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शिला-लोक: लोकालोक की स्वर्णशिला के भीतर

कथा · 22

शिला-लोक: लोकालोक की स्वर्णशिला के भीतर

आकाश में मिली एक विद्याधरी वसिष्ठ को लोकालोक पर्वत की स्वर्णमयी शिला तक ले गई। उसका निवास उस शिला के भीतर बसे विराट जगत् में था। वहाँ सामने केवल पाषाण था। धारणा से दृष्टि बदली तो शिला का अवरोध हटा और भीतर ब्रह्मा का लोक प्रकट हुआ। उस भेंट में विद्याधरी को अपने जन्म और सम्बन्ध का मूल सत्य मिला। प्रलय के बहुत बाद वही शिला असंख्य सृष्टियों के दर्शन में खुली।

आकाश में हुआ परिचय

महर्षि वसिष्ठ ने श्रीराम को अपना एक अनुभव सुनाया। एक विस्तृत आकाश-प्रदेश में उनका संवाद एक विद्याधरी से हुआ। उसका शरीर स्थूल पृथ्वी-देह की अपेक्षा सूक्ष्म था। वह आकाश में सहजता से स्थित रह सकती थी और अनेक लोकों के बीच गति कर सकती थी। वसिष्ठ ने उससे विनयपूर्वक पूछा, “देवि, आप कौन हैं? आपका निवास कहाँ है और आप यहाँ किस प्रयोजन से आई हैं?”

विद्याधरी ने उत्तर देने से पहले अपने लोक की स्थिति समझाई। उसने उस ब्रह्माण्ड का परिचित विन्यास सामने रखा जिसमें नीचे पाताल, मध्य में पृथ्वी और ऊपर स्वर्ग के प्रदेश माने गए हैं। पृथ्वी पर सात द्वीप हैं, उनके चारों ओर सात समुद्र हैं और आबाद भूभागों से बाहर दूर तक फैला एक स्वर्णमय प्रदेश है। उसी बाहरी सीमा पर लोक और अलोक के बीच लोकालोक पर्वत खड़ा है।

उस पर्वत के उत्तर की ओर, पूर्वाभिमुख एक ऊँचे शिखर पर अत्यन्त विशाल शिला है। उसका वर्ण सुवर्ण की भाँति उज्ज्वल है और उसका विस्तार सुमेरु की ढलान जैसा दीखता है। विद्याधरी ने कहा, “मेरा संसार उसी शिला के भीतर है। वहाँ भूमि, आकाश, पर्वत, नदियाँ, नगर और जीव हैं। युगों का अनगिनत क्रम वहाँ बीत चुका है। मेरे कुटुम्ब के लोग भी उसी जगत् में रहते हैं।”

वसिष्ठ उसकी बात ध्यान से सुनते रहे। विद्याधरी किसी छोटे गुप्त कक्ष का पता नहीं दे रही थी। उसके लिए वह शिला एक सम्पूर्ण त्रिलोकी का अधिष्ठान थी। बाहर से दिखाई देने वाली एक उज्ज्वल पाषाण-राशि के भीतर उसका समय, उसका घर और उसकी स्मृतियों से बना व्यापक संसार प्रतिष्ठित था।

प्राचीन ब्राह्मण का मानस-संकल्प

उस जगत् के केन्द्र में एक अत्यन्त प्राचीन ब्राह्मण बैठा था। उसने वेदों का अध्ययन किया था, ब्रह्मचर्य का पालन किया था और दीर्घकाल से अपने आसन पर स्थित था। उसका मन इतना समर्थ था कि उसके भीतर उठी जगत्-वृत्ति से पुत्र, पौत्र, सम्बन्धी और उनके रहने योग्य समूचा वातावरण प्रकट हो गया था। विद्याधरी उसी मानसिक विस्तार में अपने को उसकी पत्नी समझती आई थी।

उसने वसिष्ठ से कहा, “कभी उनके मन में पत्नी का संकल्प उठा। उसी संकल्प के कारण मेरा रूप बना। मैंने उन्हें पति माना और उनके समीप रहने लगी। उनके मानस में जो परिवार और लोक था, उसी के साथ मेरा व्यवहार चलता रहा।”

ब्राह्मण की वृत्ति गृहस्थ-जीवन की ओर नहीं बढ़ी। वह अपने आसन और साधना में ही स्थित रहा। विद्याधरी की युवावस्था में इच्छा प्रबल थी। वह उसके सान्निध्य और अनुराग की अपेक्षा करती, किन्तु उसकी प्रतीक्षा पूरी नहीं होती। समय चलता गया। जिस सम्बन्ध को वह अपना सहज अधिकार मानती थी, उसका प्रत्युत्तर उसे नहीं मिला।

