सौ रुद्र-योगी

कथा · 32

सौ रुद्र-योगी: एक चेतना, सौ रूप

एक योगी ने इतना गहरा ध्यान किया कि एक से सौ हो गया। सौ अलग-अलग जगहों में सौ अलग-अलग देहें। सब एक ही चेतना के रूप।

एक हिमालय की गुफा में एक योगी रहता था। उसका नाम कोई नहीं जानता था। बहुत लंबे बाल, बहुत गहरी आँखें। बैठा रहता दिन-रात।

उसने एक संकल्प किया था – “मैं अपनी चेतना का विस्तार करूँगा। एक देह से बँधा नहीं रहूँगा।”

उसने ध्यान शुरू किया। पहले तो साँस को साधा। फिर मन को। फिर बुद्धि को। फिर अहंकार को।

एक दिन उसकी समाधि बहुत गहरी हुई।

उसकी चेतना देह से बाहर निकली। मगर एक से सौ बन गई।

एक हिस्सा हिमालय की गुफा में रहा। दूसरा भारतवर्ष के एक नगर में बस गया – एक छोटे से व्यापारी के रूप में। तीसरा दक्षिण में मच्छीमार बना। चौथा एक राजा के दरबार में मंत्री। पाँचवाँ एक भिखारी। छठा एक तपस्वी।

हर रूप अपना जीवन जीता था। हर एक के अपने रिश्ते थे, अपनी चिंताएँ, अपने सुख-दुख। हर एक अपने को असली मानता था।

योगी के असली रूप को – हिमालय की गुफा वाले को – कुछ बेचैनी सी थी। उसे लगता कुछ खो गया है। मगर वो शांत रहा।

सालों बाद, सब रूप एक साथ कुछ अनुभव करने लगे। हर रूप ने एक अजीब बेचैनी महसूस की। एक रात हर रूप ने एक ही सपना देखा।

सपने में सब के सब हिमालय की उसी गुफा में जुटे थे।

व्यापारी, मच्छीमार, मंत्री, भिखारी, तपस्वी – सब के सब। सौ अलग-अलग रूप। सब एक-दूसरे को देखते हुए।

हर एक ने पहले डर महसूस किया। फिर पहचान। फिर मुस्कुराहट।

योगी का असली रूप उठा। उसने हाथ बढ़ाए। बाक़ी निन्यानवे रूपों ने हाथ मिलाए।

एक चमक हुई। सौ रूप एक हो गए।

योगी की देह गुफा में थी। मगर भीतर अब बहुत कुछ था। सौ जीवनों का अनुभव। सौ रिश्ते। सौ रूप-स्मृतियाँ।

उसने आँखें खोलीं। उठा। गुफा से बाहर निकला।

एक छोटी सी पगडंडी थी। उसने उस पर पैर रखा।

उसने अब साधारण जीवन जीने का फ़ैसला किया।

एक छोटे से गाँव में बसा। एक झोपड़ी बनाई। खेत-बागबानी की। लोग उसे जानते थे, मगर पहचानते नहीं थे।

एक दिन एक नौजवान साधक आया। उसने सुना था कि गाँव में एक अनोखे आदमी रहते हैं।

“महाराज, क्या मैं आपका शिष्य बन सकता हूँ?”

योगी ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, मैं किसी का गुरु नहीं हूँ। मैं तो बस सौ रूपों का संगम हूँ। तू भी कई रूपों का संगम है। यही जान लेने पर पाठ पूरा हो जाता है।”

नौजवान को कुछ समझ नहीं आया। मगर उसने महीनों योगी के साथ बिताए। धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि वो भी कई हिस्सों का जोड़ है। उसके भीतर भी एक व्यापारी था, एक मच्छीमार, एक राजा, एक भिखारी।

योगी ने उसे एक बात कही – “हम सब के भीतर सौ रुद्र हैं। बाहर एक दिखता है, मगर भीतर सौ हैं। उन्हें एक साथ देखो, और तू भी मुक्त हो जाएगा।”

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, चेतना का विस्तार सीमित नहीं है। एक देह में बँधे रहना मन की आदत है। जो उससे ऊपर उठ जाता है, वो जान लेता है कि उसके भीतर सौ रूप हैं। बाहर एक दिखता है, मगर भीतर अनगिनत।”

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