पुण्यमिता

कथा · 38

पुण्यमिता: हानि जिसकी गुरु थी

बहुत बरस पहले बड़े भाई पुण्य ने पावन को सिखाया था कि किसी एक रूप पर अटक जाना ही शोक है। अब पावन साठ के पार हैं, और बचपन का मित्र वासुधर चला गया है। वही पुरानी सीख फिर से खुलती है, इस बार और तह तक।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, जब हम किसी को खोते हैं, तो क्या उनसे जुड़ाव भी चला जाता है?”


The sage Vasistha, white-bearded in ochre robes, seated on a deerskin in a forest hermitage clearing, gently teaching young prince Rama who listens with folded hands; soft dawn light through trees, classical Indian miniature palette of warm ochres and forest greens.

वसिष्ठ बोले – “राम, आपको पुण्य और पावन की कथा याद है? पावन वही, जो माता-पिता की मृत्यु पर टूट गया था, और जिसे पुण्य ने सम्भाला था। उसी कथा के बहुत बरस बाद की एक बात सुनिए। पावन तब साठ के पार थे और पुण्य कब के जा चुके थे। पावन ने जीवन भर अपने भाई की सीख को ढोया और उसे अपना बनाया।

“आगे चलकर वो अपने को ‘पुण्यमिता’ कहलाने लगे, यानी पुण्य का मीत। यह नाम अपनी पहचान कम था, अपने भाई को प्रणाम ज़्यादा।”



दो मित्र

पुण्यमिता एक गाँव में रहते थे। जीवन बहुत साधारण था, एक ब्राह्मण की कुटिया और उसके साथ लगा छोटा सा बगीचा।


पुण्य कब के जा चुके थे, और माता-पिता तो उनसे भी पहले। पुण्यमिता अकेले ही इस गाँव में बहुत बरस से रह रहे थे।


जब वो साधना में बैठते, तो भीतर अकसर पुण्य की आवाज़ आती, वही पुरानी आवाज़ और वही पुरानी सीख – “पावन, जो रूप जाता है, वो रूप ही था। जो रहता है, वही असली है।”


अब पुण्यमिता उस सीख को ख़ुद जीते थे।


उनका एक मित्र था, बचपन का। उसका नाम वासुधर था।


वासुधर की एक आदत थी, बचपन से ही। जब वो किसी की बात सुनते, तो अपना सिर हलके से बायीं ओर झुका लेते। यही उनके सुनने का तरीक़ा था। पुण्यमिता ने यह बात पहली बार छह बरस की उम्र में देखी थी, जब दोनों गुरुकुल में नए-नए आए थे।


वासुधर क़द में थोड़े लम्बे थे, और उनकी बायीं भौं पर एक निशान था, बचपन में किसी छज्जे से गिरकर लगी चोट का। हँसते समय वो अपने हाथ की उँगलियों को आपस में बुन लेते।


दोनों एक ही गाँव में बड़े हुए, एक ही गुरुकुल में पढ़े, और एक ही नदी में नहाए।


बचपन की बहुत सी बातें थीं।


Two boys in simple dhotis climbing a laden mango tree, one gripping a branch while the other reaches out and plucks a green unripe mango, faces puckering; a glimpse of the gurukul hut below, lush summer foliage, vivid greens and golds in classical Indian style.

एक बार वो दोनों अपने गुरुजी से छुपकर एक आम के पेड़ पर चढ़ गए। आम पकने को थे। पुण्यमिता ने डाली पकड़ी, वासुधर ने हाथ बढ़ाकर एक आम तोड़ा, पर वो आम कच्चा निकला और दोनों ने मुँह बना लिया। बाद में जब उन्होंने यह बात गुरुजी को बताई, तो गुरुजी बोले – “बेटे, चोरी का फल खट्टा होता है। यही सीख है।”


दूसरी बार वो दोनों एक चाँदनी रात को नदी पर अकेले गए। उन्होंने सोचा था कि एक मछली पकड़ेंगे, और बहुत देर तक नदी में हाथ डाले रहे, पर एक भी मछली हाथ न आई।


लौटते वक़्त वासुधर ने अपना सिर पुण्यमिता की ओर बायीं ओर झुकाकर कहा – “पुण्यमिता, हम बेकार हैं।”

पुण्यमिता बोले – “शायद। पर साथ तो हैं।”

“हाँ, यही तो बात है।”


