कथा · 36
शिखिध्वज की एकल यात्रा
पत्नी ने रोका नहीं, और राजा ने महल छोड़ दिया। वन में अकेले बैठकर उन्होंने तपस्या शुरू की, हर तरीक़ा आज़माया और हर बार थककर रह गए। फिर एक दिन एक राहगीर ने एक ही वाक्य कहा।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, अगर एक राजा सब कुछ छोड़ दे, तो क्या वह मुक्त हो जाता है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, शिखिध्वज की कथा आप पहले सुन चुके हैं, चूड़ाला की कथा के साथ। पर अब उनकी एकल यात्रा को अलग से सुनिए। वे जंगल में अकेले थे, और जो वे ढूँढ रहे थे, वह उन्हें वहाँ नहीं मिला। यह कथा एक चेतावनी है, कि अगर रास्ता ही ग़लत हो, तो कितनी भी कोशिश काम नहीं आती।”
निर्णय
शिखिध्वज ने राज्य छोड़ने का निर्णय कर लिया।
बहुत बरस वे और चूड़ाला साथ-साथ पढ़ चुके थे, पर चूड़ाला ने ज्ञान पा लिया था और शिखिध्वज ने नहीं।
शिखिध्वज ने सोचा – “मेरा मन हर समय व्यस्त रहता है, राज्य में बहुत व्यवधान हैं। मुझे एकान्त चाहिए।”

उन्होंने यह बात चूड़ाला से कही, तो चूड़ाला ने मना किया – “महाराज, आप जो चाहते हैं, वह जंगल में नहीं मिलेगा।”
पर शिखिध्वज नहीं माने।
उन्होंने राज्य छोड़ा और रानी को सौंप दिया।

और ख़ुद अकेले जंगल चले गए।
जंगल
शिखिध्वज जंगल पहुँचे।
जंगल बहुत बड़ा था, पेड़ ऊँचे थे और पत्ते घने।

उन्होंने एक बड़ा पेड़ चुना, जिसकी छाया घनी थी।
वहीं वे बैठ गए।
पेड़ की जड़ें मोटी थीं, नीचे की मिट्टी ठण्डी, और ऊपर की पत्तियाँ इतनी घनी कि हवा से हिलने पर एक मद्धम आवाज़ उठती।
दूर कहीं एक चिड़िया बोल रही थी, जिसकी आवाज़ बहुत साफ़ आ रही थी।
शिखिध्वज को यह जगह अच्छी लगी – “बस। अब यहीं रहूँगा।”
पहले दिन उनके भीतर शान्ति थी।
मैं अकेला हूँ। यहाँ कोई राज-काज नहीं, कोई मन्त्री नहीं, कोई दूत नहीं, कोई आगन्तुक नहीं। कोई बच्चा नहीं जो मुझे पिता कहे, कोई पत्नी नहीं जो मुझे महाराज कहे। बस मैं।
यह सोच उन्हें अच्छी लगी।
उन्होंने सोचा – “अब मेरा तप पूरा होगा। बस।”
पर यही उनकी पहली ग़लती थी। उन्होंने शान्ति को सोच भर लिया, उसे जिया नहीं।
दूसरे दिन उन्हें भोजन की चिन्ता हुई। उन्होंने जंगल से कन्द, पत्तियाँ और फल ढूँढे और खा लिए।
तीसरे दिन उन्होंने तप शुरू किया, आँखें बन्द करके बैठ गए।
मन
पहले ही दिन मन शान्त नहीं था।

बहुत-सी बातें भीतर उमड़ आईं, राज्य की, चूड़ाला की और पुराने दिनों की।
सबसे पहले बचपन की एक बात आई। पिता के साथ एक शिकार, एक हिरण। शिखिध्वज ने तीर चलाया था, हिरण भागा और बहुत देर तक भागता रहा, फिर गिर पड़ा।
शिखिध्वज ने आँखें खोल दीं – “यह बात यहाँ क्यों आ गई?”
