शुक्र की देह-यात्रा

कथा · १२

शुक्र की देह-यात्रा

ध्यान में बैठा था ऋषि का बेटा। एक अप्सरा उड़ती हुई दिखी। आँख बहक गई। आगे जो हुआ, वो आठ जन्मों की कहानी है। हर एक की अपनी रंगत।

महर्षि भृगु के बेटे थे शुक्र। पिता ने सिखाया था ध्यान करो, मन को थामो, इंद्रियों को रोको। शुक्र सुनते थे, मगर अंदर से वो नौजवान थे। दुनिया देखी नहीं थी।

एक दिन ध्यान कर रहे थे। आँखें मूँदी हुई थीं। तभी ऊपर से एक अप्सरा उड़ी। उसकी पायलें बजीं। शुक्र ने आँखें खोल लीं।

अप्सरा सुंदर थी। बहुत सुंदर। शुक्र ने सोचा, “इसे एक बार देख लूँ, फिर ध्यान शुरू करूँगा।” वो आँखों से उसका पीछा करने लगे।

मन ने रास्ता खोल दिया। वो ख़ुद सूक्ष्म हो गए, अप्सरा के पीछे आकाश में उड़ चले।

देवलोक पहुँचे। अप्सरा का नाम वहाँ पता चला। उसका नाम था विश्वाची। शुक्र ने उसे रिझाया। अप्सरा भी मान गई। दोनों ने वर्षों स्वर्ग के बागों में बिताए।

पहला जन्म: देवलोक

देवलोक में समय अलग चलता है। शुक्र को लगता एक पल के लिए वो वहाँ हैं, मगर उनके लिए साल बीत रहे थे।

विश्वाची से उन्हें संतान हुईं। एक नाद-कन्या जो संगीत में पारंगत बनी। एक पुत्र जो अप्सराओं के मध्य देखा गया।

विश्वाची की उम्र अप्सरा की होती है – लंबी, मगर अनंत नहीं। एक दिन वो भी थक गई। शुक्र ने उसे जाते देखा। पहली बार उन्हें दुख हुआ।

उनकी ख़ुद की अप्सरा-देह भी ख़त्म हो गई। मगर मन एक नया रूप पकड़ने को तैयार था।

दूसरा जन्म: राजा

शुक्र अब एक राजा के बेटे के रूप में पैदा हुए। नाम वसुदेव। राज्य था छोटा, मगर समृद्ध।

शिक्षा हुई – शस्त्र, शास्त्र, राज-नीति। बीस की उम्र में राजा बने।

एक रानी से शादी हुई। तीन बेटे हुए, दो बेटियाँ। राज्य चलाया। पास के राजाओं से युद्ध हुए। कुछ जीते, कुछ हारे।

एक रात नींद में मरे। शांति से।

तीसरा जन्म: ब्राह्मण

तीसरे जन्म में शुक्र एक छोटे से गाँव में ब्राह्मण के घर पैदा हुए। नाम पुरुषोत्तम। पंडित बने। यज्ञ करवाए। शास्त्र पढ़ाए।

पत्नी थी, बेटे थे। ज़िंदगी छोटी मगर पूरी।

चौथा जन्म: भिखारी

चौथे जन्म में बहुत बुरा हुआ। पिता ने माँ को छोड़ा था। माँ ने भी छोड़ दिया। शुक्र (उस जन्म में नाम नहीं था) सड़कों पर पले।

भीख माँगते। गालियाँ खाते। कई बार पिटे। ठंड में काँपते। बीस की उम्र में मरे – कोई कारण नहीं, बस शरीर थक गया था।

यह जन्म छोटा था, मगर भारी।

पाँचवाँ जन्म: बुनकर

पाँचवाँ जन्म एक बुनकर के यहाँ हुआ। नाम वासू। बचपन से कपड़ा बुनना सीखा। हाथ की कला।

एक लड़की से प्यार हुआ। उससे शादी की। दो बच्चे हुए। ज़िंदगी कठिन थी, मगर दिल भरा था।

एक बीमारी में पत्नी गई। उसके बाद वासू भी जल्दी गए। शायद टूटा हुआ दिल जीने नहीं देता।

छठा जन्म: व्यापारी

छठा – व्यापारी। बहुत धन कमाया। तीन देशों में दुकानें। नाम धनेश। शानदार महल। बहुत पत्नियाँ। बहुत बच्चे।

मगर एक रात डाकुओं ने हमला किया। महल लूट लिया। पत्नियाँ कहीं भगाईं। बच्चे कुछ मारे, कुछ ज़िंदा। धनेश ख़ुद डाकुओं से लड़ते हुए मरे।

सातवाँ जन्म: स्त्री

सातवाँ जन्म चौंकाने वाला था। शुक्र की चेतना ने इस बार एक स्त्री-देह पकड़ी।

उनका नाम था कमला। एक मध्यम वर्ग के परिवार में पैदा हुईं। शादी हुई – एक भले आदमी से। बच्चे हुए। घर सँभाला।

