कथा · 23
आकाशज: जिसे मृत्यु छू न सकी
मेरुपर्वत के मध्य सत्यलोक में ध्याननिष्ठ आकाशज ब्राह्मण प्रजा के हित में रत थे। दीर्घ काल के बाद मृत्यु उनके घर पहुँची, समाधि की रक्षा करती प्रचण्ड अग्नि पार की और सैकड़ों हाथों से उन्हें पकड़ना चाहा। वे सामने दिखाई देते रहे, फिर भी उसकी पकड़ से परे थे। धर्मराज ने इस रहस्य को कर्म, देह और चिदाकाश के सम्बन्ध से खोला।
मेरु के मध्य सत्यलोक
श्रीवसिष्ठ ने कहा, “राघव, आकाशज विप्र का यह आख्यान सुनिए। उनके सामने मृत्यु स्वयं असमर्थ हो गई थी।”

आकाशज परम धर्मात्मा थे। उनका अधिकांश समय ध्यान में बीतता था और वे अपनी प्रजा की भलाई में लगे रहते थे। उनका जीवन बहुत लम्बा हो चुका था। मृत्यु ने उन्हें देखा तो उसके मन में प्रश्न उठा। जन्म लेने वाले प्राणी क्रम से उसके अधीन आते थे। आकाशज के सामने उसकी शक्ति वैसी कुण्ठित हो रही थी, जैसे पत्थर पर पड़कर तलवार की धार भोथरी हो जाए।
मृत्यु ने अपने परिचित कार्य को पूरा करने का निश्चय किया और मेरुपर्वत के मध्य में स्थित सत्यलोक नाम के उनके नगर में पहुँची। आकाशज के घर में प्रवेश करते ही प्रलयाग्नि जैसी ज्वाला उसकी ओर बढ़ी। यह अग्नि ब्रह्मा ने प्रकाशरूप में स्थापित की थी, ताकि समाधि के समय आने वाले विघ्न दूर रहें। मृत्यु एक के बाद दूसरी ज्वाला को चीरती हुई भीतर गई।
सामने आकाशज थे। मृत्यु ने उन्हें पकड़ने के लिए एक साथ सैकड़ों हाथ बढ़ाए। इतने हाथ भी उनके शरीर को ग्रहण न कर सके। संकल्प में रचे किसी पुरुष को कोई बलवान व्यक्ति छूना चाहे तो हाथ खाली रह जाते हैं। आकाशज भी उसी तरह सामने दिखाई देते हुए उसकी पकड़ से परे रहे।
मृत्यु धर्मराज के पास गई और बोली, “प्रभो, मैं आकाशज ब्राह्मण को ग्रहण करने में समर्थ क्यों नहीं हूँ? कृपया इसका कारण मुझे समझाइए।”
मृत्यु जिस आधार पर काम करती है
धर्मराज ने कहा, “मृत्यु, तुम केवल अपने बल से किसी प्राणी को नहीं मार सकतीं। जिसे तुम ग्रहण करती हो, उसके कर्म ही उसके मारण का कारण बनते हैं। आकाशज के कर्म खोजो। उनकी सहायता मिलेगी तो तुम्हारा प्रयत्न फलित होगा।”
मृत्यु अब ऐसे कर्म की खोज में निकली जो आकाशज को उसके अधिकार तक पहुँचा सके। उसने सम्पूर्ण देशों और दिगन्तों में पता लगाया। तालाबों, नदियों, दिशाओं, वनों, जंगलों, पर्वतों और समुद्रतटों तक गई। दूसरे द्वीप, अरण्य, नगर, कस्बे, गाँव, राष्ट्र और रेगिस्तान भी उसकी खोज में शामिल हुए। वह यह जानने का प्रयत्न कर रही थी कि आकाशज ने किस देश में कौन-सा पूर्व कर्म किया होगा। पूरे भूमण्डल में उसे कोई ऐसा कर्म नहीं मिला जो उनकी मृत्यु का आधार बनता।
वह फिर धर्मराज के पास पहुँची। “प्रभो, आकाशज के कर्म कहाँ हैं? मैंने देहधारी जीवों को कर्म से जुड़ा पाया, पर इनका कोई मारक कर्म मुझे कहीं नहीं मिला।”
धर्मराज ने बहुत देर तक विचार किया। फिर बोले, “आकाशज के ऐसे कर्म हैं ही नहीं। वे आकाश से उत्पन्न हुए हैं और आकाश के समान निर्मल हैं।”