फिर दूसरी बात आई। चूड़ाला के साथ पहली रात, उनका मन्द हास्य, उनकी आँखें।
फिर तीसरी बात। बहुत बरस पहले एक दूत की मृत्यु। उन्होंने उसे एक काम पर भेजा था, और वह लौटा ही नहीं।
ऐसी बहुत-सी बातें एक के बाद एक आती रहीं।
शिखिध्वज ने मन को रोकने की कोशिश की – “मन, रुक।” पर मन नहीं रुका।
उन्होंने ज़ोर से कहा – “मन, रुक।” पर मन हँसता रहा और और तेज़ चलने लगा।
दूसरे दिन फिर वही हुआ, मन बहुत भागा।
तीसरे दिन शिखिध्वज को क्रोध आ गया – “मन, तू रुकता क्यों नहीं?” पर मन ने कोई जवाब नहीं दिया।
चौथे दिन शिखिध्वज ने सोचा – “शायद कोई मन्त्र चाहिए।”
उन्होंने एक बहुत पुराना मन्त्र शुरू किया, जो उनके गुरु ने उन्हें कभी बताया था।
पहले दिन उन्होंने सौ बार जप किया, दूसरे दिन पाँच सौ, और तीसरे दिन एक हज़ार।
मन्त्र चलता रहा, पर मन के पीछे की वह भीड़ वैसी की वैसी ही रही।
यूँ ही बहुत दिन बीत गए।
दिनचर्या
शिखिध्वज की दिनचर्या साधारण थी।
सूरज निकलने से पहले ही वे बहुत जल्दी उठते, नदी पर जाकर स्नान करते, और लौटकर पेड़ के नीचे बैठकर देर तक ध्यान करते।
दोपहर को वे जंगल जाते, कन्द, पत्तियाँ और कोई फल ढूँढते, लौटकर साधारण-सा भोजन कर लेते।
शाम को फिर ध्यान करते, और रात को सो जाते।
यह दिनचर्या बहुत बरस तक वैसी ही चलती रही।
पर एक बात और थी।
शिखिध्वज ने अपनी साधना को और कठोर बनाना शुरू कर दिया।
पहले वे दिन में दो बार खाते थे, फिर एक बार, फिर बस बीच-बीच में। पहले रात भर सोते थे, फिर आधी रात, फिर बस दो पहर। पहले उनके पास एक चटाई थी, जिसे फेंककर वे ज़मीन पर सोने लगे। पहले एक कपड़ा था, जिसे भी फेंक दिया, और बस लंगोटी रख ली।
हर नई कठोरता के साथ वे सोचते – “अब मेरा तप पक्का हुआ।” पर भीतर कुछ नहीं खुलता था।
यूँ ही बहुत बरस बीत गए।
उनका देह बहुत कमज़ोर हो गया, आँखें भीतर धँस गईं, और देह पर जगह-जगह खरोंचें थीं। पर भीतर वे वही के वही रहे।
कभी-कभी जंगल से कोई गुज़रता, कोई बँजारा, कोई शिकारी, कोई पथिक। वह उन्हें देखकर कहता – “बाबा, राम।”
शिखिध्वज सिर हिला देते, बस इतना ही।
कभी-कभी कोई पूछता – “बाबा, आप कौन हैं?” पर शिखिध्वज कुछ नहीं कहते।
(भीतर वे सोचते। मैं कौन हूँ? यह सवाल असली है, पर मेरे पास इसका जवाब नहीं।)
पथिक चला जाता और शिखिध्वज वहीं बैठे रह जाते।
कभी कोई मृग बहुत पास आ जाता, शिखिध्वज को सूँघता और फिर चला जाता।
कभी कोई तोता उनके पास आ बैठता, पर शिखिध्वज को छूता नहीं, बस देखता रहता।
जंगल को शिखिध्वज से कोई शिकायत नहीं थी, पर जंगल के पास उन्हें देने को कुछ था भी नहीं। वे जो ढूँढ रहे थे, वह जंगल में था ही नहीं।
पर यह बात शिखिध्वज को बहुत बरस तक समझ ही नहीं आई।
कोशिश
शिखिध्वज ने और कठोर तप किया। उन्होंने सोचा – “मेरा तप कम पड़ रहा है, इसीलिए मन नहीं रुकता।”
