कथा · 12
शुक्र की देह-यात्रा
ध्यान में बैठा था ऋषि का बेटा, और तभी एक अप्सरा उड़ती हुई दिख गई, और आँख बहक गई। आगे जो हुआ, वो आठ जन्मों की कहानी है, हर एक की अपनी रंगत।
सरयू पर आधी रात के बाद का समय था, चाँद डूब रहा था, और पानी पर अब हलकी रोशनी बची थी, बाक़ी अँधेरा।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, अगर एक तपस्वी अपने भीतर एक छोटी सी इच्छा भी रखे, तो क्या वो उसे बाँध सकती है?”

वसिष्ठ बोले – “राम, छोटी से छोटी इच्छा भी चेतना को बाँध सकती है, अगर उसमें पूरी जान भरी हो। शुक्र की कथा सुनो। वो भृगु ऋषि के बेटे थे। उन्होंने बस एक अप्सरा को देखा, इतना ही, और फिर वो हज़ारों जन्म भटके।”
पिता और पुत्र
शुक्र भृगु ऋषि के पुत्र थे। भृगु बड़े ऋषि थे, सप्तर्षियों में से एक। उनका आश्रम हिमालय की एक तलहटी में था, जहाँ हवा पतली थी और पास एक झरना था जो पूरे साल बहता रहता था। शुक्र इसी आश्रम में बड़े हुए।
शुक्र पतले थे, पर तेज़ आँखों के। उनके बाल काले और घने थे, और उनकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, पर साफ़ थी। जब वो कोई मन्त्र पढ़ते, तो आश्रम के बाक़ी छात्र रुककर सुनते।
पिता ने उन्हें शुरू से ही तप सिखाया था।
“बेटा, ऋषि होने का मतलब क्या?”
“पिता, ऋषि वो है जो अपने भीतर के सत्य को जान ले।”
“और वो सत्य कहाँ है, उसे किससे ढूँढते हैं?”
“भीतर, और तप से।”

बाईस बरस की उम्र में शुक्र ने अपना अकेला तप शुरू किया। उन्होंने पिता से अनुमति ली और आश्रम छोड़ा, फिर एक बहुत ऊँची पहाड़ की चोटी चुनी और वहीं बैठ गए। आसन जमा, आँखें बन्द कीं, और मन्त्र भीतर उतार लिया।
पहले बरस उनका मन बहुत भागता रहा। पुराने आश्रम की यादें, अपने मित्रों की बातें, और अपनी माँ की वो हँसी जो वो बहुत पहले याद कर चुके थे, सब बार-बार लौट आता। पर शुक्र मन को हर बार वापस मन्त्र पर लौटा लाते।
दूसरे बरस मन कुछ शान्त हुआ। अब वो लम्बे समय तक मन्त्र में रह सकते थे, और बीच-बीच में मन्त्र छूटता भी तो आसानी से लौट आता।
तीसरे बरस के बीच में, एक दोपहर शुक्र हमेशा की तरह बैठे थे, आँखें बन्द, साँस धीमी, मन्त्र भीतर। तभी ऊपर से कुछ गुज़रा।
अप्सरा
शुक्र ने पहले एक सुगन्ध सूँघी, बहुत हलकी, पर ऐसी जो पहाड़ की सूखी हवा में नहीं होती। यह सुगन्ध किसी ऐसे फूल की थी जो उन्होंने पहले कभी नहीं सूँघा था, मीठी पर मिठाई की मिठास से अलग, हलकी पर भीतर तक उतरने वाली। शुक्र ने आँख खोली।
उन्होंने ऊपर देखा।

ऊपर आकाश में, बहुत ऊँचा नहीं, एक अप्सरा उड़ रही थी।

वो साधारण मानवी नहीं थी। उसका देह पारदर्शी और हलका था, जैसे हवा से बना हो। उसके लम्बे बाल पीछे हवा में खुले थे, और उसके कपड़े नीले रंग के थे, पर वो रंग बदलता रहता था, कभी हलका, कभी गहरा, फिर हलका। उसकी कमर पर एक मोती-माला बँधी थी। वो किसी और अप्सरा के साथ हँस रही थी, और उसकी हँसी हवा को छूती हुई शुक्र के कानों तक पहुँची।
शुक्र ने पहले कभी अप्सरा नहीं देखी थी। उन्होंने उनके बारे में सुना ज़रूर था, पर देखी कभी नहीं थी। अप्सरा ने नीचे देखा, शुक्र को देखा, पर वो रुकी नहीं, उड़ती रही। फिर भी एक पल को उसकी आँखें शुक्र की आँखों से मिल गईं।
वो पल बहुत छोटा था, पर वही पर्याप्त था।
अप्सरा बादलों के पीछे चली गई, और शुक्र अपने आसन पर अकेले रह गए।
उन्होंने आँख फिर बन्द की, पर अब मन्त्र पहले की तरह नहीं था। मन्त्र के बीच में अप्सरा का चेहरा आता, फिर मन्त्र, फिर अप्सरा, फिर मन्त्र। मन को एक नया विषय मिल गया था।
शुक्र ने मन को हटाने की बहुत कोशिश की, पर वो नहीं हटा।
रात आई। शुक्र ने ध्यान करने की कोशिश की, पर मन अप्सरा की ओर ही खिंचता रहा। मैं उससे बस एक बार मिलना चाहता हूँ, फिर मैं तप पर लौट आऊँगा।
शुक्र ने अपनी तपस्या रोक दी। उन्होंने अपनी चेतना को अपने देह से अलग किया। यह उन्होंने पहले अभ्यास से सीखा तो था, पर इस तरह कभी नहीं किया था। उनका देह पहाड़ की चोटी पर बैठा रहा, और उनकी चेतना बहुत तेज़ी से ऊपर आकाश में उड़ गई।
स्वर्ग

वो स्वर्ग पहुँचे, और स्वर्ग बहुत बड़ा था। पहले हर तरफ़ प्रकाश था, पर सूरज का प्रकाश नहीं, कुछ और ही। फिर बागीचे आए, और उनमें अलग-अलग रंगों के फूल, कुछ ऐसे रंगों के जो पृथ्वी पर होते ही नहीं। फिर हर तरफ़ संगीत था, पर शोर नहीं, हर ध्वनि अपनी जगह पर। और फिर लोग दिखे, और लोगों में हज़ारों अप्सराएँ।
शुक्र ने उस अप्सरा को ढूँढा। वो एक बागीचे में एक कुण्ड के किनारे मिली, पानी में अपने पैर हलके से डुबाए हुए, और पास उसकी सखी बैठी थी।
शुक्र पास गए, और अप्सरा ने उन्हें देखा।
“आप कौन हैं?”