वसिष्ठ ने उसके कथन में करुणा सुनी और निर्णय स्थगित रखा। विद्याधरी का रूप, उसका कथित सम्बन्ध और वह पूरा जगत् किस आधार पर प्रकट हुए थे, पहले यह समझना आवश्यक था। इसका उत्तर उस प्राचीन ब्राह्मण से मिलना था, जिसके संकल्प में वह संसार ठहरा हुआ था।

इच्छा का वैराग्य में बदलना

दीर्घ प्रतीक्षा ने विद्याधरी के मन को थकाया। आरम्भ में वह अपनी कामना की पूर्ति के उपाय सोचती रही। फिर उसने देखा कि इच्छा अपनी ही पुनरावृत्ति से अधिक तीखी होती जाती है। जिस सुख की आशा में वह ब्राह्मण के पास ठहरी थी, वही आशा उसके भीतर असन्तोष को बनाए हुए थी। लम्बी प्रतीक्षा में उसका विवेक प्रखर हुआ। कामना का आग्रह ढीला पड़ा और वैराग्य जागने लगा।

अब उसने ध्यान, धारणा और खेचरी-साधना का आश्रय लिया। अभ्यास दृढ़ हुआ तो चेतना अपने परिचित सीमित दृश्य से बाहर जाने लगी। वह उस शिला-लोक से निकलकर ऐसे विस्तृत आकाश में पहुँची जहाँ वसिष्ठ से उसकी भेंट हुई। बाहर आकर उसे एक विचित्र अनुभव हुआ। जिस जगत् को वह सदैव प्रत्यक्ष और स्वाभाविक मानती थी, वह दूर पड़ते ही स्मृति की तरह धुँधला होने लगा।

वसिष्ठ के साथ हुए दीर्घ संवाद ने उसकी दृष्टि को नए आकाश और नए लोक-विन्यास का अभ्यस्त कर दिया था। अपने पुराने निवास की धारणा शिथिल हुई तो उसका प्रवेश-पथ भी अस्पष्ट हो गया। वह जानती थी कि उसका लोक कहाँ है, फिर भी उसे पहले की स्पष्टता से देख नहीं पा रही थी। उसने महर्षि से कहा, “आप मेरे साथ उस स्वर्णशिला तक चलें। मेरे लोक को फिर स्पष्ट देखने का साधन भी बताइए। जो मुझे सदा निकट जान पड़ता था, अब दूर और अव्यक्त हो गया है।”

उसकी प्रार्थना में घर लौटने की उत्कण्ठा और उस जीवन का सत्य जानने की इच्छा साथ थीं। वैराग्य ने कामना को शान्त किया और विद्याधरी को अपने अनुभव के मूल तक पहुँचने योग्य बनाया। वसिष्ठ उसके साथ चलने को तैयार हुए।

लोकालोक की ओर यात्रा

दोनों की यात्रा स्थूल मार्ग से नहीं हुई। वे सूक्ष्म गति से उन प्रदेशों को पार करते गए जिनका उल्लेख विद्याधरी ने अपने वर्णन में किया था। पीछे परिचित द्वीप और समुद्र छूटे। आगे स्वर्ण की आभा से भरी विशाल भूमि आई। उसके पार लोकालोक पर्वत का विराट विस्तार उठा हुआ था। प्रकाश और अन्धकार की सीमा जैसा वह पर्वत दूर तक फैला था।

विद्याधरी ने उत्तर दिशा की ओर संकेत किया। वे पूर्वाभिमुख उस शिखर पर पहुँचे जहाँ उसका बताया हुआ पाषाण था। शिला सामने थी, विशाल, स्थिर और स्वर्णवत् दीप्त। उसके बाहर कोई प्रवेश-द्वार नहीं था। भीतर बसे नगरों की ध्वनि नहीं आती थी। पर्वत, वन, घर, ब्राह्मण, परिवार और त्रिलोकी में से कुछ भी वसिष्ठ की तत्काल दृष्टि में उपस्थित नहीं हुआ।

महर्षि ने चारों ओर दृष्टि डाली। उन्हें उस समय केवल पाषाण का अखण्ड विस्तार दिखाई दिया। विद्याधरी ने भी अपने लोक को धुँधली पहचान से अधिक स्पष्ट नहीं देखा। वह चकित थी। उसने जिस संसार में अनगिनत युग बिताए थे, उसी के स्थान पर अब उज्ज्वल शिला का निर्बाध पृष्ठ था।

उसने पूछा, “भगवन्, मेरा लोक यहीं था। आज यह शिला ही क्यों दिखाई दे रही है? क्या वह सृष्टि नष्ट हो गई, अथवा मेरी दृष्टि उसका मार्ग खो बैठी है?”

