व्याध और मृग

कथा · 22

व्याध और मृग: एक नज़र की दीक्षा

शिकारी ने धनुष उठाया और बाण साधा, तभी हिरणी ने मुड़कर उसकी ओर एक नज़र देखा। उसी एक नज़र में शिकारी ने अपना धनुष नीचे रख दिया, और फिर उसे कभी नहीं उठाया।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मारने वाला और मरने वाला एक हो सकते हैं?”

वसिष्ठ बोले – “राम, एक व्याध और एक मृग की कथा सुनो।”

दौड़

एक जंगल था, और उसमें एक मृग रहता था, बड़े सींगों वाला, पीली पीठ और तेज़ पैरों वाला।

उसी जंगल में एक व्याध शिकार करता था, जिसके हाथ में एक धनुष और एक तीर रहता था।

A lean forest hunter with drawn longbow spots a large-antlered, yellow-backed deer that bolts away through sun-dappled woodland; rich classical Indian color painting, dynamic chase, dignified, no text.

एक दिन व्याध ने मृग को देख लिया, और मृग भागने लगा।

व्याध उसके पीछे लगा रहा, और दौड़ बहुत लम्बी होती गई।

मृग के पैर ज़मीन पर पड़ते और फिर हवा में उठ जाते, उसकी साँस तेज़ चल रही थी।

व्याध भी तेज़ दौड़ रहा था, और उसके पैरों के नीचे सूखे पत्ते टूट रहे थे।

दोनों के बीच एक तनी हुई रेखा थी, न मृग रुक सकता था और न व्याध रुक सकता था।

A panting antlered deer halts at the center of a wide open meadow where a serene bearded muni sits in meditation with a water-pot, the hunter pausing at the edge; luminous classical Indian color illustration, dignified, no text.

बहुत देर तक यही चलता रहा, फिर मृग एक खुले मैदान के बीच में आकर रुक गया।

व्याध भी वहीं रुक गया।

उसी मैदान के बीच एक मुनि बैठे हुए थे।

मुनि ने आँख खोलकर दोनों को देखा, और व्याध ने अपना धनुष उठाया।

मुनि बोले – “रुको।”

व्याध रुक गया और बोला – “बोलिए, मुनिवर।”

“व्याध, यह मृग कहाँ है?”

व्याध ने कहा – “मुनिवर, मेरे सामने ही तो खड़ा है।”

“मुझे तो नहीं दिख रहा।”

व्याध हैरान रह गया और उसने फिर से देखा। मृग वहीं था, पर मुनि की आँख में नहीं था।

व्याध ने पूछा – “मुनिवर, आपको क्यों नहीं दिख रहा?”

The seated muni gestures gently toward both the hunter and the deer, who are wrapped together in a single soft golden aura of one consciousness; the hunter begins lowering his bow; serene metaphysical classical Indian color tableau, dignified, no text.

मुनि बोले – “व्याध, मुझे एक चेतना दिखती है, जिसमें मृग और तुम दोनों हो, पर अलग-अलग नहीं, एक ही चेतना। मेरी आँख न तुम्हारी चेतना से शुरू होती है, न मृग की चेतना से। मेरी आँख उस चेतना को देखती है जो हर एक के पीछे है।”

व्याध ने धनुष नीचे कर लिया।

मृग भी मुनि की ओर देख रहा था, और उसकी आँखें भी कुछ बदल गई थीं।

व्याध ने मृग को देखा और मृग ने व्याध को देखा, और दोनों के बीच कुछ बदल गया।

व्याध ने तीर नीचे कर लिया, तो मृग ने उसकी ओर एक क़दम बढ़ाया, और व्याध ने अपना हाथ बढ़ाया।

The deer steps forward and touches the hunter's outstretched open hand with its muzzle, his bow laid aside, the muni watching peacefully nearby in the sunlit clearing; tender reconciliation, warm classical Indian color painting, dignified, no text.

मृग ने व्याध के हाथ को अपने मुख से छुआ।

मुनि बोले – “अब समझे?”

व्याध ने कहा – “समझा। शिकारी और शिकार दोनों एक हैं, बस उनका देह अलग है, चेतना एक ही है।”

मुनि ने सहमति में सिर हिलाया।

व्याध ने अपना धनुष ज़मीन पर रख दिया और उस जंगल से चला गया। मृग वहीं रहा और मुनि वहीं बैठे रहे।

राम ने कहा – “गुरुदेव, मैं भी एक राजा हूँ, और मेरा भी एक कर्तव्य है, धनुष चलाने का।”

“हाँ।”

“पर अब मैं जब धनुष चलाऊँगा, तो मुझे यह बात याद रहेगी।”

“क्या?”

“कि शिकारी और शिकार एक ही चेतना के दो रूप हैं।”

वसिष्ठ बोले – “राम, यह बात जब भीतर बैठ जाती है, तो धनुष चलाना भी एक तपस्या बन जाता है। तुम मारोगे, पर मारोगे नहीं। तुम युद्ध करोगे, पर युद्ध करोगे नहीं। दोनों एक साथ।”

राम ने पानी की ओर देखा।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण, सर्ग 6अ.124 पर आधारित है। शिकारी और शिकार की एकता का यह छोटा सा रूपक, बाद की भारतीय परम्परा में कई बार दोहराया गया है।

दर्शन-दृष्टि

एक व्याध एक घायल मृग का पीछा करता है। पीछा करते-करते वो एक ऋषि के पास पहुँचता है। ऋषि से पूछता है, मृग किधर गया। ऋषि चुप रहते हैं, फिर इतना ही कहते हैं कि मेरी आँखें देखती हैं, पर बताने के लिए मेरे पास भीतर कोई बँटवारा नहीं कि कौन शिकारी है कौन शिकार। व्याध का धनुष ढीला हो जाता है। कथा यह कहती है कि पीछा करने वाला और जिसका पीछा हो रहा है, दोनों एक ही चेतना के दो रूप हैं, और जब यह दिखता है तो पीछा अपने आप रुकता है।

फ्रांसीसी दार्शनिक मॉरिस मेर्लो-पोन्ती (Maurice Merleau-Ponty, 1908-1961) ने अपनी Phenomenology of Perception (1945) में दिखाया कि देखने वाला और दिखने वाला एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते, हर देखना एक प्रकार का छुआ जाना भी है, और शिकारी जब अपने शिकार को देखता है तो वो स्वयं शिकार में भी होता है। ऋषि की चुप्पी इसी का सार है। उन्होंने व्याध को मृग की दिशा नहीं बताई, उन्होंने उसे यह दिखाया कि दिशा का प्रश्न ही अधूरा है।