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शिखिध्वज: राजमहल से मन्दराचल तक

कथा · 35

शिखिध्वज: राजमहल से मन्दराचल तक

राजा शिखिध्वज धन का दान करते हैं, तीर्थयात्राएँ पूरी करते हैं और फिर भी शान्ति नहीं पाते। वे आधी रात को चूड़ा और मालव का राजमहल छोड़कर बारह दिन तक वन-प्रदेशों में चलते हैं। आठ वर्ष की तपस्या के बाद उनकी पत्नी एक अपरिचित गुरु के रूप में लौटती हैं और वह प्रश्न पूछती हैं, जिसका उत्तर उनके कठोर अनुशासन ने अभी तक नहीं दिया है।

जिसे राजा स्वीकार न कर सके

रानी चूड़ा योग में सिद्ध और आत्मज्ञान में स्थित हो चुकी थीं। उनकी समझ उसी राजमहल, दाम्पत्य और उत्तरदायित्वों के बीच परिपक्व हुई थी, जहाँ उनका जीवन पहले से चल रहा था। वे राजा शिखिध्वज के प्रति स्नेह रखती थीं और उन्हें आत्मस्वरूप का ज्ञान समझाने का बार-बार प्रयत्न करती थीं।

शिखिध्वज प्रेम और आदर से उनकी बातें सुनते। शब्द स्मृति में रह जाते, पर उनका अर्थ राजा की अपनी दृष्टि नहीं बन पाता था। उनके भीतर यह धारणा अभी दृढ़ थी कि मुक्ति किसी कठिन उपलब्धि या परिस्थिति के पूर्ण परिवर्तन से प्राप्त होगी। चूड़ा ने उनकी निष्ठा भी देखी और उनकी जिज्ञासा की अपरिपक्वता भी।

वसिष्ठ ने श्रीराम को समझाया कि गुरु और शास्त्र साधक का ध्यान सही दिशा में ले जाते हैं, प्रश्न को स्पष्ट करते हैं और भ्रम दूर करने में सहायता देते हैं। सत्य की पहचान अन्ततः साधक की अपनी बुद्धि में होती है। मन जब ग्रहण करने को तैयार न हो, तब पूर्णतः उचित शिक्षा भी किसी दूसरे का विचार बनकर रह जाती है।

एक दिन चूड़ा के पास से स्नान के लिए उठने के बाद राजा के भीतर का वैराग्य अधिक तीव्र हुआ। उन्होंने राजसी भोगों और उनके समाप्त होने पर आने वाली व्याकुलता को देखा। जिन सुखों ने कभी तृप्ति का वचन दिया था, वे अब उन्हें क्षणिक, दोहराव से भरे और अपने अन्त की आशंका से बोझिल लगे।

उन्होंने सम्पत्ति का दान आरम्भ किया। गौएँ, भूमि, स्वर्ण, मन्दिर और अन्य धन ब्राह्मणों, निर्धनों, अतिथियों तथा उचित पात्रों को दिया गया। चूड़ा ने विद्वानों और मन्त्रियों से कहा कि वे राजा को भोगों की अस्थिरता और अन्तर्मुख सुख की आवश्यकता स्मरण कराते रहें।

शिखिध्वज तीर्थयात्रा पर निकले। पवित्र जल में स्नान किया, दान दिया, धार्मिक व्रत निभाए और साधुजनों की संगति की। प्रत्येक यात्रा ने शरीर को श्रम और आचरण को नियम दिया। राजमहल लौटने पर मन की बेचैनी फिर उनके सामने उपस्थित थी।

इन प्रयत्नों का अधूरा फल उन्हें लापरवाह नहीं बना सका। उनकी धारणा और दृढ़ हो गई कि राज्य के दायित्व और राजमहल का वातावरण शान्ति के मार्ग में बाधा हैं। अब वन उन्हें तप के लिए उचित स्थान दिखाई देने लगा।

राजमहल में हुई बात

एक रात दिन के सभी कार्य शान्त हो जाने पर शिखिध्वज ने चूड़ा से कहा, “भोग अब मुझे पीड़ा देने लगे हैं। राज्य सूना दिखाई देता है। मैं वन में जाकर तप करना चाहता हूँ।”

