तीन असत्य राजकुमार

कथा · 27

तीन असत्य राजकुमार: एक माँ का सोने का गाना

माँ ने बच्चे को सुलाने के लिए एक ऐसी कहानी सुनाई जिसमें कुछ था ही नहीं, और फिर भी बच्चा सो गया। और सच पूछो तो हम सब उसी कहानी में जी रहे हैं।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या कोई कथा ऐसी हो सकती है जिसमें कुछ भी सच न हो?”

वसिष्ठ बोले – “हाँ राम, हो सकती है। एक बूढ़ी धाय थी, जिसने तीन राजकुमारों की एक कथा सुनाई थी। पर वो तीन राजकुमार कभी थे ही नहीं। सुनो।”

A frail white-haired old nursemaid sits cross-legged by an oil lamp in a humble night-time chamber, gently coaxing a wakeful young child resting on a low cot to sleep, her hand raised mid-tale; warm amber lamplight, deep indigo night through a lattice window, tender classical Indian miniature palette, no text, dignified

एक रात एक बूढ़ी धाय एक बच्चे को सुला रही थी, पर बच्चा सो नहीं रहा था।

बच्चे ने कहा – “धाय माँ, कोई कथा सुनाओ।”

बूढ़ी ने थोड़ा सोचा, फिर सुनाने लगी।

“बहुत बरस पहले एक राज्य था, जहाँ सच में कुछ नहीं था। न वहाँ कोई राजा था, न राज्य ही था, बस एक नाम था।

“उस राज्य में तीन राजकुमार थे।

Three valiant crowned young princes in jewelled armour stand triumphant on a battlefield at dawn, bows, sword and mace in hand, fallen demon-rakshasa forms at their feet and banners flying behind them; heroic classical Indian painterly style, rich crimson and gold, victorious yet faintly translucent, no text, dignified

“तीनों बहुत वीर थे, तीनों ने बहुत युद्ध जीते थे, और तीनों ने बहुत राक्षस मारे थे।

“पर एक बात थी।

“वो तीनों कभी पैदा ही नहीं हुए थे।

“उनके माता-पिता कभी थे ही नहीं।

“उनका राज्य कभी था ही नहीं।

“उनके राक्षस कभी थे ही नहीं। सब झूठ था।

“पर तीनों ने वैसे ही जीवन जिया जैसे सब सच हो।

“वो रोज़ राज्य चलाते, रोज़ युद्ध करते, और रोज़ शाम को महल लौट आते। पर असल में वो कहीं नहीं थे।

“फिर एक दिन वो तीनों एक नदी के किनारे बैठे थे।

Three princes sit together on the grassy bank of a moonlit river, looking at one another in startled wonder as their bodies begin to dissolve into motes of pale light at the edges; reflective silvery water, hushed twilight, contemplative classical Indian miniature palette, no text, dignified

“बड़े ने कहा कि मुझे लग रहा है हम असली नहीं हैं। दूसरे ने कहा कि मुझे भी ऐसा ही लगता है, और तीसरे ने भी यही कहा।

“तीनों एक-दूसरे को देख रहे थे।

“और फिर तीनों ग़ायब हो गए, क्योंकि वो थे ही नहीं।”

बच्चा बूढ़ी की ओर देख रहा था। उसने पूछा – “धाय माँ, वो तीनों सच में थे ही नहीं?”

बूढ़ी ने कहा – “नहीं।”

“फिर तुमने उनके बारे में कैसे बता दिया?”

बूढ़ी बोली – “बेटा, मैंने बस कह दिया। यही तो कथा है।”

“पर मैंने तो सुन ली।”

“हाँ।”

“और मेरे भीतर वो तीनों कुछ देर के लिए थे।”

“हाँ।”

“फिर वो कहाँ चले गए?”

बूढ़ी बोली – “बेटा, अब सो जा। यह कथा पूरी हुई।”

और बच्चा सो गया।

वो बच्चा बड़ा हुआ, और एक दिन उसे यह कथा याद आई। उसने मन ही मन सोचा कि मेरा जीवन भी तो एक कथा है, और मैं भी एक राजकुमार हूँ। शायद मैं भी कभी पैदा नहीं हुआ, शायद मेरे माता-पिता कभी थे ही नहीं, और शायद यह सब बस एक कथा है, जो किसी और ने सुनाई।

उसने अपनी आँखें बन्द कीं और अपने भीतर देखा।

भीतर कुछ नहीं था, बस एक स्थिर सा ठहराव था। और वही उसका असली रूप था।

The aged sage Vasishtha and young prince Rama sit facing each other in quiet meditation beneath a great spreading tree by a river at dusk, a small ritual fire and water-pot between them, evening light resting on the still water; serene classical Indian painterly style, warm sunset and deep green, no text, dignified

राम कुछ देर तक चुप रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, क्या मैं भी ऐसा ही हूँ?”

वसिष्ठ बोले – “राम, तुम ख़ुद सोचो।”

राम ने पानी की ओर देखा, जहाँ शाम की रोशनी ठहरी हुई थी।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3.101 पर आधारित है। यह शास्त्र की सबसे मेटा-कथा है, एक ऐसी कथा जो ख़ुद को कथा होने की गवाही देती है। यह आधुनिक मेटा-कथा का बहुत पुराना संस्करण है।

दर्शन-दृष्टि

एक बूढ़ी धाय एक बच्चे को सुलाने के लिए एक कथा सुनाती है। तीन राजकुमार, तीन साम्राज्य, तीन युद्ध। पर वो तीनों कभी पैदा ही नहीं हुए थे। उनके माँ-बाप कभी नहीं थे। उनके राक्षस कभी नहीं थे। फिर भी कथा चलती है, बच्चा सुनता है, और कुछ पल के लिए वो तीनों उसके भीतर असली हो जाते हैं। कथा यह कहती है कि अगर एक झूठी कथा हमारे भीतर असली बन सकती है, तो यह असली दिखती कथा भी शायद उतनी ही ठहराव वाली है।

ऑस्ट्रियाई दार्शनिक लुडविग विट्गन्श्टाइन (Ludwig Wittgenstein, 1889-1951) ने अपनी Philosophical Investigations (मरणोपरान्त 1953 में प्रकाशित) में language games की व्याख्या की, कि अर्थ शब्दों में नहीं, उनके खेलने के तरीक़े में बसता है, और खेल बदलते ही अर्थ बदल जाता है। तीन राजकुमारों की कथा इसी विचार का बच्चों वाला रूप है। तीनों न कहीं थे न कहीं हैं, पर उनके होने का खेल चलता है, और जब तक हम खेल में हैं, वो हैं।