उन्होंने भोजन और कम कर दिया, पहले दिन में दो बार, फिर एक बार, फिर बीच-बीच में भी नहीं। उनका देह पतला हो गया, पर मन वैसा ही रहा।
उन्होंने सोना कम कर दिया और रात भर आँखें बन्द किए बैठे रहे। पर नींद की कमी से मन और भी चलने लगा।
उन्होंने अपने देह को दिन में धूप में और रात में ठंड में रखा। देह ने प्रतिक्रिया दी, पर मन वैसा ही रहा।
यूँ ही बहुत बरस बीत गए।
कोशिश के अनेक रूप
इन बरसों में शिखिध्वज ने तप के बहुत-से रूप आज़माए।
एक बार उन्होंने एक पैर पर खड़े होना शुरू किया, दूसरा पैर ऊपर उठाकर बहुत देर तक। पहले दिन दो घड़ी, दूसरे दिन चार, और तीसरे दिन पूरी सुबह।
देह दर्द करता, पैर सूज जाता, पर मन वैसा ही चलता रहता।
फिर उन्होंने यह छोड़ दिया।
एक बार उन्होंने दोनों हाथ ऊपर उठा लिए और बहुत देर तक वैसे ही रखे। हाथ अकड़ गए और नीचे लाना तक मुश्किल हो गया।
पर भीतर सब वैसा ही रहा।
फिर उन्होंने यह भी छोड़ दिया।

एक बार उन्होंने पाँच दिशाओं में धूनी जलाई और बीच में बैठ गए।
ऊपर सूरज तपता और चारों ओर आग जलती। देह झुलस जाता, पसीना बहुत बहता, पर मन वैसा ही रहता।
फिर उन्होंने यह भी छोड़ दिया।
एक बार उन्होंने ठण्डी नदी में कमर तक पानी में खड़े रहना शुरू किया, घण्टों तक।
देह काँपता रहता, पर मन वैसा ही रहता।
फिर उन्होंने यह भी छोड़ दिया।
हर कोशिश के बाद एक ही बात मन में आती – “शायद यह तप कम है। अगला और कठोर करूँगा।”
पर अगले कठोर तप का भी वही नतीजा निकलता।
एक दिन उन्होंने सोचा – “शायद मेरा शरीर इन सब को सह नहीं पा रहा। शायद मुझे ज़्यादा देर तक जीना चाहिए, कम कठोर पर लम्बा तप।”
तो उन्होंने सब कठोर तप छोड़ दिए और आँखें बन्द करके बस बैठे रहे।
पर बैठने में भी मन उतना ही भागता रहा।
शिखिध्वज बोले – “कठोर तप में भी मन भागा और आराम में भी मन भागा। तो मन का सम्बन्ध तप से है ही नहीं।”
यह एक समझ तो थी, पर पूरी समझ नहीं थी।
हार
शिखिध्वज का देह बहुत कमज़ोर हो गया, आँखें भीतर धँस गईं और दाढ़ी उलझ गई। पर भीतर कुछ नहीं खुला।
एक दिन वे एक नदी के किनारे बैठे थे।
उन्होंने पानी में अपना प्रतिबिम्ब देखा।
एक बूढ़ा आदमी, थका हुआ और उदास।

शिखिध्वज बहुत मद्धम स्वर में बोले – “मैंने सब छोड़ दिया, और फिर भी कुछ नहीं मिला। मैंने राज्य छोड़ा, पत्नी छोड़ी, धन छोड़ा, यश छोड़ा। पर मैं अपनी कोशिश को नहीं छोड़ पाया। मेरी यही कोशिश मेरा बँधन है।”
यह बात उनके भीतर बैठ गई, पर इसका पूरा अर्थ वे अब भी नहीं समझे।
आराम
शिखिध्वज ने कोशिश थोड़ी कम कर दी और बिना तप, बिना ध्यान, बिना मन्त्र वैसे ही बैठे रहे।
पर पूरी तरह नहीं, क्योंकि मन में अब भी थोड़ी कोशिश बाक़ी थी।
एक रात उनके भीतर एक नन्ही-सी शान्ति उतरी, बहुत छोटी, पर थी ज़रूर।
शिखिध्वज ने सोचा – “यह क्या है?”
