कथा · 25
शिला-लोक: पत्थर के भीतर का संसार
एक ऋषि ने ध्यान में एक पत्थर देखा, और फिर उस पत्थर के भीतर झाँका, तो वहाँ एक पूरा संसार बसा था। और उस संसार के एक पत्थर में फिर एक दूसरा संसार छिपा था।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या किसी पत्थर के भीतर भी कोई संसार हो सकता है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, मैंने एक बार ख़ुद यह अनुभव किया था, एक छोटी पहाड़ी पर, एक पत्थर के पास। वहाँ मेरी मुलाक़ात एक स्त्री से हुई, जिसका पति अपनी ही रची हुई सृष्टि का राजा था, और उसे इसका पता तक नहीं था। सुनो।”
पहाड़ी
यह बहुत बरस पहले की बात है, जब मैं एक पहाड़ी क्षेत्र में अकेला घूम रहा था।
वहाँ न कोई आदमी था, न कोई जानवर, बस पत्थर ही पत्थर बिखरे पड़े थे।

पहाड़ी ऊँची तो नहीं थी, पर बड़ी विचित्र थी। उस पर न पेड़ थे, न घास, बस बड़े-बड़े पत्थर थे और बीच-बीच में कुछ छोटे।
वहाँ की हवा भी कुछ अलग थी, उसमें एक प्रतिध्वनि सी बसी थी, जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो और उसकी आवाज़ पत्थरों से टकराकर लौट रही हो।
मैं एक बड़े पत्थर के पास जा बैठा। वह पत्थर मेरे क़द से दो गुना बड़ा था, और बरसों की धूप-छाँव से उसकी सतह चिकनी हो चुकी थी।
मैंने उसकी एक तरफ़ पीठ टिकाई और आँखें बन्द करके थोड़ी देर सुस्ताने लगा।
तभी मुझे एक गीत सुनाई दिया।
गीत
किसी स्त्री का गीत था, मधुर, पर उसके भीतर एक उदासी घुली हुई थी।
मैंने आँखें खोलकर इधर-उधर देखा, पर वहाँ कोई नहीं था, पूरी पहाड़ी ख़ाली पड़ी थी।
फिर भी गीत सुनाई दे रहा था। मैंने ध्यान दिया तो लगा कि वह गीत उसी पत्थर से आ रहा है।
मैंने पत्थर को छुआ। मेरी हथेली उसकी ठोस सतह पर थी, पर गीत उसके भीतर से उठ रहा था।

मैंने अपना कान पत्थर पर लगाया तो गीत अब साफ़ सुनाई देने लगा।
कोई स्त्री गा रही थी, और उसका गीत किसी पुराने राग में था, शायद ऐसे राग में जो अब इस पृथ्वी पर नहीं बचा।
शब्द तो कुछ थे, पर स्पष्ट नहीं थे, बस उनकी उदासी स्पष्ट थी।
मैंने मन में ठान लिया कि मुझे यह देखना है।
मैंने आँखें बन्द कीं।
मेरी चेतना में एक हलचल हुई। वह पहले मेरे देह से उठी, फिर बाहर की ओर बहने लगी, और पत्थर के भीतर उतर गई।
भीतर
पत्थर के भीतर एक पूरा संसार था।
पहले-पहल मैं कुछ समझ ही नहीं पाया। पहले एक हलका प्रकाश दिखा, शाम जैसा, पर शाम नहीं। फिर एक हवा बही, वह भी कुछ अलग थी, पर थी तो हवा ही।
फिर पैरों के नीचे ज़मीन आ गई, और मैं किसी ठोस धरती पर खड़ा था।
मैंने इधर-उधर देखा।

वहाँ पहाड़ थे, नदियाँ थीं, पेड़ थे, आकाश था, एक पूरा संसार मेरे सामने फैला हुआ था।
मैं चलने लगा। मेरे पैरों के नीचे ज़मीन ठोस थी, और मिट्टी का स्पर्श बिलकुल असली लग रहा था।
