कथा · 32
सौ रुद्र-योगी: एक चेतना, सौ रूप
एक भिक्षुक सोया और सपने में राजा बन गया। उस राजा ने सपना देखा तो ब्राह्मण बन गया, और ब्राह्मण ने सपना देखा तो पंछी। ऐसे सौ सपने, एक के भीतर एक। अन्त में एक हंस ने अपने भीतर झाँका और उसमें से रुद्र निकले। फिर पीछे की ओर, सब एक-एक करके जागते चले गए।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या एक सपने के भीतर हम दूसरा सपना देख सकते हैं?”

वसिष्ठ बोले – “राम, तो सौ रुद्रों की कथा सुनो। यह सपनों के भीतर सपनों की कथा है, जो एक भिक्षुक से शुरू होती है और आख़िर में एक रुद्र पर आकर रुकती है। पर रुद्र को अपनी पहचान मिलते ही वो पीछे की ओर मुड़कर सब सपनों को जगा देते हैं। यह बड़ी विचित्र कथा है।”
भिक्षुक

एक भिक्षुक थे, जिनका नाम कोई नहीं जानता था। वो एक पुराने मन्दिर के बाहर रहते थे, साधारण कपड़ों में, पास एक कमंडल और एक कम्बल।
भिक्षुक दिन भर मन्दिर के बाहर बैठे रहते। लोग आते, कोई कुछ डाल जाता, कोई यूँ ही चला जाता।
रात को वो वहीं एक कोने में सो जाते। बहुत बरस से उनका जीवन ऐसे ही बीत रहा था।
एक दिन वो बहुत थक गए और अपने आप से बोले – “मेरा जीवन कुछ भी तो नहीं। मैं बस यहाँ दिन भर बैठता हूँ, फिर सो जाता हूँ, फिर बैठ जाता हूँ।”
उस रात वो जल्दी सो गए।
और उन्हें एक सपना आया।
राजा
सपने में वो एक राजा थे।
राजा का नाम था पुरुगुप्त, मगध के राजा, उम्र पैंतालीस बरस।
उनका राज-प्रासाद बहुत बड़ा था, सात मंज़िला। ऊपर की मंज़िल से शहर दिखता था, और शहर के पार खेत, और खेतों के पार नदी।

पुरुगुप्त को सुबह सूरज उगने से पहले उठना अच्छा लगता था। वो छज्जे पर जाकर खड़े होते, हाथ में चाँदी की एक कटोरी, जिसमें गरम दूध होता और ऊपर थोड़ी केसर।
उनकी पत्नी का नाम मालविका था, बहुत मुलायम आवाज़ वाली। पुरुगुप्त को उनकी हँसी पसन्द थी, क्योंकि हँसते समय वो एक हाथ अपने मुँह पर रख लेती थीं। एक बार उन्होंने पुरुगुप्त से पूछा था – “महाराज, यह आदत आपको क्यों पसन्द है?”
“प्रिय, क्योंकि उसमें एक बच्ची छिपी है। आप राज-रानी हैं, पर हँसते समय वो बच्ची सामने आ जाती है।”
मालविका ने अपना मुँह छुपा लिया।
पुरुगुप्त के तीन बेटे और दो बेटियाँ थीं।
राजा ने बहुत बरस न्याय किया। एक बार एक चोर पकड़ा गया, जिसने पाँच गायें चुराई थीं। पुरुगुप्त ने उससे पूछा – “क्यों चुराईं?”
“महाराज, मेरी माँ बीमार है।”
पुरुगुप्त कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले – “दो गायें वापस कर दे, तीन अपने पास रख। और हर महीने राज्य से तेरी माँ को अन्न मिलेगा।”
चोर रो पड़ा।
राजा बोले – “तू रो मत। बस अगली बार माँग लेना, चुराना नहीं।”
ऐसे ही बहुत बरस बीते।
पर एक दिन पुरुगुप्त छज्जे पर खड़े थे, उम्र अब पैंसठ बरस। मालविका दो बरस पहले बीमारी से जा चुकी थीं।
उन्होंने नदी देखी, शहर देखा, खेत देखे।
भीतर एक प्यास जाग उठी।
“यह सब अच्छा है, पर कुछ अब भी बाक़ी है।”
राजा उस रात सो गए, और उन्हें एक सपना आया।
ब्राह्मण
सपने में वो एक ब्राह्मण थे।
ब्राह्मण का नाम वैदर्भ था, जो गोदावरी के पास एक गाँव में रहते थे।
उनकी कुटिया छोटी थी, मिट्टी की दीवार और फूस की छत, और एक दरवाज़ा जो बारिश में फूल जाता था।

वैदर्भ की एक आदत थी। हर सुबह वो अपनी छाती पर दायाँ हाथ रखकर धीमी आवाज़ में एक मन्त्र पढ़ते, और उनकी पत्नी पास खड़ी उनके लिए दूध लिए रहतीं।
उनकी पत्नी का नाम भारती था। बचपन की किसी चोट से उनके पैर में हलकी लंगड़ाहट थी, पर वो कभी इसकी शिकायत नहीं करती थीं।
उनके दो बच्चे थे, एक बेटा और एक बेटी। बेटा शान्त था और बेटी बहुत बातूनी।
एक बार बेटी वैदर्भ के पास आई और बोली – “पिता, आप हर सुबह वो मन्त्र क्यों पढ़ते हैं?”
