प्रह्लाद का अंतर्ध्यान

कथा · 10

प्रह्लाद का अंतर्ध्यान

पिता हिरण्यकशिपु को नरसिंह ने मारा था, और उसके बाद प्रह्लाद राजा बना। फिर एक दिन वो भी राज छोड़कर एक गुफा में जा बैठा, और इतने बरस वहीं बैठा रहा कि आख़िर भगवान विष्णु ख़ुद उसे जगाने आए।

Prince Rama and sage Vasishtha seated together on a mat beneath a tree on the breezy bank of the Sarayu river at dawn, Rama leaning forward asking a question, an ethereal blue Vishnu faintly visible above the treeline; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text

सरयू पर हलकी हवा बह रही थी, और उसी हवा में राम ने पूछा – “गुरुदेव, अगर एक व्यक्ति ज्ञान पा ले, तो क्या उसे राज-काज छोड़ देना चाहिए?”

वसिष्ठ बोले – “राम, यह प्रश्न प्रह्लाद ने भी विष्णु से पूछा था। वो एक दैत्य-राज थे, जो ज्ञान पा चुके थे, और इसीलिए राज-काज छोड़ चुके थे। पर विष्णु ने उन्हें वापस भेजा। यह कथा सुनो।”

दैत्य-राज

प्रह्लाद दैत्यों के राजा थे। उनके पिता हिरण्यकशिपु थे, जिन्हें नरसिंह ने मारा था। पिता बहुत बुरे थे, और उन्होंने तो अपने पुत्र को भी मारने की कोशिश की थी, क्योंकि पुत्र विष्णु का भक्त था। पर हर बार विष्णु ने पुत्र को बचा लिया।

आख़िर पिता मरे, और प्रह्लाद ने राज्य सम्हाल लिया।


प्रह्लाद विष्णु के भक्त थे, पर एक अजीब भक्त। उनकी भक्ति में न रोना था, न धोना। उनकी भक्ति में बस एक चुप समर्पण था।

Young demon-king Prahlada in royal attire offering flowers and a lit lamp at an ornate Vishnu altar in a palace shrine each morning, ministers and attendants waiting respectfully behind pillars; warm painterly classical Indian color illustration, dignified, no text

वो रोज़ सुबह विष्णु की पूजा करते, फिर राज-काज देखते, न्याय करते, और दैत्यों को कई नियम देते। वो दैत्य होकर भी देव-स्वभाव के थे।


प्रह्लाद ने पहले अपने पिता को बहुत बार समझाने की कोशिश की थी। पिता विष्णु के विरोधी थे, और बेटे ने कहा था – “पिता, विष्णु से लड़ना मूर्खता है।” पर पिता ने उसकी एक न सुनी।

आख़िर पिता मरे, और बेटा राजा बना।


इस तरह बहुत बरस बीते, और प्रह्लाद राज्य चलाते रहे। पर भीतर ही भीतर उनके पास एक प्रश्न था।


प्रश्न

मेरा यह जीवन, यह राज्य, यह सब क्या है? मैं आख़िर किस लिए हूँ?


यह प्रश्न उनके भीतर बहुत बरस से था, पर वो उसे दबाते रहे थे।

Prahlada alone at night on a low royal couch, crown set aside, one hand on his chest, gazing upward in solitary self-inquiry by the glow of a single oil lamp; intimate painterly classical Indian color illustration, dignified, no text

एक रात उन्होंने ख़ुद से पूछा – मैं कौन हूँ?


प्रश्न उठते ही प्रह्लाद ने उसका जवाब अपने भीतर ढूँढना शुरू किया।

मैं प्रह्लाद हूँ? पर प्रह्लाद तो एक नाम है, और नाम मैं नहीं हो सकता।

मैं दैत्य हूँ? पर दैत्य तो एक जाति है, और जाति मैं नहीं हो सकता।

मैं हिरण्यकशिपु का बेटा हूँ? पर बेटा तो एक रिश्ता है, और रिश्ता मैं नहीं हो सकता।

मैं विष्णु का भक्त हूँ? पर भक्त तो एक भूमिका है, और भूमिका मैं नहीं हो सकता।

मैं राजा हूँ? पर राजा तो एक पद है, और पद मैं नहीं हो सकता।


प्रह्लाद ने इस प्रकार अपने भीतर खोदना शुरू किया, और एक के बाद एक चीज़ छोड़ती गई।

मैं देह हूँ? पर देह तो बदलता है, बच्चे के देह से बूढ़े के देह तक। तो जो बदलता है, वो मैं नहीं हो सकता।