“मैं शुक्र हूँ, भृगु ऋषि का बेटा।”
“भृगु ऋषि? मैंने उनका नाम सुना है। आप यहाँ क्यों आए हैं?”
शुक्र के पास कोई शब्द नहीं थे।
“मैंने आपको उड़ते हुए देखा था, और मैं पीछे चला आया।”
अप्सरा बोली – “पीछे आ गए? पर क्यों?”
“पता नहीं।”
अप्सरा ने अपनी सखी की ओर देखा, और सखी उठकर उठ गई, शुक्र को उसके साथ अकेला छोड़कर।
अप्सरा बोली – “बैठिए।”
शुक्र बैठ गए।
“शुक्र, क्या आप मुझे जानते हैं?”
“नहीं।”
“फिर पीछे क्यों आए?”
शुक्र ने सिर झुकाया – “क्योंकि आपने मुझे देखा, और मुझे लगा कि मैं और कहीं नहीं जा सकता।”
अप्सरा कुछ देर चुप रही, फिर बोली – “शुक्र, आप ऋषि के बेटे हैं, आपको ऋषि होना चाहिए। आप यहाँ क्यों हैं?”
“मुझे बस एक बार आपको देखना था।”
“देख लिया?”
“हाँ।”
“फिर?”
शुक्र के पास उत्तर नहीं था, उन्हें ख़ुद पता नहीं था कि वो क्या चाहते हैं। अप्सरा ने उन्हें देखा। उनकी आँखों में जो था, वो उनके पिता ने उन्हें नहीं सिखाया था, अब उन्हें वो ख़ुद से सीखना था।
“शुक्र, मैं आपके साथ कुछ देर बैठ सकती हूँ, बस इतना।”
“बस इतना?”
“हाँ। मैं अप्सरा हूँ, मुझे काम है, मैं इन्द्र की सेवा में हूँ।”
वो दोनों बहुत देर बैठे रहे। अप्सरा ने पानी में अपने पैर हलके से हिलाए, और पानी में लहरें उठीं। शुक्र कभी पानी देखते, कभी अप्सरा को।
फिर अप्सरा उठी।
“शुक्र, मुझे जाना है।”
“मैं भी आऊँ?”
“नहीं, आप यहीं रुकिए।”
“पर…”
“शुक्र, यह आपका लोक नहीं है। आप यहाँ रहेंगे तो ज़रूर, पर आपका रहना यहाँ का नहीं होगा। आप ख़ुद को सम्हाल नहीं पाएँगे।”
अप्सरा चली गई, और शुक्र उस कुण्ड के पास अकेले रह गए।
शुक्र ने पानी देखा। अप्सरा के पैरों से उठी हलकी लहर अब भी काँप रही थी, फिर वो भी शान्त हो गई। उन्होंने अपने हाथ देखे। ये वो हाथ नहीं थे जो पहाड़ पर तप करते समय थे, अब उनमें एक कोमलता उतर आई थी, स्वर्ग की हवा का असर।
शुक्र ने सोचा, मुझे लौटना चाहिए।
पर एक पल बाद एक और सोच आई। अप्सरा ने कहा था कि वो आती-जाती रहेंगी, शायद वो आज फिर थोड़ी देर के लिए आएँ।
शुक्र वहीं बहुत देर बैठे रहे, पर अप्सरा नहीं आई।
शुक्र ने सोचा, बस एक रात और, फिर मैं लौट जाऊँगा।
रात आई, और स्वर्ग में रात भी सुन्दर थी, पृथ्वी की रात से बिलकुल अलग।
शुक्र को नींद नहीं आई, तो उन्होंने सोचा कि ध्यान करें। पर ध्यान में भी अप्सरा का चेहरा ही आता रहा।
सुबह अप्सरा आई और उसने शुक्र को देखा।
“शुक्र, आप अब भी यहाँ हैं?”
“हाँ।”
“क्यों?”
“मुझे लौटना ही नहीं है।”
अप्सरा बोली – “शुक्र, आप समझ नहीं रहे। यह स्वर्ग है, यह आपका लोक नहीं।”
“मैं रह सकता हूँ।”
“नहीं।”
पर शुक्र ने उसकी एक न सुनी।
वो बहुत बरस वहीं रुके रहे।
भटकाव
शुक्र ने अप्सरा की बात नहीं मानी और स्वर्ग में ही रुके रहे। रहते-रहते उनका देह बदलने लगा, और वो अप्सरा-समान हलके, पारदर्शी देह में आ गए। पर भीतर वो अभी भी ऋषि-पुत्र थे, और इस देह में रहने में उन्हें एक असुविधा बनी रहती थी।
स्वर्ग में बरस बीतते गए, और स्वर्ग के बरस बहुत लम्बे होते हैं, पृथ्वी के एक बरस के बराबर स्वर्ग की एक रात भी नहीं। शुक्र ने एक देह लिया और बहुत बड़े राज्य के राजा बने। उस राज्य में उन्होंने कई काम किए, कई युद्ध जीते, और कई स्त्रियाँ उनके पास आईं। फिर वो राजा मरा।
शुक्र ने एक और देह लिया और राजकुमार बने। वो छोटे थे, बड़े हुए, पर पुरानी देह की कोई याद उनके पास नहीं थी। फिर वो राजकुमार भी मरा।

शुक्र ने एक और देह लिया और ब्राह्मण बने, फिर मछुआरा, फिर सैनिक, फिर एक स्त्री, फिर एक हाथी, और फिर एक पंछी।
बहुत देह, बहुत जन्म, और बहुत मौतें।
अब एक देह की कथा सुनिए।
एक जन्म में शुक्र एक बड़े साम्राज्य के राजा थे, पर वहाँ उनका नाम शुक्र नहीं था, एक अलग नाम था।
राजा ने पन्द्रह बरस की उम्र में सिंहासन सम्हाला। पहले उन्होंने अपने बीमार पिता की देखभाल की, फिर पिता मरे और बेटे ने राज्य सम्हाल लिया।
राजा ने बहुत बड़े युद्ध जीते, पड़ोसी राज्यों को अधीन किया, और बहुत भूमि पाई।