मैंने एक पेड़ की पत्ती छुई, वह असली थी। मैंने ज़मीन से एक पत्थर उठाया, वह भी असली पत्थर था।
पर मैं जानता था कि यह पूरा संसार उस बाहर पड़े पत्थर के भीतर बसा है।
मैं चलता रहा, बहुत देर तक। पर यहाँ समय कुछ और ही ढंग से बहता था। मुझे लगा कि एक घंटा बीता है, पर शायद वह वहाँ का एक पूरा दिन था।
झोंपड़ी
चलते-चलते मैं एक झोंपड़ी पर पहुँचा। वह छोटी सी थी, मिट्टी की एक दीवार, और ऊपर सूखी घास का छप्पर।

बाहर एक स्त्री बैठी गा रही थीं।
मैं वहीं रुक गया। वह स्त्री सुन्दर थीं, बहुत सुन्दर, उस तरह से जो पृथ्वी की स्त्रियों में बहुत दुर्लभ है। उनका देह पारदर्शी और हलका सा था, उनकी आँखें बहुत बड़ी और बिना तल वाली थीं, और उनके बाल पीछे एक ढीले जूड़े में बँधे थे।
उन्हें देखकर मुझे लगा कि ये विद्याधर-कुल की कोई विद्याधरी हैं।
मैं पास पहुँचा तो स्त्री ने गाना बन्द किया, आँख उठाकर मुझे देखा।
मैंने कहा – “देवी, आप कौन हैं?”
“मेरा नाम वसिष्ठ है, मैं एक ऋषि हूँ। पर आप यहाँ कैसे आईं?”
“आप यहाँ कैसे आए?”
“मैंने आपका गीत सुना, पत्थर के बाहर, और फिर उसके भीतर चला आया।”
स्त्री बोलीं – “बहुत बरस के बाद कोई यहाँ आया है।”
“बहुत बरस?”
“हाँ।”
मैंने उन्हें देखा तो उनकी आँखों में बरसों का अकेलापन भरा हुआ था।
“बैठिए,” उन्होंने कहा, और मैं बैठ गया।
अकेलापन
मैंने पूछा – “देवी, आप यहाँ अकेली क्यों हैं?”
स्त्री ने एक गहरी साँस ली और कहा – “मेरा पति यहीं है।”
“वो कहाँ हैं?”
“भीतर, उस झोंपड़ी में।”
“तो उन्हें बुलाइए।”
“वो नहीं आएँगे।”
“क्यों?”
“क्योंकि वो बहुत बरस से तप कर रहे हैं।”
“देवी, वो हैं कौन?”
“मेरे पति, एक ब्राह्मण।”
“उनका नाम क्या है?”
विद्याधरी बोलीं – “उनका नाम तो मुझे किसी को बताना नहीं है, पर मैं इतना कहूँगी कि वो ब्रह्मा हैं।”
मैं एक पल को ठिठक गया – “ब्रह्मा?”
“हाँ, पर वो ख़ुद यह नहीं जानते। वो अपने आप को बस एक ब्राह्मण समझते हैं, जबकि असल में वो ब्रह्मा हैं। उन्होंने यह संसार रचा है, बिना जाने, बस अपनी चेतना से।”
मैंने पूछा – “देवी, यह कैसे हो सकता है कि कोई ब्रह्मा हो और उसे ख़ुद इसका पता न हो?”
विद्याधरी बोलीं – “वसिष्ठ, हर ब्रह्मा अपनी सृष्टि के भीतर एक पात्र होता है। वो ख़ुद को बस एक पात्र समझता है, पर एक स्तर पर वही पूरी सृष्टि है। उसकी चेतना ही सब कुछ है।
“मेरे पति को यह पता नहीं है। वो सोचते हैं कि वो बस एक ब्राह्मण हैं, जिन्हें तप करना है। पर असल में उनकी चेतना से ही यह पूरी सृष्टि निकल रही है। मैं भी उन्हीं से निकली हूँ, और यह पहाड़, यह नदी, यह आकाश, सब उन्हीं से।”
मैंने कहा – “देवी, यह तो बहुत बड़ी बात है।”
“हाँ।”
“और आप उनकी पत्नी हैं, पर वो आपको देखते तक नहीं?”