वसिष्ठ ने उत्तर दिया, “जिस रूप का दीर्घ अभ्यास होता है, चेतना में वही रूप दृढ़ अनुभव बनता है। तुम बहुत समय अपने भीतर के जगत् की व्यवस्था से दूर रही हो। बाहर के अनुभवों का अभ्यास बढ़ा और पुराना अभ्यास मंद पड़ा। इसी कारण परिचित संसार अभी अस्पष्ट है। धारणा को एकाग्र करो। जिस चेतना में बाहर की शिला दिखाई देती है, उसी में भीतर के लोक का प्रकाश भी सम्भव है।”

अभ्यास ने दृष्टि का द्वार खोला

वसिष्ठ ने विद्याधरी को आवश्यक धारणा समझाई। दोनों ने स्थूल देह और स्थूल अवरोध की धारणा को शान्त किया। उन्होंने अपने अनुभव को आतिवाहिक, सूक्ष्म शरीर की अवस्था में स्थिर किया। इस अवस्था में शिला को तोड़ने, काटने अथवा उसमें कोई भौतिक सुरंग खोजने की आवश्यकता नहीं थी। जिस कठोरता ने अभी तक दृष्टि को रोक रखा था, उसका आग्रह घट गया।

धारणा गहरी हुई तो पाषाण की अखण्ड सतह के स्थान पर आन्तरिक विस्तार खुलने लगा। पहले अस्पष्ट आभास आया, फिर दिशा, आकाश और भूमि स्पष्ट हुई। पर्वतों की रेखाएँ उभरीं। नगर, आश्रम और जीवों की गतिविधियाँ दिखाई देने लगीं। जिस त्रिलोकी का विद्याधरी ने वर्णन किया था, वह एक-एक करके अपनी पूरी व्यवस्था के साथ सामने उपस्थित हो गई।

लोकालोक की स्वर्णशिला के भीतर पूरा अन्तर्जगत देखते वसिष्ठ

विद्याधरी ने अपने पुराने प्रदेश पहचाने। लौटने पर उसे स्थान के साथ नई दृष्टि भी मिली। अब वह उसी संसार को अपने अभ्यास, धारणा और वासना के योगदान सहित देख रही थी। पहले वह उसे एक निर्विवाद बाहरी व्यवस्था मानकर रहती आई थी।

वसिष्ठ ने राम से कहा कि चिरकाल का अभ्यास अनुभव को घनत्व देता है। स्वप्न में मन अपनी रचना को उसी समय वास्तविक मानता है। जाग्रत व्यवहार भी नियमित अभ्यास, साझा संस्कार और वासना से स्थिरता पाता है। इस शिक्षा से जगत् के व्यवहार का अपमान नहीं होता। साधक केवल यह पहचानता है कि कठोर दिखाई देने वाले रूप का प्रकाश भी चेतना में ही घटित है।

धारणा का सूक्ष्म परिवर्तन ही शिला में प्रवेश का साधन बना। दृष्टि की अवस्था बदली तो पाषाण की घनता और भीतर का जगत् एक ही चिदाकाश में अपने-अपने अभ्यास के अनुसार प्रकट हो सके।

भीतर का ब्रह्मलोक

उस जगत् में पहुँचकर विद्याधरी वसिष्ठ को उस स्थान पर ले गई जहाँ प्राचीन ब्राह्मण आसन लगाए बैठा था। उसने उसे देखकर कहा, “यही मेरे पति हैं। इन्हीं के संकल्प में यह कुटुम्ब और संसार स्थित है।”

वसिष्ठ ने सामने बैठे पुरुष में उस सृष्टि के ब्रह्मा को पहचाना। वह गहरे अन्तर्मुख भाव में था। उसके जागने पर वसिष्ठ का विधिवत् स्वागत हुआ। उस लोक के देवता, सिद्ध और गन्धर्व भी वहाँ एकत्र हुए। अभिवादन, पूजन और कुशल-प्रश्न का शिष्ट क्रम चला। एक मुहूर्त तक अतिथि-सत्कार और परस्पर सम्मान की यह मर्यादा निभाई गई। उसके बाद वसिष्ठ ने उस संसार, विद्याधरी और निकट आते प्रलय के विषय में प्रश्न किया।