तीसरी बात भी थी। एक बार दोनों ने पास के एक पीपल के पेड़ के नीचे एक गुप्त वचन किया – “हम जीवन भर मित्र रहेंगे।” और दोनों ने एक स्वर में दोहराया कि रहेंगे।


बहुत बरस बाद भी पुण्यमिता को यह वचन याद रहा।


दोनों के माता-पिता ने उनके बीच यह दोस्ती देखी थी, पर कभी रोका नहीं था। बच्चों की दोस्ती बहुत बार समय के साथ दूर हो जाती है, पर इन दोनों की नहीं हुई।


जब दोनों युवा हुए, तो उनके अपने-अपने रास्ते बने। पुण्यमिता ने अपने गाँव में रुकना चुना, एक कुटिया बनाई और एक छोटी पाठशाला शुरू की, जहाँ वो बच्चों को पाठ सिखाते।

Vasudhara as a young traveling merchant setting out on a road toward distant lands, a sack over his shoulder and a caravan of laden bullock-carts behind him, looking back once toward his village; rolling countryside, bright morning sky, classical Indian color illustration.

वासुधर ने एक अलग रास्ता चुना। उन्हें यात्रा करना पसन्द था, इसलिए वो दूसरे देशों में गए और व्यापारी बन गए।


दोनों के बीच बातें कम होती गईं, क्योंकि वासुधर दूर थे और पुण्यमिता घर पर ही रहते थे।

बीच-बीच में संदेश आते रहते, कभी एक पत्र, कभी कोई कथा, तो कभी कोई भेंट।


पुण्यमिता को अपने मित्र की याद आती, पर वो इसे स्वीकार कर लेते कि यही जीवन है।


कभी-कभी रात को, जब सब सो जाते, पुण्यमिता अपनी कुटिया के सामने आकर आसमान देखते और उन्हें मित्र की याद आ जाती।


वो मन ही मन कहते – “मित्रवर, तुम कहाँ हो? किसी दूर देश में? क्या तुम भी आसमान देख रहे हो? क्या तुम्हें भी मेरी याद आ रही है?”

पर कोई जवाब न आता, बस आसमान रहता और बस तारे।


पुण्यमिता मुस्कुराकर अपने आप से कहते – “शायद वो भी ऐसे ही देख रहे होंगे। और शायद नहीं।”


फिर वो अन्दर लौट जाते।


इसी तरह बहुत बरस बीत गए।


ख़बर

एक दिन पुण्यमिता को एक ख़बर मिली कि उनका मित्र चला गया।


यह ख़बर एक छोटे से पत्र में थी, जो मित्र के बेटे ने भेजी थी – “पुण्यमिता काका, मेरे पिता वासुधर एक बीमारी से चले गए। आख़िरी समय में उन्होंने आपके बारे में बात की और कहा कि पुण्यमिता मेरा सबसे पुराना मित्र है, उसे बता देना। यही पत्र मैं आपको भेज रहा हूँ।”


पुण्यमिता ने पत्र पढ़ा और बहुत देर तक उसे हाथ में थामे रहे।


फिर वो अपनी कुटिया के बाहर जा बैठे और बहुत देर तक कुछ न कर सके।


दुख

पुण्यमिता बहुत दुखी हुए।


उन्होंने मन ही मन सोचा – “मेरा मित्र चला गया। मैंने उसे बहुत बरस से नहीं देखा था, और अब तो कभी नहीं देखूँगा।”


बहुत दिन तक उन्होंने पाठशाला नहीं खोली।

बच्चे आते, दरवाज़ा बन्द देखते, और लौट जाते।


पुण्यमिता बस अपनी कुटिया के बाहर बैठे रहते। न ठीक से खाते, न ठीक से सोते।


उनकी पत्नी ने यह सब देखा और पूछा – “पति, आप ठीक नहीं हैं। क्या मित्र की वजह से?”

पुण्यमिता बोले – “हाँ, उसी वजह से।”


पत्नी ने हाथ बढ़ाकर पुण्यमिता का हाथ अपने हाथ में ले लिया और कहा – “पति, यह दुख स्वाभाविक है, पर इसमें डूब मत जाइए।”

पुण्यमिता ने पूछा – “तो क्या करूँ?”

