कथा · 12
राजा बलि: मन के मन्त्री से आत्मबोध तक
दस करोड़ वर्ष तक तीनों लोकों का राज्य करने के बाद बलि को बार-बार लौटते भोगों में कोई नवीनता दिखाई न दी। मेरु पर्वत के रत्नमय झरोखे में बैठे उन्हें पिता विरोचन का पुराना उपदेश याद आया। मन रूपी मन्त्री पर विजय, शुक्राचार्य का संक्षिप्त उत्तर और एक हजार दिव्य वर्ष की समाधि ने उनके लिए शासन और आत्मविश्रान्ति का सम्बन्ध बदल दिया।
पाताल का उजास और दस करोड़ वर्षों का राज्य
वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा, “बलि का उत्तम वृत्तान्त सुनिए। कभी-कभी विवेक का एक स्पष्ट क्षण दीर्घ अभ्यास के लिए द्वार खोल देता है। बलि के जीवन में ऐसा ही हुआ।”
भूमि के नीचे पाताल के सात विस्तृत लोक थे। पुराने पाठ में उनका वर्णन एक ही रंग से नहीं किया गया है। कहीं रत्नों से खचित प्रासाद थे, कहीं सुगन्धित उद्यान, कहीं नागकन्याएँ और सहस्र फनों वाले सर्प। कहीं कपिल मुनि का पवित्र आश्रय था, कहीं हाटकेश्वर की उपासना होती थी। सुख के रमणीय स्थानों के निकट नरक और दुर्गन्ध के प्रदेश भी थे। पाताल का संसार समुद्र की उज्ज्वल गहराई जैसा व्यापक था, अपनी सम्पदा और अपनी कठोरताओं सहित।
उसी पाताल में विरोचन के पुत्र बलि दानवों के राजा थे। उन्होंने देवताओं, विद्याधरों और किन्नरों को जीतकर तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित किया था। इन्द्र तक उनके प्रताप से भयभीत रहते। लोकों के अनेक रत्न उनके राजकोष में पहुँचते और असुरों की भुजाओं पर उनका विशाल राज्य टिका था। यज्ञों की आहुति से उठता धुआँ मेघ बनकर पर्वतों पर छा जाता। उनका प्रभाव ऐसा था कि दिशाएँ और कुलाचल भी उनके सामने झुके हुए प्रतीत होते।

बलि ने इस ऐश्वर्य में दस करोड़ वर्ष तक शासन किया। इस दीर्घ काल में उन्होंने अनेक युगों को बीतते देखा। देवता और दैत्य बार-बार उत्पन्न हुए, सामर्थ्य को पहुँचे और मिट गए। स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल के श्रेष्ठ समझे जाने वाले भोग भी उनके अनुभव से बाहर न रहे। विजय और भोग की कोई ऐसी वस्तु शेष न थी जिसे वे पहली बार देख रहे हों।
राज्य, सामर्थ्य और साधन बने रहने पर भी दीर्घ उपभोग ने बलि के भीतर एक सूक्ष्म थकान पैदा की। प्रत्येक सुख अपना परिचित क्रम दोहरा रहा था। दिन और रात लौटते, भोजन, शयन, संगीत, क्रीड़ा और राजवैभव फिर उसी ढंग से सामने आते। जो अनुभव आरम्भ में मधुर लगता, परिचय के बाद अपना रस खो देता और मन फिर उसी को किसी नए रूप में माँगने लगता।
बलि ने देखा कि इच्छा पूरी होने पर कुछ समय के लिए शान्त होती है, फिर दूसरे विषय की ओर बढ़ जाती है। संकल्प और विकल्प समुद्र की तरंगों की तरह उठते और मिटते हैं। उनमें व्यस्त मन प्रत्येक बार नवीनता का अनुमान करता है, जबकि अनुभव का ढाँचा पुराना ही रहता है। यह पहचान वैराग्य का आरम्भ बनी। बलि भोगों से घृणा करने नहीं लगे। उन्होंने उनके परिणाम, अवधि और बार-बार लौटती माँग को साफ देख लिया।
मेरु के झरोखे में उठी विरक्ति
एक दिन बलि मेरु पर्वत के शिखर पर बने रत्नमय भवन के ऊँचे झरोखे में अकेले बैठे। नीचे उनका साम्राज्य फैला था और सामने राज्य की पूरी व्यवस्था अपने क्रम से चल रही थी। उसी सुरक्षित ऊँचाई पर उन्होंने अपने जीवन की दिशा और राज्य तथा भोग के प्रयोजन की जाँच की। वे ऐसी उपलब्धि खोज रहे थे जिसके बाद मन को फिर किसी वस्तु की आवश्यकता न रहे।

उन्होंने अपने भीतर कहा, “तीनों लोकों का यह ऐश्वर्य बड़ा दिखाई देता है, मगर इसमें मेरे लिए अब कौन-सी अनदेखी वस्तु बची है? जो कुछ देखने योग्य था, देख चुका हूँ। जो कुछ भोगने योग्य था, उसका दीर्घ अनुभव कर चुका हूँ। धन एकत्र होता है, घटता है और फिर एकत्र किया जाता है। इच्छा उठती है, पूरी होती है और दूसरी इच्छा उसका स्थान ले लेती है। यह क्रम विश्राम कहाँ देता है?”