ब्रह्मा ने वसिष्ठ का आदर करते हुए कहा कि उनका आना उचित समय पर हुआ है। उनके कल्पित जीवन की बड़ी अवधि पूरी हो चुकी थी। संसार के विस्तार को धारण करने वाली वृत्ति अब निवृत्ति की ओर जा रही थी। वे उस कल्पना से विश्राम लेकर कैवल्य की ओर अग्रसर होना चाहते थे।

विद्याधरी भी उनके सामने उपस्थित थी। अब उस सम्बन्ध की व्याख्या हुई जिसे उसने इतने युगों तक विवाह मानकर जिया था। ब्रह्मा ने कहा, “इसका और मेरा लौकिक विवाह कभी हुआ ही नहीं। मेरे भीतर बची हुई संसार-वासना ने अधिष्ठात्री शक्ति का रूप लिया है। उसी से इसका यह शरीर प्रकट हुआ और उसी वासना से पत्नी होने की धारणा बनी।”

इन वचनों ने विद्याधरी के पूर्व कथन को संशोधित किया। ब्रह्मा के मन में पत्नी का संकल्प अवश्य उठा था, पर कोई वास्तविक विवाह नहीं हुआ। वह उनकी अवशिष्ट जगत्-वासना की साकार अधिष्ठात्री थी। उसका प्रेम, प्रतीक्षा, परिवार और अपने सम्बन्ध की पहचान उसी मानसिक जगत् में अनुभव की गई व्यवस्था का भाग थे।

यह स्पष्टीकरण विद्याधरी की पीड़ा का आधार बता रहा था। उसने जो चाह, प्रतीक्षा और विरक्ति अनुभव की थी, वे उसके लिए घटित अवस्थाएँ थीं। जिस सम्बन्ध को वह स्वतंत्र, आरम्भ से स्थापित विवाह मानती थी, वह वासना से बनी पहचान थी। अपने जन्म का कारण समझते ही उसकी कथा एक निजी शिकायत की सीमा से आगे चली गई।

वसिष्ठ ने श्रीराम को इस प्रसंग के माध्यम से दिखाया कि मन नामकरण से आगे बढ़कर पूरा सम्बन्ध, कर्तव्य, स्मृति और जगत् प्रदान कर सकता है। व्यक्ति उन्हीं के भीतर प्रेम, अपूर्णता और समय का अनुभव करता है। विवेक जागने पर अनुभव की उत्पत्ति दिखाई देने लगती है।

विद्याधरी के वैराग्य का महत्त्व यहीं पूरा खुलता है। कामना के वेग में वह ब्राह्मण से केवल प्रत्युत्तर चाहती थी। वैराग्य ने उसे यह प्रश्न करने योग्य बनाया कि वह स्वयं कौन है और इस सम्बन्ध का अधिष्ठान क्या है। खेचरी और धारणा ने उसे शिला-लोक से बाहर पहुँचाया। वसिष्ठ का संग उसे उसी लोक में नए बोध के साथ वापस लाया। ब्रह्मा के वचन ने उसके जन्म की वह तह खोल दी जो भीतर रहते हुए उससे छिपी थी।

इस बोध के बाद उसके लिए ब्रह्मा से गृहस्थ-सुख माँगने का प्रश्न शेष नहीं रहा। सामने उस सृष्टि का अन्त आने वाला था। ब्रह्मा अपनी संसार-वृत्ति को समेट रहे थे और विद्याधरी की साधना भी उसी निवृत्ति में प्रवेश करने लगी।

दो परार्ध और चार प्रलय

ब्रह्मा ने कहा कि उनके कल्पित जीवन के दो परार्ध पूर्ण हो चुके हैं। जिस काल-विस्तार में वह जगत् पुष्ट हुआ था, उसी के भीतर अब अनेक प्रकार की समाप्तियाँ एक साथ आ मिली थीं। नित्य, नैमित्तिक, दैनन्दिन और आत्यन्तिक, चारों प्रलयों का संयोग उपस्थित था। चतुर्युग का काल, मनु की व्यवस्था, इन्द्र का पद और देवताओं का कालक्रम भी अपने-अपने अवसान की ओर था।

उन्होंने समझाया कि चिति की अनन्त सामर्थ्य प्रत्येक पात्र और पदार्थ में सृष्टि का अनुभव प्रकाशित कर सकती है। घट में जगत् की कल्पना हो सकती है, पट में, भित्ति में, आकाश में, वायु में, जल में, अग्नि में और पाषाण में भी। चेतना अपने स्वरूप में स्थित रहती है और स्थान के अनुसार नाम बदलते रहते हैं। जहाँ वासना और संकल्प दृढ़ होते हैं, वहाँ उनके अनुरूप जगत् का अनुभव फैल सकता है।

