कथा · 14
राजा बलि का बोध
तीन कदम ज़मीन माँगी थी एक छोटे ब्राह्मण ने। दो कदम में पूरा ब्रह्मांड नाप लिया। तीसरा कदम कहाँ रखा? और उससे क्या हुआ – यह कथा गहरी है।
राजा बलि असुरकुल में पैदा हुए थे। प्रह्लाद के पोते। मगर बहुत न्यायी। प्रजा खुश थी उनके राज में। यज्ञ-दान भी ख़ूब करते थे।
उनकी दानशीलता का यह आलम था कि कोई कुछ भी माँगे, वो ना नहीं करते। एक बार एक भिखारी आया, बलि ने उसे एक बोरी अनाज दे दिया। एक बार एक ब्राह्मण आया, बलि ने उसे गाय भेंट की। एक बार एक राजा आया – बलि ने उसे अपनी एक हथेली का सोने का कंगन उतारकर दे दिया।
उनके गुरु शुक्राचार्य कहते थे, “महाराज, इतना दान? कुछ संभल कर।”
बलि हँसते। “गुरुदेव, जो आता है, उसे ख़ाली हाथ मैं नहीं भेज सकता।”
अहंकार
मगर एक चीज़ थी जो बलि के साथ थी – दानी होने का गर्व। उन्हें पता था कि वो दानी हैं। दूसरों से उन्हें वो बात कहलवाना भी अच्छा लगता।
एक रात उन्होंने सोचा, “अगर मैं इतना दानी हूँ, तो शायद देवताओं से बड़ा। इंद्र मुझसे ज़्यादा दानी कहाँ?”
उन्होंने एक अश्वमेध-जैसा बड़ा यज्ञ करवाने की ठानी। यज्ञ की ख़बर तीनों लोकों में फैली। देवता घबराए – बलि अगर यह यज्ञ पूरा कर लेंगे, तो स्वर्ग का राज भी ले लेंगे।
वामन का आगमन
विष्णु ने यह देखा। उन्होंने तय किया – बलि के अहंकार को कम करना है। मगर बलि बुरे नहीं हैं। उन्हें मारना नहीं, जगाना है।
उन्होंने वामन का अवतार लिया। एक छोटे, बौने ब्राह्मण-बालक का रूप। हाथ में एक छाता, एक कमंडल। पैरों में एक छोटी सी पादुका। चेहरे पर एक मासूम सी मुस्कान।
यज्ञ के दिन वामन बलि के दरबार में पहुँचे।
“महाराज, मुझे थोड़ी ज़मीन चाहिए।”
बलि ने मुस्कुराया। “बेटे, माँगो जो चाहिए। तुम्हें इनकार नहीं होगा।”
वामन ने कहा, “बस तीन कदम भर ज़मीन।”
दरबार में सब हँसे। तीन कदम? इतना छोटा बच्चा क्या नापेगा? बलि ने भी हँसकर कहा, “तथास्तु।”
तभी शुक्राचार्य ने हस्तक्षेप किया।
गुरु की चेतावनी
“महाराज, ज़रा रुकिए।”
बलि ने मुड़कर देखा। “गुरुदेव, क्या हुआ?”
शुक्राचार्य ने योग-दृष्टि से वामन को देखा था। उन्होंने पहचान लिया था कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं।
“महाराज, यह बच्चा साधारण नहीं है। यह स्वयं विष्णु हैं। आप अगर तीन कदम का वचन देंगे, तो आप का सर्वस्व चला जाएगा।”
बलि चुप हुए। पल भर के लिए सोचा। फिर बोले, “गुरुदेव, मगर मैं वचन दे चुका हूँ।”
“वचन तोड़ दो। यह विशेष परिस्थिति है।”
“नहीं। मेरा कुल वचन के लिए जाना जाता है। मेरे पूर्वज प्रह्लाद ने अपनी देह दे दी थी, मगर हरि का नाम नहीं छोड़ा। अगर वचन की कीमत मेरा सर्वस्व है, तो ठीक है।”
शुक्राचार्य ने और कोशिश की। उन्होंने अपनी सिद्धियों से एक छोटी सी चीज़ की – कमंडल के मुँह में एक तिनका डाल दिया, जिससे जल का अभिषेक करने में रुकावट हो। (अभिषेक के बाद ही वचन फलता है।)
मगर वामन इतने सूक्ष्म रूप से छोटे हो गए कि अपने हाथ की उंगली से तिनका हटा दिया। बलि ने जल अभिषेक किया।
“वामन, ज़मीन तुम्हारी।”
तीन कदम
तभी वामन ने पाँव बढ़ाया।
और बढ़ता गया।
बच्चा बड़ा होने लगा। पहले युवक हो गया। फिर पुरुष। फिर विशाल।
उसकी देह आसमान को छूने लगी। फिर उसके पार। फिर ब्रह्मांडीय।
एक कदम में पृथ्वी समा गई। ज़मीन के सब महाद्वीप, सब सागर, सब पहाड़। कुछ भी नहीं बचा।
दूसरे कदम में आकाश और स्वर्ग। चाँद, सूरज, तारे। इंद्र की राजधानी अमरावती। नंदन वन। सब कुछ।
तीसरा कदम कहाँ रखें?