“पता नहीं। पर शायद आपको किसी ऋषि से बात करनी चाहिए।”

पुण्यमिता ने यह बात मान ली।


दुख की रात

एक रात पुण्यमिता अपनी कुटिया में बैठे थे। रात बहुत लम्बी थी।


An aged bearded Punyamita seated on the floor of his dim hut at night, unfolding a yellowed palm-leaf letter from his friend, an oil lamp casting warm glow on his sorrowful face; moonlight through a small barred window, intimate classical Indian palette of amber and indigo.

उन्होंने वासुधर का एक पुराना पत्र निकाला, बरसों पहले का। पुण्यमिता ने पढ़ा – “मित्र, मैं दूर हूँ, पर तुम्हें भूला नहीं। हर रात तुम्हें सोचता हूँ। एक दिन हम ज़रूर मिलेंगे।”


पुण्यमिता ने उस पत्र को बहुत देर तक अपनी छाती से लगाए रखा।


उन्होंने धीरे से कहा – “मित्र, हम तो नहीं मिले।”


पुण्यमिता की आँखों से छलककर एक बूँद उस पत्र पर गिर पड़ी।


बहुत देर बाद पुण्यमिता ने पत्र रखा और उठ खड़े हुए। बाहर रात थी, पर एक तारा बहुत साफ़ चमक रहा था।


पुण्यमिता ने उस तारे को देखकर कहा – “मित्र, यह तारा! क्या तुम वहाँ हो?”


तारा चमकता रहा, पर पुण्यमिता को लगा जैसे वो तारा हलके से मुस्कुरा रहा हो।


ऋषि

पास के गाँव में एक बूढ़े ऋषि रहते थे।

Grieving Punyamita kneeling with folded hands before an old white-bearded sage seated under a spreading banyan with hanging aerial roots, pouring out his sorrow; a small lamp on a mat between them, dappled shade, dignified classical Indian color tableau.

पुण्यमिता उनके पास गए और बोले – “ऋषिवर, मेरा मित्र चला गया। मैं रोज़ रोता हूँ, पर मेरा रोना ख़त्म ही नहीं होता।”


ऋषि बोले – “पुण्यमिता, आपके मित्र कहाँ हैं?”

पुण्यमिता ने कहा – “वो अब नहीं हैं।”

“नहीं हैं?”

“नहीं, बिलकुल नहीं।”


ऋषि ने कुछ सोचकर कहा – “पुण्यमिता, आपके मित्र का देह नहीं रहा, पर आपके भीतर वो अब भी हैं।”

पुण्यमिता ने पूछा – “इसका क्या मतलब?”

“आपकी यादें, आपकी वो हँसी जो उनके साथ बँटी, और आपके पास उनकी एक छवि है। वो छवि आपके भीतर है।”


पुण्यमिता ने धीरे से कहा – “पर यह तो बस छवि है, वो ख़ुद तो नहीं।”


The old sage gesturing in teaching toward Punyamita beneath the banyan; behind them a luminous symbolic tableau of translucent human silhouettes dissolving into a single radiant golden light of shared consciousness, dignified Vedantic imagery in glowing classical Indian palette.

ऋषि बोले – “पुण्यमिता, आप जिसे ख़ुद कहते हैं, वो भी एक छवि ही है। हम सब छवियाँ हैं। हमारा देह छवि है, हमारा मन छवि है, और हमारी पहचान भी छवि है। पर इन छवियों के पीछे एक चेतना है, और वो चेतना सबके लिए एक ही है। आपका मित्र और आप, दोनों उसी एक चेतना के दो रूप हैं। आपके मित्र का देह नहीं रहा, पर वो चेतना तो आप ही में है। आप अपने मित्र को मिस कर रहे हैं? अपने भीतर देखिए, वो वहीं हैं।”

यह सुनकर पुण्यमिता ठहर गए।


ऋषि की आवाज़ के बीच एक और आवाज़ आई, बहुत पुरानी, उनके बड़े भाई पुण्य की, जो बहुत बरस पहले माता-पिता के जाने पर सुनी थी।


पुण्य ने भी कभी यही कहा था, उन्हीं शब्दों में नहीं, पर वही बात – “पावन, जो रूप जाता है, वो छवि ही थी। उसके पीछे चेतना है, और चेतना नहीं जाती।”


पुण्यमिता के चेहरे पर एक हलकी हँसी आ गई।

ऋषि ने इसे देखकर पूछा – “क्या हुआ, पुण्यमिता?”


पुण्यमिता बोले – “ऋषिवर, यह बात तो मुझे बहुत बरस से पता थी।”

“फिर?”