विद्याधरी की मुस्कान में एक पीड़ा झलक आई।
“नहीं।”
“क्यों?”
“वो अपने तप में डूबे हैं। उन्होंने सब कुछ छोड़ दिया है, मुझे भी।”
“और आप उनकी प्रतीक्षा कर रही हैं? कितने बरस से?”
“बहुत बरस से, मुझे अब गिनती भी याद नहीं।”
मैंने पूछा – “देवी, क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ?”
“हाँ, पर वो आपसे बात नहीं करेंगे।”
“फिर भी।”
विद्याधरी ने कहा – “आइए, मैं आपको ले चलती हूँ।”
ब्राह्मण
विद्याधरी मुझे झोंपड़ी की ओर ले गईं। वह झोंपड़ी छोटी और बहुत साधारण थी।
भीतर अँधेरा था, एक हलका सा दिया जल रहा था, और एक ब्राह्मण बैठे थे।

वो बहुत बूढ़े थे, बाल पूरे सफ़ेद, आँखें बन्द, और साँस इतनी धीमी कि लगभग न के बराबर। उनका देह बहुत पतला था, हड्डियाँ तक साफ़ दिख रही थीं।
मैं उनके पास जा बैठा।
“ब्राह्मण।” उन्होंने आँख नहीं खोली।
“ब्राह्मण।” फिर भी कोई हलचल नहीं हुई।
मैंने उनकी कलाई छुई, वह ठंडी थी, पर उसमें जीवन था।
मैंने देर तक उनके देह को देखा। मन में सोचा कि अगर सचमुच यही ब्राह्मण पूरी सृष्टि के स्रोत हैं, तो उनका देह कितना विचित्र है, एक पतला बूढ़ा देह, जिसमें एक पूरा संसार समाया हुआ है।
विद्याधरी ने पीछे से कहा – “वसिष्ठ, देख लिया?”
“हाँ।”
“वो अपने आप उठेंगे, जब उनका तप पूरा होगा।”
“और तब?”
“और तब वो जानेंगे कि यह सब उन्होंने ही रचा था, कि मैं उनकी पत्नी हूँ, और यह पत्थर उनका देह है।”
विद्याधरी ने आगे कहा – “पर एक बात है, वसिष्ठ।”
“क्या?”
“जब वो उठेंगे, तो उनकी सृष्टि एक पल में दिख जाएगी, और शायद एक ही पल में मिट भी जाएगी।”
“इसका क्या मतलब?”
“मतलब यह कि जब रचयिता अपनी रचना को पहचान लेता है, तो रचना उसकी आँखों के सामने हलकी पड़ जाती है। वो जान जाता है कि यह सब उसी का रचा हुआ है, और तब वह रचना अपनी असली प्रकृति दिखाने लगती है, माया हटने लगती है।”
“और आप?”
विद्याधरी बोलीं – “मैं भी हट जाऊँगी, क्योंकि मैं भी तो उन्हीं की रचना हूँ।”
“पर आप जानती हैं कि आप एक रचना हैं, फिर भी यहाँ हैं?”
“हाँ। मेरा यहाँ होना भी उनकी रचना का हिस्सा है। मैं ख़ुद को नहीं हटा सकती, बस उनके जागने पर ही हटूँगी।”
मैं देर तक चुप रहा।
फिर मैंने पूछा – “देवी, क्या आप इस अकेलेपन में ख़ुद को सम्भाल पाती हैं?”
