कथा · 16
दाशूर और कदम्ब-वृक्ष: संकल्प का नगर
मगध के दाशूर ने शुद्ध स्थान की कठोर खोज में कदम्ब की सबसे ऊँची शाखा पर निवास माँगा। दस वर्षों के मानसिक यज्ञों से उनका अन्तःकरण निर्मल हुआ। बहुत समय बाद वनदेवी अपने बारह वर्ष के पुत्र को ब्रह्मविद्या के लिए उनके पास लाई। राजा खोत्थ के रूपक में दाशूर ने समझाया कि संकल्प देह, जगत, अहंकार और दुःख की पूरी व्यवस्था कैसे रचता है।
मगध का पर्वत और शरलोमा का पुत्र
श्रीराम ने वसिष्ठ से उस आख्यायिका को विस्तार से सुनाने की प्रार्थना की जिसमें जगत को कल्पना से रचा हुआ कहा गया था। वसिष्ठ बोले, “राम, मगध नाम का एक समृद्ध देश था। उसकी ग्राम-सीमाओं तक धान के खेत फैले थे। नदियों के किनारे कमल और उत्पल खिले रहते, नगरों के उपवनों में गीत सुनाई देते और एक पर्वतीय प्रदेश कनेर, केले की झाड़ियों तथा कदम्ब-वृक्षों से आच्छादित था। उसी पर्वत पर दाशूर नाम के महातपस्वी मुनि रहते थे।”
दाशूर के पिता शरलोमा थे। तप और ज्ञान में उनका स्थान ऐसा था कि उनकी तुलना दूसरे ब्रह्मा से की जाती थी। दाशूर उनकी एकमात्र सन्तान थे, जैसे बृहस्पति के पुत्र कच। उनकी माता पहले ही जीवन से अनुपस्थित हो चुकी थीं। पिता ने पुत्र के साथ वन में पूरी आयु बिताई। समय आने पर उन्होंने शरीर छोड़ा और स्वर्ग चले गए। माता-पिता दोनों से वियोग ने दाशूर को उस वन में अकेला कर दिया।
पिता के वियोग ने युवक को तोड़ दिया। वह वन में अकेला बैठा करुण विलाप करता रहा। उसके लाल पड़े नेत्रों और म्लान मुख को देखकर एक वनदेवता ने अदृश्य रहकर कहा, “ऋषिपुत्र, सृष्टि का व्यवहार ऐसा ही है। जो उत्पन्न हुआ है, वह कुछ समय ठहरकर विनष्ट होता है। ब्रह्मा से लेकर साधारण प्राणी तक इस क्रम से बाहर नहीं हैं। अपने पिता के लिए शोक करते हुए उस नियम को मत भूलिए जिसे आप जानते हैं।”
आकाश से आए इन शब्दों ने दाशूर को सम्भाला। उन्होंने पिता का और्ध्वदैहिक संस्कार विधिपूर्वक पूरा किया और तप के लिए दृढ़ हुए। उनके भीतर अभी शुद्धि और अशुद्धि के विधान का आग्रह बहुत प्रबल था। धरती वस्तुतः पवित्र थी, फिर भी हर स्थान में उन्हें किसी स्पर्श, किसी प्राणी अथवा किसी कर्म से अशुद्धि की आशंका दिखती। बैठने को कोई भूमि स्वीकार्य न लगी। अन्ततः उन्होंने सोचा कि वृक्ष की चोटी पर पक्षियों की तरह रहा जाए, जहाँ पृथ्वी के व्यवहार का संसर्ग कम हो।
