कथा · 23
हेमचूड़ और हेमलेखा: प्रेम जो गुरु बना
राजा को एक सुंदर लड़की पसंद आई। शादी की शर्त एक थी – तुम्हें मेरी सिखाई हर बात सुननी होगी। राजा ने मान लिया। उसके बाद हर दिन एक नया प्रश्न। हर रात एक नई समझ।
राजा हेमचूड़ बहुत बड़े राज्य के स्वामी थे। नौजवान, ताक़तवर, हर युद्ध जीतते। उनके दरबार में सबसे विद्वान पंडित आते। संगीतज्ञ, कवि, गणितज्ञ। राजा हर एक से बात करते, मगर भीतर से एक बेचैनी थी।
उन्हें कुछ चाहिए था जो धन-यश से नहीं मिलता था। मगर वो बात कर नहीं पाते थे – किस्से किस्से किसे बोलें?
हेमलेखा का आगमन
एक दिन एक नई लड़की दरबार में आई। बिना किसी ढोल-तमाशे के। एक छोटी सी मंडली के साथ। पास के राज्य की कोई राजकुमारी थी, या शायद नहीं। यह अब तक भी कोई नहीं जानता।
उसका नाम हेमलेखा। बहुत सुंदर। मगर सुंदरता से ज़्यादा कुछ था उसकी आँखों में। जैसे वो किसी गहरे कुएँ से देख रही हो। पुरानी आँखें, युवा चेहरे में।
राजा हेमचूड़ ने उसे एक नज़र में देख लिया। मन डूबा। यह वो लड़की है जिसका इंतज़ार था।
उन्होंने उसे रुकने को कहा। हेमलेखा रुकी। राजा ने तीसरे दिन उससे बात की।
“हेमलेखा, मुझसे विवाह करो।”
हेमलेखा ने मुस्कुराकर कहा, “करूँगी। एक शर्त है।”
“बताओ।”
“तुम्हें मेरी हर बात सुननी होगी। और जो मैं सिखाऊँ, उसे समझना होगा।”
राजा हँसे। ज़ोर से। “तुम मुझे क्या सिखाओगी? मैं राजा हूँ। तुम मेरी पत्नी बनोगी।”
हेमलेखा ने कोई जवाब नहीं दिया। बस मुस्कुराईं।
राजा प्यार में थे। एक मिनट सोचा, फिर बोले, “ठीक है। मान गया।”
शादी हो गई। बहुत भव्य। पूरा राज्य ख़ुश था।
पहला पाठ: मीठा कहाँ है?
शादी के कुछ दिन बाद हेमलेखा ने राजा से एक मीठा फल माँगा। एक आम। राजा ने अपनी निजी टोकरी से एक चुना। पका हुआ, मीठा।
हेमलेखा ने उसे काटा। एक टुकड़ा खाया। फिर राजा से पूछा, “मीठा कहाँ है?”
“फल में।”
“सच?”
हेमलेखा ने राजा को एक टुकड़ा दिया। “अब तुम खाओ।”
राजा ने खाया। मीठा था।
“अब बताओ – मीठा फल में था, या तुम्हारी जीभ में?”
राजा रुक गए। पहली बार उनके मन में एक प्रश्न उठा – जिसका जवाब तुरंत नहीं था।
“दोनों में?”
“अगर फल में होता, तो मरे हुए आदमी की जीभ पर भी मीठा लगता। अगर सिर्फ़ जीभ में होता, तो लकड़ी भी मीठी लगती। तो क्या?”
राजा ने सोचा।
“मीठापन फल और जीभ के मिलने पर बनता है।”
“और जो जानता है कि मीठापन बना है – वो कौन है?”
“मैं?”
“वो ‘मैं’ न फल है, न जीभ। वो उन दोनों को देख रहा है।”
राजा ने सिर खुजलाया। पूरा दिन उन्हें यह प्रश्न खाता रहा।
दूसरा पाठ: सुंदरता कहाँ है?
दूसरे दिन हेमलेखा ने राजा को महल दिखाने को कहा। उन्होंने सबसे सुंदर हॉल दिखाया – संगमरमर का, सोने का। दीवारों पर सजावट, छत पर चित्र।
“सुंदर है, ना?” राजा ने कहा।
“हाँ। सुंदर पत्थर में है, या तुम्हारी आँख में?”
राजा फिर रुके।
“पत्थर खुद को सुंदर नहीं कहता। पत्थर तो पत्थर है। सुंदरता जब हम उसे देखते हैं, तब बनती है।”
“तो असली सुंदर क्या है?”
“देखने वाला?”
“देखने वाला भी एक तरफ़ का है। उसके बिना सुंदर नहीं, उसके होने से सुंदर। मगर वो ख़ुद कौन है?”
राजा ने हाथ जोड़े। “हेमलेखा, तुम मुझे थका रही हो।”
“तुमने वचन दिया था।”
तीसरा पाठ: सोना और जागना
एक रात हेमलेखा ने पूछा, “तुम सोते कब हो?”
“रात को।”
“और जब गहरी नींद आती है, तब क्या होता है?”
“कुछ नहीं। बस… सोता हूँ।”
“क्या तब तुम राजा होते हो?”
“नहीं। तब कुछ नहीं।”
“क्या तब तुम पुरुष होते हो?”
“नहीं।”
“तब तुम कुछ हो?”
