कथा · 25
शिला-लोक: पत्थर के भीतर का संसार
एक ऋषि ने ध्यान में एक पत्थर देखा। फिर पत्थर के भीतर देखा। वहाँ एक पूरा संसार था। और उस संसार के एक पत्थर में, दूसरा संसार।
एक ऋषि वन में ध्यान कर रहे थे। पास में एक छोटा सा पत्थर था। साधारण। न बड़ा, न रंगीन। बस एक भूरा पत्थर।
ऋषि की आँख गहरी हुई। ध्यान बहुत अंदर गया। उन्होंने पत्थर पर मन एकाग्र किया। बहुत देर तक देखते रहे।
फिर अजीब हुआ।
उन्हें लगा कि वो पत्थर के भीतर देख रहे हैं। पत्थर पारदर्शी हो गया। भीतर – एक पूरा ब्रह्मांड था।
उस ब्रह्मांड में सूरज थे, चाँद थे, तारे थे। पृथ्वी थी, पहाड़ थे, समुद्र थे। और प्राणी थे – मनुष्य, पशु, पक्षी।
ऋषि ने और गहरा देखा। उस ब्रह्मांड के एक पहाड़ पर एक ऋषि बैठा था। ध्यान में। उसके पास एक छोटा पत्थर था।
तीसरे ब्रह्मांड का खुलासा। उस पत्थर के भीतर भी एक संसार।
हमारा ऋषि और गहरा गया। पाँचवाँ संसार। दसवाँ। हज़ारवाँ।
हर संसार पूरा था। हर में सूरज, चाँद, प्राणी। हर में कोई न कोई ध्यान कर रहा था। हर के पास एक पत्थर था।
ऋषि के मन में एक डर सा हुआ। “यह कहाँ रुकेगा?”
एक आवाज़ आई। शायद उन्हीं के भीतर से।
“कहीं नहीं रुकेगा। हर रूप में रूप है। हर पत्थर में संसार है। हर संसार में पत्थर है।”
“फिर असली क्या है?”
“असली वो है जो यह सब देख रहा है। तुम्हारे भीतर भी, उन ऋषियों के भीतर भी। वो एक है। बाकी सब प्रतिबिंब हैं।”
ऋषि अपने ध्यान से बाहर आए।
उनके सामने वही साधारण पत्थर था। मगर अब वो जानते थे। उस पत्थर में जो था, वो साधारण नहीं था। और उनके अपने शरीर में जो था – वो भी कोई और संसार हो सकता था, किसी और के पत्थर के भीतर।
उन्होंने पत्थर को हाथ में लिया। प्यार से देखा।
“तुझमें कितने जीव बसे हैं,” उन्होंने धीरे से कहा। “और मेरे भीतर कितने।”
एक मिनट बाद, उन्होंने पत्थर वापस ज़मीन पर रखा। उठे। आश्रम लौटे।
शिष्यों ने पूछा, “गुरुजी, आप अलग दिख रहे हैं।”
उन्होंने हँसकर कहा, “मैंने आज एक छोटी सी चीज़ देखी।”
“क्या?”
“छोटा कुछ नहीं होता। बड़ा भी कुछ नहीं होता। हर चीज़ अपने भीतर एक पूरा खोल समेटे है। और ऊपर से देखो, तो हर चीज़ ख़ुद ही एक खोल है।”
शिष्य कुछ समझे, कुछ नहीं। मगर उस दिन के बाद वो ऋषि किसी भी छोटी चीज़ को – एक धूल का कण, एक तिनका, एक बूँद – बहुत ध्यान से छूते थे।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, ब्रह्मांड का आकार बाहरी नहीं है। हर बिंदु में पूरा ब्रह्मांड है। हर पत्थर एक नक्षत्र-गुच्छ है। यह बात सुनकर लगती है मगर देखकर बदल देती है।”
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