विद्याधरी बोलीं – “वसिष्ठ, मेरा अकेलापन उतना बड़ा नहीं। मेरे पति मेरे पास ही हैं, बस वो मुझे देखते नहीं। यह विचित्र ज़रूर है, पर मेरे लिए सहने योग्य है।
“क्योंकि मैं तो उन्हें हर रोज़ देखती हूँ। मैं अदृश्य रहकर उनकी सेवा करती हूँ, उनकी कुटिया को साफ़ रखती हूँ, उनके पास पानी रखती हूँ, फल रखती हूँ।
“वो उन्हें खा लेते हैं, पर सोचते हैं कि ये अपने आप उग आते हैं। यह उनका अपना सपना है।
“पर मेरा प्रेम उन तक पहुँचता रहता है, बस वो इसे जानते नहीं।”
मैंने कहा – “देवी, यह तो बहुत कोमल बात है, ऐसा प्रेम जो अदृश्य रहकर भी मिलता रहता है।”
विद्याधरी बोलीं – “वसिष्ठ, बहुत से प्रेम ऐसे ही होते हैं, बस हमें वो दिखते नहीं।
“माँ का प्रेम बच्चे के लिए बच्चे को कई बार नहीं दिखता, पर उसी से वह बच्चा बढ़ रहा होता है।
“पति का प्रेम पत्नी के लिए पत्नी को कई बार नहीं दिखता, पर वही उसे थामे रहता है।
“प्रेम का अधिकतर भाग अदृश्य ही रहता है।”
मैंने पूछा – “देवी, मेरा एक और प्रश्न है। क्या मेरी पत्नी अरुन्धती भी मुझे ऐसे ही देखती हैं?”
विद्याधरी बोलीं – “वसिष्ठ, हाँ। हर पत्नी अपने पति को ऐसे ही देखती है, यही स्त्री का स्वभाव है।”
उनकी यह बात सुनकर मैंने अपनी पत्नी के बारे में सोचा। बहुत बरस वो मेरे साथ रहीं, बहुत प्रेम दिया, पर मैंने उन्हें कितनी बार सचमुच पहचाना?
विद्याधरी ने मेरे चेहरे को देखा और बोलीं – “वसिष्ठ, अब आप जान गए, यही काफ़ी है।”
प्रश्न
मैंने कहा – “देवी, मुझे एक और प्रश्न पूछना है।”
“पूछिए।”
“क्या यह जो मेरी अपनी सृष्टि है, यह भी ऐसी ही है?”
विद्याधरी कुछ देर मौन रहीं, फिर बोलीं – “वसिष्ठ, आप यह प्रश्न ख़ुद पूछ रहे हैं, इसका मतलब है कि इसका उत्तर आपके भीतर पहले से मौजूद है।”
“पर मैं तो ब्रह्मा नहीं हूँ।”
“हर कोई एक स्तर पर अपनी सृष्टि का ब्रह्मा है। आप अपनी सृष्टि के ब्रह्मा हैं, मैं अपनी सृष्टि की, और मेरे पति अपनी सृष्टि के।
“सृष्टियाँ एक-दूसरे के भीतर बसी हैं, एक के भीतर दूसरी, दूसरी के भीतर तीसरी।”
विद्याधरी ने आगे कहा – “वसिष्ठ, आप जो दुनिया देख रहे हैं, वो आपकी अपनी चेतना से ही है। पर आप उसे ऐसा नहीं देख पाते, क्योंकि आप अपनी ही सृष्टि के भीतर एक पात्र हैं। एक दिन आप जागेंगे, और तब आप यह जान जाएँगे।”
“पर आपके पति की तरह?”
“शायद, शायद नहीं। हर रचयिता का अपना-अपना ढंग होता है।”
फिर मैंने पूछा – “देवी, तो मैं अब क्या करूँ?”
“वसिष्ठ, बस लौट जाइए। आपका संसार आपका इन्तज़ार कर रहा है, जैसे मेरे पति का संसार उनका इन्तज़ार करता है। यही नियम है।”
मैं उठ खड़ा हुआ।
मैंने पूछा – “देवी, क्या मैं फिर आ सकूँगा?”