वैदर्भ बोले – “बेटी, क्योंकि मेरे पिता पढ़ते थे, और उनके पिता भी। यह बहुत पुरानी आदत है।”
“पर इसका मतलब क्या है?”
वैदर्भ बोले – “सच कहूँ तो पूरा मतलब मुझे भी नहीं पता।”
“फिर क्यों पढ़ते हैं?”
वैदर्भ कुछ देर सोचकर बोले – “बेटी, क्योंकि उसके पढ़ने से एक बात होती है। मैं अपने पिता के पास पहुँच जाता हूँ, और वो अपने पिता के पास। एक कड़ी-सी बन जाती है।”
बेटी पूरी बात समझी तो नहीं, पर उसे यह सुन्दर लगी।
वैदर्भ ने बहुत साधना की, यज्ञ किए, पाठ किए, तप किया।
पर भीतर एक प्यास बनी रही।
एक रात वो अपनी छाती पर हाथ रखकर सो गए।
और उन्हें एक सपना आया।
पंछी
सपने में वो एक पंछी थे।

वो एक नीलकंठ था, गले पर एक नीली रेखा, पंख भूरे जिनमें हलके नीले रंग की झाँक थी।
पंछी एक पुराने बरगद के पेड़ पर रहता था। पेड़ बहुत बड़ा था, हज़ार-दस हज़ार पत्तों वाला।
पंछी की एक मादा थी, जो उसके साथ रहती थी। दो बार में उनके चार बच्चे हुए थे। पहले के बच्चे उड़कर अपने-अपने पेड़ पर जा चुके थे, और नए चार अभी छोटे थे।
मादा का स्वभाव कठोर था और पंछी से अकसर उसकी बहस हो जाती, मगर बच्चों के सामने वो दोनों चुप रहते।
एक दिन सबसे छोटी बच्ची पेड़ से गिर पड़ी, और नीचे एक बिल्ली घात लगाए बैठी थी।
पंछी ने यह देखा तो बहुत तेज़ी से नीचे आया और बिल्ली पर झपटा, उसकी आँख पर चोंच मार दी।
बिल्ली भाग खड़ी हुई और बच्ची बच गई।
इस झपट में पंछी का एक पंख टूट गया, पर वो बच्ची को चोंच में लेकर ऊपर ले गया।
मादा ने पंछी को बहुत देर तक देखा, फिर धीमे से बोली – “तू अच्छा है।”
पंछी ने अपने टूटे पंख की कोई परवाह नहीं की, बस मादा के पास जा बैठा। उसका पंख जीवन में पहली बार टूटा था।
ऐसे बहुत मौसम बीत गए।
पंछी बूढ़ा हो चला, उसके पंख कमज़ोर पड़ गए और आँखें भी।
एक रात वो डाली पर सो गया।
और उसे एक सपना आया।
मछुआरा
सपने में वो एक मछुआरा था।

उसका नाम कुम्भज था, जो यमुना के एक मोड़ पर, मथुरा से उत्तर की ओर रहता था।
उसकी झोंपड़ी पानी के बहुत क़रीब थी, इसलिए बरसात में अकसर पानी अन्दर आ जाता।
कुम्भज की पत्नी का नाम कोश्ती था, क़द में छोटी। मछली साफ़ करते-करते उसके हाथ हमेशा गीले रहते।
उनके तीन बच्चे थे। सबसे बड़ा पन्द्रह बरस का था, जो पिता के साथ नाव पर जाता।
कुम्भज को एक बात बहुत पसन्द थी। सुबह-सुबह जब वो नाव पर बैठता, पानी अभी ठण्डा होता और मछलियाँ अभी जगी न होतीं, तब वो हाथ में जाल लिए बस बैठा रहता, पर डालता नहीं।
वो देर तक यूँ ही बैठा रहता।
एक बार बेटे ने पूछा – “पिता, अभी जाल क्यों नहीं डालते?”