राजा को बहुत स्त्रियाँ मिलीं, तीन रानियाँ हुईं, और हर एक से बच्चे हुए। राजा ख़ुश था।
पर एक रात राजा अपने महल के छज्जे पर बैठा था और उसने आसमान देखा। उसके भीतर कहीं एक कमी सी थी।
राजा ने सोचा, मेरे पास सब कुछ है, फिर भी कुछ कम लगता है।
राजा ने उस कमी पर ध्यान देना चाहा, पर उसकी रानियाँ, उसके बच्चे और उसके मन्त्री आ गए, और राजा बीच में फँस गया। वो कमी बनी तो रही, पर दब गई।
बहुत बरस बाद राजा बूढ़े हुए। उन्होंने अपने बेटे को सिंहासन दे दिया और ख़ुद अपने महल के एक कोने में रहने लगे।
मरते समय राजा ने एक बात कही – “मुझे लग रहा है कि मैं कोई और था।”
बेटे को बात समझ नहीं आई, उसने कहा – “पिता, आप राजा थे।”
राजा बोले – “शायद।”
फिर वो चले गए।
शुक्र की चेतना ने वो राजा छोड़ा।
फिर एक और देह, एक स्त्री की।
स्त्री एक छोटे से गाँव में रहती थी। उसने अपने पति से प्रेम किया था, और उन्हें दो बच्चे हुए। पर एक बीमारी से दोनों बच्चे चले गए।
स्त्री बहुत रोई।
स्त्री ने अपने पति से कहा – “मुझे लग रहा है कि मैं कोई और थी।”
पति ने कहा – “बावली, तू स्त्री है, मेरी पत्नी।”
स्त्री चुप रही, पर भीतर वही कमी बनी रही।
स्त्री ने अपने जीवन में फिर कोई बच्चा नहीं लिया। पति बूढ़े हुए और चले गए, और स्त्री अकेली बहुत बरस तक रही।
मरते समय स्त्री ने भी वही कहा – “मुझे लग रहा है कि मैं कोई और थी।” पर पास कोई सुनने वाला नहीं था।
शुक्र की चेतना ने वो स्त्री छोड़ी।
फिर एक और देह, एक मच्छर का।
मच्छर का जीवन छोटा था, बस कुछ दिन का, पर मच्छर ने बिना किसी प्रश्न के हर पल अपना जीवन जिया। वो पैदा हुआ, उड़ा, ख़ून पीया, और मर गया। बस इतना ही।
शुक्र की चेतना ने वो मच्छर छोड़ा।
इसके बाद और भी बहुत देह आईं, बहुत-सी।
हर देह में शुक्र यह भूले रहे कि वो शुक्र हैं। हर देह में उनकी एक नई पहचान होती, और हर नई पहचान में पुरानी का कोई निशान न बचता। यह सब बहुत हज़ार बरस तक चलता रहा।
एक राजकुमार का जीवन
शुक्र की एक देह में वो एक राजकुमार थे।
राजकुमार का पिता एक बहुत बड़ा राजा था, और राजकुमार के तीन भाई थे।
बचपन से ही राजकुमार में कुछ ख़ास था। वो अकेला रहता, दूसरे बच्चे खेलते तो वो किताबें पढ़ता, दूसरे बच्चे लड़ते तो वो आसमान देखता रहता।
पिता ने उससे एक बार पूछा – “बेटा, तू कुछ अलग है, तेरे भाई जैसा नहीं।”
राजकुमार ने कहा – “पिता, मुझे लगता है कि मैं कोई और था।”
“क्या मतलब?”
“पता नहीं, बस लगता है।”
पिता ने समझाया – “बेटा, ऐसा सोचना मत। तू मेरा बेटा है, तू राजकुमार है, तेरा अपना जीवन है।”
राजकुमार चुप रहा, पर भीतर वो सोच बनी रही।
राजकुमार बड़ा हुआ, पन्द्रह बरस का। पिता ने उसके लिए एक पत्नी ढूँढी, पर राजकुमार ने मना कर दिया।
“पिता, मैं अभी नहीं।”
“क्यों?”
“मैं अभी तैयार नहीं।”
पिता बोले – “बेटा, ठीक है, तीन बरस, फिर पक्का।”
राजकुमार मान गया।
उन तीन बरसों में राजकुमार ने अपने भाइयों को विवाहित होते देखा और उन्हें बच्चे होते देखे। पर वो ख़ुद वैसा ही रहा, एक छोटे से कक्ष में किताबें पढ़ते और आसमान देखते।
तीन बरस बाद पिता ने फिर बात की।
“बेटा, अब?”
“पिता, मुझे जाने दीजिए।”
“कहाँ?”
राजकुमार बोला – “पिता, मुझे एक तपस्वी बनना है।”
पिता ठिठक गए – “बेटा, तू मेरा बेटा है, तू राजकुमार है।”
“मैं ये सब हूँ, पर भीतर मैं कुछ और हूँ।”
पिता ने बहुत बहस की, और राजकुमार ने सब सुना, पर वो अपने निर्णय पर पक्का रहा।
आख़िर पिता झुक गए – “बेटा, जा। पर अगर रास्ते में थक जाए, तो लौट आना।”
राजकुमार बोला – “पिता, धन्यवाद।”
राजकुमार चल पड़ा।
वो एक जंगल में पहुँचा, वहाँ एक गुफा मिली, और वहीं बैठ गया।
पर अजीब बात थी, राजकुमार को बैठने में मन ही नहीं लगता था। वो बार-बार उठता, चलता, फिर बैठता।
एक दिन एक ऋषि वहाँ से गुज़रे और उन्होंने राजकुमार को देखा।
“बेटा, तू तपस्या के लिए तैयार नहीं।”
राजकुमार चौंका – “क्यों?”
“क्योंकि तेरा देह राजकुमार का है, तेरी आदतें राजसी हैं, तू बैठ नहीं सकता।”
राजकुमार ने पूछा – “तो मैं क्या करूँ?”
