कथा · 16
उद्दालक का प्रणव-ध्यान
बचपन में पिता ने मरते समय बस एक ही शब्द कहा था, “चुप।” बहुत बरस बाद ऋषि उद्दालक ने ॐ की चार-स्वर साधना शुरू की, और अ-उ-म के बाद चौथे स्वर की चुप में पिता की वही आवाज़ उन्हें फिर सुनाई दी।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, ॐ का जप क्यों किया जाता है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, उद्दालक की कथा सुनो। उन्होंने ॐ को सिर्फ़ शब्द नहीं माना, उन्होंने उसे एक साँस की लय बनाया।”
ऋषि
उद्दालक एक ऋषि थे, उम्र कोई पचास बरस।
उनके बाल पीछे एक गाँठ में बँधे थे और दाढ़ी कमर तक आती थी। उनकी दायीं भौं पर एक निशान था, बचपन में किसी पत्थर से लगी चोट का।
उन्होंने बहुत पुस्तकें पढ़ी थीं, बहुत मन्त्र जाने थे, बहुत यज्ञ किए थे।
पर एक बात उनके भीतर बहुत बरस से बैठी थी।

बचपन में, जब वो आठ बरस के थे, उन्होंने अपने पिता को मरते देखा था। पिता ब्राह्मण थे, और उनकी मृत्यु अचानक हुई थी।
मरते समय पिता ने कोई बात बहुत धीमे से कही थी। उद्दालक ने उसे सुना तो था, पर समझ न पाए।
बहुत बरस बाद उद्दालक ने अपनी माँ से पूछा – “माँ, पिता ने आख़िर में क्या कहा था?”
माँ बोलीं – “बेटा, उन्होंने कहा था, ‘चुप।’ बस इतना ही।”
“चुप?”
“हाँ, बस चुप।”
उद्दालक उस समय कुछ न बोले, पर वो शब्द उनके भीतर बैठा रहा।
बहुत बरस तक वो यही सोचते रहे कि चुप का क्या मतलब है, और पिता ने अपने आख़िरी पल में कौन सी चुप देखी थी।
उद्दालक ने पुस्तकें पढ़ीं, मन्त्र सीखे, यज्ञ किए, पर हर शब्द के पीछे वही प्रश्न खड़ा रहता था।
उन्होंने अपने मन में सोचा – “मैंने जो सीखा, वो सब शब्द हैं। पर शब्द से आगे जो है, उसे मैं कैसे जानूँ? पिता ने जो चुप देखी, मैं उसे कैसे देखूँ?”
एक दिन उद्दालक एक गुरु के पास गए, और गुरु ने उन्हें ॐ का अभ्यास सिखाया।

“उद्दालक, ॐ बस एक शब्द नहीं है। यह एक साँस है, एक लय है, तीन स्वरों का एक मिलन है।
“अ पहला स्वर है, साँस के शुरू में।
“उ दूसरा स्वर है, साँस के बीच में।
“म तीसरा स्वर है, साँस के अन्त में।
“फिर एक चौथा स्वर है, बिना आवाज़ का, साँस के बाद के चुप का। यही असली है।
“पहले तुम तीन स्वर जपो, ज़ोर से, फिर धीमे, फिर मन में, फिर बिना आवाज़ के। आख़िर में तुम सिर्फ़ चौथे स्वर में रह जाओगे, उस चुप में।”
उद्दालक लौटे और उन्होंने एक पेड़ के नीचे, एक झील के पास अपने अभ्यास के लिए स्थान चुना। फिर वो वहीं बैठ गए।
अभ्यास
पहले दिन उद्दालक ने ॐ ज़ोर से जपा।