चूड़ा ने उनके शब्दों में छिपा अटल निश्चय सुन लिया। उन्होंने राजा से उस जिम्मेदारी पर विचार करने को कहा, जो प्रजा ने उनके हाथ में सौंप रखी थी। जिस शासक में लोगों की रक्षा करने का सामर्थ्य हो, उसके लिए वर्तमान कर्तव्य पूरा करना आवश्यक था। वृद्धावस्था आने पर वनवास का समय भी आ सकता था।

उन्होंने कहा, “जब हम दोनों वृद्ध हो जाएँगे, तब साथ चलेंगे। इस समय राज्य को आपकी देखभाल चाहिए। उचित समय से पहले प्रजा को छोड़ देने का उत्तरदायित्व भी राजा पर ही आता है।”

वन-प्रस्थान से पहले शिखिध्वज को समझाती चूड़ाला

शिखिध्वज अपने मन में शान्ति और प्रस्थान को एक कर चुके थे। उन्होंने चूड़ा से मार्ग में बाधा न बनने को कहा और वन को अपने लिए पर्याप्त संगति बताया। उन्होंने यह भी कहा कि वन के कष्ट स्त्रियों के लिए उचित नहीं हैं और चूड़ा को राजमहल में रहकर शासन सँभालना चाहिए।

राजा का कथन उस समय की मान्यताओं और अपनी पत्नी को गुरु के रूप में स्वीकार न कर पाने की स्थिति से निकला था। चूड़ा पहले ही उस ज्ञान में स्थित थीं, जिसकी खोज में शिखिध्वज वन जाना चाहते थे। योगबल से आकाश में चलने की शक्ति भी उनके पास थी। उन्होंने अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए विवाद नहीं किया।

उनकी शान्ति में उदासीनता नहीं थी। वे समझती थीं कि जबरन दी गई शिक्षा राजा को उन्हीं धारणाओं की रक्षा करने के लिए प्रेरित करेगी, जो उन्हें अशान्त रखती हैं। समय, अनुशासन और चुने हुए जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव शायद उनके भीतर अधिक सच्चा प्रश्न जगा सके।

शिखिध्वज ने स्नान किया और दिन के सभी राजकीय काम पूरे किए। सन्ध्या के नियत अनुष्ठानों के बाद वे निजी कक्ष में लौटे और चूड़ा के पास लेट गए। उनके व्यवहार से किसी को यह आभास नहीं हुआ कि निर्णय भोर होने से पहले ही कर्म बन जाएगा।

आधी रात का प्रस्थान

आधी रात के बाद, जब चूड़ा और राजमहल के सेवक सो गए, शिखिध्वज चुपचाप उठे। उन्होंने तलवार ली और पत्नी को जगाए बिना कक्ष से बाहर निकल आए। द्वार पर पहरेदारों से कहा कि वे अपने स्थान पर रहें, क्योंकि राजा एक कार्य से अकेले नगर से बाहर जा रहे हैं।

आधी रात के बाद सोए हुए राजमहल से अकेले निकलते शिखिध्वज

वे अन्तिम गलियों से गुजरे, पीछे छूटते राज्य को प्रणाम किया और मालव की राजधानी के बाहर फैले अँधेरे में प्रवेश कर गए। कोई सैनिक या सेवक साथ नहीं था। आबाद भूमि के बाद घनी झाड़ियाँ, अनिश्चित पगडण्डियाँ और वन्य जीवों की आवाजें आरम्भ हुईं।

रात के शेष प्रहर में वह विशाल वन भयावह था। शिखिध्वज सूर्योदय तक चलते रहे और दिन चढ़ने पर भी गति बनाए रखी। उन्हें आशंका थी कि राजमहल से कोई उनके चिह्नों का पीछा करते हुए आएगा और लौटने के लिए विवश करेगा। इसलिए वे नगर से शीघ्र दूर निकल जाना चाहते थे।