ऋषि बोले – “बेटा, घर लौट जा। पहले राजकुमार बन, फिर राजा बन, फिर बूढ़ा हो, फिर तपस्या।”
राजकुमार मान गया और लौट पड़ा।
उसने पिता को देखा और सिर झुकाया – “पिता, मैं वापस आ गया।”
“बेटा।”
“पिता, मुझे विवाह करना है।”
पिता बोले – “बेटा, मुझे यह दिन देखना ही था।”
राजकुमार का विवाह हुआ और उसे बच्चे हुए।
पिता के बाद वो राजा बना और बहुत बरस राज किया।
मरते समय राजा ने एक बात कही – “मुझे लग रहा है कि मैं कोई और था।”
बेटे को बात समझ नहीं आई, उसने कहा – “पिता, आप राजा थे।”
राजा बोले – “शायद।”
फिर वो चले गए।
शुक्र की चेतना ने वो राजकुमार छोड़ा।
एक माँ का जीवन
शुक्र की एक देह में वो एक माँ थी।
वो एक छोटे से गाँव में रहती थी, और उसका पति एक मछुआरा था।
स्त्री ने पाँच बच्चों को जन्म दिया, तीन बेटे और दो बेटियाँ।

स्त्री ने हर बच्चे को बहुत प्रेम किया। रात को उन्हें कथाएँ सुनाती, सुबह उनके लिए खाना बनाती, और दिन भर उन्हें सम्हालती।
स्त्री का जीवन साधारण था, पर भीतर एक बेचैनी सी बनी रहती थी।
एक रात स्त्री ने अपने पति से कहा – “मुझे कभी-कभी लगता है कि मैं कोई और हूँ।”
पति कुछ देर चुप रहा, फिर बोला – “बावली, तू माँ है, मेरी पत्नी।”
स्त्री चुप रही।
पर भीतर वो सोच बनी रही।
एक बार स्त्री के सबसे छोटे बेटे ने एक प्रश्न पूछा – “माँ, क्या तू पहले कोई और थी?”
स्त्री चौंकी – “बेटा, यह बात कहाँ से?”
“माँ, मुझे ऐसा लगता है। मुझे लगता है तू पहले कोई बहुत बड़ी हस्ती थी, कोई और, पर अब तू माँ है।”
स्त्री ने बच्चे को गले लगाया – “बेटा, यह सब बातें मत सोच, मैं तेरी माँ हूँ।”
बच्चा चुप हो गया, पर वो जानता था।
स्त्री बूढ़ी हुई। पति पहले मरा, और बहुत बरस बाद उसका देह छूटा।
मरते समय स्त्री के पास उसका छोटा बेटा था, जो अब बहुत बड़ा हो चुका था।
“माँ, तू कौन है?”
स्त्री बोली – “बेटा, मैं तेरी माँ हूँ।”
“पर भीतर?”
स्त्री कुछ देर चुप रही, फिर बोली – “बेटा, मुझे नहीं पता, पर शायद कोई और।”
बेटा बोला – “माँ, तू जा, जहाँ तेरा घर है।”
स्त्री ने बेटे के सिर पर देर तक हाथ रखा, फिर हाथ हट गया।
शुक्र की चेतना ने वो माँ छोड़ी।
एक तपस्वी का जीवन
शुक्र की एक देह में वो एक तपस्वी थे।
एक पहाड़ पर बहुत बरस का तप।
तपस्वी ने देर तक आँखें बन्द रखीं।
बीच-बीच में उसे पुराने जन्मों की एक झलक मिलती, कभी राजा की, कभी माँ की, कभी मछुआरे की, कभी पंछी की।
तपस्वी ने इन झलकों को देखा, पर उन्हें पकड़ा नहीं।
एक दिन तपस्वी के भीतर एक बात मालूम हुई – “मैं इन सब रूपों से बना नहीं, मैं इन सब रूपों के पीछे हूँ।”
तपस्वी ने आँखें खोलीं और सोचा – “मेरा नाम क्या है?”
पहले उसे अपने तपस्वी जीवन का नाम याद आया, फिर अपने राजा जीवन का, फिर अपने माँ-जीवन का।
पर ये तो सब रूप थे, असली नाम क्या था?
तपस्वी ने देर तक अपने भीतर देखा।
और भीतर से एक हलकी आवाज़ आई – “शुक्र।”
तपस्वी ठिठक गया – “शुक्र?”
आवाज़ ने फिर कहा – “हाँ, शुक्र। तू शुक्र है, भृगु का बेटा।”
तपस्वी की आँखों से बहुत बरस के आँसू बह निकले।
“शुक्र।”
तपस्वी ने अपने इस तपस्वी देह को छोड़ा, और उसकी चेतना हिमालय की ओर उड़ चली।
भृगु
नीचे, पहाड़ पर, शुक्र का असली देह बैठा था। देह वहीं था, आँखें बन्द, साँस इतनी धीमी कि लगभग न के बराबर, पर देह जीवित था। बाहर बहुत साल बीत चुके थे, फिर भी किसी जानवर ने उसे नहीं छुआ था, क्योंकि उसके चारों ओर एक अदृश्य रक्षा थी, जो उसकी अपनी तपस्या से बनी थी।
भृगु ने अपने बेटे को बहुत बरस से नहीं देखा था। पहले वो सोचते रहे कि बेटा तप में डूबा है, उसे न रोकूँ। फिर एक रात उन्हें एक स्वप्न आया जिसमें उन्होंने अपने बेटे को एक अप्सरा के साथ देखा, और तब उन्हें लगा कि कुछ ग़लत है।
एक दिन वो उस पहाड़ की चोटी पर गए और बेटे का देह देखा। देह सुन्दर था, पर ख़ाली, चेतना वहाँ नहीं थी।
भृगु ने पुकारा – “शुक्र।” पर देह ने जवाब नहीं दिया। “शुक्र।” फिर भी कोई जवाब नहीं।

भृगु ने बेटे के माथे पर हाथ रखा। देह तो था, पर भीतर कोई नहीं था। उनका मन भारी हुआ, मेरा बेटा कहाँ है?
