कथा · १६
उद्दालक का प्रणव-ध्यान
मन काबू नहीं होता था। हर तरीक़ा आज़माया, सब बेकार। फिर एक दिन झरने की आवाज़ ने रास्ता बता दिया।
उद्दालक एक तपस्वी थे। नौजवान थे जब साधना शुरू की। उन्हें एक बात की चिंता थी – मन। मन रुकता ही नहीं था। बैठने जाते, तो विचार दौड़ते। आँख मूँदते, तो दृश्य उठते। साँस गिनते, तो गिनती भूल जाते।
उन्होंने सब आज़माया। आसन सीखा। प्राणायाम सीखा। मंत्र जपा। उपवास किया। फिर भी मन भागता रहा।
एक दिन वो हताश होकर वन में निकल गए। कोई दिशा नहीं, बस चलते रहे। थोड़ी देर बाद उन्हें एक झरने की आवाज़ सुनाई दी।
उन्होंने सोचा, “थोड़ा पानी पी लूँ।” झरने के पास गए।
झरना ऊँचे चट्टान से गिर रहा था। आवाज़ लगातार। एक तरह की धुन। उद्दालक एक पत्थर पर बैठ गए।
वो आवाज़ सुनने लगे।
आवाज़ में तीन हिस्से थे। ऊपर से पानी टकराता – “अ”। बीच में बहता – “उ”। नीचे जाकर शांत होता – “म”।
अ-उ-म।
“यह तो ओ३म् है,” उद्दालक ने सोचा।
उन्होंने आँखें मूँदीं। आवाज़ चलती रही। उन्होंने मन को आवाज़ के साथ बहने दिया। न रोका, न पकड़ा, बस बहने दिया।
कुछ देर बाद कुछ अजीब हुआ। उद्दालक का अपना शरीर भी अ-उ-म लगने लगा। साँस भी अ-उ-म थी। दिल की धड़कन भी।
“पूरा संसार अ-उ-म से बना है,” उन्हें लगा।
उन्होंने मन को नहीं रोका। मन ने आवाज़ को पकड़ लिया। आवाज़ ने मन को थाम लिया। दोनों एक हो गए।
घंटे बीते। दिन बीते। उद्दालक नहीं उठे।
एक दिन उन्होंने आँखें खोलीं। मगर वो वही उद्दालक नहीं थे। भीतर से बहुत कुछ गिर चुका था। बेचैनी, खोज, हताशा – सब झरने में बह गई थी।
उन्होंने झरने को प्रणाम किया। फिर उठकर अपनी कुटिया लौटे।
उनके शिष्यों ने पूछा, “गुरुजी, आप कहाँ थे? और कौन सी विद्या सीखकर आए हैं?”
उद्दालक मुस्कुराए। बोले, “एक झरने से। उसने मुझे सब सिखा दिया।”
शिष्य हैरान। “झरने से क्या?”
“ओ३म्।”
“वो तो हम भी जानते हैं।”
“जानते हो, मगर सुना नहीं है। जो सुनेगा, वो जानेगा भी।”
उद्दालक ने अपने शिष्यों को झरने पर ले जाना शुरू किया। एक-एक को बैठाते। कहते, “बस सुनो। कुछ करना नहीं।” कई शिष्यों को वहीं ज्ञान हुआ।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, गुरु कहीं भी मिल सकता है। एक झरना भी गुरु हो सकता है। बस सुनने की क्षमता चाहिए। मन को उद्दालक की तरह बहने दो, रोको मत। आवाज़ ख़ुद रास्ता बना देगी।”
← सब कथाएँ