उचित समय आने पर उन्होंने स्नान किया, सन्ध्या की और वन के फल खाए। फिर यात्रा आरम्भ कर दी। उनके लिए त्याग का पहला अनुभव निरन्तर चलना था। राजसी सुविधा पीछे थी और सामने का गन्तव्य अभी स्पष्ट नहीं हुआ था।

यात्रा बारह दिन चली। उन्होंने आबाद प्रदेश, पर्वत, नदियाँ और एक के बाद एक कई वन पार किए। प्रत्येक पड़ाव उन्हें राजकीय जीवन के परिचित चिह्नों से अधिक दूर ले गया। वे ऐसे मार्ग चुनते रहे, जो नगरों और जनसमूहों से दूर जाते थे।

अन्ततः मन्दराचल के एक निर्जन वन में पहुँचे। पास में स्वच्छ जल था। फलदार वृक्षों और पुष्पित लताओं के बीच ठंडी घास उगी थी। पुराने ब्राह्मण आश्रमों के चिह्न भी दिखाई देते थे। उन्होंने जल से घिरा हुआ एक स्वच्छ, समतल स्थान चुना, जो बस्ती से बहुत दूर था।

शिखिध्वज ने वर्षा और खुले आकाश से बचने के लिए पत्तों की कुटी बनाई। पूजा और दैनिक निर्वाह के लिए कुछ वस्तुएँ जुटाईं: बाँस का दण्ड, फल रखने का पात्र, अर्घ्य का पात्र, पुष्पपात्र, कमण्डलु, रुद्राक्ष की माला, शीत से बचने का वस्त्र और मृगचर्म का आसन।

जिस राजा ने विशाल राज्य की व्यवस्था सँभाली थी, अब उसने ऐसी कुटी बसाई, जहाँ प्रत्येक वस्तु का एक निश्चित प्रयोजन था। परिवर्तन देखने के लिए कोई दरबार वहाँ उपस्थित नहीं था। मन्दराचल ने उन्हें वही एकान्त दिया, जिसे उन्होंने चूड़ा के सामने अपना साथी बताया था।

आश्रम की दिनचर्या

शिखिध्वज ने दिन के मुख्य कार्यों को चार प्रहरों के अनुसार व्यवस्थित किया। प्रातः के पहले प्रहर में वे सन्ध्या और जप करते। मन्त्र और प्रार्थना आरम्भिक समय को दिशा देते और उनकी दृष्टि को एक क्रम में बाँधते थे।

दूसरे प्रहर में वे पुष्प चुनने निकलते। स्नान करके कुटी लौटते और वन से मिली सामग्री द्वारा देवताओं की पूजा करते। पात्र, माला, दण्ड और आसन से हर क्रिया का अपना स्थान और समय निश्चित रहता था।

उनका भोजन वन के फल थे। विस्तृत वर्णन में कन्द और कमलनाल भी आते हैं, जिन्हें वे आसपास के प्रदेश से प्राप्त करते थे। भोजन के बाद जप चलता रहता। रात्रि में वे अकेले रहते और शरीर के लिए जितना आवश्यक हो, उतना विश्राम लेते।

एक दिन के बाद अगला दिन उसी अनुशासन में आता रहा। शिखिध्वज ने राजमहल के भोगों को स्मरण करके लौटने का विचार नहीं किया। कोई तत्काल सिद्धि न मिलने पर भी साधना नहीं छोड़ी। उनका तप कठोर था और उसके प्रति उनकी निष्ठा सच्ची थी।

इस दिनचर्या ने राजकार्य से जुड़ी अनेक माँगों को शान्त कर दिया। साथ ही उस अकेले साधक की पहचान को पुष्ट किया, जिसने मुक्ति पाने के लिए राज्य छोड़ा था। चूड़ा की शिक्षा पहचान के आधार को ही जाँचने को कहती थी। वह जाँच अभी पूरी नहीं हुई थी।

वसिष्ठ की कथा दोनों बातों को साथ रखती है। वन के अनुशासन ने शिखिध्वज के धैर्य और ध्यान को परिपक्व किया। उनका आत्मस्वरूप किसी कुटी, वस्त्र या दिनचर्या से बनाया नहीं जा सकता था। इस रहस्य को जानने वाली गुरु उसी समय उनके छोड़े हुए राज्य को सँभाल रही थीं।

