आकाशज: आकाश का बेटा

कथा · 09

आकाशज: आकाश का बेटा

जंगल में राजा को एक बालक मिला। न माँ थी उसकी, न पिता। हवा में बैठा था, बिना किसी सहारे के। उसका जवाब हर कहानी पलट देता है।

राजा सरोद एक बार वन में शिकार पर निकले थे। दोपहर का समय था। पेड़ों के बीच से सूरज की किरणें ज़मीन पर गिर रही थीं। अचानक उन्होंने रुकर देखा – एक बालक हवा में बैठा था। न नीचे कोई आसन, न ऊपर कोई छाया। बस खाली आकाश, और उसके बीच एक छोटा सा बच्चा।

राजा हैरान हो गए। घोड़े से उतरे। पास गए। बालक की आँखें आधी मुँदी थीं, चेहरा बहुत शांत।

“बेटा, तुम कौन हो?”

बालक ने आँखें खोलीं। बोला, “मेरा नाम आकाशज है। मैं आकाश से जन्मा हूँ।”

“माँ-पिता कहाँ हैं?”

“कोई नहीं है। मेरी माँ भी आकाश है। पिता भी। मेरा शरीर भी आकाश है। मेरी साँस भी।”

राजा कुछ समझ नहीं पाए। बोले, “मगर तुम्हारा शरीर मुझे दिख रहा है। यह मांस है, हड्डी है। यह आकाश कैसे हो सकता है?”

आकाशज मुस्कुराया। “महाराज, ज़रा अपने हाथ को छुओ।”

राजा ने हाथ छुआ।

“महसूस क्या होता है?”

“कुछ ठोस।”

“और भीतर?”

राजा रुक गए। भीतर तो वो जा नहीं सकते थे।

आकाशज ने कहा, “अगर आप अपने शरीर को बहुत सूक्ष्म दृष्टि से देखें, तो हड्डी के भीतर कण होंगे। कणों के भीतर और छोटे कण। उन कणों के भीतर खाली जगह। बस इतनी सी जगह कि कण कहाँ टिके हैं, यह भी पता न चले। आपका शरीर लगभग पूरा खाली है।”

राजा ने सोचा। उन्होंने अपने हाथ को फिर देखा। वो उन्हें ठोस ही दिख रहा था।

“मगर मुझे तो ठोस लगता है।”

“क्योंकि आप ठोसपन का अनुभव करते हैं। जैसे लहर ख़ुद को लहर समझती है, और भूल जाती है कि वो पानी है। आप अपने शरीर को शरीर समझते हैं, और भूल जाते हैं कि वो आकाश है।”

राजा कुछ देर चुप रहे। फिर पूछा, “तो तुम क्या कर रहे हो यहाँ हवा में?”

“बैठा हूँ। आकाश में, आकाश से, आकाश की तरह।”

“तुम्हें भूख नहीं लगती?”

“लहर को पानी की भूख नहीं लगती।”

“और प्यास?”

“लहर को पानी की प्यास नहीं लगती।”

राजा ने एक बार और बालक को देखा। फिर वहीं ज़मीन पर बैठ गए। उन्होंने आँखें मूँदीं। कोशिश की कि अपने भीतर का खालीपन महसूस करें।

कुछ देर बाद उन्हें कुछ हुआ। एक अनुभव। वो सही नहीं समझ पाए, मगर उनके भीतर कुछ खुला। उन्होंने आँखें खोलीं तो आकाशज जा चुका था। आकाश साफ था।

राजा सरोद वन से लौटे। राज्य चलाते रहे। मगर अब उनके भीतर एक हलकापन था। जब कोई चीज़ खोती, उन्हें उतना दुख नहीं होता। जब कोई जीतता, उतनी खुशी भी नहीं। उन्होंने सीख लिया था कि सब कुछ आकाश में लहरें हैं।

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राजकुमार, अपने आप को बहुत भारी मत समझो। तुम जिस देह को इतना सच मानते हो, वो भी आकाश का एक रूप है। हलके से चलो। आकाशज की तरह।”

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