कथा · 18
दशूर: वृक्ष पर तपस्वी
अनाथ ब्राह्मण-बालक एक पेड़ पर चढ़ गया। वहीं बैठा रहा। फिर उसके मन में एक बेटा पैदा हो गया, और बेटे ने एक पूरा जीवन जिया।
दशूर बहुत छोटे में अनाथ हो गए थे। पिता गए, माँ गई। कोई रिश्तेदार नहीं। बस एक छोटी सी कुटिया, और थोड़े पुराने ग्रंथ।
उन्होंने सोचा – “अकेला हूँ। तो क्या? तप करूँगा।” मगर ज़मीन पर बैठने में मन भागता था। उन्होंने एक तरकीब सोची।
उनकी कुटिया के पास एक ऊँचा पेड़ था। उन्होंने पेड़ पर चढ़ने का फ़ैसला किया। ऊपर एक मोटी डाल पर बैठ गए। ज़मीन से बहुत ऊपर। न आदमी आते थे, न जानवर। बस हवा।
दशूर वहीं बैठ गए। आँखें मूँद लीं।
दिन-रात बीते। वो पत्ते खाते थे। बारिश का पानी पीते थे। ज़्यादातर ध्यान करते थे।
एक दिन ध्यान में अजीब हुआ। उनके मन में एक छवि बनी। एक बच्चा – उन्हीं का बेटा। नाम भी आया – समुद्र।
दशूर ने पहले सोचा, “यह भ्रम है।” मगर बच्चा हटा नहीं। बल्कि बढ़ता गया।
उन्होंने बच्चे को देखा – खेलते हुए, बढ़ते हुए। उसके लिए माँ कौन थी, यह उनके मन में नहीं था। बस बेटा था।
फिर कुछ और हुआ। दशूर की चेतना बेटे में चली गई। अब वो दशूर नहीं थे। वो समुद्र थे। एक नौजवान। ज़मीन पर खड़ा। पेड़ पर बैठा बूढ़ा कोई और था।
समुद्र बढ़ा। शादी की। बच्चे हुए। एक राज्य की सेवा की। यह सब उनके अपने जीवन जैसा सच था।
एक दिन समुद्र ने सुना – “वन में एक तपस्वी है। एक पेड़ पर बैठा है। बहुत समय से।”
समुद्र को कुछ हुआ। एक हलचल। उसने सोचा, “मुझे उसे देखना चाहिए।”
वो वन गया। पेड़ ढूँढा। मिला। पेड़ पर एक बूढ़ा बैठा था। दाढ़ी सफ़ेद, आँखें मूँदीं।
समुद्र पेड़ पर चढ़ा। ऊँची डाल पर बूढ़े के पास बैठा।
“महाराज?”
बूढ़े ने आँखें खोलीं। उनकी आँखों में कुछ अजीब दिखा।
“बेटे, तुम कौन हो?”
“मेरा नाम समुद्र है।”
बूढ़े ने हँसा। “और मेरा नाम दशूर। मगर हम दो नहीं हैं। तुम मेरा एक सपना हो। और मैं तुम्हारा एक सपना हूँ।”
समुद्र चौंका। “आप क्या कह रहे हैं?”
“देखो। मैं यहाँ बैठा हूँ। मैंने तुम्हें अपने मन में बनाया। तुम्हारा सब जीवन – माँ, पिता, पत्नी, बच्चे – मेरे मन में बना। मगर तुम्हारे लिए वो असली था।”
“मगर मैं तो असली हूँ।”
“हाँ हो। मन की रचनाएँ अपने स्तर पर असली होती हैं। मगर मेरे स्तर पर – तुम मेरे विचार हो।”
समुद्र चुप।
“और मैं?” बूढ़े ने ख़ुद से पूछा। “मैं भी किसी का विचार हो सकता हूँ। शायद ब्रह्मा का। शायद किसी और दशूर का।”
दोनों चुप बैठे रहे।
फिर समुद्र की चेतना बूढ़े में लौटी। दशूर अकेले रह गए। पेड़ पर। समुद्र अब कहीं नहीं था। सिर्फ़ एक स्मृति बची थी।
दशूर पेड़ से उतरे। बहुत वर्षों के बाद। पाँव काँपे। ज़मीन फिर से छुई।
उन्होंने वन छोड़ा। एक छोटे से गाँव में बस गए। न तपस्वी रहे, न गृहस्थ। बस एक देखने वाले।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, मन एक डाल पर बैठा एक पूरा जीवन रच सकता है। तुम जिसे जीवन कहते हो, क्या पता वो किसी की डाल पर बैठा सपना हो।”
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