चूड़ा की प्रतीक्षा

पति के बहुत दूर निकल जाने के बाद चूड़ा की नींद खुली। शय्या खाली देखकर उन्होंने प्रस्थान के संकेत समझे और राजा के पीछे जाने का विचार किया। योगबल से वे आकाश में उठीं और उस दूरी को पार कर गईं, जिसे शिखिध्वज ने पूरी रात चलते हुए तय किया था।

उन्होंने ऊपर से राजा को तलवार लिए वन में अकेले जाते देखा। वे उसी क्षण उनके पास प्रकट हो सकती थीं। ऐसा करने से पहले उन्होंने राजा के मन की भावी गति और किसी सम्भावित उपदेश के उचित समय का विचार किया।

उनकी शेष वासनाएँ अभी ऐसी ग्रहणशीलता में नहीं बदली थीं, जिसमें शिक्षा टिक सके। पत्नी के रूप में पहुँचने पर राजा यही समझते कि चूड़ा उन्हें घर लौटाने आई हैं। गुरु के रूप में बोलने पर भी पुराने संस्कार उनके उत्तर को दिशा देते।

चूड़ा राजधानी लौट आईं। उन्होंने मन्त्रियों और नागरिकों को आश्वस्त किया कि राजा एक प्रयोजन से गए हैं और राज्य सुरक्षित रहेगा। इसके बाद उन्होंने उस दायित्व को अपने हाथ में लिया, जिसे शिखिध्वज उनके लिए छोड़ गए थे।

उन्होंने सावधानी से शासन किया। निर्णय समय पर हुए, प्रजा की रक्षा हुई और राजा की अनुपस्थिति में व्यवस्था बनी रही। आत्मज्ञान ने उन्हें सार्वजनिक कर्तव्य से दूर नहीं किया। उसी स्पष्टता ने उन्हें शासन करते हुए पति की मनःस्थिति को भी ठीक प्रकार समझने दिया।

उधर शिखिध्वज मन्दराचल में अपनी नियमित साधना करते रहे। इस कथा का मुख्य कालक्रम उनके तप और चूड़ा के शासन के लिए आठ वर्ष बताता है। कुछ अन्य परम्पराओं में अठारह वर्ष का समय मिलता है। यहाँ घटनाएँ आठ वर्ष के क्रम में आगे बढ़ती हैं।

इन आठ वर्षों में दोनों ने अपने सामने आया कार्य नहीं छोड़ा। राजा पुष्प लाते, स्नान करते, पूजा और जप करते तथा वन का भोजन ग्रहण करते। रानी राज्य चलातीं, प्रतीक्षा करतीं और उस क्षण का विचार करतीं, जब नई रीति से कही बात उनके पति तक पहुँच सके।

मन्दराचल की ओर वापसी

आठ वर्ष पूरे होने पर चूड़ा ने अनुमान किया कि समय और अनुशासन ने शिखिध्वज को अब अपने पुराने निष्कर्षों की परीक्षा के योग्य बना दिया होगा। वे राजमहल से आकाशमार्ग द्वारा मन्दराचल की ओर चलीं।

यात्रा के बीच पति की स्मृति और उनसे मिलने की इच्छा मन में उठी। चूड़ा ने उस भाव को स्पष्ट दृष्टि से देखा और आगे बढ़ती रहीं। आत्मज्ञान ने स्नेह को समाप्त नहीं किया था। उसने स्नेह को उनके निर्णय पर अज्ञानपूर्वक अधिकार करने से रोक रखा था।

योगदृष्टि से उन्होंने निर्जन आश्रम का स्थान पाया। शिखिध्वज भूमि पर बैठे देवताओं और अतिथियों की पूजा के लिए फूल पिरो रहे थे। वर्षों के तप से शरीर कृश और धूप से साँवला हो गया था। सिर पर जटाएँ थीं और शरीर पर वल्कल वस्त्र।