राजा ने सोचा। “नहीं… मगर मैं हूँ। सोता तो जो उठता है वो वही है, जो सोया था।”
“बिल्कुल। तो जो गहरी नींद में बच रहा है – वो राजा नहीं, पुरुष नहीं, कुछ नहीं। मगर है। वो तुम हो।”
राजा को कुछ हुआ। एक झलक। फिर ग़ायब।
चौथा पाठ: मृत्यु का प्रश्न
एक दिन राज्य में एक बूढ़े पुजारी की मृत्यु हुई। राजा अंतिम संस्कार में गए। चिता जल रही थी।
लौटे, हेमलेखा से कहा, “मन भारी है।”
“क्यों?”
“वो बूढ़े पुजारी मेरे बचपन के मित्र थे। अब नहीं।”
“क्या उनकी देह नहीं है?”
“उनकी देह जल गई।”
“तो जो देह नहीं है, वो भी ‘वो’ है? या ‘वो’ देह थी?”
राजा रुके।
“देह ‘वो’ नहीं थी। देह में कोई था।”
“वो कोई कहाँ गया?”
“पता नहीं। शास्त्र कहते हैं किसी और जन्म में।”
“और जब वो किसी और जन्म में होगा, तो उसे यह बूढ़े पुजारी का जीवन याद होगा?”
“शायद नहीं।”
“तो वो वही पुजारी होगा या कोई और?”
राजा फिर रुके।
“मगर अगर भीतर वही चेतना है, और बाहर सब बदल गया है – तो ‘मेरा मित्र’ था कौन? देह तो जली। यादें भी अगले जन्म में नहीं रहेंगी। तो जो रिश्ता मेरा था, वो किससे था?”
हेमलेखा ने मुस्कुराकर कहा, “तुम पास आ रहे हो।”
रात भर के चिंतन
राजा कई रातें सो नहीं पाए। प्रश्न उन्हें खाते रहते।
हेमलेखा हर दिन एक नया प्रश्न लाती।
“राजा होने की पहचान कब बनती है? जब लोग ‘महाराज’ कहते हैं? या जब तुम सोचते हो कि मैं राजा हूँ?”
“क्रोध जब आता है – कौन आता है? तुम बदल जाते हो? या तुम वही रहते हो, और क्रोध आता-जाता है?”
“दर्द कहाँ होता है? शरीर में? या उसे जानने वाले में?”
“जब तुम कोई काम करते हो, तो कौन करता है? तुम्हारा हाथ? तुम्हारा मन? या कोई जो दोनों को देख रहा है?”
हर प्रश्न पर राजा कुछ देर अटकते। फिर एक छोटी सी समझ। फिर अगला प्रश्न।
समझ का खुलना
दो साल बाद – हेमचूड़ बदल चुके थे। उन्होंने राज चलाना नहीं छोड़ा, मगर भीतर से वो उतर चुके थे।
एक दिन उन्होंने हेमलेखा से कहा, “अब समझ आया।”
“क्या?”
“मैंने देखा। हर सुख, हर सुंदरता, हर स्वाद – सब मन का खेल है। मन के बिना कुछ नहीं। और मन के पीछे एक चेतना है – वो ही असली है।”
“और तुम?”
“मैं वो चेतना हूँ। राजा नहीं। पुरुष नहीं। हेमचूड़ नहीं। बस चेतना।”
हेमलेखा ने मुस्कुराकर कहा, “अब तुमने जान लिया।”
राजा ने हाथ जोड़े।
हेमलेखा का रहस्य
“और तुम कौन हो? तुमने यह सब कैसे जाना? तुम्हारा गुरु कौन था?”
हेमलेखा कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं।
“मैं एक यात्री हूँ। मेरा रूप तुम्हारी आँखों में बना। मेरा प्यार तुम्हारी ज़रूरत में बना। मगर मेरा असली स्वरूप वही चेतना है, जो तुम्हारा भी है।”
“तुम मेरे लिए आईं?”
“हाँ। तुम तैयार थे। तुम्हारी बेचैनी ही तुम्हारा बुलावा थी। चेतना ने तुम्हारे लिए मेरा रूप रचा।”
“तो तुम मेरी पत्नी नहीं?”
“पत्नी हूँ भी, नहीं भी। पत्नी का रूप मेरा एक रूप है। दूसरा रूप तुम्हारी अपनी आत्मा है।”
राजा ने अपनी आँखें भरीं।
“मैं अब तुम्हें नहीं रोक सकता। तुम जाओगी?”
“नहीं। मैं तब तक यहाँ रहूँगी जब तक तुम चाहोगे। मगर अब तुम्हें यह जान लेना ज़रूरी था कि मैं केवल मेरा रूप नहीं हूँ।”
वापसी
दोनों ने राज्य चलाते रहे। राज में हेमलेखा रानी रहीं। हेमचूड़ राजा रहे। मगर अब दोनों एक नई जगह से जीते थे।
लोगों ने पूछा, “महाराज, आप ऐसे क्यों बदले?”
हेमचूड़ हँसकर कहते, “मेरी रानी ने सिखाया।”
लोग चौंकते। “रानी? रानी ने राजा को सिखाया?”
“हाँ। और सबसे बड़ी सीख – कि शिक्षा कहाँ से आती है, मायने नहीं रखता। शिक्षा को सुनो जब वो आए।”
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, कभी-कभी प्रेम ही गुरु बनकर आता है। हेमलेखा का रूप राजा के लिए दीक्षा थी। प्रेम को भगाओ मत। उसे ध्यान से देखो। शायद वो तुम्हें कहीं ले जाने आया है।
“और एक बात – असली गुरु प्रश्न देता है, उत्तर नहीं। हेमलेखा ने हेमचूड़ को कोई शास्त्र नहीं पढ़ाया। बस छोटे-छोटे प्रश्न दिए। फल का स्वाद, महल की सुंदरता, नींद की ख़ालीपन। हर प्रश्न एक चाबी थी। राजा ने एक के बाद एक दरवाज़े खोले।”
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