“बेटा, अभी मछलियाँ सो रही हैं। उन्हें भी थोड़ा सोने दे।”
बेटा हँस पड़ा – “पिता, यह तो मछुआरे की बात नहीं।”
“शायद नहीं, पर यह मेरी बात है।”
ऐसे बहुत बरस बीते।
एक रात कुम्भज की पत्नी बीमार पड़ी, बहुत तेज़ ज्वर तीन दिन तक रहा।
चौथे दिन वो चल बसी।
कुम्भज ने अपनी पत्नी का चेहरा देखा। उसके वो गीले रहने वाले हाथ अब सूखे पड़े थे।
कुम्भज रोया नहीं, बस बहुत देर तक बैठा रहा। फिर उठकर उसने अन्तिम क्रिया की।
उस रात कुम्भज अकेला नाव पर गया, पूरी रात पानी पर रहा।
सुबह जब वो लौटा, उसका तन थका हुआ था, पर भीतर कोई बात ठहर गई थी। उसके मुँह से निकला – “कोश्ती, तू कहाँ है?”
कोई जवाब नहीं आया।
बहुत बरस बीत गए।
कुम्भज बूढ़ा हो चला।
एक रात वो सो गया।
और उसे एक सपना आया।
और सपने

मछुआरे के सपने में एक राजकुमार था, नाम वसु, पाटलिपुत्र का। उसकी एक ख़ास आदत थी कि बात करते समय वो अपनी अँगूठी से खेलता रहता। राजकुमारी सुरुचि से उसका विवाह हुआ और एक बेटा हुआ, पर वो बेटा घोड़े से गिरकर मर गया। उस रात राजकुमार ने अपनी अँगूठी निकालकर एक कुएँ में फेंक दी, और फिर सो गया।
राजकुमार के सपने में एक संन्यासी थे, नाम आचार्य कोश, काशी में रहने वाले, सिर पर लम्बी जटा और कमर पर एक गेरुआ कपड़ा। उनका एक छात्र था जिसने उन्हें छोड़ दिया था, और यह बात उन्हें बहुत बरस तक खटकती रही। मरते समय भी उन्होंने उसी छात्र को याद किया।
संन्यासी के सपने में एक चोर था, जिसका नाम ख़ुद उसे भी पता नहीं था। उसकी माँ ने उसे बचपन में छोड़ दिया था, और उसने जीवन भर लोगों के घरों में सेंध लगाई। एक रात एक स्त्री ने उसे चोरी करते पकड़ लिया, पर उसने उसे मारा नहीं, बल्कि खाना दिया। चोर रो पड़ा।
चोर के सपने में एक राजा था, नाम धरण, बहुत क्रूर, जिसने अपने भाई को कैद किया था। एक दिन भाई के बेटे ने धरण को मार डाला। मरते समय धरण को कुछ समझ नहीं आया, बस एक आश्चर्य हुआ कि मरने में दर्द इतना कम होता है।
राजा के सपने में एक स्त्री थी, नाम राधा, किसी गाँव की। उसका पति व्यापारी था और बहुत दूर रहता, इसलिए राधा बीस बरस अकेली रही। एक बार उसके मन में एक सोच आई – “मैं किसी और के सपने में हूँ।” यह सोच कहाँ से आई, उसे पता नहीं चला, और वो इसे किसी से कह भी नहीं पाई। पति लौटा, पर राधा ने उसे यह बात नहीं बताई।
राधा के सपने में एक तपस्विनी थी, हिमालय में, उम्र अस्सी बरस, नाम अनसूया। उसने जीवन भर एकान्त चुना था। आख़िर में जब वो अपनी अन्तिम श्वास के लिए बैठीं, तो धीरे से हँस पड़ीं – “तो बस यही है?”
तपस्विनी के सपने में एक देवी थी, नाम सती, जो एक छोटे-से मन्दिर में पूजी जाती थी। उसकी एक भक्त थी, एक नन्ही बच्ची, जो हर सुबह फूल ले आती। एक दिन बच्ची ने सती से पूछा – “देवी, आप असल में कौन हो?” सती ने कोई जवाब नहीं दिया, पर बच्ची को लगा कि उत्तर मिल गया।
देवी के सपने में एक कीट था, जिसका कोई नाम नहीं था, बस एक नन्हा कीट जो पत्तियों पर रेंगता था। उसका जीवन तीन दिन का था।
कीट के सपने में एक मच्छर था, जिसका जीवन आधे दिन का था।
और मच्छर के सपने में हवा में तैरता एक धूल का कण था।
ऐसे बहुत सारे सपने थे। हर एक में कोई जीवन था, कोई प्रेम, कोई दुख, और कभी एक पल को कोई आहट कि “मैं किसी और के सपने में हूँ।” पर फिर वो भूल जाते।
बहुत सारे ऐसे सपने थे।
पर वो भूलते क्यों थे?