अग्नि का वर और कदम्ब की चोटी
वृक्षों के ऊपर निवास पाने के लिए दाशूर ने अग्नि प्रज्वलित की। संकल्प इतना कठोर था कि वह अपने कन्धों से मांस नोचकर आहुति देने लगे। अग्निदेव ने विचार किया कि ब्राह्मण के शरीर को भस्म होने देना उचित नहीं। वह प्रकाशमान रूप में सामने आए और बोले, “कुमार, आपके हृदय में जो अभीष्ट वर पहले से स्थित है, उसे कहिए।”
दाशूर ने अर्घ्य और पुष्प से उनकी पूजा की। फिर निवेदन किया, “पृथ्वी प्राणियों से भरी है और मेरी दृष्टि को कोई प्रदेश पूर्णतः पवित्र नहीं जान पड़ता। मुझे वृक्षों के ऊपर रहने की सामर्थ्य दीजिए।” अग्निदेव ने वर स्वीकार किया और अन्तर्धान हो गए।
दाशूर ने वन के मध्य उस असाधारण कदम्ब को देखा। उसकी शाखाएँ धरती और आकाश के बीच विशाल वितान की तरह फैली थीं। कोटरों में पक्षी बसे थे, मंजरियों पर भ्रमर गूँजते थे और हरे पत्तों के बीच पराग से पीले तथा लाल फूल मेघ में चमकते रंगों-से लगते थे। कहीं शाखाएँ सिद्धों के आकाशमार्ग को छूती प्रतीत होतीं, कहीं पल्लव हवा में दिशाओं के मुख सहलाते थे।
वह ऊपर चढ़ते गए और सबसे ऊँचे पत्ते पर आसन लगाया। चारों दिशाएँ उस ऊँचाई से उनके सामने खुलीं और वृक्ष का विस्तार स्वयं एक जगत जैसा दिखाई दिया। दाशूर ने वहीं रहकर अपना अभ्यास आरम्भ किया और कदम्बदाशूर कहलाए।

उस समय उनके भीतर कर्मफल की अभिलाषा शेष थी और परमार्थज्ञान स्थिर नहीं हुआ था। बाहरी वेदी और सामग्री के बिना उन्होंने सारे यज्ञ मन में सम्पन्न करने शुरू किए। दस वर्षों तक गोमेध, नरमेध और अश्वमेध जैसे विशाल यज्ञ, देवताओं की पूजा और प्रचुर दक्षिणा, सब उनके मानसिक विधान में पूरे हुए। प्रत्येक क्रिया का क्रम, प्रत्येक मन्त्र और प्रत्येक अर्पण चित्त में रचा जाता।
इस दीर्घ अभ्यास से राग और दोष शान्त हुए। अन्तःकरण की निर्मलता ने पूर्वजन्म में किए शास्त्रश्रवण के संस्कार जगा दिए। ज्ञान उदित हुआ, अज्ञान का आवरण छिन्न हुआ और वासनाओं की पकड़ हट गई। दाशूर जिस पवित्रता को पहले किसी बाहरी स्थान में खोजते थे, उसका आधार अब उनके अपने स्पष्ट चित्त में था।
चैत्र की त्रयोदशी और वनदेवी की याचना
एक दिन कदम्ब की निकटवर्ती शाखा पर उन्हें फूलों से सजी एक तेजस्विनी स्त्री दिखाई दी। दाशूर ने आदर से पूछा, “देवि, आप कौन हैं? फूलों से ढकी इस शाखा पर किस प्रयोजन से आई हैं?”