बलि की दृष्टि अपने पूर्व आचरण पर गई। देवताओं के साथ संघर्ष, सम्पत्ति का विस्तार और विषयों के प्रति आकर्षण कभी उन्हें पुरुषार्थ लगे थे। अब वे उन कर्मों के पीछे चलती तृष्णा को देख पा रहे थे। उन्होंने बीते कार्यों के लिए नया पश्चात्ताप पालने के स्थान पर वर्तमान विवेक को महत्त्व दिया। जो हो चुका था, उसका परिणाम सामने था। आगे की चिकित्सा अभी सम्भव थी।
उसी समय उन्हें पिता विरोचन से हुई पुरानी बातचीत याद आई। वह प्रश्न परिपक्व जिज्ञासा से उठा था। विरोचन लोकव्यवहार और आत्मतत्त्व, दोनों के ज्ञाता थे। बलि ने उनसे कहा था, “तात, वह कौन-सा पद है जहाँ दुःखों का अन्त हो, भ्रम शान्त हो जाए, मन का मोह मिटे और इच्छाएँ विश्राम पाएँ? किसकी प्राप्ति के बाद कुछ और पाना शेष नहीं रहता? वह स्थिर आनन्द बताइए जिसमें राग और द्वेष चित्त को फिर विक्षुब्ध न करें।”
विरोचन ने उत्तर में एक देश, उसके राजा और एक असाधारण मन्त्री का आख्यान सुनाया था। मेरु के झरोखे में बैठे बलि के लिए वह पुरानी शिक्षा अब स्मृति भर न रही। जीवन के पूरे अनुभव ने उन्हें उसका आशय ग्रहण करने योग्य बना दिया था।
विरोचन का देश, राजा और मन्त्री
विरोचन ने कहा था, “पुत्र, एक अत्यन्त विस्तृत देश है जिसमें हजारों त्रिलोकी समा सकती हैं। वहाँ समुद्र, पर्वत, वन, नदी, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्र, देवता, दैत्य, दिशा, प्रकाश और अन्धकार के पृथक चिह्न नहीं हैं। वहाँ एक ही राजा अपने स्वभाव में स्थित है। वह सबका आधार है, सबमें व्याप्त है और फिर भी किसी परिवर्तन से बँधा नहीं।”
बलि ने पूछा था, “वह देश कहाँ है? वह राजा कौन है? उसका मन्त्री इतना प्रबल कैसे है कि देवता, दैत्य और शस्त्र भी उसे वश में नहीं कर पाते?”