क्योंकि सपने का स्वभाव यही है। सपने में अगर तुम पूरी तरह जान लो कि यह सपना है, तो सपना टूट जाता है और तुम जाग जाते हो।
पर इन जीवों को जागना नहीं था, इन्हें अभी अपने सपने में ही रहना था।
इसलिए हर एक के भीतर बस एक धीमी-सी आहट रहती थी।
जो कभी सुनी जाती और फिर भुला दी जाती।
हंस
आख़िर में एक सपना ऐसा था जिसमें एक हंस था।

हंस मानस सरोवर पर तैरता था। पानी इतना साफ़ था कि नीचे की रेत की एक-एक रेखा दिखती थी। पीछे कैलाश था, जिसकी चोटी तक बर्फ़ जमी थी।
हंस का देह सफ़ेद था, उसकी चोंच पीली, जिसमें नारंगी की एक झलक थी, और उसकी आँखें छोटी, गहरी और भूरी।
उसकी मादा पास ही तैरती थी। दोनों के बीच किसी बातचीत की ज़रूरत नहीं थी, बस साथ तैरना ही उनकी भाषा थी।
उनके चार छोटे हंस-बच्चे थे, जिनके पंख अभी पूरी तरह नहीं आए थे, और वो माँ के पीछे-पीछे तैरते।
हंस को मानस का पानी पसन्द था, ठण्डा और साफ़, जिसमें एक हलकी मिठास थी।
बहुत बरस उसने ऐसे ही बिताए।
एक दिन उसने अपनी मादा से कहा – “मेरे भीतर कुछ है।”
मादा ने उसे देखकर पूछा – “क्या है?”
“पता नहीं। पर मैं केवल हंस नहीं हूँ।”
मादा बोली – “तू कुछ ज़्यादा ही सोचता है।”
“शायद।”
हंस अकेला सरोवर के बीच एक छोटे-से टापू पर गया और वहाँ जा बैठा।
उसने आँखें बन्द कीं।
और भीतर झाँका।
पहले बहुत-सी छवियाँ उभरीं – एक मछुआरा, एक पंछी, एक ब्राह्मण, एक राजा, एक भिक्षुक, एक स्त्री, एक चोर, एक तपस्विनी, एक देवी।
हंस ने आश्चर्य से देखा – “यह सब मैं ही हूँ?”

फिर एक और छवि उभरी, बहुत स्पष्ट। एक पुरुष, जिसकी उम्र का अनुमान न लगे, बहुत प्राचीन और बहुत स्थिर, हाथ में त्रिशूल और माथे पर तीसरी आँख।
हंस ने एक पल को साँस रोक ली – “रुद्र।”
रुद्र ने हंस को देखा।
रुद्र बोले –
“बेटा, तू वही है, मैं वही हूँ।”
जागना
हंस की आँखें खुलीं।
पर अब वो टापू पर हंस नहीं रह गया था।
वो एक मनुष्य के देह में खड़े थे, पर देह से कहीं अधिक, प्रकाश का देह।

उन्होंने अपने हाथ देखे। एक हाथ में त्रिशूल था और दूसरे में डमरू, और माथे पर तीसरी आँख, जो अभी बन्द थी।
रुद्र।
रुद्र ने एक पल को साँस ली।
“मैं रुद्र हूँ।”
फिर एक झटका लगा, एक वर्टिगो।
“पर मैं तो अभी कुछ देर पहले हंस था।”
रुद्र ने पीछे मुड़कर देखा।
पीछे की कतार
रुद्र को एक कतार दिखी।
कतार बहुत लम्बी थी, शायद सौ की, शायद हज़ार की।
सबसे क़रीब वो हंस था। उसके पीछे एक धूल का कण, उसके पीछे एक मच्छर, उसके पीछे एक कीट, उसके पीछे एक देवी, उसके पीछे एक तपस्विनी, उसके पीछे एक स्त्री, उसके पीछे एक राजा, उसके पीछे एक चोर, उसके पीछे एक संन्यासी, उसके पीछे एक राजकुमार, उसके पीछे एक मछुआरा, उसके पीछे एक पंछी, उसके पीछे एक ब्राह्मण, और उसके पीछे एक राजा।
और कतार के अन्तिम छोर पर, सबसे पीछे, एक छोटा-सा भिक्षुक था, एक पुराने मन्दिर के बाहर, जिसके पास एक कमंडल और एक कम्बल था।
रुद्र को फिर वर्टिगो हुआ।
“यह सब मैं ही हूँ?”