भृगु ने पहले अपनी विद्या से देखने की कोशिश की। वो ध्यान में बैठे और अपनी चेतना से बेटे की चेतना को खोजा। बेटे की चेतना मिली ज़रूर, पर वो अप्सरा के साथ थी, फिर एक राजा के रूप में, फिर एक ब्राह्मण के रूप में। भृगु ने ध्यान दिया तो समझे कि बेटा कई जन्मों में बँधा हुआ है।
भृगु का हृदय भारी हो गया। उन्होंने सोचा, मैं ख़ुद उसे लाऊँ? पर पिता का हृदय कितनी देर अकेले यह बोझ सम्हाल सकता है? और भृगु अपने बेटे की चेतना तक पहुँच भी नहीं सकते थे, क्योंकि वो उनकी पहुँच से बाहर थी, अप्सरा के साथ।
तब भृगु यम के पास गए।
भृगु का अनुभव
भृगु अपनी कुटिया लौटे। बेटे का देह वहाँ नहीं था, वो तो पहाड़ पर ही था।
भृगु ने अपनी पत्नी से कहा – “पत्नी, मेरा बेटा खो गया।”
पत्नी सहम गई – “मर गया?”
“नहीं।”
“फिर?”
भृगु कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “पत्नी, हमारा बेटा हज़ारों जन्मों में भटक रहा है।”
पत्नी ने पूछा – “कैसे?”
“एक अप्सरा के पीछे।”
पत्नी की आँखें भीग गईं – “भगवन्, हम क्या करें?”
भृगु बोले – “पत्नी, हम कुछ नहीं कर सकते, बेटे को ख़ुद ही लौटना होगा।”
पत्नी रो पड़ी – “भगवन्, मैं अपने बेटे को कैसे लौटाऊँ?”
“पत्नी, हम बस प्रार्थना कर सकते हैं।”
पत्नी बोली – “मैं प्रार्थना करूँगी।”
फिर बहुत बरस बीते, और पत्नी हर रोज़ प्रार्थना करती – “मेरे बेटे, तू जहाँ भी हो, ख़ुद को याद कर।”
भृगु ने भी प्रार्थना की, पर उनकी प्रार्थना अलग थी – “शुक्र, तुम्हारा देह यहाँ तैयार है। जब तुम तैयार हो, लौट आना।”
बहुत बरस यूँ ही बीत गए।
एक रात पत्नी ने भृगु से कहा – “भगवन्, मेरा देह अब जा रहा है।”
भृगु ने पत्नी को देखा – “पत्नी, अभी नहीं।”
“भगवन्, मेरा समय आ गया।”
“पर बेटा?”
“भगवन्, मैं उसकी प्रतीक्षा अगले जन्म में करूँगी, यहाँ नहीं रुक सकती।”
भृगु चुप रह गए।
पत्नी का देह छूटा, और भृगु अकेले रह गए।
बहुत बरस बीते, पत्नी के बिना, बेटे के बिना।
भृगु ने एक छोटी कुटिया बनाई और रोज़ तप करते, रोज़ बेटे को याद करते।
एक दिन, जब भृगु बहुत बूढ़े हो चुके थे, उन्होंने सोचा – “मेरा समय भी अब आ रहा है।”
तभी बाहर एक आहट हुई, और भृगु ने आँख खोली।
बाहर एक तपस्वी खड़ा था, बहुत बूढ़ा, पतला, सफ़ेद बालों वाला।
भृगु ठिठक गए – “पुत्र?”
तपस्वी बोला – “पिता।”
भृगु की आँखें भीग गईं – “शुक्र, तू लौट आया।”
“हाँ, पिता।”
दोनों कुछ देर चुप रहे।
“पुत्र, माँ नहीं रही।”
“मुझे पता है।”
“कैसे?”
“पिता, माँ मेरे पास आती है, हर रात, और मेरे देह को सम्हाले रखती है।”
भृगु ने कहा – “पुत्र, यह तो बहुत बड़ी बात है।”
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
बहुत देर बाद भृगु ने कहा – “पुत्र, अब एक बात। मेरा समय आ रहा है।”
शुक्र बोले – “पिता, मैं यहाँ हूँ।”
भृगु हलके से हँसे – “पुत्र, अब मैं ख़ुश हूँ। तुम लौट आए, अब मैं जा सकता हूँ।”
शुक्र ने देर तक पिता का हाथ अपने हाथ में लिए रखा।
रात के एक पहर में भृगु का देह छूटा।
शुक्र अकेले रह गए।
बहुत देर तक उन्होंने पिता को देखा, फिर हलके से बोले – “पिता, अब मैं भी आता हूँ, बहुत बरस बाद। पर अभी मेरा काम बाक़ी है।”
यम

यम के लोक में बहुत अँधेरा था, पर वो अँधेरा डरावना नहीं, शान्त था। यम सिंहासन पर बैठे थे, और उनके सामने एक सूची थी जिसमें हर जीव का नाम दर्ज था।
भृगु बोले – “यम, मेरा बेटा कहाँ है?”
यम ने अपनी सूची देखी – “भृगु, आपका बेटा अभी जीवित है, उसका देह उसी पहाड़ पर है।”
“पर देह में कोई नहीं है।”
“क्योंकि उसकी चेतना और जगह है।”
“कहाँ?”
यम बोले – “भृगु, आपका बेटा अप्सरा के पीछे गया और हज़ारों जन्म ले चुका है, हर बार किसी और देह में। उसका आख़िरी देह अभी एक राजकुमार का है।”
“मैं उसे ला सकता हूँ?”
“नहीं, उसे ख़ुद ही आना होगा।”
“कैसे?”
यम ने कहा – “भृगु, आपका बेटा अपनी पुरानी पहचान भूल चुका है, पर वो पहचान कहीं उसके भीतर ही है। उसे ख़ुद ही याद आना होगा कि वो शुक्र है। यह तपस्या से आता है, और तपस्या तब आती है जब उसका जन्म ऐसे जीव में हो जो तपस्या के योग्य हो। आप प्रतीक्षा कीजिए।”
“प्रतीक्षा? कितनी देर?”
“भृगु, समय का यहाँ कोई हिसाब नहीं। पर एक बात मैं कह सकता हूँ। आपका बेटा एक दिन तपस्वी बनेगा, और उस तपस्या में उसे अपना पुराना देह याद आएगा, तब वो लौटेगा।”
“पर तब तक उसका देह?”
“वो वहीं रहेगा। उसके अपने तप से बनी एक अदृश्य रक्षा है, कोई जानवर उसे नहीं छुएगा, कोई पक्षी उस पर घोंसला नहीं बनाएगा।”
भृगु ने पूछा – “यम, मुझे एक बात बताइए। क्या यह मेरी ग़लती है?”
