कथा · १०
प्रह्लाद का अंतर्ध्यान
पिता हिरण्यकशिपु को नरसिंह ने मारा था। प्रह्लाद राजा बना, फिर एक दिन वो भी राज छोड़कर एक गुफा में बैठ गया। बहुत बैठा। इतना कि भगवान विष्णु उसे जगाने आए।
आपने प्रह्लाद की कहानी सुनी होगी। बच्चा था जब उसने भगवान विष्णु का नाम लेना शुरू किया। पिता हिरण्यकशिपु ने उसे मारने की कई कोशिशें कीं। हर बार विष्णु ने बचाया। आख़िर में नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु को मारा।
उसके बाद प्रह्लाद राजा बना। वर्षों तक राज्य चलाया। अच्छा राजा था। प्रजा खुश थी। मगर उसके भीतर एक बेचैनी थी। राज-पाट करना, फैसले लेना, युद्ध जीतना – यह सब उसे एक तरह की धुंध लगती।
एक दिन उसने अपने मंत्रियों से कहा, “मैं कुछ समय के लिए जा रहा हूँ। राज्य आप संभालिए।” और वो एक पहाड़ी गुफा में चला गया।
गुफा में बैठा। साँस को धीमा किया। मन को अंदर मोड़ा।
उसने सोचा, “मैं विष्णु का भक्त हूँ। मगर विष्णु कौन हैं? कहाँ हैं?” वो भीतर ढूँढने लगा।
पहले उसे विष्णु बाहर लगते थे – कहीं वैकुंठ में, चार भुजा वाले, शंख-चक्र-गदा-पद्म लिए हुए। फिर उसने ध्यान में देखा – विष्णु तो उसके अपने हृदय में थे। फिर और गहरा गया – विष्णु उसकी अपनी चेतना थे। फिर और – विष्णु और प्रह्लाद में कोई दो नहीं थे।
“मैं जो हूँ, वही विष्णु हैं।”
यह विचार झटका था। प्रह्लाद ने झटका झेला। फिर शांत हो गया। समाधि में डूब गया।
एक हज़ार साल बीत गए।
उसका शरीर पत्थर सा हो चला। बाल बढ़ गए, घास उग आई उसके चारों ओर। मगर वो जागा हुआ था। बस बाहर का जागना नहीं था।
दुनिया में सब उल्टा-पुल्टा होने लगा। राजा नहीं था, मंत्री लड़ने लगे, सीमाएँ टूटीं। लोग प्रह्लाद को ढूँढने आए। मगर गुफा में वो एक मूर्ति जैसा बैठा था। हिलाते, तो हिलता नहीं।
तब विष्णु स्वयं आए। प्रह्लाद के सामने प्रकट हुए। बोले, “प्रह्लाद, उठो।”
प्रह्लाद ने आँखें खोलीं। मगर अब विष्णु को बाहर देखकर उसे उतना अचंभा नहीं हुआ। उसने मुस्कुराकर कहा, “प्रभु, आप तो भीतर ही थे। बाहर क्यों आए?”
विष्णु हँसे। “तेरे लिए नहीं। बाकी सब के लिए। तुझे राज्य पर लौटना होगा।”
“मगर अब क्या? सब एक ही है।”
“वही तो बात है। जब सब एक है, तो राज्य चलाना भी ध्यान है, मगर तब करो जैसे कोई और कर रहा हो। शरीर चलेगा, फैसले होंगे, मगर भीतर तू एक रहेगा।”
प्रह्लाद उठा। गुफा से निकला। राज्य लौटा। मंत्रियों ने उसे देखा – वही प्रह्लाद, मगर कुछ बदला हुआ। चाल वही, बोल वही, मगर भीतर कुछ खुला हुआ।
उसने राज्य फिर से व्यवस्थित किया। न्याय किया। प्रजा को सुखी रखा। मगर अब उसके भीतर कोई कर्ता नहीं था। बस घटना हो रही थी।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, भक्ति और ज्ञान दो नहीं हैं। प्रह्लाद ने भक्ति से ज्ञान तक की यात्रा की। और ज्ञान के बाद भी भक्त ही रहा। यह उसकी बड़ी बात थी।”
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