“फिर भी मैं उसे ओढ़े तो था, पर जी नहीं रहा था। मेरे भाई पुण्य ने यह सीख मुझे माता-पिता के जाने पर दी थी। मैंने उसे सीख तो लिया, पर शायद आधी ही। आज मित्र के जाने पर उसी सीख की फिर ज़रूरत पड़ी।”


ऋषि बोले – “पुण्यमिता, यह बहुत सामान्य है। सीख एक बार में पूरी नहीं होती। हर बार जब जीवन उसे माँगता है, वही सीख फिर से खुलती है।”


पुण्यमिता यह सुनकर देर तक चुप रहे।


अनुभव

फिर पुण्यमिता ने पूछा – “ऋषिवर, और मेरा दुख?”

ऋषि बोले – “दुख थोड़ी देर रहेगा, फिर वो भी चला जाएगा। पर मित्रता नहीं जाएगी, क्योंकि मित्रता रूप से ऊपर है।”


पुण्यमिता ने कहा – “ऋषिवर, यह बात मुझे अभी पूरी तरह समझ नहीं आ रही।”

ऋषि बोले – “पुण्यमिता, सुनिए। आज रात आप घर जाइए और अपनी कुटिया में बैठकर आँखें बन्द कीजिए। फिर अपने मित्र को याद कीजिए, पर इस बार ख़ास तौर से। उनकी हँसी, उनकी आवाज़, और उनके चेहरे की कोई एक ख़ास बात। फिर अपने भीतर देखिए, तो आप पाएँगे कि मित्र वहीं हैं, आपके भीतर, और हमेशा से थे, बस आपको पता नहीं था।”

पुण्यमिता ने यह बात मान ली।


वो घर लौटे और रात को अपनी कुटिया में बैठकर आँखें बन्द कर लीं।


उन्होंने वासुधर को याद किया। वासुधर की वो हँसी जो बचपन में थी, और वासुधर की वो आवाज़ जो थोड़ी ऊँची थी और जिसमें हमेशा एक छुपी हुई हँसी रहती।

वासुधर की एक ख़ास बात भी याद आई कि वो जब किसी की बात सुनते, तो हलके से सिर बायीं ओर झुका लेते। यह उनकी बचपन की आदत थी।


पुण्यमिता ने इन सब को अपने भीतर देखा।


Punyamita seated in meditation against a tree on the moonlit riverbank, eyes closed in peace; beside him a softly glowing translucent figure of his friend Vasudhara smiling and nearly touching his shoulder, ethereal silver-blue luminescence, serene classical Indian color illustration.

और एक पल को उन्हें लगा कि मित्र पास ही हैं। देह नहीं था, पर कुछ तो था, एक हलकी आहट और एक हलकी हँसी।


पुण्यमिता ने धीरे से कहा – “वासुधर, तुम तो वहीं हो।”


भीतर से एक हलकी आवाज़ आई – “हाँ।”


पुण्यमिता के चेहरे पर एक हँसी फैल गई।


आगे

पुण्यमिता ने आँखें खोलीं। बाहर रात थी, दिया जल रहा था, और पत्नी पास ही सो रही थीं।


उनके भीतर अब वो भारी दुख नहीं था, बल्कि एक शान्ति थी और एक हलका सा प्रेम।


अगले दिन उन्होंने पाठशाला फिर खोली और बच्चे आए।

पुण्यमिता ने उन्हें पाठ पढ़ाया, पर अब उनका पढ़ाना कुछ अलग था।


एक बच्चा बीच में रो पड़ा। पुण्यमिता ने पूछा – “बोलो, बेटा।”

बच्चे ने कहा – “महाराज, मेरी दादी कल चली गई।”


पुण्यमिता ने उस रोते हुए बच्चे को पास बुलाया।


पुण्यमिता ने बच्चे का सिर अपनी छाती से लगाकर कहा – “बेटा, रोओ। जितना रोना है, उतना रो लो। फिर एक बात बताऊँगा।”


बच्चा बहुत देर तक रोता रहा, फिर रुक गया।


बच्चे ने पूछा – “महाराज, क्या आपको वो बात बतानी थी?”

पुण्यमिता बोले – “हाँ, बेटा। तुम्हारी दादी कहीं नहीं गईं। बस उनका देह नहीं रहा, पर वो तुम्हारे भीतर हैं।”

“भीतर?”

