कथा · 38
पुण्यमिता: हानि जिसकी गुरु थी
परिवार सब चला गया। अकेली रह गई एक लड़की। वन में चली गई। बैठ गई। साल बीते। फिर एक ऋषि ने उसकी आँखें देखीं और सिर झुका दिया।
एक छोटे से नगर में पुण्यमिता रहती थी। बहुत साधारण लड़की। न ज़्यादा सुंदर, न ज़्यादा विद्वान। मगर मन बहुत साफ़।
उसकी एक माँ थी, एक पिता, दो भाई, एक बहन।
एक साल नगर में महामारी आई। पहले बहन गई। फिर एक भाई। फिर माँ। फिर दूसरा भाई। फिर पिता।
एक हफ़्ते के अंदर पुण्यमिता का पूरा परिवार चला गया। वो अकेली बच गई।
उसने रोई। बहुत रोई। फिर एक दिन रोना ख़त्म हो गया। आँसू सूख गए।
उसने सोचा – “अब क्या? कोई दूसरा परिवार ढूँढूँ? कोई पति, बच्चे, घर?”
फिर सोचा – “नहीं। जो परिवार था, वो भी इतनी जल्दी चला गया। जो आगे बनाऊँगी, वो भी जाएगा।
“मैं अब किसी से नहीं बँधूँगी।”
उसने नगर छोड़ा। एक झोला बाँधा। थोड़ा अनाज, एक मटका। पैदल चली।
एक वन में पहुँची। वहाँ एक नदी के किनारे, एक पेड़ के नीचे, उसने एक छोटी सी झोपड़ी बनाई।
एक मृग-चर्म बिछाया। बैठ गई।
उसने तय किया – “अब मैं बस बैठूँगी।”
दिन बीते। पहले मन भागा। माँ की याद आई, पिता की, भाई-बहनों की। आँसू फिर बहे। मगर उसने उठने नहीं दिया ख़ुद को। बस बैठी रही।
हफ़्ते बीते। मन की हलचल कम हुई।
महीने बीते। मन शांत हुआ।
साल बीता। पुण्यमिता के बाल लंबे हो गए। चेहरे पर एक तेज आ गया।
वन के जानवर पहले दूर रहते थे। फिर पास आने लगे। एक हिरण रोज़ झोपड़ी के पास आता। पुण्यमिता के पास बैठता।
एक चिड़िया उसके बालों में घोंसला बनाने लगी। पुण्यमिता ने हिलाई नहीं। बच्चे चिड़िया के पैदा हुए। उन्होंने उड़ना सीखा। फिर चिड़िया चली गई।
एक भालू भी आता। पास बैठता। पुण्यमिता को छूता नहीं था। बस देखता था। फिर चला जाता।
पुण्यमिता को कुछ भी नहीं चाहिए था। न खाना (मगर पेड़ों के फल बहुत होते थे), न पानी (नदी पास थी), न बातचीत।
उसकी आँखों में एक गहराई आ गई।
एक दिन एक भटकता हुआ ऋषि उस वन में पहुँचा। वो किसी अनोखे जीव की तलाश में थे। उन्हें मिल गई – पुण्यमिता।
उन्होंने उसे दूर से देखा। एक मूर्ति जैसी बैठी थी। बाल लंबे, आँखें मूँदीं। चारों ओर शांति।
ऋषि पास गए। बैठ गए।
“बेटी।”
पुण्यमिता ने आँखें खोलीं।
“बेटी, तुम कब से यहाँ हो?”
“पता नहीं। बहुत वर्षों से।”
“कौन सिखाता है तुम्हें?”
“हानि।”
ऋषि चौंके। “हानि?”
“हाँ। मेरा परिवार चला गया। तब मैंने जाना कि कोई भी मेरा नहीं। फिर वन में आई। बैठी। समझ आया कि मैं भी ‘मेरी’ नहीं। बस हूँ।”
“और अब?”
“अब मैं बैठती हूँ। और देखती हूँ। ख़ुद को देखती हूँ। हर विचार आता है, जाता है। मेरा कोई नहीं।”
ऋषि ने सिर झुकाया। उन्होंने पुण्यमिता को प्रणाम किया।
“बेटी, तू मुझसे आगे है। तुझे बताने को मेरे पास कुछ नहीं।”
पुण्यमिता ने मुस्कुराकर कहा, “महाराज, बताने को कुछ है नहीं। होने को सब कुछ है।”
ऋषि वहीं बैठ गए। दोनों चुप।
कुछ घंटों बाद ऋषि उठे। चले गए।
पुण्यमिता वहीं रही। उसकी कथा कहीं नहीं छपी। मगर वन के जानवर उसे जानते थे। और वो जानवर उस ऋषि को बाद में मिले, जब वो ऋषि और भटकते रहे – तो ऋषि बता पाए कि एक स्त्री वन में अकेले मुक्ति पाई।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, गुरु पुरुष ही नहीं होता। स्त्री भी होती है। और कभी-कभी गुरु कोई व्यक्ति नहीं, कोई अनुभव होता है। पुण्यमिता को हानि ने सिखाया। हानि सबसे ईमानदार गुरु है। वो कुछ नहीं छुपाती।”
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