यम कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “भृगु, हर पिता अपने पुत्र की कथा का साक्षी होता है, पर रचयिता नहीं। आपने उन्हें तप सिखाया, उन्होंने तप किया, उन्होंने एक अप्सरा देखी, और उन्होंने अपना मन एक छोटी सी इच्छा में रख दिया। यह उनकी कथा थी, आपकी नहीं।
“पर यह भी सच है कि हर पिता अपने पुत्र की पीड़ा को अपनी पीड़ा बना लेता है। यह स्वाभाविक है। आप दुखी हैं, क्योंकि आपका प्रेम है।”
भृगु ने सिर झुकाया – “धन्यवाद, यम।”
“भृगु, एक बात और।”
“बोलिए।”
“जब आपका बेटा लौटे, तो उसे डाँटिएगा मत। उसकी इच्छा ने ही उसे यह सबक दिया है। अब वो आपसे भी बेहतर समझेगा कि छोटी से छोटी इच्छा क्या कर सकती है, और एक दिन वो इन्हीं बातों का गुरु बनेगा।”
भृगु मान गए और लौट पड़े।
लौटना
हज़ारों बरस बीत गए, और शुक्र की चेतना एक देह से दूसरे देह में जाती रही।
एक दिन वो एक तपस्वी के देह में जन्मे। बचपन से ही उन्हें कुछ अजीब लगता था, जैसे वो किसी और जगह से आए हों। वो दूसरे बच्चों की तरह खेल नहीं पाते थे, और रात को आसमान देखते रहते। तारे देखकर उन्हें कुछ याद आने लगता, पर पूरी तरह नहीं।
जब वो बड़े हुए, तो उन्होंने बहुत बरस तक तप किया।
तप में उन्हें अपनी पुरानी देहें एक के बाद एक याद आने लगीं, एक राजा, एक ब्राह्मण, एक मछुआरा, एक स्त्री, एक हाथी, एक पंछी, बहुत-सी यादें।
फिर उन्हें वो याद आई जो सबसे पहले की थी।
स्वर्ग में वो अप्सरा।
फिर इससे भी पहले की, एक पहाड़ पर तप।
फिर इससे भी पहले की, एक पिता, भृगु, एक माँ, और एक आश्रम।
शुक्र ने इस अवस्था में आँखें खोलीं। उनके सामने उनका अभी का देह था, वो एक तपस्वी थे, भारत के किसी कोने में। पर भीतर अब उन्हें पता था कि वो शुक्र हैं।
उन्होंने अपने इस तपस्वी देह को देखा और सोचा, यह असली देह नहीं है, यह तो बस एक तपस्वी का देह है, यह भी एक रूप ही है। मेरा असली देह कहाँ है?
उन्हें पता था, उस पहाड़ पर, हिमालय में।
शुक्र ने इस देह को छोड़ा, और उनकी चेतना हिमालय की ओर, उस पहाड़ की ओर उड़ चली। दूरी बहुत बरस की थी, पर चेतना के लिए दूरी कुछ भी नहीं।

वहाँ देह बैठा था, अब बहुत पुराना, माथे पर मिट्टी, बालों पर पत्तियाँ, हज़ारों बरस की धूल। पर देह जीवित था, साँस बहुत हलकी चल रही थी। शुक्र ने उस देह में प्रवेश किया।
देह की आँखें खुलीं।
शुक्र ने अपने हाथ देखे, वो काँप रहे थे, खाल पर मिट्टी थी, पत्ते थे, हज़ारों बरस की धूल थी। उन्होंने हलकी सी हलचल की। पर वो शुक्र थे।
पिता-पुत्र
भृगु को ख़बर लगी। उन्हें कैसे लगी, यह कोई नहीं जानता, शायद ऋषियों के पास अपने तरीक़े होते हैं।
वो पहाड़ पर आए। बेटे ने पिता को देखा, और पिता ने बेटे को।
दोनों कुछ देर कुछ नहीं बोले। भृगु को देखकर शुक्र को एक पल लगा कि पिता बहुत बूढ़े हो गए हैं, फिर उन्होंने सोचा, नहीं, पिता तो ऋषि हैं, उनका देह इतनी जल्दी नहीं बदलता। फिर शुक्र ने अपने देह की ओर देखा, उनका अपना देह बहुत पुराना हो चुका था, पर अब उसके भीतर शक्ति लौट रही थी।
“पिता।”
“बेटा।”
“मैं वापस आ गया।”
भृगु हलके से हँसे – “बेटा, तुम कहाँ चले गए थे?”
शुक्र बोले – “पिता, मैंने एक अप्सरा देखी थी और उसके पीछे चला गया। हज़ारों जन्म लिए, फिर एक तपस्वी के देह में मुझे याद आया कि मैं कौन हूँ, और मैं लौट आया।”
बहुत देर तक दोनों कुछ नहीं बोले।
फिर भृगु अपने बेटे के पास बैठ गए – “बेटा, मुझे माफ़ कीजिए।”
शुक्र चौंके – “पिता, क्यों?”
“मैंने आपको तप सिखाया, पर मैंने यह नहीं सिखाया कि तप में सबसे बड़ा ख़तरा क्या है।”
“क्या?”
“छोटी इच्छाएँ। तप में जब मन शान्त होता है, तब छोटी इच्छाएँ बड़ी हो जाती हैं। उन्हें पहचानने की कला सीखनी होती है, और मैंने आपको यह नहीं सिखाई।”
शुक्र हलके से हँसे – “पिता, यह सीखी हुई बात नहीं, यह अनुभव की बात है। मैंने अब अनुभव कर लिया है, अब मुझे पता है।”
भृगु ने अपने बेटे को देखा – “बेटा, यह बात कभी भूल मत जाना। एक छोटी सी इच्छा भी हज़ारों जन्म तक खींच सकती है। तपस्या में इच्छा नहीं रखनी, बस उस चेतना को देखते रहना है जो हर इच्छा से पहले है।”
शुक्र मान गए।
मृत संजीवनी
बहुत बरस बीते, और शुक्राचार्य दानवों के गुरु बने। एक दिन एक बड़े युद्ध में एक दानव-राजा का पुत्र मारा गया।
राजा बहुत दुखी हुआ और शुक्राचार्य के पास आया।
“गुरुदेव, मेरा पुत्र मर गया।”
शुक्राचार्य कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “राजा, क्या आप उसे वापस चाहते हैं?”
राजा ठिठक गया – “गुरुदेव, यह सम्भव है?”
“हाँ।”
“कैसे?”