“हाँ, भीतर। आज रात तुम घर जाओ और अपनी दादी को याद करो। उनकी हँसी, उनकी आवाज़, उनकी कोई ख़ास बात। फिर अपने भीतर देखो, तो तुम्हें वो मिलेंगी।”


बच्चे ने यह बात मान ली और घर चला गया। रात को उसने कोशिश की।

अगले दिन वो वापस आया और बोला – “महाराज, मुझे दादी मिल गईं।”

पुण्यमिता ने पूछा – “कैसे?”

“उसी तरीक़े से जो आपने बताया था।”

यह सुनकर पुण्यमिता मुस्कुरा दिए।

दूसरी रात

अगली रात पुण्यमिता ने फिर वही किया, आँखें बन्द कीं और मित्र को याद किया।


इस बार अनुभव और घना था। मित्र की एक आदत याद आई कि जब वो खाना खाते, तो हर निवाले से पहले हलके से मुस्कुरा देते। बहुत साधारण थी यह बात, पर बहुत प्यारी।


पुण्यमिता हँस पड़े और बोले – “मित्रवर, तुम तो वैसे ही हो।”


भीतर से एक हलकी हाँ आई।


तीसरी रात वासुधर के साथ की एक पुरानी कहानी याद आई।


A bustling village fair with stalls and lanterns; the boy Vasudhara breaking a sweet in half and handing one portion to the boy Punyamita who has no coins, both faces warm with friendship; festive crowd, bright colorful classical Indian fair scene.

बचपन में वो दोनों एक मेला देखने गए थे। वासुधर ने एक मिठाई खरीदी, पर पुण्यमिता के पास पैसा नहीं था। तब वासुधर ने अपनी मिठाई आधी करके पुण्यमिता को दे दी।


पुण्यमिता ने उस वक़्त सोचा था कि वासुधर बहुत अच्छा है।


अब वही याद थी, पर एक अन्तर के साथ। अब पुण्यमिता को लगा कि वो आधा करना सिर्फ़ मिठाई का नहीं था, वो ख़ुद का था। वासुधर ने ख़ुद को आधा करके दिया था।


पुण्यमिता रो पड़े, पर अब वो रोना दुख का नहीं, आभार का था।


पत्नी

पुण्यमिता ने अपनी पत्नी को यह बात बताई।


उन्होंने कहा – “प्रिय, मित्र मेरे भीतर हैं।”

पत्नी ने पूछा – “कैसे?”


पुण्यमिता ने पूरी बात बताई, ऋषि की, आँख बन्द करने की और याद करने की।


पत्नी ने यह सब बहुत ध्यान से सुना।


फिर मुस्कुराकर बोलीं – “पति, यह तो अच्छी बात है। पर एक चीज़ पूछनी है।”

पुण्यमिता ने कहा – “पूछिए।”


पत्नी ने कहा – “मेरे माता-पिता बहुत पहले चले गए थे। मैं तब छोटी थी, इसलिए मुझे उनकी याद बहुत कम है। क्या मैं भी ऐसा कर सकती हूँ?”

पुण्यमिता ने उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा – “प्रिय, ज़रूर। यादें कम हों, तब भी। बस जो याद है, उसी में डूब जाइए, फिर अपने भीतर देखिए।”

पत्नी ने यह बात मान ली।


उस रात पत्नी ने कोशिश की। उन्होंने अपनी माँ की एक छोटी सी याद ली, उनकी एक लोरी, जिसकी बस एक पंक्ति याद थी, बाक़ी वो भूल चुकी थीं।


उन्होंने उस पंक्ति को भीतर ही भीतर दोहराया।


और एक पल को उन्हें लगा कि माँ पास ही हैं।


पत्नी की आँखें भर आईं, पर वो शान्त रहीं।


सुबह उन्होंने पुण्यमिता से कहा – “पति, मुझे मिल गईं।”

पुण्यमिता बोले – “अच्छा हुआ।”


फिर पुण्यमिता ने मुस्कुराकर कहा – “प्रिय, अब हमारा घर भरा हुआ है, बहुत सारे लोगों से।”

यह सुनकर पत्नी हँस पड़ीं।


बाक़ी

इसके बाद बहुत बरस बीते।


पुण्यमिता ने यह बात बहुत से लोगों को सिखाई।

जो लोग किसी अपने को खो चुके थे, वो उनके पास आते, और पुण्यमिता उन्हें यही बताते – “अपने भीतर देखो, वो वहीं हैं।”