पर अगले ही पल वह शान्ति चली गई, क्योंकि उन्होंने उसे पकड़ने की कोशिश कर ली थी।
शिखिध्वज बोले – “जब-जब मैं कोशिश करता हूँ, तब-तब शान्ति चली जाती है।”
पर इस बात को वे ख़ुद अपने जीवन में लागू नहीं कर पाए।
ठहराव
बहुत बरस तक शिखिध्वज वहीं रहे।
पर भीतर पूरी तरह कुछ नहीं खुलता था।
बीच-बीच में थोड़ी शान्ति आती और फिर चली जाती। बीच-बीच में भीतर एक हलचल उठती और फिर वही पुराना लौट आता।
अब शिखिध्वज को लगने लगा – “शायद मुझे कोई और चाहिए।”
पर वे किसे पुकारें? वह कौन-सा गुरु था जो उन्हें बताता कि वे कहाँ ग़लत हैं?
रात को वे अकसर आकाश के असंख्य तारों को देखते रहते।
उन्होंने सोचा – “इन तारों के पीछे कोई है, कोई जो सब जानता है। पर उसकी आवाज़ मुझ तक नहीं पहुँचती।”
कभी कोई तारा टूटकर गिरता, तो शिखिध्वज उसे देखकर सोचते – “मेरी कोशिशें भी ऐसी ही हैं। एक चमक, और फिर नीचे।”
कभी उन्हें चूड़ाला याद आ जातीं – “वे मुझसे क्या-क्या कहती थीं?”
बहुत कुछ याद आता, पर एक बात बार-बार लौट आती।
“शिखिध्वज, असली ज्ञान भीतर है। बाहर ढूँढोगे तो नहीं मिलेगा।”
तब वे हँस पड़े थे – “रानी जी, यह तो सब कहते हैं।”
अब वही अपनी हँसी उन्हें कड़वी लगी।
उन्होंने सोचा – “मैं तब हँसा था, पर वे सच कह रही थीं।”
पर अब क्या किया जाए? चूड़ाला बहुत दूर राज्य में थीं, और वे ख़ुद यहाँ जंगल में।
शिखिध्वज ने सिर झुका लिया – “मेरा अहंकार, यही मेरा असली बँधन है।”
यह एक और समझ तो थी, पर पूरी समझ नहीं थी।
ऋतुएँ
जंगल में ऋतुएँ बदलती रहीं।
ग्रीष्म आया, पेड़ की पत्तियाँ सूखकर गिर गईं, नदी पतली पड़ गई, और शिखिध्वज का देह और सूख गया।
वर्षा आई, चारों ओर पानी ही पानी हुआ, उनके पेड़ के नीचे की मिट्टी गीली हो गई, और उन्होंने ख़ुद को यूँ ही भीगने दिया।
शरद आया, पत्ते भूरे पड़ गए, हवा हलकी बहने लगी, और शिखिध्वज को थोड़ी राहत मिली।
हेमन्त आया, बहुत ठंड पड़ी, शिखिध्वज का देह काँपता रहा, पर वे वैसे ही बैठे रहे।
शिशिर आया, पाला गिरने लगा, उनकी दाढ़ी पर ओस जम जाती और आँखें पानी से भर आतीं, पर बस ठंड से, और किसी कारण से नहीं।
वसन्त आया, नए पत्ते और नई कोंपलें फूट आईं। पर शिखिध्वज के भीतर कोई नई कोंपल नहीं फूटी।
यह चक्र बहुत बार दोहराया गया।
बीच-बीच में शिखिध्वज सोचते – “पेड़ हर बार नया हो जाता है। मैं क्यों नहीं होता?”