उसने उत्तर दिया, “भगवन्, मैं इस वन की वनदेवी हूँ और लताओं के बीच मेरा निवास है। चैत्र शुक्लपक्ष की त्रयोदशी को इन्द्र के नन्दनवन में उत्सव था। तीनों लोकों की वनदेवियाँ वहाँ गान, वादन, नृत्य और भोज के लिए एकत्र हुई थीं। सब अपनी सन्तान के साथ आईं। मुझे अकेले और पुत्रहीन देखकर मन में गहरा दुःख हुआ। महात्मा की शरण में आई याचिका को फल मिलता है, इसी विश्वास से आपके पास पहुँची हूँ। मुझे पुत्र का वर दीजिए। मेरी प्रार्थना निष्फल हुई तो यह देह अग्नि को अर्पित कर दूँगी।”

दाशूर ने एक पुष्प उसके हाथ में रखा और कहा, “देवि, जैसे शाखा पर फूल उत्पन्न होता है, वैसे ही एक मास के भीतर तुम्हें सुन्दर और पूजनीय पुत्र मिलेगा। तुम प्राण त्यागने का संकल्प लेकर मेरे पास आई हो, इसलिए वह तत्त्वज्ञानी होगा और अन्य वनदेवियों के पुत्रों की तरह भोगों में आसक्त नहीं रहेगा।” वनदेवी सेवा करना चाहती थी। दाशूर ने उसे स्नेह से विदा कर घर लौटने को कहा।
बहुत समय बीता। एक दिन वही वनदेवी अपने बारह वर्ष के पुत्र को साथ लेकर फिर आई। उसने मुनि को प्रणाम किया और बालक को सामने बैठाकर कहा, “भगवन्, हम दोनों का यह पुत्र बहुत सुन्दर है। मैंने इसे सभी कलाओं में दक्ष कर दिया है। संसार के बन्धन से छुड़ाने वाली ब्रह्मविद्या अभी इसे प्राप्त नहीं हुई। कृपा करके इसका उपदेश आप दीजिए। ऐसा कौन पिता होगा जो अपने पुत्र को दुःखदायी अज्ञान में रहने दे?”
दाशूर ने बालक को अपने पास रख लिया। वह अनुशासित शिष्य की तरह पिता-गुरु की सेवा में रहा। सैकड़ों आख्यायिकाओं और दृष्टान्तों, महाभारत जैसे इतिहासों, वेद तथा वेदान्त के निरूपण से दाशूर ने उसकी बुद्धि को क्रमशः तैयार किया। प्रत्येक कथा उसके लिए अनुभव को जाँचने और सूत्रों का अर्थ खोलने का साधन बनी।
आकाश में राजा खोत्थ का नगर
उन्हीं दिनों वसिष्ठ आकाशमार्ग से कैलास की मन्दाकिनी में स्नान के लिए जा रहे थे। रात होने पर वह कदम्ब के पास पहुँचे। शाखाओं के खोखलों और पत्तों के बीच से उन्हें दाशूर का गम्भीर स्वर सुनाई दिया। मुनि अपने पुत्र से कह रहे थे, “महात्मन्, इस संसार की उपमा समझने के लिए राजा खोत्थ की आश्चर्यमयी आख्यायिका सुनो।”
खोत्थ तीनों लोकों पर आक्रमण करने में समर्थ महापराक्रमी राजा था। ब्रह्मा, विष्णु और दूसरे देवता भी उसकी आज्ञा का मान रखते थे। अस्त्र, अग्नि और विशाल शक्ति उसे रोक नहीं पाती थी। उसके उत्तम, मध्यम और अधम, तीन शरीर थे। सात्त्विक, राजस और तामस प्रवृत्तियाँ उन्हीं के भीतर अपना-अपना व्यवहार करतीं।
वह राजा आकाश में उत्पन्न हुआ, आकाश में रहा और वहीं उसने ब्रह्माण्ड जैसा नगर रचा। चौदह भुवन उसके विशाल रथ-समूह थे और चौदह विद्याएँ उसके मार्ग। तीन लोक और तीन वेद नगर के तीन प्रकार के विभाग बने। मेरु जैसे पर्वत उसके क्रीड़ा-स्थल थे। सात समुद्र सात बावड़ियों के रूप में फैले थे। चन्द्रमा और सूर्य उसके दो अक्षय दीप थे, एक शीतल और दूसरा उष्ण।