विष्णु – क्योंकि वामन वो ही थे – बलि की ओर मुड़े। बहुत बड़े होकर भी उनकी आँखें कोमल थीं।
“राजन, तीसरा कहाँ?”
बलि ने एक पल सोचा। उन्होंने अपने इर्द-गिर्द देखा। अब तो उनके राज्य का कुछ नहीं बचा था। अब सिर्फ़ वो बचे थे, और उनकी देह।
उन्होंने सिर झुकाया।
“मेरे सर पर रखिए, प्रभु। मेरे पास और कुछ नहीं बचा।”
पाताल में
विष्णु ने अपना पाँव बलि के सर पर रखा। दबाव से बलि पाताल लोक में चले गए।
पाताल। अंधेरा। ऊपर पैर, नीचे राख।
बलि बैठ गए वहाँ। पहले कुछ देर रोए। उनके सब साथी, सब रिश्तेदार, सब प्रजा – कोई पास नहीं था। बस वो थे और पाताल का अंधकार।
फिर एक हफ़्ता बीता। फिर एक महीना। फिर एक साल।
बलि ने सोचना शुरू किया।
“मेरे पास सब था। राज्य, धन, सेना, यश। सब चला गया। मगर मैं अभी भी हूँ। क्यों?”
“मैंने सोचा था कि मैं राजा हूँ। मगर अब राज्य नहीं। मैं अभी भी हूँ। तो मैं राजा नहीं था।”
“मैंने सोचा था कि मैं धनवान हूँ। धन गया। मैं अभी भी हूँ। तो मैं धनवान भी नहीं था।”
“मैंने सोचा था कि मैं असुर हूँ। पाताल में यह असुर रूप गिर रहा है। फिर भी मैं हूँ। तो मैं असुर भी नहीं हूँ।”
“फिर मैं क्या हूँ?”
उन्होंने भीतर देखा।
एक चेतना मिली। जो शरीर से, नाम से, सम्मान से, धन से, सब से अलग थी। वो बलि नहीं थी। वो किसी की नहीं थी। बस थी।
उसकी पहचान में बलि के भीतर कुछ खुल गया।
वो हँसने लगे। पाताल लोक में अकेले। अकेले हँस रहे थे।
विष्णु की वापसी
विष्णु तभी प्रकट हुए। बलि ने पाँव छुए।
“प्रभु, धन्यवाद।”
विष्णु हैरान। उन्होंने सोचा था बलि नाराज़ होंगे। वो सीधे मिले हैं, मगर बलि का स्वर अलग है।
“धन्यवाद किसका? मैंने तुम्हें पाताल भेजा।”
“पाताल मेरा गुरु बना। आपने मुझे जगा दिया। राजा रह जाता तो ज़िंदगी ख़ाली रह जाती।”
विष्णु ने पास बैठे। बलि के सर पर हाथ रखा।
“बेटा, तू ने अपने अहंकार को पहचान लिया। अब तू मुक्त है।”
“प्रभु, अहंकार ही तो था। मुझे लगता था मैं दानी हूँ, मगर असली दानी तो वो है जिसके पास कुछ नहीं हो। मेरे पास सब था, उससे दान देना – वो दान कहाँ था? वो तो सजावट थी।”
विष्णु मुस्कुराए।
“बेटा, तू असली दानी अब बनेगा। अब तेरे पास कुछ नहीं। अब तू जो भी देगा, वो असली दान होगा।”
“मगर मेरे पास तो कुछ नहीं।”
“तेरे पास तेरी चेतना है। उससे ही दान कर। मनुष्यों को शांति दे, ज्ञान दे, अनुग्रह दे। यह दान सबसे बड़े होते हैं।”
पाताल का राजा
विष्णु ने बलि को पाताल का राजा बना दिया। बलि वहाँ बैठे रहे, मगर अब बंधन में नहीं। अब वो सिंहासन पर थे, मगर सिंहासन का बोझ नहीं उठाते थे।
हर युग में जब देवता मद से चूर होते, तो बलि की कथा कही जाती। याद दिलाने के लिए कि गर्व सबसे बड़ा शत्रु है।
एक बात और हुई। बलि ने पाताल में रहकर हज़ारों भक्तों को अनुग्रह दिया। जो भी सच्चा भक्त उन्हें पुकारता, बलि उसे प्रकट होकर मार्ग बताते। पुराण कहते हैं कि बलि ही “महाबलि” बने – दिव्य भक्तों के संरक्षक।
और जब अगला युग आता है – कलियुग के अंत में – तो बलि स्वयं पृथ्वी पर लौटेंगे, इंद्र बनकर। यह वर विष्णु ने उन्हें दिया।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, कभी-कभी हानि असली लाभ होती है। और दबना ही उठना होता है। बलि की कथा यही सिखाती है।
“और एक बात गहरी है – दान देने वाला जब तक ‘मैं दे रहा हूँ’ सोचता है, वो दान नहीं। दान वो है जब देने वाला और लेने वाला, दोनों एक ही चेतना के दो रूप दिखें। बलि ने पाताल में यह जाना। वहीं से असली दानी बने।”
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