इस कथन को स्थूल पदार्थ के भीतर छिपी छोटी प्रतिकृति की तरह समझना अधूरा होगा। ब्रह्मा जिस व्यवस्था की ओर संकेत कर रहे थे, उसमें देखने वाला, देखने की साधना और दिखाई देने वाला लोक एक ही चेतना के भीतर सम्बन्ध पाते हैं। साधारण दृष्टि शिला की कठोर सतह पर रुकती है। संस्कारित सूक्ष्म दृष्टि उसी अधिष्ठान में विस्तृत विश्व को अनुभव करती है।

ब्रह्मा ने वसिष्ठ से कहा कि अब वे अपने गन्तव्य की ओर जाएँ। विदाई आदरपूर्वक हुई। वसिष्ठ उस लोक से लौटे। ब्रह्मा की सृष्टि प्रलय की दीर्घ प्रक्रिया में प्रविष्ट हुई और विद्याधरी ने भी ध्यान में उसी निवृत्ति का अनुसरण किया। भूमि, लोक, देव-व्यवस्थाएँ और प्रकट तत्त्व क्रमशः सिमटते हुए चेतना में लौटने लगे।

प्रलय के बाद बची स्वर्णशिला

दीर्घ प्रलय के उपरान्त अनेक दृश्य मिट चुके थे और ब्रह्मा का जगत् अपनी पूर्व व्यवस्था में विलीन हो चुका था। वसिष्ठ ने अपनी दृष्टि फिर उसी विशाल स्वर्णशिला की ओर मोड़ी।

वसिष्ठ ने उसे सामान्य दृष्टि से देखा तो एक ही शिला दिखाई दी। उसमें कोई नगर खुला नहीं था और किसी विश्व की सीमा अलग से नहीं चमक रही थी। फिर उन्होंने संकल्प-दृष्टि और निर्मल बोध से देखा। शिला के प्रत्येक प्रदेश में सृष्टियों के जाल दिखाई देने लगे। कहीं ब्रह्मा उत्पन्न हो रहे थे, कहीं संसार अपनी रचना के लिए तैयार था, कहीं पृथ्वी और तत्त्वों की व्यवस्था अलग प्रकार से बनी थी।

उन सृष्टियों की समानता भी पूर्ण नहीं थी। किसी लोक में परिचित क्रम था, किसी में देवताओं और प्राणियों का गठन भिन्न था। कहीं राम और रावण का प्रसंग हमारे जाने हुए रूप के निकट था, कहीं उसके पात्रों और घटनाओं की व्यवस्था बदल गई थी। कहीं एक ही नाम अनेक रूपों में सामने आता था। अनन्त चिति में सम्भावना किसी एक इतिहास की प्रतिलिपि बनकर नहीं ठहरी थी।

वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा कि संकल्प-दृष्टि में आत्मरूप आकाश के भीतर अनन्त सृष्टियाँ दिखाई देती हैं और निर्मल आत्म-दृष्टि में अद्वैत चेतना ही प्रकाशित रहती है। पाषाण में घास, तृण, पत्थर, फल और फूलों के असंख्य रूप भी दृष्टिगत हो सकते हैं। उन सबका अधिष्ठान एक चिति में मिलता है। चिति अपने ही प्रकाश में नाम और रूप का अनुभव प्रकट करती है।

वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा कि पहली यात्रा ने ब्रह्मा की वासना से व्यवस्थित एक जगत् दिखाया था। उसके प्रलय के बाद निर्मल दृष्टि ने उसी शिला में असंख्य दूसरी सृष्टियाँ प्रकट कर दीं। विद्याधरी के लिए युगों तक पूर्ण रहा लोक अभ्यास बदलने पर छिप गया था और धारणा से फिर दिखाई दिया। भीतर पहुँचकर ब्रह्मा ने उसके विवाह, परिवार और स्वयं उसके रूप का आधार स्पष्ट किया। इस प्रकार यात्रा के प्रत्येक चरण में दृष्टि का क्षेत्र बदला और उसके साथ अनुभव का अर्थ भी खुलता गया।

सामान्य दृष्टि में स्वर्णशिला एक पाषाण रही, संकल्प-दृष्टि में वही अनन्त विश्व-जाल का अधिष्ठान बनी। वसिष्ठ ने राम को शिला की कठोरता, लोकों की बहुलता और समय के विस्तार के बीच उस चिति को पहचानने को कहा जो हर रूप और हर दृष्टि को प्रकाशित करती है।

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