चूड़ा ने बाहरी तप के चिह्नों से आगे उनकी अवस्था देखी। साधना में स्थिरता आ चुकी थी और लम्बी दिनचर्या ने मन को संयम दिया था। अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान अभी शेष थी। साधक और साध्य के बीच की दूरी उनकी दृष्टि में बनी हुई थी।

उन्होंने पत्नी के रूप में सामने जाने पर विचार किया। उस रूप के साथ राजमहल की पुरानी बातचीत, वन से लौटाने की आशंका और उनकी शिक्षा के प्रति पिछला अविश्वास भी उपस्थित हो जाता। एक अपरिचित रूप राजा को वक्ता की पहचान से पहले वचन सुनने का अवसर दे सकता था।

चूड़ा ने तेजस्वी युवा ब्रह्मचारी का रूप धारण किया। उनके हाथ में कमण्डलु और रुद्राक्ष की माला थी। गले के पास मृगचर्म, शरीर पर भस्म और कन्धे पर श्वेत यज्ञोपवीत दिखाई देता था।

वे मन्दराचल तक आकाशमार्ग से पहुँची थीं, पर कुटी के निकट की दूरी पैदल चलीं। इस प्रकार राजा के सामने कोई अलौकिक प्रदर्शन नहीं हुआ। वहाँ केवल एक पथिक तपस्वी अतिथि के रूप में आ रहा था।

युवा ब्रह्मचारी का रूप धरकर शिखिध्वज के पास आती चूड़ाला

पर्णकुटी का अतिथि

शिखिध्वज ने तेजस्वी ब्राह्मण युवक को आश्रम के पास आते देखा और तुरन्त उठ खड़े हुए। फूल पिरोने का काम अलग रखा, खड़ाऊँ उतारी और अतिथि-सत्कार की तैयारी की।

उन्होंने पत्तों का आसन, अर्घ्य, चरण धोने का जल, पुष्प और माला अर्पित की। राजदरबार छोड़ देने के बाद भी अतिथि के सम्मान की उनकी समझ बनी हुई थी। वर्षों के एकान्त ने विनम्रता की इस रीति को दुर्बल नहीं किया था।

राजा ने कहा, “आपके आगमन से आज का दिन धन्य हुआ। कृपया बताइए कि आप कहाँ से पधारे हैं और इस निर्जन वन में किस प्रयोजन से आए हैं।”

वेषधारी चूड़ा ने अभिवादन स्वीकार किया। उन्होंने आश्रम की सुव्यवस्था, शिखिध्वज के कठोर तप, उनके संयम और अपरिचित पथिक का स्वागत करते समय दिखाई गई शान्त सजगता की प्रशंसा की।

यह प्रशंसा उनकी वास्तविक उपलब्धि के लिए थी। उन्होंने बारह दिन कठिन मार्ग पार किया था, वन में अपने हाथ से जीवन बनाया था और आठ वर्ष तक उसकी कठोर लय निभाई थी। अब आने वाला प्रश्न उस परिश्रम को उसी विषय की ओर मोड़ने वाला था, जो अभी तक उनकी दृष्टि से छूटा रहा।

चूड़ा ने पूछा, “क्या आपने आत्मज्ञान के लिए भी कोई तप किया है?”

इस बार शब्दों के साथ पत्नी की परिचित पहचान नहीं थी। शिखिध्वज के सामने ऐसा अपरिचित तपस्वी खड़ा था, जिसका वे आदर करते थे और जिसका प्रश्न उनके वर्षों के परिश्रम से बने खुले स्थान में प्रवेश कर सकता था।

कथा इसी प्रश्न पर ठहरती है। शिखिध्वज ने सुविधा छोड़ना, एकान्त सहना, दिन को अनुशासित करना और अतिथि का सम्मान करना सीख लिया था। चूड़ा ने प्रतीक्षा, शासन और शिक्षा के लिए उचित रूप चुनने की कला दिखाई थी। अब दोनों का विस्तृत संवाद उस प्रश्न से आरम्भ होगा, जिसने वनवास के प्रयोजन को फिर से जाँचने योग्य बना दिया है।

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