पर इसका कोई जवाब नहीं आता।
आगमन
एक दिन एक युवक उनके पास आया।
युवक के बाल काले थे, दाढ़ी हलकी जो अभी पूरी नहीं आई थी, और आँखें तेज़।
(पर वे असल में युवक नहीं थे। वे चूड़ाला थीं, कुम्भ के रूप में। यह बात आगे की चूड़ाला कथा में है।)
उस युवक का नाम कुम्भ था।

कुम्भ ने शिखिध्वज से कहा – “महाराज, मैं आपके साथ रहूँगा।” शिखिध्वज ने सिर हिला दिया।
कुम्भ की आँखों में कुछ था, कुछ जो शिखिध्वज ने बहुत बरस से नहीं देखा था, शायद कभी नहीं देखा था।
शिखिध्वज ने सोचा – “शायद इनसे कुछ मिले।”
बस इतना-सा खुलापन ही था, पर इतना भी बहुत था।
(क्योंकि जो बन्द है, उसमें कुछ नहीं आ सकता। जो ज़रा भी खुला है, उसमें बहुत कुछ आ सकता है।)
(आगे की कथा चूड़ाला की कथा में है। यहाँ हम सिर्फ़ शिखिध्वज की एकल यात्रा देख रहे थे, उनकी वही असफलता।)
पीछे मुड़कर
बहुत बरस बाद, जब शिखिध्वज मुक्त हो चुके थे, उन्होंने एक बार कुम्भ से पूछा – “वे जंगल के बरस, क्या वे सब बेकार थे?”
कुम्भ बोले – “नहीं महाराज, बेकार नहीं। वे बरस ज़रूरी थे। उन्हीं ने आपको थकाया, और थका हुआ आदमी ही सीखने को तैयार होता है। ताज़ा आदमी तो अहंकार से भरा रहता है।”
शिखिध्वज ने सिर हिलाया और पूछा – “पर एक बात बताइए। अगर मुझे पहले से ही कोई बता देता कि अकेले जाना काफ़ी नहीं, तो क्या मैं मान जाता?”
कुम्भ बोले – “नहीं महाराज, आप नहीं मानते। कुछ बातें सुनकर समझ में नहीं आतीं, उन्हें जीना पड़ता है।”
शिखिध्वज ने सिर झुकाकर पूछा – “तो क्या हर असफलता एक पाठ है?”
“हर असफलता एक पाठ है। पर पाठ तभी काम आता है जब हम उसे पहचानें। जो असफलता को बस असफलता मानकर रह जाता है, उसे पाठ नहीं मिलता। जो असफलता में सीख ढूँढता है, उसे ही मिलता है।”
शिखिध्वज ने यह बात भीतर सँभालकर रख ली, और बहुत साल बाद भी वह वहीं बनी रही।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, तो अकेले छोड़ देना काफ़ी नहीं?”
वसिष्ठ बोले – “राम, अकेले छोड़ देना एक शुरुआत है। पर अगर तुम कोशिश में ही फँस गए, तो वह भी एक बँधन बन जाता है। असली बात तो कोशिश को भी छोड़ देना है। और कभी-कभी एक हाथ चाहिए होता है, कोई जो हमें बताए कि हम कहाँ ग़लत हैं।”
राम ने पूछा – “तो क्या शिखिध्वज ने अकेले जाकर ग़लत किया?”
वसिष्ठ बोले – “ग़लत नहीं, राम। शायद उन्हें यही रास्ता चाहिए था। उन्होंने अकेले जाकर अपनी कोशिश की सीमा देखी, बहुत बरस लगाकर। अगर वे न जाते, तो वे यह कभी न जान पाते। फिर जब चूड़ाला कुम्भ के रूप में आईं, तब शिखिध्वज तैयार थे, क्योंकि वे अपनी कोशिशों से थक चुके थे। तभी उनके लिए सीखना सम्भव हुआ। अगर वे ताज़ा होते, तो कुम्भ की बात भी न सुनते। इसीलिए शिखिध्वज की एकल यात्रा बेकार नहीं थी, वह ज़रूरी थी।”
राम ने पूछा – “तो क्या असफलता भी ज़रूरी हो सकती है?”