“और इन सब के सपनों के अन्त में वो भिक्षुक?”
“और भिक्षुक का सपना ही यह सब?”
रुद्र कुछ देर ठहरे रहे, फिर उन्हें समझ आ गया।
“मैं भिक्षुक का सपना नहीं हूँ। भिक्षुक मेरा सपना है।
“पर भिक्षुक भी अपने भीतर मुझे ही रखता है।
“हम एक हैं। सब एक हैं।”
जगाना
रुद्र ने अपनी तीसरी आँख खोली।
प्रकाश फूट पड़ा।
प्रकाश कतार के साथ-साथ चला, सबसे क़रीब वाले हंस तक पहुँचा।
हंस अपने टापू पर बैठे थे। उन्होंने अपने भीतर एक उजाला महसूस किया।
हंस ने आँखें खोलीं।
उन्होंने अपनी मादा को देखा, पानी को देखा, पीछे कैलाश को देखा। पर अब सब बदला हुआ था। पहले यह सब उनका संसार था, अब यह सब उनके भीतर का एक हिस्सा भर था।
हंस धीरे से हँस पड़े।
(हंस की हँसी गले में उठती एक छोटी-सी आवाज़ होती है, जिसे बहुत कम लोगों ने सुना होगा।)
मादा ने उन्हें देखकर पूछा – “क्या हुआ?”
“कुछ नहीं। और सब कुछ।”
मादा समझी तो नहीं, पर उसने हंस की आँखों में कुछ नया देखा।
प्रकाश आगे बढ़ा।
उसने धूल के कण को जगाया, फिर मच्छर को, फिर कीट को।
हर एक के भीतर एक हलकी रोशनी जाग उठी।
(मच्छर एक पल को रहा और फिर मर गया, क्योंकि उसका जीवन ही आधे दिन का था। पर वो आधा दिन उसने रुद्र-रूप में जिया, बहुत हलका, पर असली।)
प्रकाश और आगे बढ़ा।
उसने देवी को जगाया, फिर तपस्विनी को।
तपस्विनी को बहुत वर्टिगो हुआ। उन्होंने जीवन भर एकान्त ढूँढा था, पर अब उन्हें समझ आया कि वो जिस एकान्त को ढूँढ रही थीं, वो ख़ुद ही थीं।
तपस्विनी धीरे से हँस पड़ीं।
प्रकाश आगे बढ़ा।
उसने राधा को जगाया। राधा अपने घर में सो रही थीं, पति पास ही था।
राधा ने आँखें खोलीं।
बहुत बरस पुरानी वो आहट अब उन्हें साफ़ सुनाई दी – “मैं किसी और के सपने में हूँ।”
पर अब वो आहट भूली नहीं, राधा ने उसे थाम लिया।
राधा ने अपने पति को देखा, फिर ख़ुद को, फिर ऊपर छत को।
राधा मुस्कुरा उठीं।
“मैं हूँ। पर मैं केवल राधा नहीं हूँ।”
पति सो रहा था। राधा ने बहुत हलके से अपना हाथ उसके सिर पर रख दिया।
प्रकाश आगे बढ़ा।
उसने राजा को जगाया, फिर चोर को, फिर संन्यासी को, फिर राजकुमार को।
हर एक जागा, हर एक को अपनी कतार दिखी, और हर एक को वर्टिगो आया।
(राजकुमार वसु को अपनी वो अँगूठी याद आई जो उसने कुएँ में फेंकी थी। वो हँस पड़ा। अँगूठी, कुआँ, पुत्र, यह सब एक सपना ही तो था।)
(संन्यासी आचार्य कोश को अपना वो छात्र याद आया जिसने उन्हें छोड़ दिया था। पर अब वो उस छात्र पर क्रोधित नहीं थे, बस एक हलकी समझ थी कि छात्र अपने सपने में था और गुरु अपने में, दोनों एक ही सपने के दो रूप।)
प्रकाश और पीछे बढ़ा।
अब वो मछुआरे कुम्भज तक पहुँचा।
कुम्भज रात को अपनी नाव पर अकेला बैठा था, आँखें बन्द किए।
प्रकाश उसके भीतर उतरा।
कुम्भज ने आँखें खोलीं। उसकी पत्नी कोश्ती की एक छवि उसके भीतर थी, पर अब वो छवि बँधी हुई नहीं, हलकी थी।
कुम्भज हँस पड़ा – “कोश्ती, तू भी।”
जैसे भीतर से एक हलकी आवाज़ आई – “हाँ कुम्भज।”
प्रकाश आगे बढ़ा।
अब वो पंछी नीलकंठ तक पहुँचा।
नीलकंठ अपनी डाली पर सो रहा था, बहुत बूढ़ा, पंख कमज़ोर।
प्रकाश के साथ नीलकंठ ने आँखें खोलीं।
वो कुछ देर बस बैठा रहा, फिर उसने अपनी मादा को देखा, जो पास ही सो रही थी।
नीलकंठ ने एक हलकी चहचहाहट की।
मादा ने एक आँख खोलकर पूछा – “क्या हुआ?”
