कथा · 31
सौ रुद्र: एक चित्त के सौ संसार
एक अनुशासित भिक्षु संसार के केवल एक विचार को मन में स्थान देता है और अनेक जीवनों की शृंखला में उतर जाता है। अन्तिम हंस को रुद्र के समान ज्ञान मिलता है तो पूरी स्मृति लौट आती है, किन्तु पहले के संसार अब भी चल रहे हैं और प्रत्येक सोए हुए रूप को खोजकर जगाना शेष है।
श्रीराम का प्रश्न
श्रीराम ने वसिष्ठ से पूछा कि एक स्वप्न के भीतर दूसरा स्वप्न कैसे जन्म लेता है, जबकि हर स्वप्नद्रष्टा अपने अनुभव को सम्पूर्ण संसार मानता है। यदि पहला मनुष्य जाग जाए तो क्या उसके बाद प्रकट हुए जीवन मिट जाएँगे, अथवा वे अपने अलग क्रम में चलते रहेंगे?
वसिष्ठ ने उत्तर में एक विचारशील भिक्षु का इतिहास सुनाया। वह शम, दम, वैराग्य, सत्संग, श्रवण, मनन और समाधि के अभ्यास में दृढ़ था। साधना में कमी नहीं थी, पर आत्मस्वरूप का स्थिर बोध अभी नहीं हुआ था।
एक दिन अपने नियत अभ्यास पूरे करने के बाद उसने सामान्य संसारी मन की चेष्टाओं पर विचार करने का निश्चय किया। यह अभ्यास उसके लिए निर्धारित नहीं था। एकाग्रता के कारण साधारण कल्पना ने भी उसके भीतर असाधारण बल ग्रहण कर लिया।
उसने सोचा, “मैं जीवट हूँ।”
मठ उसके अनुभव से ओझल हो गया। उसने स्वयं को जीवट के रूप में एक कल्पित नगर में चलते पाया। वहाँ की सड़कें, लोग और प्रयोजन उसे इतने स्वाभाविक लगे कि उस भिक्षु की स्मृति ही नहीं रही, जिसने जीवट की कल्पना की थी।
एक जीवन ने दूसरे को देखा
जीवट ने मदिरा पी, नशे में डूबा और सो गया। स्वप्न में वह वेदों का अध्ययन करने तथा विधिपूर्वक नित्यकर्म करने वाला ब्राह्मण था। उस जीवन के अपने संस्कार और कर्तव्य थे। ब्राह्मण सोया तो उसने स्वयं को सेना और प्रदेश वाला माण्डलिक, अर्थात सामन्त राजा देखा।
सामन्त ने सोकर चक्रवर्ती सम्राट का जीवन पाया। सम्राट की भोग-प्रवृत्ति ने अप्सरा का रूप लिया। अप्सरा का मृगनयनों के प्रति आकर्षण उसे हरिणी के अनुभव में ले गया।
हरिणी ने स्वप्न में अपने को लता देखा। लता काटी गई तो भ्रमर से जुड़ी अन्तिम छाप ने अगला मार्ग बनाया। चेतना अब फूलों के बीच मँडराते भ्रमर के रूप में खुली।
भ्रमर मधु पीने के लिए कमल में घुसा और वहीं चिपका रहा। एक हाथी ने कमल कुचल दिया। मरते समय भ्रमर की दृष्टि और स्मृति हाथी पर टिकी थी, इसलिए अगला शरीर हाथी का हुआ।
हाथी पकड़ने वालों ने उसे बाँधा और प्रशिक्षित किया। वह एक राजा का प्रिय बना और युद्ध में ले जाया गया। रात के संग्राम में तलवारों और लम्बे शस्त्रों से घायल होकर उसकी मृत्यु हुई। हाथियों के गण्डस्थलों पर मँडराते भौंरों का संस्कार उसके भीतर था, इसलिए फिर भ्रमर का जन्म हुआ।
वह भ्रमर भी कमल में गया। हाथी के पैर ने फूल को कुचल दिया। अन्तिम क्षण में उसे पास का हंस दिखाई दिया और उसका ध्यान हंस के शरीर में पहुँच गया।
वसिष्ठ ने बीच के प्रत्येक जन्म को गिनाकर नहीं सुनाया। अनेक रूप आते गए। हर नया जीवन उस अन्तिम संस्कार से खुला, जो पिछले रूप के छूटते समय सबसे प्रबल था।