शुक्राचार्य बोले – “राजा, मेरे पास एक विद्या है, मृत संजीवनी। मैं मरे हुए को जीवित कर सकता हूँ।”
राजा बोला – “गुरुदेव, यह तो बहुत बड़ी विद्या है। मेरे पुत्र को भी?”
शुक्राचार्य कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “राजा, एक बात है। अगर मैं आपके पुत्र को जीवित करूँ, तो वो वही नहीं रहेगा।”
“मतलब?”
“मतलब, उसका देह तो वही रहेगा, पर भीतर कुछ बदल जाएगा। उसे अपने मरने का अनुभव होगा, और वो अनुभव उसे बदल देगा।”
राजा कुछ देर चुप रहा, फिर बोला – “गुरुदेव, फिर भी मुझे वो चाहिए।”
शुक्राचार्य मान गए।
वो राजा के पुत्र के पास गए। पुत्र का शव ज़मीन पर पड़ा था।

शुक्राचार्य ने अपनी विद्या का जाप किया, वो विद्या जो बहुत बरस के अनुभव से आई थी।
कुछ देर बाद पुत्र के देह में हलचल हुई, फिर साँस लौटी, फिर आँखें खुलीं।
पुत्र उठ बैठा, और राजा रो पड़ा।
“पुत्र।”
“पिता।”
पर एक बात थी, पुत्र की आँखों में कुछ अलग था।
पुत्र ने अपने पिता को देखा – “पिता, मैंने कुछ देखा।”
“क्या?”
पुत्र कुछ देर चुप रहा, फिर बोला – “पिता, मैंने अपने देह को छोड़ते हुए देखा। फिर मैं एक ख़ालीपन में था। फिर…”
“फिर?”
“फिर मुझे लगा कि मैं कुछ नहीं हूँ, पर फिर भी हूँ।”
राजा बोला – “पुत्र, यह बात मुझे समझ नहीं आती।”
“पिता, मुझे भी पूरी तरह नहीं। पर भीतर एक शान्ति है।”
राजा ने शुक्राचार्य को देखा – “गुरुदेव, मेरा पुत्र बदल गया है।”
“हाँ।”
“पर मुझे फिर भी वो चाहिए।”
“राजा, यह आप तय करें।”
राजा बोला – “गुरुदेव, धन्यवाद।”
“नहीं, राजा, यह मेरी विद्या है, मेरा काम है।”
राजा अपने पुत्र के साथ लौट गया।
शुक्राचार्य कुछ देर चुप बैठे रहे।
उन्होंने सोचा – “मेरी यह मृत संजीवनी विद्या, यह मुझे क्यों मिली?”
जवाब उनके मन में ही आया – “क्योंकि तुम ख़ुद मरकर लौटे थे। तुमने अपना देह छोड़कर हज़ारों जन्म लिए, और फिर लौटे। यह विद्या तुम्हारा अपना अनुभव है।”
शुक्राचार्य हलके से हँसे – “हाँ, यही।”
वो बहुत बरस दानवों के गुरु रहे और बहुत मरों को जीवित किया।
शुक्राचार्य
शुक्र फिर तप पर बैठे। इस बार उन्होंने आँखें बन्द कीं, मन्त्र शुरू किया, और मन्त्र में डूब गए। जब कोई इच्छा उठती, वो उसे देखते, न उसे रोकते, न उसे अपनाते, बस देखते रहते। इच्छा आती और जाती, और शुक्र वहीं स्थिर रहते।
बहुत बरस बाद उन्हें वो स्थिर चेतना मिली जिसकी प्यास उन्हें शुरू से थी।
फिर एक दिन देवताओं और दानवों के बीच की बात उठी। दानवों के पास कोई गुरु नहीं था, उनके पुराने गुरु जा चुके थे, और उन्हें कोई चाहिए था। दानवों ने तपस्वियों में खोजा और उनकी नज़र शुक्र पर पड़ी।
“शुक्र, हमारे गुरु बनिए।”
शुक्र ने सोचा।
फिर उन्होंने पिता से पूछा – “पिता, दानव मुझे गुरु बनाना चाहते हैं, क्या मैं बनूँ?”
भृगु हलके से हँसे – “बेटा, यह आपका निर्णय है। पर एक बात कहूँ। आपने जो अनुभव पाया है, वो आम तपस्वी से अलग है। आप जानते हैं कि इच्छा क्या करती है, और शायद यही ज्ञान दानवों को चाहिए। दानव इच्छा के साथ रहते हैं, अगर आप उन्हें इच्छा को सम्हालना सिखाएँ, तो शायद वो भी एक दिन…”
शुक्र बोले – “मैं बनूँगा।”
शुक्र दानवों के गुरु बने, और अब उनका नाम शुक्राचार्य हुआ।
उन्हें एक सिद्धि भी मिली। वो ज्योतिष में बहुत निपुण थे, क्योंकि अपनी जन्म-यात्रा में उन्होंने इतने ग्रहों के पीछे देखा था। उनके पास एक अद्भुत विद्या आ गई, मृत संजीवनी, मरे हुए को जीवित कर देने की विद्या। यह विद्या उन्होंने बहुत अकेले संरक्षित रखी।
वो बहुत बरस दानवों के गुरु रहे, और दानव थोड़े बदले, पूरे नहीं, पर थोड़े। शुक्र ने जाना कि जो उन्होंने अनुभव से सीखा था, वो आसानी से सिखाया नहीं जा सकता, हर एक को अपना अनुभव ख़ुद करना पड़ता है।

पर वो रुके नहीं, बहुत बरस तक उन्होंने सिखाया। और एक दिन वो आकाश में चले गए। अब उनका नाम एक तारे का बन गया, शुक्र-तारा, आकाश में सबसे चमकीला, सूर्य के पास। जो दूर से उसे देखते, उन्हें पता ही नहीं था कि वो तारा एक बार एक तपस्वी था, जिसका मन एक अप्सरा पर रुक गया था।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, तो हर इच्छा बाँधती है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हर वो इच्छा बाँधती है जिसमें तुम पूरी तरह डूब जाओ। अगर तुम इच्छा को देख रहे हो, तो वो नहीं बाँधती, पर अगर तुम इच्छा के साथ बह रहे हो, तो वो हज़ारों जन्म खींच सकती है। फ़र्क़ देखने और बहने में है।”
राम ने पानी की ओर देखा – “और पिता-पुत्र की वो बात मुझे भीतर तक छू गई।”
वसिष्ठ बोले – “राम, हर पिता अपने पुत्र की चिन्ता करता है, और हर पिता को लगता है कि वो अपने पुत्र को सब कुछ सिखा देगा। पर एक स्तर पर हर पुत्र को अपना अनुभव ख़ुद करना होता है, और यही बात पिता को सीखनी होती है। भृगु को भी सीखनी पड़ी।”
राम कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, मेरे पिता दशरथ, वो भी एक दिन मुझे जाने देंगे?”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह प्रश्न तुम्हारे जीवन में बाद में आएगा। पर हाँ, हर पिता को एक दिन अपने पुत्र को जाने देना होता है। दशरथ को भी।”
“पर वो दुखी होंगे।”
“हाँ, हर पिता दुखी होता है। पर यही पिता का धर्म है।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, और शुक्र की माँ की कथा। वो माँ अपने बेटे की प्रतीक्षा करती हुई चली गई, और हज़ारों बरस बाद बेटा लौटा, पर माँ नहीं थी। यह बात मुझे बहुत भारी लगी।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह बहुत स्त्रियों की कथा है। माँ अपने बेटे को बहुत बरस याद करती है, पर बेटा अपनी ही कथा में डूबा रहता है, और माँ की प्रतीक्षा उसे बहुत बार दिखती ही नहीं।”
“गुरुदेव, मैं अपनी माँ के साथ कभी ऐसा नहीं करूँगा।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह वादा कठिन है।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारा जीवन तुम्हें बहुत जगह ले जाएगा, और तुम अपनी माँ से बहुत बार दूर होओगे।”
राम ठिठके – “फिर?”