विद्याधरी बोलीं – “वसिष्ठ, यह पत्थर बहुत बरस तक यहाँ रहेगा, आप जब चाहें आ सकते हैं। पर एक बार मेरे पति जाग गए, तो यह सब नहीं रहेगा।”
“मतलब आपका अकेलापन…”
“मेरा अकेलापन तो असल में एक प्रतीक्षा है।”
मैंने उन्हें प्रणाम किया, और विद्याधरी ने हाथ हिलाकर मुझे विदा किया।
मैं बाहर लौट आया।
लौटना
मेरी आँखें खुलीं। मैं अब भी उस बड़े पत्थर के पास बैठा था, मेरी हथेली और कान दोनों पत्थर पर लगे हुए थे।
पत्थर वैसा ही ठोस था, पर गीत अब बन्द हो चुका था।
मैं उठा और मैंने उस पत्थर को प्रणाम किया। अब मुझे पता था कि यह बस एक पत्थर नहीं था, बल्कि एक ब्रह्मा का देह था, और उसके भीतर एक पूरी सृष्टि बसी थी।
नीचे उतरते समय मैंने सोचा कि विद्याधरी सही कह रही थीं। हर कोई अपनी सृष्टि का ब्रह्मा है, मैं भी अपनी सृष्टि का, पर मुझे अभी यह पता नहीं। एक दिन मैं भी जागूँगा।
यह अनुभव मैंने बहुत बरस तक अपनी पत्नी अरुन्धती को नहीं बताया, क्योंकि मुझे लगता था कि वो डर जाएँगी।
पर बहुत बरस बाद, जब वो ख़ुद बूढ़ी हो चुकी थीं, मैंने उन्हें यह कहानी सुनाई।
सुनकर अरुन्धती बोलीं – “वसिष्ठ, अगर सब कुछ आपकी सृष्टि है, तो क्या मैं भी?”
मैंने कहा – “हाँ।”
“पर मैं तो आपसे अलग हूँ। मेरी अपनी इच्छाएँ हैं, मेरे अपने विचार हैं।”
“हाँ, पर वो भी आपके हैं, या मेरे?”
अरुन्धती हँस पड़ीं – “वसिष्ठ, यह बात अब छोड़िए। मैं ख़ुश हूँ कि आपने मुझे रचा, और मैं ख़ुश हूँ कि मैं आपके साथ रही।”
इसके बाद बहुत बरस बीत गए, पर मैं उस पहाड़ी पर फिर कभी नहीं गया।
पर हर बार जब मैं किसी पत्थर को देखता, तो मुझे लगता कि उसके भीतर कोई संसार बसा है, कोई स्त्री गा रही है, कोई ब्राह्मण तप कर रहा है। और शायद वो हम सब ही हैं।
यह कहकर वसिष्ठ क्षण भर रुके, फिर राम की ओर देखा।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, और जो हम अभी देख रहे हैं, यह सरयू, यह पेड़, यह पानी?”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह भी किसी की चेतना में ही है, शायद हमारी अपनी, शायद किसी और की। यह कथा बहुत बड़ी है, पर एक बात याद रखना। हर पत्थर के भीतर एक संसार है, हर बूँद के भीतर एक संसार है, हर आँख के पीछे एक संसार है।”

राम ने एक छोटा सा पत्थर उठाया और उसे देर तक देखते रहे।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या इसके भीतर भी कोई संसार है?”
वसिष्ठ बोले – “शायद।”
राम ने उस पत्थर को देर तक अपने हाथ में थामे रखा, फिर बोले – “गुरुदेव, अगर इसके भीतर एक संसार है, तो वहाँ कोई स्त्री गा रही होगी।”
“शायद।”
“कोई ब्राह्मण तप कर रहा होगा।”
“शायद।”
“और हम उन्हें कभी नहीं देखेंगे।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह देखने की बात नहीं, जानने की बात है। हम जानते हैं कि वो हो सकते हैं, और यही काफ़ी है।”
राम कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, मेरे मन को विद्याधरी का अकेलापन बहुत भीतर तक छू गया।”
“क्यों?”