विरोचन ने उस रूपक को खोलते हुए कहा, “वह मोक्ष नाम का देश है। उसका राजा आत्मा है। उसने मन्त्री के रूप में मन का संकल्प किया है। मन स्वयं कुछ भोगता नहीं, फिर भी अनुभव के पूरे जगत का रूप बना देता है। जो उपस्थित नहीं है उसकी कल्पना कर सकता है, जो सामने है उसे दृष्टि से ओझल कर सकता है। शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि, इच्छा और संसार के भेद उसी के परिणाम में फैलते हैं।”
उस मन्त्री पर तलवार, गदा, चक्र, वज्र या युद्ध से विजय नहीं मिलती। उसने देवताओं और असुरों को भी अपने प्रभाव में रखा है। काम और क्रोध उसी के सहारे अपना बल पाते हैं। युद्धों, महत्त्वाकांक्षाओं और भय की अनेक धाराएँ उसी से निकलती हैं। बल से दबाया गया मन अवसर मिलते ही फिर किसी विषय, स्मृति या कल्पना के रूप में उठ खड़ा होता है।
विरोचन ने समझाया कि राजा का दर्शन होने पर मन्त्री की शक्ति समझ में आती है और मन्त्री के शान्त होने पर राजा का दर्शन स्पष्ट होता है। आत्मविचार और मन का संयम इसी कारण साथ चलते हैं। आत्मा को केवल एक विचार मान लेने से मन की पुरानी गति समाप्त नहीं होती। मन को दमन से रोक देने पर आत्मज्ञान प्रकट नहीं होता। विवेक, वैराग्य और अभ्यास के सहारे दोनों दिशाओं में एक साथ काम करना पड़ता है।
बलि ने पूछा, “इस मन पर विजय की युक्ति क्या है?”
विरोचन बोले, “शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में जो स्थायी तृप्ति खोजी जाती है, उसकी जाँच करो। विषय नश्वर हैं और मन उनमें अपनी अपेक्षा जोड़ता है। विषय के अनुभव को दोष न दो, उसमें स्थिर आश्रय खोजने की आदत को पहचानो। विषयों में जमी आस्था ढीली पड़ने लगे तो मन रूपी मतवाला हाथी क्रमशः संयत होता है।”
उन्होंने पुरुषार्थ पर विशेष आग्रह किया। दैव कोई अलग देहधारी सत्ता बनकर मनुष्य का अभ्यास पूरा नहीं करता। जो संकल्प बार-बार पुष्ट होता है, वह नीति और नियति की तरह व्यवहार में उतरता है। मन रहते नियम, संस्कार और फल का अनुभव रहता है। इसलिए उपलब्ध जीवन में किया गया विवेकपूर्ण प्रयत्न ही मन की दिशा बदलता है।
अभ्यास की चार घड़ियाँ
विरोचन का उपदेश अचानक सब विषय छोड़ देने का आग्रह नहीं करता। मन जिस क्रम से विषयों का अभ्यस्त हुआ है, उसी को समझते हुए विरक्ति भी क्रम से दृढ़ करनी है। अभ्यास के आरम्भ में दिन को चार भागों में बाँटने का निर्देश मिलता है। दिन के दो भाग देह और आजीविका के आवश्यक कार्यों में लगें, एक भाग शास्त्र के श्रवण और विचार में, और एक भाग गुरु की सेवा में। इस व्यवस्था में व्यवहार छूटता नहीं और विवेक को नियमित स्थान मिलता है।
जब मन कुछ विचारशील हो जाए, तब अभ्यास का अनुपात बदले। आगे दिन के दो भाग वैराग्ययुक्त शास्त्र-विचार और दो भाग ध्यान तथा गुरु-पूजन के लिए रखे जाएँ। इस प्रकार मन की अवस्था के साथ अनुशासन भी गहरा होता जाए।
विरोचन ने बलि से कहा था कि आत्मदर्शन और तृष्णा का क्षय एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं। आत्मस्वभाव की झलक विषयों पर निर्भरता घटाती है। विषयों से घटती आसक्ति आत्मस्वभाव को और साफ देखने देती है। नाव नाविक को पार ले जाती है और नाविक नाव को दिशा देता है। उसी तरह विवेक और वैराग्य एक-दूसरे को सहारा देते हैं।