उस नगर में राजा ने अनेक देह-गृह बनाए। कुछ ऊपर के प्रदेशों में थे, कुछ मध्य में और कुछ नीचे। किसी की अवधि छोटी थी, किसी की लम्बी। प्रत्येक घर में नौ द्वार थे और प्राणवायु भीतर-बाहर चलती थी। कान, आँख, नासिका और दूसरे अवयव उसकी खिड़कियाँ थे। पाँच इन्द्रियाँ भीतर जलते पाँच दीप। दो जाँघें और रीढ़ तीन स्तम्भ। सफेद हड्डियाँ बाँसों की तरह आधार देतीं, त्वचा मिट्टी के लेप जैसी उन्हें ढकती और दोनों भुजाएँ चौड़े मार्गों का रूप लेतीं।
इन देह-गृहों के स्वामी और रक्षक अहंकाररूपी महायक्ष थे। आत्मविवेक का प्रकाश उन्हें भयभीत करता था, क्योंकि उसके आते ही उनकी स्वतन्त्र सत्ता मिट जाती। खोत्थ उन्हीं अहंकारों के साथ शरीरों में प्रवेश करता, व्यवहार करता और फिर निकल जाता। कभी वह स्वप्न का नया नगर रच लेता। कभी पुराने निवास को छोड़कर भावी नगर की कल्पना करता और उसी में पहुँच जाता।
कभी राजा विलाप करता, “मैं अज्ञानी हूँ, दुःखी हूँ, अब क्या करूँ?” कभी सुख के उन्माद में भर जाता। जाग्रत और स्वप्न में वह निरन्तर दिखाई देता था। सुषुप्ति, प्रलय, समाधि और मुक्ति में उसकी प्रतीति नहीं रहती। उसकी गति समुद्र में उठती और उसी में बैठती तरंग की तरह अपने ही आधार से चलती थी।
रूपक का अर्थ और तीन शरीरों की गति
पुत्र ने पूछा, “तात, ऐसा राजा कौन है? आकाश में नगर बनना, फिर उसका नष्ट होकर किसी दूसरे नगर में बदल जाना कैसे सम्भव है?”
दाशूर ने कहा, “पुत्र, खोत्थ संकल्पात्मा जीव है। परमाकाश में उठे संकल्प से उसकी उत्पत्ति दिखाई देती है। संकल्प के साथ विश्व प्रकट होता है और उसके शान्त होने पर उसी की प्रतीति समाप्त हो जाती है। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और रुद्र तक इस व्यापक कल्पना के अंग कहे गए हैं। नगर ब्रह्माण्ड भी है और प्रत्येक जीव का देह-गृह भी।”
उन्होंने नगर के चिह्न एक-एक करके खोले। चौदह भुवन, सात समुद्र, सूर्य और चन्द्र, इन्द्रियाँ, नौ द्वार, अस्थि, त्वचा और प्राण, सब अनुभव की उसी व्यवस्थित रचना को सूचित करते थे। अहंकाररूपी यक्ष देह को अपना मानकर उसकी रखवाली करते हैं। आत्मा का प्रत्यक्ष विवेक आते ही उनके स्वामित्व का भ्रम टिकता नहीं।
तीन शरीर गुणों की तीन दिशाएँ खोलते हैं। सात्त्विक संकल्प देवत्व और हिरण्यगर्भ के समीप ले जाता है तथा मुक्ति की योग्यता बढ़ाता है। राजस संकल्प मनुष्य-जीवन के कर्म, परिवार और संसार में प्रवृत्त रखता है। तामस संकल्प अधोगति और घोर अज्ञान की अवस्थाओं में पहुँचाता है। जीव अपनी वासना के अनुसार इन्हीं घरों में आता-जाता है।
दाशूर ने साधन का क्रम भी रखा। बाहरी दृष्टियों का त्याग, मन से मन का संयम, साधनचतुष्टय, श्रवण, मनन और निदिध्यासन से संकल्प शान्त होता है। चित्त अपनी कल्पित पृथकता छोड़कर सजग ब्रह्मस्वरूप में विश्राम पाता है।
संकल्प का अंकुर कैसे बढ़ता है
पुत्र ने अगला प्रश्न किया, “तात, यह संकल्प उत्पन्न कैसे होता है, बढ़ता किससे है और नष्ट कैसे होता है?”
