तीन असत्य राजकुमार

कथा · २७

तीन असत्य राजकुमार: एक माँ का सोने का गाना

माँ ने बच्चे को सुलाने के लिए कहानी सुनाई। उसमें कुछ था ही नहीं। फिर भी बच्चा सो गया। और सच पूछो तो हम सब उसी कहानी में जी रहे हैं।

एक माँ थी। थोड़ी सीधी सी, बहुत होशियार नहीं। उसका छोटा बेटा था। बच्चा रात को सोता नहीं था। बहुत चंचल। माँ कहानी सुनाती तो शायद सो जाए।

उसने कहानियाँ बहुत कम सुनी थीं। पुराने ज़माने की कहानियाँ कैसे होती हैं, यह भी ज़्यादा पता नहीं था। मगर बेटे के लिए कुछ तो कहना था।

उसने शुरू की।

“बेटा, बहुत पुरानी बात है। एक राज्य में तीन राजकुमार थे।”

बच्चे ने आँखें मूँदीं। माँ ने आगे कहा।

“उनमें से दो कभी पैदा ही नहीं हुए। और तीसरा तो कभी अस्तित्व में आया ही नहीं।”

बच्चा अभी जाग रहा था।

“वो तीनों राजकुमार एक ऐसे शहर में रहते थे, जो कभी बना ही नहीं था।”

माँ रुकी। सोचा, यह सही जा रहा है या ग़लत। फिर भी जारी रखा।

“एक दिन वो तीनों एक जंगल में निकले। वो जंगल उन्होंने अपनी आँखों से नहीं देखा था, क्योंकि उनकी आँखें भी नहीं थीं।”

बच्चा अब थोड़ा शांत होने लगा।

“जंगल में उन्हें एक ऋषि मिले। वो ऋषि कभी थे ही नहीं। उन्होंने तीनों राजकुमारों को कुछ सिखाया। मगर सिखाया कुछ नहीं, क्योंकि कोई था नहीं सिखाने वाला, और कोई था नहीं सीखने वाला।”

बच्चे की साँस लंबी होने लगी।

“तीनों राजकुमार वापस अपने राज्य लौटे। राज्य में कोई राजा नहीं था, क्योंकि राज्य था ही नहीं। तीनों ने राज सँभाला। बहुत न्यायी राजा बने। प्रजा भी ख़ुश थी। प्रजा भी कोई थी नहीं।”

बच्चा सो गया।

माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा। दीया बुझाया। ख़ुद भी लेट गई।

उसे नहीं पता था कि उसने अभी क्या सुनाया है।

मगर वसिष्ठ जी जानते थे।

राम को कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा, “हे राम, यह माँ की कथा बहुत गहरी है। हम सब इसी कहानी में हैं। यह संसार जिसे हम इतना सच मानते हैं – इसके बारे में कोई कहे, ‘कभी हुआ ही नहीं’ – तो हम मानेंगे नहीं। मगर अगर ध्यान से देखो, तो यह संसार ठीक उन तीन राजकुमारों जैसा है। जिन्होंने बनाया, वो भी नहीं हैं। जो भोग रहे हैं, वो भी नहीं हैं। जो कथा कह रही है, वो भी नहीं है।”

“मगर फिर हम क्या हैं?”

“तुम वो हो जो इस कहानी को सुन रहा है।”

राम चुप।

“वो सुनने वाला असली है। बाक़ी सब उसकी छाँव हैं।”

राम ने आँखें मूँदीं। बच्चे की तरह।

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