आत्मविश्रान्ति का आनन्द विचार और अनुभव में परखा जाता है। तप, दान और तीर्थ जैसे साधन चित्त को तैयार करते हैं। साधु-संग, शास्त्र और गुरु का सान्निध्य मन को उपयुक्त दिशा देते हैं। निर्णय भीतर परखा जाता है। मन विषय में स्थायित्व खोजने की अपनी आदत पहचानता है और उसी अनुपात में उसका आग्रह कम होता है।
विरोचन के शब्द याद करते हुए बलि ने अपने दीर्घ जीवन को नए प्रकाश में देखा। पाताल, पृथ्वी और स्वर्ग की स्त्रियाँ, रत्न और श्रेष्ठ सम्पत्तियाँ भी काल के अधीन थीं। उन्होंने जो कुछ पाया था, वह किसी समय चला जाना था। देवताओं से द्वेष और भोगों के लिए निरन्तर प्रयत्न मन की ही चेष्टाएँ थीं। इस समझ ने उनके भीतर शीतल प्रसन्नता जगाई। अब वे गुरु से उस आत्मा के विषय में पूछना चाहते थे जो इन सब अवस्थाओं को जानता है।
शुक्राचार्य का संक्षिप्त उत्तर
बलि ने आँखें बन्द करके अपने गुरु शुक्राचार्य का ध्यान किया। उस समय शुक्राचार्य आकाश में अपने कार्य पर थे और चैतन्य के ध्यान में स्थित थे। उन्होंने शिष्य का स्मरण जाना और अपने शरीर सहित उस रत्नमय झरोखे में उपस्थित हुए जहाँ बलि बैठे थे। बलि उठे, गुरु के चरणों का पूजन किया, रत्न और पुष्पों से अर्घ्य दिया और उन्हें सम्मानपूर्वक आसन पर बैठाया।
बलि ने कहा, “आपकी कृपा से मेरे भीतर भोगों के प्रति विरक्ति स्पष्ट हुई है। अब मैं उस तत्त्व को जानना चाहता हूँ जिससे मोह का अन्त हो। इस ब्रह्माण्ड में स्थिर वस्तु कौन है? ‘यह’ और ‘मैं’ किसे कहते हैं? मैं कौन हूँ, आप कौन हैं और यह लोक क्या है?”
शुक्राचार्य ने उत्तर दिया, “राजन्, अधिक विस्तार से कहने का समय नहीं है। सप्तर्षियों से सम्बन्धित एक देवकार्य के लिए मुझे आकाश में जाना है। सब सिद्धान्तों का सार सुनिए। जो विस्तृत चेतन तत्त्व है, वही चित् है। आप चित् हैं, मैं चित् हूँ और यह लोक भी चित् है। चेतना से पृथक कोई अनुभव आपके सामने उपस्थित नहीं होता।”

उन्होंने आगे कहा, “चित् में विषयाकार कल्पना का सम्बन्ध ही बन्धन है। उस आग्रह से मुक्त चित् पूर्ण आत्मा है। यदि आपकी बुद्धि श्रद्धा और विवेक से तैयार है तो यह संक्षिप्त निश्चय पर्याप्त होगा। तैयारी न हो तो बहुत-सा कथन भी निष्फल रह जाएगा। निर्मल बुद्धि से अपने अनुभव में इसे देखिए।”
यह उपदेश छोटा था, क्योंकि बलि की भूमि पहले से तैयार थी। विरोचन की शिक्षा, दस करोड़ वर्षों का अनुभव, विषयों की पुनरावृत्ति से उत्पन्न वैराग्य और मेरु के झरोखे में किया गया आत्मपरीक्षण उन्हें उस एक वाक्य तक ले आए थे। शुक्राचार्य ने कोई नया तप, राज्यत्याग या वनवास नहीं बताया। उन्होंने यथाप्राप्त कर्तव्य छोड़ने को भी उचित नहीं कहा। शरीर रहते ज्ञानी के सामने जो कार्य आता है, वह उसे आसक्ति के बिना पूरा करता है।