धर्मराज यहाँ दिखाई देने वाले रिक्त विस्तार से सूक्ष्म चिदाकाश की बात कर रहे थे, चेतना का वह आधार जिसमें अनुभव और जगत का आभास प्रकट होता है। आकाशज का कोई पृथक कारण नहीं था। इसलिए उनका स्वरूप अपने कारण से अलग कोई वस्तु बनकर उपस्थित नहीं हुआ। वे अपने मूल, शुद्ध चिदाकाश में ही स्थित थे।
धर्मराज के विवेचन में कर्म की कई परतें आती हैं। प्रारब्ध वह कर्म है जिसका फल वर्तमान जीवन में भोगा जा रहा है। संचित कर्म पहले से संजोया हुआ भण्डार है। आगामी कर्म वर्तमान कर्तृत्व से आगे के लिए तैयार होता है। आकाशज के प्रसंग में मृत्यु की सहायता करने वाला इनमें से कोई आधार नहीं मिलता। अहंकार और राग से उपजने वाला वर्तमान कर्म भी उनमें स्थापित नहीं है।
मानसिक कर्म का प्रश्न अधिक सूक्ष्म था। मन का व्यापार प्रायः पूर्व देह के व्यवहार से बनी वासना के अधीन चलता है। आकाशज के लिए ऐसा पूर्व शरीर और उससे आया संस्कार उपस्थित नहीं था। इसलिए मृत्यु को उनके भीतर कोई मानसिक संचय भी नहीं मिला जो देह और नाश का संबंध बना सके।
जो गतिविधि दिखाई देती है
मृत्यु के प्रश्न का एक स्वाभाविक पक्ष अभी शेष था। आकाशज प्राण लेते और शरीर से काम करते दिखाई देते थे। यदि कोई कर्म और देह नहीं, तो यह गतिविधि किसकी थी?
धर्मराज ने समझाया कि देखने वालों को उनकी प्राणक्रिया और शरीर का व्यापार अपनी अज्ञानजनित भ्रान्ति से दिखाई देता है। आकाशज स्वयं उन गतिविधियों में स्वतंत्र सत्य का बोध नहीं रखते। उनके विषय में उठने वाला यह भाव कि “मेरा आकार ब्रह्म से अलग है” भी वासनामात्र आभास है। उसकी वास्तविकता को वे स्वीकार नहीं करते।
जल में तरलता, आकाश में अवकाश और वायु में स्पन्दन सहज रूप से जाने जाते हैं। उसी प्रकार आकाशज परम पद में स्थित हैं। उनका चैतन्य किसी अलग देह में बन्द होकर अपना मूल स्वरूप नहीं खोता। कारणों के अभाव में प्रकट रूप अपने कारण से पृथक सत्ता ग्रहण नहीं करता। इसी अर्थ में उन्हें स्वयंभू कहा गया है।
धर्मराज बोले, “जिस जीव को यह दृढ़ निश्चय है कि पृथ्वी और दूसरे तत्त्वों से बना शरीर ही मैं हूँ, वह पार्थिव देह के अधीन रहता है। ब्रह्मा जिस समय अपनी सत्यसंकल्प बुद्धि से मृत्यु की कल्पना करेंगे, उसी समय तुम उन्हें ग्रहण कर सकोगी। अभी उनके लिए वैसा देहभाव उपस्थित नहीं है। कैसी ही मजबूत रस्सी हो, वह आकाश को बाँध नहीं सकती। आकाशज को पकड़ने का प्रयत्न भी इसी कारण सफल नहीं होगा।”
अजन्मा का प्रकट होना
मृत्यु ने पूछा, “भगवन्, शून्य से अजन्मा की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? पृथ्वी और दूसरे तत्त्वों की अनुभूत सत्ता किस रूप में प्रकट होती है, और उनकी स्वतन्त्र सत्ता का अभाव किस प्रकार समझा जाए? कृपया यह भी स्पष्ट कीजिए।”
धर्मराज ने कहा कि परब्रह्म के लिए यहाँ आकाश शब्द आया है। पृथ्वी और दूसरे तत्त्व अपने कारण से पृथक स्वतन्त्र सत्ता से रहित हैं। अजन्मा का प्रकट होना विवर्त है: एक ही चेतना में रूप का आभास उठता है और चेतना अपने स्वरूप में अविकारी रहती है।
उन्होंने कहा, “यह आकाशज ब्राह्मण कभी उत्पन्न नहीं हुआ और कभी नष्ट नहीं हुआ। परमार्थ में वह प्रकाशात्मक विज्ञानस्वरूप है। इसलिए सदा अपने स्वरूप में रहता है।”