“क्योंकि वो बहुत बरस से अपने पति के पास रहीं, फिर भी पति उन्हें नहीं देखते। यह एक स्तर पर मेरी माँ की कथा भी है।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह बहुत सी स्त्रियों की कथा है, जो अपने पति के पास रहकर भी देखी नहीं जातीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि पुरुष अपने तप में या अपने काम में इतना डूबा रहता है कि उसे लगता है उसकी पत्नी हमेशा रहेगी।
“फिर एक दिन पत्नी नहीं रहती, और तब पुरुष को मालूम होता है कि उसने अपनी पत्नी को कभी ठीक से देखा ही नहीं।”
राम कुछ देर मौन रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, मैं अपनी पत्नी को देखूँगा।”
“बहुत अच्छा, राम।”
राम ने उस पत्थर को धीरे से वापस ज़मीन पर रख दिया और बोले – “गुरुदेव, यह पत्थर मेरे लिए अब बस पत्थर नहीं रहा। यह एक पूरा संसार है, और उसके भीतर एक स्त्री प्रतीक्षा कर रही है।”
वसिष्ठ बोले – “राम, हर पत्थर ऐसा ही है।”
राम कुछ देर पानी की ओर देखते रहे।
फिर राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मेरे भीतर भी कोई संसार है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, बिल्कुल। तुम्हारे भीतर एक पूरा संसार है, तुम्हारी अपनी सोचें, तुम्हारी अपनी यादें, तुम्हारी अपनी इच्छाएँ।
“और हर सोच में एक छोटा सा संसार बसा है।
“और हर सोच के पीछे कुछ स्थिर सा बैठा है।”
राम ने पूछा – “और वो जो स्थिर है, वो कौन है?”
“वो तुम हो।”
राम देर तक मौन बैठे रहे।
बाहर रात घनी हो चली थी, और राम ने एक हलकी सी जम्हाई ली।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मैं अब चलूँ?”
“चलो, राम।”
दोनों उठ खड़े हुए।
रास्ते में राम ने एक और पत्थर देखा, बहुत साधारण सा, और वहीं ठहर गए।
राम ने कहा – “गुरुदेव, मैं इसे अपने साथ ले जाऊँगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि यह मुझे विद्याधरी की याद दिलाएगा।”
वसिष्ठ बोले – “राम, ले जाओ, पर एक बात याद रखना। यह पत्थर तो बस एक संकेत है, असली विद्याधरी तो तुम्हारे ही भीतर है।”
राम ने वह पत्थर उठाया और अपने पास रख लिया।
बहुत बरस तक वह पत्थर राम के पास रहा। वो कभी-कभी उसे देखते, और तब उन्हें एक हलकी सी आहट सुनाई देती।
वह विद्याधरी का गीत होता, बहुत दूर से आता हुआ, पर बिलकुल असली।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण, सर्ग 6ब.59-70 पर आधारित है। शिला-लोक की कथा शास्त्र की सबसे चकित करने वाली कथाओं में से है। एक पत्थर के भीतर एक पूरी सृष्टि, और उस सृष्टि के अनभिज्ञ रचयिता का अपनी पत्नी से दूर रहना, यह माया के सिद्धान्त का गहरा रूपक है। विद्याधरी का अकेलापन, और उनकी प्रतीक्षा, इस कथा का सबसे मार्मिक अंग है।
दर्शन-दृष्टि
वसिष्ठ एकान्त में हैं। एक दूर से गीत आता है। एक स्त्री गा रही है। पीछा करते हैं, और पाते हैं एक विद्याधरी जो रो रही है, क्योंकि उसका तपस्वी ब्राह्मण पति उससे विरक्त है। और वो पति वस्तुतः एक ब्रह्मा है, और उनका सारा संसार एक पत्थर के भीतर बसा है। कथा यह कहती है कि कोई एक पत्थर भी एक पूरा ब्रह्माण्ड हो सकता है, और हर सीमित दिखती चीज़ के भीतर एक अनन्त चेतना तैयार बैठी है।
स्वीडिश-अमेरिकी भौतिकीविद् मैक्स टेगमार्क (Max Tegmark, जन्म 1967) ने अपनी Our Mathematical Universe (2014) में चार स्तर के मल्टीवर्स की व्याख्या की, और दिखाया कि कोई भी सीमित गणितीय संरचना अपने भीतर एक पूरा ब्रह्माण्ड समा सकती है। शिला-लोक की कथा इसी विचार की पुराण-भाषा है। एक पत्थर, बाहर से छोटा, भीतर से एक पूरा संसार, और उस संसार में फिर वही प्रश्न, वही प्रेम, वही पीड़ा, जो हमारे संसार में हैं।