“राम, सबसे अच्छी बात यह है कि जब तुम माँ के पास हो, तब पूरी तरह उनके पास रहो, और जब दूर हो, तब उन्हें अपने भीतर रखो। ये दोनों एक साथ।”
राम मान गए।
राम ने आसमान की ओर देखा। ऊपर एक तारा बहुत चमक रहा था, शुक्र-तारा।
“गुरुदेव, वो तारा, क्या वो अब भी पिता को याद करते हैं?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हाँ। हर तारा अपनी कथा याद रखता है।”
राम देर तक उस तारे को देखते रहे।
“गुरुदेव, मेरी कथा भी एक दिन तारा बनेगी?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हर बड़ी कथा एक तारा बनती है। तुम्हारी कथा भी बनेगी।”
एक हवा चली, और राम के बाल हलके से हिले।
राम ने कहा – “गुरुदेव, शुक्र की कथा में एक और बात है। उन्होंने बहुत बरस बहुत देहों में बिताए, बहुत स्त्रियाँ, बहुत पुरुष, बहुत पंछी, पर भीतर वो एक ही रहे।”
“हाँ।”
“तो हम सब भी ऐसे ही हैं?”
“राम, हम सब। बस हमें यह दिखता नहीं।”
राम कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, इससे एक बात। मेरी पत्नी एक दिन होगी, मेरे बच्चे होंगे। वो भी पहले किसी और देह में थे।”
“हाँ।”
“फिर हमारा मिलना संयोग है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, संयोग जैसा कुछ नहीं होता। हर मिलना किसी पुराने सम्बन्ध से होता है। तुम्हारी पत्नी तुम्हारी पुरानी सम्बन्धी होगी, शायद बहुत जन्म पहले से, और तुम्हारे बच्चे भी।”
राम बोले – “गुरुदेव, यह बहुत गहरी बात है। और जो लोग मेरे जीवन में पीड़ा देंगे?”
“वो भी पुराने सम्बन्धी होंगे। शायद पुराने जन्म में तुमने उन्हें पीड़ा दी हो।”
राम कुछ देर चुप रहे – “गुरुदेव, यह सोच भारी है।”
“हाँ, पर यह सच है।”
राम ने देर तक पानी की ओर देखा।
“गुरुदेव, मैं अब हर मिलने वाले को अलग देखूँगा।”
“कैसे अलग?”
“मैं समझूँगा कि वो मुझसे जुड़ा है, बहुत पुराने से।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह बहुत अच्छी आदत है।”
राम के चेहरे पर एक हलकी मुस्कान आई। फिर उन्होंने ऊपर देखा, जहाँ आकाश में अब एक तारा चमक रहा था, बहुत चमकीला, सूर्य की दिशा में।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 4.5-16 पर आधारित है। शुक्र की देह-यात्रा, और भृगु के द्वारा यम से सहायता माँगना, यह इच्छा और कर्म-बन्ध के सिद्धान्त का सबसे स्पष्ट कथात्मक चित्रण है। शुक्र अन्ततः शुक्राचार्य के रूप में जाने गए, जो दानवों के गुरु थे, और भारतीय परम्परा में एक प्रमुख ज्योतिषीय आकृति हैं। उनकी मृत संजीवनी विद्या उनके अपने मृत्यु-यात्रा से जुड़ी मानी जाती है।
दर्शन-दृष्टि
शुक्र तप में बैठे हैं, पर मन में एक अप्सरा का चित्र अटका है। वो चित्र उन्हें इन्द्र-लोक तक खींच ले जाता है, और एक के बाद एक जन्म-दर-जन्म में बहाता है। उनका मूल देह कहीं तप में सूख रहा है। भृगु अपने बेटे को ढूँढते हैं, यम से उत्तर माँगते हैं, और जब शुक्र अपने देह में लौटते हैं तो वो शुक्राचार्य बनते हैं। कथा यह कहती है कि कामना चेतना को अपने देह से उखाड़कर अनेक देहों में फेंकती है, और जब तक वो कामना न पहचानी जाए, यात्रा थमती नहीं।
फ्रांसीसी दार्शनिक हेनरी बर्गसन (Henri Bergson, 1859-1941) ने अपनी Matter and Memory (1896) में दिखाया कि चेतना और शरीर के बीच का सम्बन्ध एक तरफ़ा नहीं, चेतना अपने आप शरीरों के बीच फैल सकती है, और स्मृति किसी एक मस्तिष्क में बन्द नहीं रहती। शुक्र का अनुभव इसी की पुराण-भाषा है। एक कामना, एक चित्र, एक स्मृति, और चेतना देह के बाहर निकल जाती है, अपना अगला देह ढूँढने।