महाप्रलय में नाम और रूप शान्त हो जाते हैं। उस समय शान्त, जरारहित, अनन्त, नित्य उदित, सूक्ष्म और उपाधिरहित परब्रह्म शेष रहता है। सृष्टि के आरम्भ में जीवों की अविद्या, वासना और अदृष्ट के कारण उसी विज्ञानमात्र के निकट विराट या चतुर्मुख रूप का आभास होता है। देखने वालों को वह स्वप्न की तरह साकार दिखाई देता है। इस दृश्य का आधार जीवों की दृष्टि में है। आकाशज में उससे शरीर, कर्तृत्व, कर्म या वासना स्थापित नहीं होती।
धर्मराज ने मृत्यु से कहा, “जहाँ पृथ्वी आदि से बनी देह का आधार ही नहीं, वहाँ तुम्हारा आक्रमण किस पर टिकेगा? आकाश को कोई पकड़ नहीं सकता। इस प्रयत्न को छोड़ दो।”
धर्मराज के वचन सुनकर मृत्यु को बहुत आश्चर्य हुआ। वह अपने घर लौट गई।
आकाशज ही ब्रह्मा हैं
श्रीराम ने इस आख्यान का संकेत पहचान लिया। उन्होंने कहा, “भगवन्, आकाशज ब्राह्मण के नाम से आपने स्वयंभू, अज, एकात्मा और जीवसमष्टिरूप ब्रह्मा का ही वर्णन किया है। मेरी यही धारणा है।”
श्रीवसिष्ठ ने उत्तर दिया, “श्रीरामचन्द्र, आपका कथन सत्य है। आकाशज के नाम से मैंने ब्रह्मा का ही वृत्तान्त कहा है।”
वसिष्ठ ने उस प्राचीन संवाद का समय भी स्पष्ट किया। एक मन्वन्तर में मृत्यु सम्पूर्ण प्राणियों का संहार करते हुए बहुत बलवान हुई। अपने लगातार किए हुए कार्य के प्रति बनी प्रवृत्ति के कारण उसने ब्रह्मा को भी ग्रहण करने का उद्योग किया। उसी अवसर पर धर्मराज यम ने उसे यह शिक्षा दी थी।
ब्रह्मा चिदाकाशस्वरूप हैं। उनका शरीर संकल्परूप और मनोमात्र कहा गया है। उसमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बनी स्थूल देह की रचना नहीं होती। इसीलिए उनका आकार दिखाई देने पर भी मृत्यु को पकड़ने योग्य भौतिक आधार नहीं मिलता।
वसिष्ठ ने इस सूक्ष्म बात को कई दृश्यों से समझाया। आकाश कभी नीलम की बनी, उलटी रखी हुई विशाल कड़ाही जैसा दिखता है, जबकि वहाँ वैसी कोई ठोस वस्तु नहीं होती। निर्मल आकाश में मोतियों की माला जैसी रेखा उभर सकती है। संकल्प और स्वप्न में पूरा नगर दिखाई देता है। इन रूपों को देखने के लिए पृथ्वी आदि से बनी वास्तविक वस्तु का वहाँ उपस्थित होना आवश्यक नहीं होता।
चित्रकार पहले अपने अन्तःकरण में चित्र की प्रतिमा बनाता है। वह भीतर की प्रतिमा देहरहित होते हुए भी स्पष्ट आकार में भासती है। उसी प्रकार चिदाकाश का स्वच्छ प्रतिबिम्ब ग्रहण करने वाला मन प्रजापति के रूप में दिखाई देता है। ब्रह्मा का यह पुरुषाकार चिदाकाश में उठे संकल्प का आभास है।
वसिष्ठ ने आख्यान का निष्कर्ष इन शब्दों में रखा: आदि, मध्य और अन्त से रहित अद्वितीय ब्रह्म अपने संकल्प के कारण स्वयंभू के रूप में आकारवान और पुरुष जैसा भासता है। उसके लिए मानी गई स्वतंत्र भौतिक देह की स्थिति बन्ध्या के पुत्र जैसी है।
मृत्यु की असमर्थता किसी वरदान, असाधारण आयु या बच निकलने की युक्ति का परिणाम नहीं थी। उसका कार्य कर्म और देहभाव के सहारे चलता है। आकाशज में वह सहारा स्थापित नहीं हुआ। मृत्यु उनके सामने पहुँची, उन्हें देखा और सैकड़ों हाथ बढ़ाए, फिर भी उसकी पकड़ के लिए वहाँ कोई स्वतंत्र देह उपलब्ध नहीं थी।