स्त्री होने का अनुभव अलग था। ध्यान में आना अलग। समाज से सामना अलग।

कमला बूढ़ी हुईं, मरीं। एक नई समझ लेकर – कि स्त्री और पुरुष होने में फ़र्क़ है, मगर मूल चेतना एक।

आठवाँ जन्म: चांडाल

आठवाँ। एक चांडाल कबीले में पैदा हुए। नाम कतंजे। ज़िंदगी कठिन। पास के गाँव वाले उन्हें “चांडाल” कहकर हटाते।

शिकार करना सीखा। शादी की। बच्चे हुए।

एक दिन कतंजे ने एक यज्ञशाला में चुपके से प्रवेश किया – खाना खोजने। पकड़े गए। ब्राह्मणों ने उन्हें चांडाल जानकर मार-मारकर निकाला।

उन्होंने सोचा, “अब क्या रहा?” चिता पर चढ़ गए।

आग ने छुआ।

वापसी

उधर पिता भृगु ने कुछ देर बाद नज़र दौड़ाई। बेटा ध्यान में था या नहीं? उन्होंने योग-दृष्टि से देखा। शुक्र की देह वहीं थी, ध्यानस्थ। मगर मन कहीं बहुत दूर। पिता हैरान।

योग-दृष्टि से और गहरा देखा। पाया – बेटा कई जन्मों से गुज़र रहा है। एक के बाद एक देह बदल रहा है।

भृगु यम के पास गए। बोले, “मेरा बेटा कहाँ है? उसकी आत्मा कहाँ भटक रही है?”

यम ने उन्हें दिखाया। शुक्र की आत्मा अभी एक चांडाल के शरीर में थी। आठवाँ जन्म, चिता पर खड़ा।

भृगु ने यम से पूछा, “इसकी देह तो वहीं बैठी है, फिर यह यहाँ कैसे?”

यम ने कहा, “मन एक देह से दूसरी में जाता है। देह यहाँ छूट सकती है, और मन वहाँ चलता रह सकता है। समय भी अलग है। यहाँ का एक दिन, वहाँ के हज़ार साल।”

भृगु लौटे। बेटे की देह को छुआ। बोले, “शुक्र, उठो।”

शुक्र की आँखें खुलीं। मगर पहले एक पल रुके। उन्हें लगा कि वो चांडाल हैं, चिता पर खड़े हैं। फिर देह की पहचान बदली। वो शुक्र बने।

“पिताजी?” उनकी आवाज़ काँपी।

“हाँ बेटा।”

“मैंने अभी कई जन्म जिए। एक देवपुत्र, एक राजा, एक ब्राह्मण, एक भिखारी, एक बुनकर, एक व्यापारी, एक स्त्री, एक चांडाल। सब कुछ।

“हर एक में अलग नाम, अलग रिश्ते, अलग सुख-दुख। हर एक मेरा अपना लगता था।”

“तेरी देह यहाँ है। मगर तेरा मन आठ जन्म जी आया है। तेरे लिए हज़ारों साल बीते। मेरे लिए कुछ ही घंटे।”

शुक्र ने हाथ-पाँव छुए। शरीर वैसा ही था। मगर भीतर बहुत कुछ बदल चुका था।

“पिताजी, अब मैं कौन हूँ? वो आठ जन्म असली थे, या यह असली है?”

भृगु ने कहा, “दोनों। और कोई नहीं। मन जिसे पकड़ता है, वो उसके लिए असली है। मगर असल में, सब चेतना के खेल हैं।”

शुक्र ने पिता के पाँव छुए। फिर तपस्या में बैठ गए।

आगे चलकर वो शुक्राचार्य कहलाए, असुरों के गुरु। बहुत बड़े पंडित बने। मगर भीतर से वो कभी पूरी तरह किसी देह को सच नहीं मान सके।

उनके दिल में कमला की संवेदनशीलता थी। कतंजे का चांडाल-दर्द था। धनेश का व्यापार-कौशल। पुरुषोत्तम का शास्त्र-ज्ञान। बुनकर का प्यार। राजा वसुदेव की राजनीति। और सबसे ऊपर – देवलोक की विश्वाची की याद।

एक देह में आठ देहें। एक मन में आठ जीवन।

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, हम जिसे एक जीवन कहते हैं, वो शायद किसी के एक पल का सपना हो। और हमारा एक पल किसी का जीवन। शुक्र की कथा यही दिखाती है।

“और एक बात – हर देह में जीना सीखो। राजा भी, चांडाल भी। पुरुष भी, स्त्री भी। ब्राह्मण भी, भिखारी भी। हर देह की एक सीख है। शुक्र को आठ देहों ने आठ सीखें दीं। तुम्हें भी अनेक देहें मिल चुकी हैं, और मिलेंगी।”

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