँ।”
राम बोले – “गुरुदेव, तब तो हर बच्चा एक नन्हा विदुरथ ही है।”
वसिष्ठ बोले – “राम, और हर वयस्क भी।”
राम ने सिर हिलाया।
दूर घर के पास एक हलकी-सी रोशनी टिमटिमा रही थी। उसे देखकर राम मुस्कुरा उठे, मन में बस एक ही शब्द था, घर।
पर एक पल बाद उन्होंने सोचा कि यह घर भी तो एक चित्र-लोक ही है।
वसिष्ठ ऐसे मुस्कुराए जैसे उन्होंने राम की यह सोच सुन ली हो।
वसिष्ठ बोले – “राम, हाँ, घर भी।”
पर फिर भी वो घर की ओर बढ़ते रहे, उस बहुत प्रिय चित्र-लोक की ओर।
उसी घर की ओर, जहाँ माँ कौसल्या उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं और जहाँ पिता दशरथ बैठे थे।
राम ने अपनी चाल थोड़ी तेज़ कर दी।
घर पहुँचने पर माँ ने उन्हें गले लगा लिया, और राम के भीतर एक हलकी कोमलता भर आई।
माँ बोलीं – “बेटा, तू आज देर से आया।”
राम बोले – “माँ, गुरुदेव ने एक कथा सुनाई।”
माँ ने पूछा – “कौन सी?”
राम बोले – “माँ, एक राजा की, जो किसी और के सपने में था।”
माँ बोलीं – “अच्छा बेटा, खाना तैयार है, चलो।”
और दोनों भीतर चले गए।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3.40-51 पर आधारित है। यह लीला कथा का एक भाग है, पर इसे एक अलग कथा के रूप में भी देखा जा सकता है। एक सपने का राजा जो असली युद्ध लड़ता है, यह माया के सिद्धान्त का सबसे जीवित उदाहरण है। विदुरथ के अन्तिम सपने में अरुन्धती का आना, यह इस कथा को लीला की कथा से जोड़ता है।
दर्शन-दृष्टि
विदुरथ एक राजा हैं। उनका राज्य बड़ा है। उनकी रानी दूसरी लीला है। उनके सामने सिन्धु से एक बड़ा युद्ध है। वो लड़ते हैं, घायल होते हैं, मरते हैं। पर वो अपनी कथा के नायक हैं, अपने सपने में नहीं। उनका दर्द उनके लिए असली है, उनकी मृत्यु उनके लिए अन्तिम है। कथा यह कहती है कि स्वप्न और जागृति के बीच का भेद देखने वाले के स्तर पर है, स्वप्न के भीतर के व्यक्ति के लिए वो स्वप्न नहीं, उसका सब कुछ है।
अमेरिकी भौतिकीविद् ह्यू एवरेट (Hugh Everett III, 1930-1982) की many-worlds interpretation (1957) में हर शाखा का अपना अनुभोक्ता है, और हर शाखा के अनुभोक्ता के लिए वो शाखा एकमात्र असली ब्रह्माण्ड है, उसे यह नहीं पता कि वो किसी बड़े वृक्ष की एक टहनी है। विदुरथ इसी एक टहनी पर बैठे राजा हैं। उनके लिए उनका युद्ध एकमात्र युद्ध है, उनकी रानी एकमात्र रानी, उनकी मृत्यु एकमात्र मृत्यु, और बाहर से देखने वाली पहली लीला के लिए वो एक सपने के भीतर का एक पात्र।