ब्रह्मा का वाहन हंस
बहुत से जन्मों के बाद वह फिर हंसों के बीच रहने लगा। हंसों की सभा में उसने उस श्रेष्ठ हंस की महिमा सुनी, जो ब्रह्मा का वाहन था। प्रशंसा धीरे-धीरे दृढ़ अभिलाषा बनी। मृत्यु के समय वही इच्छा फलित हुई और उसने ब्रह्मा के वाहन हंस का रूप पाया।
ब्रह्मा के निकट रहना उसके दीर्घ स्वप्न में निर्णायक मोड़ बना। उसने विवेक, वैराग्य और तत्त्वज्ञान का उपदेश सुना। बदलती पहचानों और उन्हें प्रकाशित करने वाले चैतन्य का भेद समझ में आया। उसी जीवन में वह जीवन्मुक्त ज्ञानी हुआ।
एक बार वह ब्रह्मा के साथ रुद्रपुरी गया। वहाँ भगवान रुद्र को देखकर उसके निर्मल मन में रुद्ररूप की प्रबल भावना उठी। उसने रुद्र के समान एक मानसिक शरीर धारण किया।

यह ज्ञान और सामर्थ्य में रुद्र से मिलता हुआ रूप था। प्रधान आदिरुद्र अपनी जगह अलग थे। उस नए रुद्ररूप में जागते ही पूरी शृंखला स्मरण हो आई। उसने आदिचैतन्य से मन और जीवभाव का उदय देखा। भिक्षु, जीवट, ब्राह्मण, सामन्त, चक्रवर्ती, अप्सरा, हरिणी, लता, भ्रमर, हाथी, हंस और उनके बीच के सभी जन्म एक साथ स्मृति में उपस्थित हो गए।

उस स्मृति से एक और बात स्पष्ट हुई। वे जीवन पुराने वस्त्रों की तरह केवल छूटे नहीं थे। हर कल्पित संसार ने अपना कारणक्रम और अनुभव प्राप्त कर लिया था।
मठ की ओर वापसी
रुद्ररूपी ज्ञानी ने निश्चय किया कि वह जीवन की प्रत्येक धारा तक जाएगा और सभी रूपों को वही ज्ञान देगा, जो उसमें जाग चुका था।
वह पहले मठ पहुँचा। मूल भिक्षु वहाँ मृतक की तरह निश्चल पड़ा था। जीवट की कल्पना से शुरू हुआ मानसिक क्रम अब भी चल रहा था। रुद्र ने उसे जगाया और उसके बोध को साझा जानने वाले मन से जोड़ दिया।
दोनों जीवट के चलते हुए संसार में गए। वह हाथ में तलवार लिए सो रहा था। जागने पर उसने उस भिक्षु को जाना, जिसकी कल्पना से उसका जीवन आरम्भ हुआ था, और रुद्र के ज्ञान को ग्रहण किया।
इसके बाद वे ब्राह्मण के लोक में पहुँचे। वह अपनी पत्नी के आलिंगन में सोया था। उसे जगाकर वे सामन्त, चक्रवर्ती और अन्य रूपों के संसारों में गए। हर बार एक और व्यक्ति ने पूरी शृंखला में व्याप्त एक ही चैतन्य को पहचाना।
उनके पहुँचने से घर, राज्य, वन और लोक खाली नहीं हुए। पहले से आरम्भ कर्म का शेष वेग, जिसे प्रारब्ध कहा जाता है, हर शरीर और उसके परिवेश को बनाए हुए था। परिवार, दायित्व और परिणाम अभी पूरे होने थे।
भीतर से सभी जागे हुए रूप एक ही चेतना में जानते थे। बाहर उनके शरीर और संसार अनेक रहे। ज्ञानी एक-दूसरे तक इसलिए पहुँच सके कि व्यापक चैतन्य उन सबमें समान था, जैसे अलग-अलग तरंगों में जल एक होता है।
सौ की संख्या
आरम्भ के भिक्षु और अन्तिम रुद्ररूप के बीच अट्ठानबे मध्यवर्ती रूप थे। इस प्रकार कुल सौ रूप हुए।
वसिष्ठ ने उन सभी को रुद्र कहा, क्योंकि प्रत्येक में रुद्र के समान ज्ञान और शक्ति जागी थी। आदिरुद्र से सम्बन्ध के कारण वे गण भी कहे गए। एक नाम उनकी उपलब्धि बताता था और दूसरा प्रधान रुद्र के साथ उनका सम्बन्ध।