कुछ लोगों ने यह बात मानी, कुछ ने नहीं। जिन्होंने मानी, उन्हें अपने अपने मिल गए, और जिन्होंने नहीं मानी, वो दुखी ही रहे।


एक बार एक स्त्री आईं, जिनका पुत्र बहुत बरस पहले युद्ध में गया था और लौटा नहीं था। उन्होंने कहा – “पुण्यमिता, मुझे मेरा बेटा चाहिए।”


पुण्यमिता बोले – “बहन, आइए, बैठिए।”


स्त्री बैठ गईं।


पुण्यमिता ने कहा – “बहन, बेटे की कोई एक छोटी सी याद बताइए।”


A grieving mother seated before elderly Punyamita on his veranda, eyes closed as she recalls her lost son; a tender memory-vignette above her of a small frightened boy hiding his face in his mother's saree pallu while a dog passes, warm lamplit classical Indian color tableau.

स्त्री ने देर तक सोचा, फिर बोलीं – “वो छोटा था। एक दिन उसने मेरी साड़ी के पल्लू में अपना मुँह छुपा लिया, क्योंकि बाहर एक कुत्ता था और वो डर रहा था। पर वो मुझसे यही कहता रहा कि वो डर नहीं रहा। उस दिन मैं हलके से हँस पड़ी थी।”


पुण्यमिता के भीतर एक हलकी आहट हुई, पुण्य की आवाज़ की – “पावन, यही सीख है। एक बार सीखी जाती है, और बहुत बार दी जाती है।”


पुण्यमिता बोले – “बहन, यह अच्छी याद है। अब आँखें बन्द कीजिए और इस याद को भीतर देखिए। उसकी मुट्ठी, उसका मुँह, उसका वो हलका सा डर, सब कुछ।”


स्त्री ने आँखें बन्द कीं और देर तक उसी याद में डूबी रहीं।


फिर उनके चेहरे पर एक हलकी हँसी आ गई, आँसू भी थे, पर साथ में हँसी भी।


उन्होंने कहा – “पुण्यमिता, वो है, यहीं है।”


पुण्यमिता बोले – “बहन, वो था, है, और रहेगा।”


स्त्री ने पुण्यमिता के पाँव छूने चाहे, पर पुण्यमिता ने उन्हें रोककर कहा – “बहन, मुझे नहीं। अपने बेटे को छुइए, वो आपके भीतर है।”


स्त्री हँस पड़ीं और घर लौट गईं।

बहुत बरस बाद, जब वो भी देह छोड़ गईं, तो उनके आख़िरी शब्द यही थे – “बेटे, मैं आ रही हूँ।”


पुण्यमिता धीरे-धीरे बूढ़े हो चले। उनकी आँखें अब कम देखती थीं, उनका देह झुक गया था, और उनकी आवाज़ हलकी पड़ गई थी। पर पाठशाला अब भी चलती रहती और बच्चे आते रहते।


बच्चे अब उनकी कहानियाँ सुनते, और पुण्यमिता उन्हें अपने मित्र की बात बताते – “बच्चो, मेरा एक मित्र था। वो बहुत बरस पहले चला गया, पर वो अब भी मेरे पास है।”


बच्चे आश्चर्य से पूछते – “महाराज, यह कैसे?”


पुण्यमिता मुस्कुराकर कहते – “अपने भीतर, बच्चो। जब तुम बड़े होगे, तो तुम भी यह सीखोगे। अभी बस इतना याद रखो कि जिनसे प्रेम करते हो, उन्हें कभी अकेले नहीं छोड़ते, न अपने जीते जी और न उनके।”


बच्चे यह बात मन में बैठा लेते।


एक दिन उनका देह छूट गया।


उनकी पत्नी ने बच्चों से कहा – “पिता चले गए, पर अब हम जानते हैं कि क्या करना है।”


पत्नी ने अपनी आँखें बन्द कीं और पुण्यमिता को याद किया, उनकी हँसी, उनकी आवाज़, और उनकी एक ख़ास बात।


पत्नी को वो मिल गए।


और बच्चों को भी।


पुण्यमिता की कथा घर-घर फैल गई। लोग कहते – “पुण्यमिता ने हमें सिखाया कि जिनसे हम प्रेम करते हैं, वो कभी नहीं जाते। बस उनका देह जाता है, बाक़ी सब हमारे भीतर रहता है।”

राम यह सुनकर बोले – “गुरुदेव, तो जिन्हें हम खोते हैं, वो वैसे नहीं जाते जैसा हम सोचते हैं?”