अ कहते ही मुँह खुला, आवाज़ छाती से उठी, और सीने में एक कम्पन हुआ। उ कहते मुँह आधा बन्द हुआ, आवाज़ गले से आई, और कम्पन गर्दन तक पहुँचा। म कहते होंठ बन्द हुए, आवाज़ केवल कम्पन रह गई, और वो कम्पन माथे तक चढ़ा।
यही उन्होंने बहुत बार दोहराया।
पेड़ों के बीच गूँज उठी, और झील पर एक लहर दौड़ गई।
दूसरे दिन उन्होंने धीमे जपा, और आवाज़ कानों के पास ही रही।
तीसरे दिन उन्होंने मन में जपा। पर मन में जपते-जपते उद्दालक के साथ एक बात होने लगी, उनका मन भागने लगा।
ॐ के बीच में बचपन की एक कथा घुस आई, फिर एक और, फिर तीसरी।
उद्दालक ने सोचा – “यह क्या? मैं ॐ जप रहा था, और मेरा मन इधर-उधर भटक रहा है।”
उन्हें पहले क्रोध आया, फिर निराशा।
बहुत दिन तक उन्होंने यही किया। हर बार वो जपते, और हर बार मन भाग जाता।
एक रात उद्दालक झील के किनारे बैठे थे। उनकी आँखें खुली थीं, और आकाश में कुछ तारे चमक रहे थे।
उन्होंने सोचा – “शायद मैं ग़लत कर रहा हूँ। मैं मन को रोकने की कोशिश कर रहा हूँ, पर मन रुकने की चीज़ नहीं है।”
उन्हें अपने गुरु की बात याद आई – “फिर तुम सिर्फ़ चौथे स्वर में रह जाओगे, उस चुप में।”
चुप। वही शब्द जो पिता ने मरते समय कहा था।
उद्दालक के भीतर एक हलचल हुई। शायद पिता ने भी आख़िर में यही जाना था।
चौथे दिन वो बिना जपे बैठ गए, बस अपनी साँस के साथ।
साँस अन्दर गई, और उन्होंने अ को छाती पर बिना उच्चारण के महसूस किया, बस वहाँ का हलकापन।
साँस बीच में आई, उ, और गले पर एक रुकावट के बाद फिर खुलापन।
साँस बाहर गई, म, और होंठों पर एक थरथराहट के बाद फिर शान्ति।
फिर साँस के बाद का चुप आया।
(पहली बार उद्दालक ने उस चुप को ध्यान से देखा।)
(वो चुप बस आवाज़ का अभाव नहीं था, वो एक उपस्थिति थी, एक भरी हुई चुप।)
(उद्दालक के भीतर एक मुस्कुराहट उठी।)
(पिता।)
पाँचवें दिन उद्दालक ने उस चुप में और भीतर देखा।
चुप अन्दर था, और उस चुप के भीतर एक स्थिर सी चीज़ थी, एक प्रकाश, बिना किसी स्रोत के, बिना किसी आँख के।
उद्दालक उसी प्रकाश में डूब गए।
बरस बीतते गए। उद्दालक वहीं बैठे रहे, हर रोज़ वो ॐ का अभ्यास करते और हर रोज़ चौथे स्वर में डूब जाते।

उनका देह बूढ़ा हुआ, पर उनकी आँखें बच्चे जैसी हो गईं।
लोग उनसे मिलने आते और कहते – “उद्दालक, हमें ॐ सिखाइए।”
उद्दालक बोलते – “मैं तुम्हें सिखाऊँगा, पर पहले एक बात समझ लो। यह कोई जादू नहीं है, यह बस अभ्यास है, हर रोज़, बहुत बरस तक। फिर एक दिन वो चुप तुम्हें मिल जाएगा।”
कुछ लोग अभ्यास करते, कुछ नहीं। जिन्होंने किया, उन्हें वो चुप मिली, और जिन्होंने नहीं किया, उन्होंने ॐ को एक शब्द ही माना।
राम बोले – “गुरुदेव, मैं भी अभ्यास करूँगा। पर वो चौथा स्वर आख़िर है क्या?”
वसिष्ठ बोले – “राम, उसके बारे में बोलना मुश्किल है। वो न शब्द है, न आवाज़, वो तो सब आवाज़ों का स्रोत है। बस अभ्यास करो, तुम्हें वो मिलेगा।”
राम ने पानी की ओर देखा, जहाँ सूरज की एक रोशनी काँप रही थी।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5.51-55 पर आधारित है। उद्दालक का प्रणव-ध्यान शास्त्र में सबसे विस्तृत प्राणायाम और ॐ-जप का वर्णन है। चार स्वरों का सिद्धान्त माण्डूक्य उपनिषद् के समानान्तर है।
दर्शन-दृष्टि
उद्दालक प्रणव (ॐ) पर बैठते हैं। श्वास को पकड़ते हैं, अक्षर को पकड़ते हैं, और दोनों के बीच के एक सूक्ष्म अन्तराल में उतरते हैं। उस अन्तराल में, जहाँ न श्वास है न ध्वनि, उन्हें बोध मिलता है। कथा यह कहती है कि साधना का केन्द्र किसी क्रिया का अभ्यास नहीं, क्रिया और क्रिया के बीच की चुप्पी का अभ्यास है, और प्रणव वो ध्वनि है जो अपनी ही चुप्पी की ओर खींचती है।
माण्डूक्य उपनिषद् पर अपनी कारिका में गौडपाद (छठी-सातवीं शताब्दी) ने ॐ के चार चरणों, अ-उ-म और मात्रातीत चौथे को, चेतना की चार अवस्थाओं से जोड़ा, और कहा कि चौथा अनुच्चारित अंश ही असली ध्यान का विषय है। उद्दालक की साधना यही चौथा है। ॐ का उच्चारण उन्हें वहाँ ले जाता है जहाँ ॐ ख़त्म होता है, और जहाँ ॐ ख़त्म होता है वही उनका असली घर निकलता है।