शुक्राचार्य के चले जाने पर बलि ने उनके कथन की प्रत्येक दिशा से जाँच की। यदि सूर्य चेतना में जाना न जाए तो सूर्यत्व का अनुभव किसे होगा? पृथ्वी, दिशा, पर्वत, आकाश, शरीर, इन्द्रिय और मन का स्वरूप भी चेतना में ही प्रकट है। भीतर का अनुभव और बाहर का जगत उसी जानने में मिलते हैं।
बलि ने शरीर को काष्ठ और मिट्टी के ढेले जैसी जड़ वस्तु के रूप में देखा। उसका आदर और संरक्षण व्यवहार का भाग था, मगर वह स्वयं अनुभवकर्ता नहीं था। चैतन्य किसी एक शरीर की सीमा में बन्द न था। जिस देह को बलि कहा जाता है, उसके परिवर्तन से सर्वव्यापक आत्मा का कोई अंश कटता नहीं। इसी समझ में शत्रु और मित्र के लिए बनी कठोर सीमाएँ ढीली हुईं। सुख और दुःख की अनुभूति चित्त की चेतना पर निर्भर थी, जबकि चेतना स्वयं उनसे व्यापक थी।
उन्होंने चेतन, अचेतन, ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान के नामों को भी व्यवहार की संज्ञाएँ समझा। आत्मा को किसी नाम में बाँधना सम्भव न था। वह प्रकाशक था, उसके सामने जगत का विस्तार आता था और उसी में लीन होता था। बलि का चिन्तन किसी सूत्र की पुनरावृत्ति से आगे बढ़कर अपने अनुभव के प्रत्येक स्तर की परीक्षा बन गया।
एक हजार दिव्य वर्ष की समाधि
इस विचार के परिपक्व होने पर बलि ने ओंकार की अर्धमात्रा और तुरीय पद की भावना में चित्त स्थिर किया। ध्याता, ध्यान और ध्येय की पृथकता शान्त हो गई। मन की वासनाएँ और संकल्प अपने आधार में विराम पाने लगे। वे रत्नों के उस झरोखे में ऐसे निश्चल बैठे रहे जैसे वायु से रहित स्थान में दीपक की लौ और शिला पर उकेरी हुई मूर्ति।
दीर्घ काल बीतने पर मन्त्री, सामन्त, सेनापति, मित्र, बान्धव और सेवक उन्हें देखने आए। यक्ष, विद्याधर और नाग उपस्थित हुए। रम्भा, तिलोत्तमा और अन्य अप्सराएँ चँवर लेकर खड़ी थीं। नदियाँ, समुद्र और पर्वत भी मूर्त रूप में भेंट लिए आए बताए गए हैं। त्रिलोकी का राजसमाज उस ऊँचे महल में एकत्र था, मगर बलि की दृष्टि किसी बाहरी संकेत पर न उठी।
सभा में कई भाव पैदा हुए। किसी को भय हुआ कि राजा के प्राण चले गए हैं। कोई शोक में डूबा, कोई उनकी निश्चलता से चकित हुआ और कोई उस शान्ति को देखकर प्रसन्न हुआ। मन्त्रियों ने शुक्राचार्य का स्मरण किया। गुरु फिर वहाँ आए, बलि को देखा और उनकी स्थिति पहचान ली।
शुक्राचार्य ने दानवों से कहा, “राजा ने विचार के द्वारा निर्मल आत्मप्रकाश पाया है। उनका भ्रम क्षीण हो गया है और चित्त को विश्राम मिला है। उन्हें जगाने का प्रयत्न मत कीजिए। प्रारब्ध का अंकुर शेष है, इसलिए समय आने पर वे स्वयं जागेंगे और अपना राजकार्य सँभालेंगे। आप लोग व्यवस्था के अनुसार अपने कार्य करते रहें। बलि एक हजार वर्ष बाद समाधि से उठेंगे।”
सभा शान्त हुई। सब अपने-अपने स्थान लौट गए। मन्त्री राज्यव्यवस्था में लगे। देवता, नाग, पर्वत, दिशाएँ और आकाशचारी अपने क्षेत्रों को चले गए। बलि उसी समाधि में स्थित रहे। उनके अनुभव में एक हजार दिव्य वर्ष क्षण की तरह बीते।