“मुझे एक बात पता चली।”
“क्या?”
“बाद में बताऊँगा।”
मादा ने आँख बन्द कर ली। नीलकंठ बैठा रहा, और उसका वो टूटा पंख अब उसे बहुत हलका लगने लगा।
प्रकाश आगे बढ़ा।
अब वो ब्राह्मण वैदर्भ तक पहुँचा।
वैदर्भ अपनी छाती पर हाथ रखकर सो रहे थे, और प्रकाश ने उन्हें जगा दिया।
वैदर्भ ने आँखें खोलीं।
उन्हें अपने पिता की याद आई, फिर उनके पिता की, फिर उनके पिता के पिता की।
वही कड़ी, जिसके बारे में उनकी बेटी ने पूछा था।
अब वो कड़ी उन्हें साफ़ दिखी।
वो कड़ी किसी पीढ़ी की नहीं थी, वो तो हर देह की कड़ी थी, हर रूप की।
वैदर्भ धीरे से हँस पड़े – “बेटी, अब मैं तुझे बता सकता हूँ।”
पर बेटी सो रही थी। वैदर्भ ने हलके से उसका सिर छुआ, फिर चुपचाप अपना मन्त्र पढ़ा।
इस बार उन्हें मन्त्र का पूरा अर्थ मिल गया।
प्रकाश आगे बढ़ा।
अब वो राजा पुरुगुप्त तक पहुँचा।
पुरुगुप्त रात को अपने छज्जे पर बैठे थे, ऊपर तारे चमक रहे थे।
प्रकाश ने उन्हें छुआ।
पुरुगुप्त ने आँखें ऊपर आकाश की ओर उठाईं।
उन्हें मालविका की याद आई।
पुरुगुप्त धीरे से हँस पड़े – “प्रिय, तू भी सपना थी, पर तू असली भी थी। दोनों।”
ऊपर एक तारा चमका, और पुरुगुप्त ने धीरे से सिर हिला दिया।
प्रकाश आगे बढ़ा।
भिक्षुक
प्रकाश सबसे पीछे पहुँचा।
मन्दिर के बाहर।
भिक्षुक अपनी जगह पर, कम्बल ओढ़े सो रहे थे।
प्रकाश उनके भीतर उतरा।
भिक्षुक ने आँखें खोलीं।
पहले उन्होंने अपने आसपास देखा, मन्दिर, पत्थर, अपना कमंडल, अपना कम्बल। सब वैसा ही था।
पर भीतर एक पूरी कतार थी।
राजा पुरुगुप्त, ब्राह्मण वैदर्भ, पंछी नीलकंठ, मछुआरा कुम्भज, राजकुमार वसु, संन्यासी आचार्य कोश, चोर, राजा धरण, राधा, तपस्विनी अनसूया, देवी सती, कीट, मच्छर, धूल का कण, हंस, और रुद्र।
ये सब उनके भीतर थे।
भिक्षुक उठ बैठे।
कुछ देर वो यूँ ही बैठे रहे, फिर धीरे से हँस पड़े।
“तो मैं सबसे आख़िर में जागा।”
(क्योंकि कड़ी के पीछे लौटना धीमा है। हर सपने में डूबना तेज़ था, पर हर सपने से उठना धीमा।)
भिक्षुक ने अपने हाथ देखे, बूढ़े और दुबले, पर अब उनमें कुछ था।
सुबह हो रही थी।
एक स्त्री हाथ में थोड़ा अन्न लिए मन्दिर के पास आई – “बाबा।”
भिक्षुक बोले – “धन्यवाद।”
स्त्री ने उन्हें ध्यान से देखकर कहा – “बाबा, आज आप कुछ अलग लग रहे हैं।”
“हाँ बच्ची।”
“क्यों?”

भिक्षुक धीरे से हँसकर बोले – “बच्ची, आज मैंने एक कतार देखी।”
“कैसी कतार?”