“हाँ, बहुत बार। असफलता हमें हमारी सीमा दिखाती है, और सीमा देखने के बाद ही हम सीमा के पार जा सकते हैं।”
राम कुछ देर पानी की ओर देखते रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, क्या मेरे जीवन में भी ऐसी असफलता आएगी?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हर एक के जीवन में आती है। पर उसे असफलता कहना भी ग़लत है, उसे एक सीख कहना चाहिए। और सीख तभी काम आती है जब तुम उसे पहचानो। शिखिध्वज ने पहले नहीं पहचाना, इसमें उन्हें बहुत बरस लग गए।”
राम ने पूछा – “पर असफलता पहचानने के लिए भी तो कुछ चाहिए। क्या चाहिए?”
वसिष्ठ ने राम को देखा और बोले – “राम, बहुत अच्छा सवाल है। असफलता पहचानने के लिए चाहिए, थकान। थका हुआ आदमी ही सच देख पाता है, ताज़ा आदमी तो अपने ही जाल में फँसा रहता है। शिखिध्वज को थकना पड़ा, तभी उन्होंने देखा।”
राम ने पूछा – “और गुरुदेव, क्या वह थकान बिना जंगल जाए नहीं आ सकती?”
वसिष्ठ बोले – “राम, किसी को नहीं आती, किसी को आ सकती है। हर एक का रास्ता अलग होता है। शिखिध्वज को जंगल चाहिए था, चूड़ाला को घर में ही मिल गया। यह व्यक्ति पर निर्भर है।”
राम ने कहा – “पर एक बात तो निश्चित है।”
“बोलिए।”
“रास्ता चाहे जो भी हो, अहंकार को थकना ही पड़ता है। बिना अहंकार के थके, ज्ञान नहीं उतरता।”
राम ने बहुत मद्धम स्वर में कहा – “गुरुदेव, मेरा अहंकार अभी थका नहीं है।”
वसिष्ठ बोले – “राम, इस बात को जान लेना भी एक थकान की शुरुआत है।”
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण, सर्ग 6अ.84-87 पर आधारित है। चूड़ाला की कथा का यह एक भाग है, जिसे यहाँ अलग से प्रस्तुत किया गया है। शिखिध्वज की अकेली तपस्या और उसकी विफलता कोशिश-आधारित साधना की सीमा का चित्रण है। यह कथा एक चेतावनी है कि बाहर की चीज़ें छोड़ने से भीतर की चीज़ें नहीं बदलतीं।
दर्शन-दृष्टि
शिखिध्वज राजा थे, चूड़ाला से विवाहित और समृद्ध, पर भीतर एक उलझन में पड़े हुए। वे सोचते हैं कि मुक्ति का मार्ग यही है कि सब छोड़कर जंगल चले जाओ, तप करो और देह को कष्ट दो। वे यही करते हैं, बरसों जंगल में रहते हैं, और फिर भी कुछ नहीं होता। कथा यह कहती है कि बाहर का त्याग भीतर के बन्धन को नहीं काटता। अगर मन वही पुराना मन है, तो जंगल भी एक नया राजमहल बन जाता है।
जिद्दू कृष्णमूर्ति (1895-1986) ने अपनी The First and Last Freedom (1954) में बार-बार कहा कि सच्चा त्याग बाहर की वस्तुओं को छोड़ना नहीं, बल्कि उन वस्तुओं पर अपनी मानसिक पकड़ को देख पाना है, और जब तक हम भीतर का काम न कर लें, तब तक बाहर का त्याग एक नई पकड़ बन जाता है। शिखिध्वज की एकाकी तपस्या इसी का जीता-जागता रूप है। उन्होंने सब छोड़ा, पर “मैंने सब छोड़ा है” इस गर्व को नहीं छोड़ा, और यही उनका असली बन्धन था, जब तक चूड़ाला आकर कुम्भ के रूप में इसे नहीं तोड़तीं।