शिखिध्वज की एकल यात्रा

कथा · 36

शिखिध्वज की एकल यात्रा

पत्नी ने नहीं रोका। राजा ने महल छोड़ा। वन में अकेले तपस्या शुरू की। हर तरीक़ा आज़माया, हर बार थक गया। तभी एक राहगीर ने एक वाक्य कहा।

राजा शिखिध्वज ने महल छोड़ा। (बाद में रानी चूड़ाला ने उन्हें ढूँढा – वो दूसरी कथा है।) मगर पहले जो हुआ, वो यह था।

शिखिध्वज वन में अकेले गए। पहले रात को कुछ डर लगा। पेड़ों के बीच, जानवरों की आवाज़ें। फिर धीरे-धीरे आदत हो गई।

उन्होंने एक नदी के किनारे डेरा डाला। सोचा, “अब तपस्या करूँगा। आत्म-ज्ञान होगा।”

पहले उन्होंने उपवास शुरू किया। एक दिन, दो दिन, तीन दिन। शरीर कमज़ोर हुआ। चक्कर आए। मगर मन शांत नहीं हुआ। बल्कि और चंचल। भूख ने उसे और भगा दिया।

उन्होंने उपवास छोड़ा। फल खाए।

फिर मौन व्रत किया। एक हफ़्ते तक एक शब्द नहीं बोले। मगर भीतर विचार और तेज़ हो गए। बिना बोले, मन और चलने लगा। मौन ने मन को नहीं रोका, और भड़का दिया।

उन्होंने मौन छोड़ा।

शारीरिक तपस्या आज़माई। एक टांग पर खड़े हुए। सूरज की धूप में। रात की ठंड में। शरीर टूट गया।

जप शुरू किया। एक मंत्र हज़ार बार। मगर मंत्र मशीनी हो गया। बस होंठ चलते थे, मन कहीं और।

उन्होंने पूजा की। मूर्तियों के सामने बैठे। मगर उन्हें नहीं लगा कि कोई सुन रहा है।

हर तरीक़ा आज़माया। हर बार वो असफल हुए। शरीर टूटने लगा। बाल लंबे हो गए। आँखें खाली।

एक दिन वो थककर एक पेड़ के नीचे बैठे। आँखें मूँद ली। उन्होंने अब तपस्या नहीं की। बस बैठ गए।

तभी एक राहगीर वहाँ से गुज़रा। एक साधारण साधु। हाथ में लाठी, कंधे पर एक झोला।

उसने शिखिध्वज को देखा। पहचाना नहीं। मगर बैठ गया पास।

“भाई, क्या हो रहा है?”

शिखिध्वज ने आँखें खोलीं। “तपस्या कर रहा था। नहीं हो रही।”

“तपस्या से क्या चाहिए?”

“आत्म-ज्ञान।”

“और अभी क्या हो रहा है?”

“मैं ख़ुद से लड़ रहा हूँ। शरीर से लड़ रहा हूँ। मन से लड़ रहा हूँ। थक रहा हूँ।”

साधु हँसा।

“भाई, तू ख़ुद को क़ाबू में करने की कोशिश कर रहा है। मगर जो क़ाबू करने वाला है, और जो क़ाबू में आना है, वो दोनों तू ही है।

“तू ख़ुद से लड़ रहा है। ख़ुद को मार रहा है। ख़ुद को थका रहा है।

“लड़ना बंद कर। बस बैठ। बस देख।”

शिखिध्वज ने कुछ कहना चाहा। मगर साधु उठ गया।

“बेटा, मेरा रास्ता आगे है। मगर एक बात बता दूँ – तू जो ढूँढ रहा है, वो लड़ाई से नहीं मिलेगा। शांति में मिलेगा। और शांति वो है जब तू कुछ नहीं करता। बस होता है।”

साधु चला गया। शिखिध्वज बैठे रहे।

उन्होंने एक नया प्रयोग किया। कुछ नहीं किया। न जप, न उपवास, न आसन। बस बैठे। साँस आती-जाती।

एक हलकी सी झलक मिली। एक पल के लिए। मन रुका। शांति आई।

फिर मन फिर चलने लगा। मगर अब उन्हें पता था कि शांति कैसी होती है।

उन्होंने वहीं बैठना जारी रखा। हर रोज़।

(आगे चलकर रानी चूड़ाला आई और इस झलक को पूरा किया। वो अलग कथा है।)

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, साधना का सबसे बड़ा रहस्य यह है – साधना नहीं करनी। ख़ुद से लड़ना नहीं। बस होना। मगर यह ‘बस होना’ सबसे कठिन काम है। शिखिध्वज ने वर्षों लगाए इस सीधी बात को समझने में।”

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