“मेरे भीतर एक राजा है, एक ब्राह्मण, एक पंछी, एक मछुआरा, और बहुत-से। और तेरे भीतर भी।”
स्त्री हँस पड़ी – “बाबा, यह कैसा मज़ाक है।”
“मज़ाक नहीं है। आज रात तू सोएगी और एक सपना देखेगी। अगर तू उस सपने में एक पल को यह सोच ले, ‘मैं सपने में हूँ’, और भूले नहीं, तो तू भी यह कतार देखेगी।”
स्त्री बात समझी तो नहीं, पर बाबा की आँखों में कुछ था जो उसे अच्छा लगा।
वो चली गई।
भिक्षुक मन्दिर के बाहर बैठे रहे।
ऐसे बहुत बरस बीते।
जो भी उनके पास आता, वो उससे यही बात करते।
कुछ लोग हँस देते, कुछ ध्यान से सुनते, और कुछ अगली रात कोशिश करते।
एक दिन भिक्षुक का देह छूट गया, मन्दिर के बाहर ही, वैसे ही बैठे-बैठे, आँखें बन्द किए।
पर उनकी कतार किसी ने नहीं देखी। सिर्फ़ वही, जो उनसे बात कर चुके थे, अपनी-अपनी कतार देखने लगे थे।
वसिष्ठ की बात
राम, यह कथा मुझे एक पुराने ऋषि ने सुनाई थी। उन्होंने मुझे यह भी कहा था –
“वसिष्ठ, हर रात तुम अपने सपने में जाते हो, पर जो सपना देख रहा है, वो जागता रहता है। अगली रात तुम फिर एक नया सपना देखते हो, पर देखने वाला वही रहता है।
“हर जन्म में तुम एक नए देह में होते हो, पर भीतर देखने वाला वही रहता है।
“हर सृष्टि में तुम एक नई कथा में होते हो, पर भीतर देखने वाला वही रहता है।
“वो देखने वाला रुद्र है, हर एक के भीतर। बस उसे पहचानना है।”
मैंने यह सुना, पर तब पूरी तरह नहीं समझा। समझने में बहुत बरस लगे।
राम, अब तुम यह सुन रहे हो। शायद तुम भी अभी पूरी तरह न समझो, पर एक दिन समझोगे।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, तो क्या मैं भी किसी का सपना हूँ?”
“शायद।”
“और जो मेरा सपना देख रहा है, वो भी किसी का सपना है?”
“शायद।”
“और इसका अन्त?”
वसिष्ठ बोले – “राम, अन्त में बस एक चेतना है। हम सब उसी की कथाएँ हैं, उसी के सपने, उसी के रूप।
“रुद्र हम सब के भीतर है।”
राम ने इस पर सिर हिलाया।
राम ने आकाश की ओर देखा। रात थी, ऊपर सप्तर्षि और बहुत-से तारे चमक रहे थे।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या ये तारे भी रुद्र हैं?”
वसिष्ठ बोले – “राम, तुम जल्दी समझ रहे हो।”
राम मुस्कुराए।
राम ने फिर कहा – “गुरुदेव, सौ रुद्रों की कथा में एक और बात है।”
“क्या?”
“उन्होंने एक-एक करके सब को पीछे की ओर जगाया, पर जो भिक्षुक सबसे पहले थे, वो सबसे आख़िर में जागे। ऐसा क्यों?”
वसिष्ठ बोले – “राम, क्योंकि कड़ी के पीछे लौटना धीमा है।”
“समझाइए।”
“राम, हर सपने में डूबना तेज़ था, पर हर सपने से उठना धीमा। क्योंकि जागते समय हम पुराना सब कुछ छोड़ते हैं और नया सब कुछ लेते हैं। यह काम धीमा होता है।”
राम ने फिर पूछा – “गुरुदेव, एक और प्रश्न है। भिक्षुक जब आख़िर में जागे, तो क्या वो भी रुद्र थे?”
“हाँ।”
“पर वो तो साधारण थे।”
वसिष्ठ बोले – “राम, हर साधारण मनुष्य के भीतर एक रुद्र बैठा है, बस वो जानता नहीं। भिक्षुक के सपनों ने उन्हें खोल दिया, और जब वो लौटे, तब उन्होंने यह जाना।”
राम ने सिर हिलाया।
“गुरुदेव, क्या मुझे भी ऐसे सपने आएँगे?”