काल पूरा होने पर देव-दुन्दुभियों और जयघोष की ध्वनि के बीच उनकी आँखें खुलीं। राजसमाज के आने से पहले उन्होंने उस शान्त पद का स्मरण किया जिसमें वे स्थित रहे थे। एक क्षण के लिए चित्त फिर उसी समाधि में उतरना चाहता था। उसी समय उन्होंने अपने निश्चय की अगली परीक्षा की। यदि आत्मा सर्वत्र है तो समाधि को ग्रहण करने और राजकार्य को त्यागने का आग्रह भी मन की एक नई पसन्द बन सकता है।
समता के साथ शासन में वापसी
बलि ने विचार किया कि बन्ध और मोक्ष की कल्पनाएँ अज्ञान की भूमि में अर्थ पाती हैं। आत्मनिश्चय स्पष्ट होने पर समाधि, ध्यान, राज्य और एकान्त में किसी को अपनी पहचान का आधार बनाना आवश्यक नहीं। वे शरीर छोड़ने की इच्छा में नहीं थे और संसार में टिके रहने की इच्छा में भी नहीं। यथाप्राप्त कर्म सामने था। उसे पूरा करने में अब बन्धन का कारण नहीं बचा था।
दैत्यों ने उन्हें घेरकर प्रणाम किया। बलि ने सबकी वन्दना स्वीकार की और राजकार्य सँभाल लिया। उन्होंने ब्राह्मणों, देवताओं और गुरु का पूर्ववत् पूजन किया। मित्रों, बान्धवों, याचकों और सेवकों को उचित मान तथा धन दिया। शासन में जिनके लिए दण्ड आवश्यक था, उन्हें दण्ड मिला। योग्य जनों की आवश्यकताएँ पूरी की गईं। बाहरी व्यवस्था पहले की तरह चली, मगर उसके भीतर बलि की दृष्टि बदल चुकी थी।
कुछ समय बाद उन्होंने शुक्राचार्य और अन्य प्रधान आचार्यों के साथ अश्वमेध यज्ञ किया। तीनों लोकों के प्राणी तृप्त किए गए और देवताओं तथा ऋषियों का पूजन हुआ। श्रीहरि यज्ञ में आए, इन्द्र के लिए तीनों लोकों को अपने पग से नापा, बलि को राजवैभव से वंचित करके बाँधा और पाताल में स्थित किया। यह आकस्मिक परिवर्तन उस बलि के सामने आया जिसका आत्मनिश्चय पहले ही दृढ़ हो चुका था।

बलि की ज्ञानप्राप्ति इस घटना से पहले हो चुकी थी। विष्णु द्वारा बाँधे जाने के बाद भी उनकी समता इसी कारण बनी रही। वे पाताल में जीवन्मुक्त होकर रहे, आपत्ति और सम्पत्ति को समान दृष्टि से देखते हुए। राज्य के दिनों में उन्होंने अपनी पूर्णता को पद से अलग पहचाना था। राज्य चले जाने पर वही आत्मनिश्चय स्थिर रहा। प्रारब्ध के क्रम में वे भावी इन्द्र होंगे और बहुत वर्षों तक जगत का शासन करेंगे। उस पद की प्रत्याशा और पूर्व ऐश्वर्य की स्मृति, दोनों उनके सन्तोष को बदल नहीं पातीं।
वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा कि बलि ने दस करोड़ वर्ष तक तीनों लोकों का राज्य किया, असंख्य सुख और दुःख आते-जाते देखे और अन्ततः विवेक से मन को शान्त किया। जिस विषय में मन बार-बार जाता है, उसे वहाँ से लौटा कर आत्मतत्त्व में स्थिर करने का अभ्यास आवश्यक है। मन संयत होने पर बाहरी परिस्थिति अपना उचित आकार रखती है। वह आत्मा का माप नहीं बनती।
बलि का बोध उन्हें शासन के बीच स्थिर करता है। वे अनुभव से वैराग्य तक पहुँचे, पिता के उपदेश को परखा, गुरु से प्रश्न किया, समाधि में स्थित हुए और फिर पूरे दायित्व के साथ सभा में लौटे। राज्य के भीतर उनका आत्मनिश्चय सुरक्षित रहा। पाताल में बँधने पर भी वही निश्चय बना रहा। यही उनके जीवन में विरोचन के राजा और मन्त्री वाले रूपक की पूर्णता है। मन ने राजा होने का दावा छोड़ा और आत्मा अपने स्वभाव में स्पष्ट हुई।