कथा · 09
आकाशज: आकाश का बेटा
आकाशज आकाश से जन्मा था, न माँ, न पिता, न ज़मीन। उसने हवा में घर बनाने की कोशिश बार-बार की, और घर हर बार ढह गया। अन्त में एक ऋषि ने एक ऐसी बात कही कि उसने अपना घर बाहर ढूँढना ही बन्द कर दिया।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या कुछ बिना नींव का भी हो सकता है?”

वसिष्ठ बोले – “राम, इस पर एक छोटी कथा है, आकाशज की। सुनो।”
घर
यह बहुत बरस पहले की बात है, जब एक आदमी पैदा हुआ। उसकी न कोई माँ थी, न कोई पिता।

वह आकाश से पैदा हुआ था, और आकाश से ही उसे एक अजीब नाम मिला – आकाशज।
आकाशज बड़ा हुआ, पर वह कहीं नहीं रहता था, क्योंकि आकाश से जन्मे इस आदमी के पास अपनी कोई जगह ही नहीं थी।
वह बस हवा में ही रहता था।
हवा में रहना अपने आप में एक अजीब बात थी।
जब वह लेटना चाहता, तो पीठ के नीचे कुछ नहीं होता था। उसका देह नीचे नहीं गिरता था, क्योंकि वह हवा का बना था, पर नीचे कोई आधार भी नहीं था। इसलिए लेटना कभी पूरा नहीं होता था, न आराम मिलता, न दर्द, बस एक लटकाव बना रहता।
जब वह सोना चाहता, तो उसकी आँखें तो बन्द हो जातीं, पर देह को कोई दबाव नहीं मिलता था, और बिना दबाव के नींद पूरी नहीं उतरती। इसी कारण आकाशज जीवन भर आधी नींद में ही रहा।
जब वह खाता, तो भोजन उसके पेट तक पहुँचने से पहले ही हवा हो जाता, और उसे कभी पेट भरने का सुख नसीब नहीं हुआ।
और सबसे अजीब बात यह थी कि जब वह चलना चाहता, तो उसके पैरों के नीचे कुछ नहीं होता, इसलिए चलने का अर्थ ही नहीं बचता था।
पर इन सब बातों को आकाशज ने कभी अजीब नहीं समझा, क्योंकि उसके लिए तो यही जीवन था। आकाश से जन्मे लोगों को यह पता ही नहीं चलता कि पृथ्वी से जन्मे लोगों को क्या मिला हुआ है।
एक दिन उसके मन में एक विचार आया कि मुझे एक घर चाहिए।
सो उसने हवा में ही एक घर बनाया, हवा की दीवारें, हवा की छत, और हवा का ही दरवाज़ा। घर बनकर तैयार हो गया।
आकाशज ने उस घर में रहना शुरू किया, पर एक दिन हवा चली।
और घर हिलने लगा।
आकाशज ने सोचा कि मेरा घर हिल रहा है।
तो उसने पहले से और मज़बूत घर बनाया।

पर फिर एक तूफ़ान आया और घर उड़ गया।
आकाशज दुखी हुआ और उसने एक तीसरा घर बनाया।
पर तीसरा घर भी टूट गया।
इस तरह बहुत बरस तक आकाशज घर बनाता रहा। हर बार घर बनता, और हर बार टूट जाता, क्योंकि उसकी कोई नींव नहीं थी, नींव तो हवा में ही टिकी थी।
एक दिन एक ऋषि आकाशज के पास आए और बोले – “आकाशज, तुम यह क्या कर रहे हो?”
आकाशज ने कहा – “मैं घर बना रहा हूँ।”
“पर तुम्हारा घर तो हर बार टूट जाता है, ऐसा क्यों?”
“यह तो मुझे भी पता नहीं, ऋषिवर।”
ऋषि बोले – “आकाशज, तुम्हारी नींव हवा में है, और हवा में नींव हो ही नहीं सकती। तुम्हारा घर बनेगा, फिर टूटेगा, और यही क्रम यूँ ही चलता रहेगा।”
“तो फिर मैं क्या करूँ?”

“एक काम करो, घर बनाना ही छोड़ दो। तुम ख़ुद आकाश हो, तो तुम्हें भला घर की क्या ज़रूरत?”
यह सुनकर आकाशज ठहर गया और उसने अपने आप को देखा।
मैं हवा हूँ, मैं ख़ुद ही घर हूँ, तो फिर मुझे किसी और घर की क्या ज़रूरत?
आकाशज ने घर बनाना छोड़ दिया। अब वह बिना किसी घर के हवा में ही रहने लगा, पर अब उसे घर की कोई कमी नहीं खलती थी।
क्योंकि अब वह जान चुका था कि वह ख़ुद ही अपना घर है।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या हम भी बिना नींव के घर बना रहे हैं?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हम सब ही ऐसे घर बना रहे हैं। पहचान का घर, प्रसिद्धि का घर, धन का घर। हर घर हवा में टिका है, और हर घर एक दिन टूटेगा, फिर भी हम बस घर बनाते ही चले जाते हैं।
असली बात तो यह है कि हम ख़ुद ही अपना घर हैं, हमें बाहर किसी और घर की ज़रूरत नहीं।”
राम ने आसमान की ओर देखा।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण, सर्ग 6अ.112-113 पर आधारित है। आकाशज का रूपक मन की पहचान-निर्माण-प्रक्रिया की एक तेज़ निन्दा है।
दर्शन-दृष्टि
आकाशज आकाश से जन्मा एक मनुष्य है। उसकी कोई माँ नहीं, कोई पिता नहीं, कोई धरती नहीं। वो हवा में रहता है। एक घर बनाता है, हवा से। तूफ़ान में वो उड़ जाता है। फिर दूसरा बनाता है, फिर तीसरा। हर घर हवा का है, हर बार वो भूल जाता है कि नींव कहीं नहीं है। कथा यह कहती है कि हम सब आकाशज हैं, बिना नींव की पहचानें बनाते रहते हैं, और हर पहचान के टूटने पर एक नई बनाकर फिर वही भूल दोहराते हैं।
जर्मन दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर (Martin Heidegger, 1889-1976) ने अपनी Being and Time (Sein und Zeit, 1927) में Geworfenheit की व्याख्या की, कि मनुष्य संसार में “फेंका हुआ” है, बिना अपनी पसन्द से, और इसी फेंके होने में वो अपना अर्थ रचता है। आकाशज इसी का चरम रूप है। हवा में फेंका हुआ, बिना ज़मीन के, फिर भी घर बनाता है, क्योंकि घर बनाना उसकी मजबूरी नहीं, उसकी आदत है। हाइडेगर ने इसे चिन्ता कहा, कथा इसे करुणा से देखती है।