आदिरुद्र ने सबको अपने-अपने संसार में लौटने की आज्ञा दी। ज्ञान मिल गया था, फिर भी आरम्भ हो चुके जीवनों का शेष क्रम पूरा होना था। उन्हें परिवारों के बीच रहकर प्रारब्ध का अनुभव करना था और अलग अहंभाव के पुराने भ्रम को फिर बल नहीं देना था।
उन जीवनों के समाप्त होने पर वे रुद्रपुरी लौटकर गण होंगे। वसिष्ठ ने कहा कि वे आकाश में तारों जैसे रूपों में देखे जा सकते हैं। दो परार्ध का काल पूरा होने और शेष अज्ञान तथा प्रारब्ध के क्षीण हो जाने पर वे रुद्र के साथ परम अवस्था प्राप्त करेंगे। परार्ध ब्रह्माण्डीय काल की पारम्परिक अवधि है, जिसे कथा सामान्य वर्षों में नहीं बदलती।
वसिष्ठ ने यह भी कहा कि ऐसे अनेक शतरुद्र प्रकट हो चुके हैं। जिस संसार में श्रीराम यह उपदेश सुन रहे थे, वह इसी भिक्षु-रुद्र की सौ धाराओं में ग्यारहवें भ्रामर रुद्र का संसार था।
अब श्रीराम उस क्रम को ऐसे निजी स्वप्नों की पंक्ति नहीं समझ सकते थे, जो पहले स्वप्नद्रष्टा के जागते ही नष्ट हो जाए। अज्ञानी जीव अपनी सीमित कल्पना में बन्द रहकर एक-दूसरे को नहीं देखते। ज्ञान उस व्यापक चेतना को प्रकट करता है, जिसमें उनकी अलग दिखाई देने वाली कथाएँ उठती हैं।
रात भर वसिष्ठ की खोज
श्रीराम ने पूछा कि वह भिक्षु केवल उपदेश के लिए रचा गया पात्र था या कहीं वास्तव में भी ऐसा कोई साधक विद्यमान था।
वसिष्ठ ने कहा कि उन्होंने योगविचार से यह इतिहास प्रस्तुत किया है और ऐसा जीवन सम्भव अवश्य है। उन्होंने रात में योगदृष्टि से खोज करने का वचन दिया।
अगले दिन सभा लगी तो वसिष्ठ ने बताया कि उत्तर दिशा में विहार नाम का एक स्थान है। वहाँ बन्द कुटी के भीतर दीर्घदर्श नाम का पीले केशों वाला भिक्षु इक्कीस रात से समाधि में बैठा था।
कुटी के बाहर लोगों के लिए केवल इक्कीस रात बीती थीं। दीर्घदर्श के मानसिक अनुभव में हजारों वर्ष और संसारों का बहुत लम्बा क्रम प्रकट हो चुका था। मन की गति और उसकी एकाग्रता ने अनुभव की अवधि को अलग विस्तार दिया था।
वसिष्ठ ने यह भी देखा कि भिक्षु का शारीरिक जीवन समाप्त हो चुका है। दीर्घदर्श के आदेश के अनुसार सेवक कुटी को एक महीने तक बन्द रखेंगे। उसके बाद वे द्वार खोलकर शरीर का जल में विसर्जन करेंगे और स्मृति में पाषाण प्रतिमा स्थापित करेंगे।
उस भिक्षु से जुड़ा चेतन क्रम ब्रह्मा के वाहन हंस की अवस्था तक पहुँच चुका था। कुटी में पड़ा मौन शरीर और भीतर फैला विराट अनुभव एक ही कारणधारा के दो बिन्दु थे।
वसिष्ठ ने श्रीराम को फिर मूल प्रश्न की ओर लौटाया। बार-बार की पहचान जीव को एक दीर्घ स्वप्न से दूसरे में ले जाती है और हर अवस्था पूरा संसार लगती है। ज्ञान बन्धनकारी भ्रम को समाप्त करता है, जबकि पहले से आरम्भ अनुभव अपना शेष पथ पूरा करता है। सौ संसारों तक फैली यह यात्रा एक अनुशासित साधक के उस एक विचार से शुरू हुई थी, जिसे उसने बिना जाँचे अपनी सम्पूर्ण एकाग्रता दे दी।