वसिष्ठ बोले – “राम, सभी को आते हैं, पर हर एक उन्हें याद नहीं रखता। तुम्हें भी आते हैं, पर तुम सुबह उठकर भूल जाते हो।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, मैं ध्यान दूँगा।”
कुछ देर दोनों चुप रहे।
राम ने फिर पूछा – “गुरुदेव, मेरा सबसे साधारण रूप क्या हो सकता है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह विचित्र प्रश्न है।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम राजकुमार हो, तुम्हें यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिए।”
“पर मेरा कोई पुराना देह?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हाँ। तुम्हारा एक पुराना देह बहुत साधारण था।”
“कैसा?”
“एक छोटा-सा भिक्षुक, एक मन्दिर के बाहर बैठा हुआ।”
राम चौंक उठे – “गुरुदेव, क्या वो मैं ही था, जो सौ रुद्रों की कथा में था?”
वसिष्ठ बोले – “राम, शायद हाँ, शायद नहीं। पर एक स्तर पर, हाँ। हर भिक्षुक में राम है, और हर राम में भिक्षुक।”
राम ने सिर हिलाया।
कुछ देर दोनों चुप रहे।
“गुरुदेव, अगर मैं भिक्षुक था, तो मेरी कथा कब शुरू हुई?”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह बहुत गहरा प्रश्न है।”
“बताइए।”
“राम, किसी कथा का कोई आरम्भ नहीं होता, हर कथा अपनी पुरानी कथा से निकलती है। तुम भिक्षुक थे, उससे पहले शायद राजा, उससे पहले शायद पशु, और उससे पहले शायद और कुछ। कोई पहला नहीं।”
राम बोले – “गुरुदेव, यह बात बहुत भारी है।”
“हाँ।”
“और कोई अन्तिम भी नहीं?”
“नहीं।”
“फिर?”
“राम, कथा बस चलती रहती है, आरम्भ के बिना और अन्त के बिना। पर तुम कथा से ऊपर जा सकते हो। तब तुम कथा को देखते हो, उसमें रहते नहीं।”
राम बोले – “गुरुदेव, यह सीख मुझे मिल रही है।”
“बहुत अच्छा।”
राम ने ऊपर देखा। सप्तर्षि बहुत स्थिर थे।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या वो भी कथा से ऊपर हैं?”
वसिष्ठ बोले – “हाँ।”
राम धीरे से हँस पड़े – “एक दिन मैं भी।”
“शायद।”
कुछ देर दोनों चुप रहे।
राम ने ऊपर देखा।
सप्तर्षि अभी भी वैसे ही थे, पर अब राम को लगा कि वो सात तारे एक कतार हैं, और हर तारे के पीछे एक और कतार, और अन्त में सब एक।
राम ने कुछ देर के लिए अपनी आँखें बन्द कीं।
भीतर एक धीमी-सी आहट उठी।
राम ने आँखें खोलीं।
“गुरुदेव, मुझे एक आहट हुई।”
वसिष्ठ बोले – “बस उसे भूल मत।”
राम ने सिर हिलाया।
नदी बहती रही।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण, सर्ग 6अ.62-65 पर आधारित है। सौ रुद्रों का सपनों के भीतर सपनों से जागना, यह नेस्टेड-कथा की एक प्राचीन रचना है। एक भिक्षुक से शुरू, और सौ सपनों के पार एक हंस, और फिर रुद्र, और फिर पीछे की ओर जागरण। यह संरचना आधुनिक मेटा-कथा का बहुत पुराना संस्करण है।
दर्शन-दृष्टि
एक भिक्षुक सोते-सोते अनेक जन्म-स्वप्न देखता है। एक स्वप्न में एक हंस होता है, हंस अपने को रुद्र मानता है, और रुद्र होकर पीछे जाकर पूरी श्रृंखला को जगाता है। एक के बाद एक, हर सपने का पात्र जागता है, और अन्त में एक रुद्र के सौ रूप बनकर सब एक हो जाते हैं। कथा यह कहती है कि चेतना अपने ही सपनों की एक श्रृंखला है, और जागरण किसी एक छोर से शुरू होकर पूरी श्रृंखला को उल्टे जगा सकता है।
ऑस्ट्रियाई भौतिकीविद् एर्विन श्रोडिङ्गर (Erwin Schrödinger, 1887-1961) ने अपनी What is Life? (1944) और बाद की My View of the World (Meine Weltansicht, मरणोपरान्त 1961) में रखा कि चेतना अनेक होने का भ्रम भले देती हो, पर वस्तुतः वो एक ही है, और हर जीव उस एक का एक कोण है। सौ रुद्र-योगी की कथा इसी एकत्व का दृश्य रूप है। सपनों का अनेक होना अनेक चेतनाओं को नहीं दिखाता, एक चेतना के अनेक कोणों को दिखाता है, और जब एक जागता है तो सब के जागने का रास्ता खुलता है।