वसिष्ठ बोले – “राम, उनका देह जाता है, उनका रूप जाता है। पर वो चेतना जो उनमें थी, वो हमारी ही चेतना का एक रूप थी। इसलिए वो हमेशा हमारे पास है। रिश्ता रूप का नहीं था, रिश्ता चेतना का था, और चेतना नहीं जाती।”


राम ने कुछ देर सामने बहते पानी की ओर देखा, फिर पूछा – “गुरुदेव, तो जब मेरे पिता एक दिन जाएँगे…”

वसिष्ठ बोले – “राम, उस दिन तुम पुण्यमिता को याद करना। तुम अपने पिता को अपने भीतर पाओगे। हर बार जब तुम्हें ज़रूरत होगी, तुम बस आँखें बन्द करना, वो वहीं होंगे।”


राम कुछ देर चुप रहे, फिर हलकी आवाज़ में बोले – “गुरुदेव, पर एक बात पूछनी है। क्या यह केवल याद भर नहीं, कोई कल्पना?”


वसिष्ठ बोले – “राम, अच्छा सवाल है। याद और कल्पना का अन्तर बहुत सूक्ष्म है, पर सुनो। याद जब बहुत गहरी हो, तो वो याद नहीं रहती, वो उपस्थिति बन जाती है। क्योंकि जिसे हम उपस्थिति कहते हैं, वो भी असल में हमारे मन में एक छवि ही है। हमारी आँख देखती है, हमारा मन छवि बनाता है, और फिर हम कहते हैं कि यह उपस्थित है। तो याद भी एक छवि है और उपस्थिति भी एक छवि। अन्तर बस इतना है कि एक देह से आई और दूसरी स्मृति से। पर दोनों के पीछे एक ही चेतना है।”


राम ने यह बात मन में बैठा ली।


साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5.19-21 का एक परवर्ती-कल्पित विस्तार है। मूल कथा में पावन माता-पिता की मृत्यु पर टूटते हैं और उनके बड़े भाई पुण्य उन्हें पुनर्जन्म और चेतना की निरन्तरता पर सीख देते हैं। यहाँ हम पावन के बहुत बरस बाद के जीवन की कल्पना करते हैं, जब वो अपने भाई की सीख को ख़ुद जीते हैं और दूसरों को देते हैं। ‘पुण्यमिता’ नाम पावन का परवर्ती-तदभाव है, अपने भाई पुण्य के प्रति।

यह कथा एक नियम पर टिकी है, कि एक सीख एक बार में पूरी नहीं होती। हर बार जब जीवन उसे माँगता है, वही सीख फिर से खुलती है। पावन माता-पिता के जाने पर एक स्तर पर सीखे थे, और मित्र के जाने पर एक और स्तर पर। हर शोक एक नई परत खोलता है।

दर्शन-दृष्टि

पुण्य के जाने के बाद पावन अकेले रह जाते हैं। वो अपने भाई की सीख को जीवन भर ढोते हैं, और बूढ़े होकर अपने को पुण्यमिता कहलाने लगते हैं, यानी पुण्य का मीत। नाम बदल जाता है, पर भीतर का सम्बन्ध बना रहता है। फिर उनके बचपन के मित्र वासुधर आते हैं, और दोनों बिना कुछ कहे बहुत कुछ साझा करते हैं। कथा यह कहती है कि सम्बन्ध शरीर के साथ ख़त्म नहीं होता, वो चेतना में बना रहता है, और मित्रता का असली रूप वो है जो रूप के जाने के बाद भी ठहरा रहे।

फ्रांसीसी दार्शनिक हेनरी बर्गसन (Henri Bergson, 1859-1941) ने अपनी Time and Free Will (Essai sur les données immédiates de la conscience, 1889) में दिखाया कि भीतर का काल (durée) घड़ी के काल से अलग है, उसमें बीते क्षण भीतर बने रहते हैं, बहते नहीं हैं। पुण्यमिता की पुण्य से बातचीत इसी durée के भीतर है। पुण्य गए, पर पावन के भीतर जा नहीं पाए, क्योंकि भीतर का काल बाहर के काल जैसा नहीं बहता। उनकी आवाज़ अब भी पावन के भीतर है, और वही आवाज़ अब पुण्यमिता को बना रही है।