दाशूर बोले, “अनन्त सत्तामात्र आत्मा जब विषयों की ओर उन्मुख होती है, वहीं संकल्परूपी वृक्ष का सूक्ष्म अंकुर दिखाई देता है। चेतना विषय को अपने से अलग मानने लगती है। ज्ञाता और ज्ञेय का भेद उसके लिए आहार बनता है। मूल अंकुर से शाखाएँ निकलती हैं और एक संकल्प दूसरे संकल्प को जन्म देता है। इस बढ़त का फल दुःख होता है।”
उन्होंने काकतालीय न्याय का उदाहरण दिया। कौआ ताड़ पर बैठे और उसी क्षण फल गिर पड़े, तो साथ घटी दोनों घटनाओं में मन तुरन्त कारण और परिणाम का सम्बन्ध मान लेता है। जगत की कई धारणाएँ ऐसे ही संयोग से स्थिर होती हैं। मृगतृष्णा में जल और नेत्रदोष में दो चन्द्रमा दिखाई देते हैं। दिखाई देना किसी वस्तु की स्वतन्त्र सत्यता का पर्याप्त प्रमाण नहीं बनता।
पूर्व में अनुभव किए सुख और दुःख का बार-बार स्मरण संकल्प को फिर पोषण देता है। उनकी भावना को न दोहराने से उसका नाश आरम्भ होता है। दाशूर ने कहा, “कोमल फूल मसलने में भी उँगलियों की चेष्टा लगती है। संकल्प को आहार देना बन्द करने में उससे भी कम यत्न है। आधे निमेष में वह दुर्बल पड़ सकता है।”
मन को समझने और उसके आग्रह को उखाड़ने के लिए उसी मन की विवेकशक्ति काम आती है। विषय दिखाई पड़े तो उसके प्रति संचित आसक्ति और स्मृति को जाँचिए। बाहरी वस्तु का संसर्ग सूखे तिनके में चिनगारी की तरह संकल्प को भड़का देता है। दर्शन और स्मरण का आग्रह घटने पर उसकी ज्वाला सिमटती है। विचार से जगत की असन्मयता, अर्थात उसकी स्वतन्त्र स्थायी सत्ता का अभाव, स्पष्ट होता है।
इस शिक्षा में मन, जीव, चित्त और वासनायुक्त बुद्धि संकल्प के विभिन्न पक्षों के लिए प्रयुक्त नाम हैं। आत्मा अपने स्वरूप में पूर्ण है। संकल्प शान्त होने पर दुःख का आधार शान्त होता है और आत्मस्वरूप में निरतिशय आनन्द की उपलब्धि होती है।
कदम्ब पर एक रात
वसिष्ठ ने पिता और पुत्र का यह संवाद सुना और आकाश से कदम्ब पर उतर आए। दाशूर ने आसन देकर उनका स्वागत किया तथा अर्घ्य, फल, पत्र और पुष्प से पूजा की। इसके बाद दोनों मुनियों ने बालक की समझ दृढ़ करने वाली ब्रह्मचर्चा को आगे बढ़ाया। दाशूर स्वयं पहले से तत्त्वज्ञान में स्थित थे।
रात भर वसिष्ठ उस अद्भुत वृक्ष को भी देखते रहे। उसकी शाखाओं में पक्षियों के बसेरे थे, पुष्पों पर भ्रमर मँडरा रहे थे और लताओं के मण्डपों में वनदेवियों की उपस्थिति का आभास था। मुनियों की कथाएँ चलती रहीं। पुत्र को परमज्ञान का बोध फिर कराया गया। संवाद में बीती वह लम्बी रात उन्हें एक मुहूर्त जैसी लगी।
भोर में तारामण्डल फीका पड़ा। दाशूर और उनका पुत्र वसिष्ठ को विदा करने वृक्ष के आकाशभाग तक साथ आए। वसिष्ठ ने दोनों को उनके निवास की ओर लौटाया, आकाशगंगा गए और वहाँ से सप्तर्षियों के मध्य अपने स्थान पर पहुँचे। दाशूरोपाख्यान इसी विदाई पर समाप्त होता है।