व्याध और मृग

कथा · २२

व्याध और मृग: एक नज़र की दीक्षा

शिकारी ने धनुष उठाया, बाण साधा। हिरणी ने मुड़कर देखा। बस एक नज़र। शिकारी ने धनुष नीचे रख दिया। उठाया फिर कभी नहीं।

एक वन में एक शिकारी रहता था। नाम लोग उसे व्याध कहते थे – शिकारी ही उसकी पहचान। जन्म से शिकारी, बाप-दादा भी शिकारी।

दिन भर बाण और धनुष। शाम तक चार-छह जानवर। माँस ले जाकर बेचता, परिवार पालता।

एक सुबह वो हमेशा की तरह वन में था। पैरों के नीचे सूखे पत्ते बहुत धीरे से चटकाते। उसकी कला यही थी – बिना आवाज़ के चलना।

एक झाड़ी के पीछे उसे एक हिरणी दिखी। बहुत सुंदर। पतली, पर मज़बूत। चर रही थी। उसे शिकारी का पता नहीं था।

व्याध रुका। धनुष उठाया। बाण निकाला। तानी हुई डोर। बाण की नोक हिरणी की गर्दन की ओर।

तभी हिरणी ने सिर उठाया। शायद कोई पत्ता हिला था। शायद कुछ और। उसने मुड़कर सीधे शिकारी की आँख में देखा।

एक नज़र।

व्याध रुक गया।

उस नज़र में कुछ था। डर नहीं था। आरोप नहीं। बस देखना था। एक प्राणी, दूसरे प्राणी को।

व्याध ने अपने हाथ देखे। बाण देखा। फिर हिरणी की आँख देखी।

उसे एक बात समझ आई। बहुत सीधी। ख़ुद से कही – “इसकी आँखों में जो देखने वाला है, वो मेरी आँखों में भी है। एक ही है। मैं इसे मार रहा हूँ, तो ख़ुद को मार रहा हूँ।”

उसने धनुष नीचे किया। बाण कमर में डाला।

हिरणी कुछ देर खड़ी रही। फिर मुड़ी, धीरे से चली गई।

व्याध वहीं ज़मीन पर बैठ गया।

घंटे बीते। शाम हुई। वो बैठा रहा।

रात गुज़री। वो बैठा रहा।

सुबह हुई। वो उठा। मगर वो अब वही व्याध नहीं था।

घर लौटा। पत्नी ने पूछा, “माँस लाए?”

“नहीं।”

“क्यों?”

“अब मैं शिकार नहीं करूँगा।”

पत्नी ने पूछा, “तो खाएँगे क्या?”

“फल। पत्ते। जो वन देगा।”

परिवार में हलचल। मगर व्याध रुका नहीं। उसने दूसरा काम सीखा – शहद इकट्ठा करना, फल बेचना। ठीक से नहीं चला, मगर चला।

कई साल बाद वन में कुछ साधु पहुँचे। उन्हें एक झोपड़ी मिली। उसमें एक बूढ़ा बैठा था, ध्यान में।

साधुओं ने पूछा, “महाराज, आप कौन हैं? आपके गुरु कौन थे?”

बूढ़े ने आँखें खोलीं। बोले, “मैं व्याध था। मेरी गुरु एक हिरणी थी।”

साधु हँसे। “हिरणी?”

“हाँ। उसने मुझे एक नज़र दी। बस उतनी देर में सब बदल गया।”

साधु बैठ गए। बहुत देर बैठे रहे।

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, ज्ञान कब आता है, कोई नहीं जानता। कभी एक नज़र काफ़ी होती है। कभी जीवन भर साधना से नहीं मिलता। फ़र्क़ देखने वाले के तैयार होने में है, गुरु में नहीं।”

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