मैं मन हूँ? पर मन भी बदलता है, एक क्षण ख़ुश तो एक क्षण दुखी। तो जो बदलता है, वो मैं नहीं हो सकता।

मैं भावना हूँ? पर भावना भी तो बदलती है।

मैं विचार हूँ? पर विचार तो आते-जाते रहते हैं।


Prahlada in deep meditation as a serene golden inner light steadies within his chest, surrounding swirls of fading thoughts and changing forms dissolving into a single calm radiance of unchanging witness-consciousness; luminous painterly classical Indian color illustration, dignified, no text

आख़िर वो एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ कुछ नहीं बदलता था। एक स्थिर चेतना, हर बदलाव का साक्षी। वहीं रुककर उन्होंने जाना – मैं यह हूँ।


विथड्रॉल

यह जान कर उनके भीतर एक शान्ति आई, पर साथ ही एक उदासी भी।


उन्होंने सोचा – यह राज-काज जो मैं कर रहा हूँ, यह तो सब एक भ्रम है, एक खेल। मेरा असली स्वरूप तो वो स्थिर चेतना है, और मुझे उसी में रहना चाहिए।

यही सोचकर प्रह्लाद ने राज-काज छोड़ दिया। उन्होंने अपने मन्त्रियों को बुलाया और कहा – “मैं अब राज्य से अलग हो रहा हूँ।”

मन्त्री हैरान रह गए – “महाराज?”

“मेरा कोई पुत्र नहीं है, तो अब आप लोग ख़ुद राज्य देखो। मैं अपने कक्ष में रहूँगा, और मुझे कोई व्यवधान न दे।”


Prahlada seated in lotus posture, eyes closed in deep meditation in a palace chamber, his crown lying discarded on the floor beside him while alarmed ministers gesture in dismay around him; painterly classical Indian color illustration, dignified, no text

प्रह्लाद अपने महल के एक कक्ष में जा बैठे, आँखें बन्द कीं, और ध्यान में डूब गए।


बिखराव

उधर दैत्य-राज्य बिखरने लगा। न राजा था, न न्याय, न कोई निर्णय।


पहले मन्त्री-गण ने राज्य चलाने की कोशिश की, पर वो आपस में सहमत ही नहीं हो पाते थे।

एक मन्त्री कहता – “ऐसा करो।” दूसरा कहता – “नहीं, वैसा।” तीसरा कहता – “दोनों ग़लत।” बहसें तो ख़ूब होतीं, पर निर्णय कोई नहीं होता।


दैत्य आपस में लड़ने लगे, पहले छोटे विवादों पर, फिर बड़े झगड़ों पर।


राज्य की सीमाएँ हिलने लगीं। पड़ोसी राज्यों ने यह मौक़ा देखा और अपनी सेनाएँ भेज दीं, और दैत्य-राज्य ने हार खाई।


प्रजा परेशान हो उठी, व्यापार रुक गया, और सिंचाई का कोई प्रबन्ध न होने से खेत सूख चले।

बच्चे भूखे रह जाते, क्योंकि उनके पिता काम पर नहीं जा रहे थे।


यों कई बरस बीत गए, और प्रह्लाद वहीं बैठे रहे। मन्त्री-गण ने कई बार उन्हें जगाने की कोशिश की, पर प्रह्लाद नहीं उठे।


अराजकता

राज्य और भी बिखरने लगा।


पहले छोटी-छोटी समस्याएँ आईं। कोई कर नहीं भर रहा था, कोई न्याय नहीं माँग रहा था, कोई अपनी समस्या लेकर नहीं आ रहा था, क्योंकि लाने का कोई फ़ायदा ही नहीं था। राजा जो नहीं था।


फिर बड़ी समस्याएँ आईं। दैत्य आपस में लड़ने लगे, पहले शब्दों से और फिर हथियारों से, और बहुत-से दैत्य मारे गए।


सीमाएँ फिर हिलने लगीं। पड़ोसी राज्यों ने मौक़ा देखकर अपनी सेनाएँ भेजीं, और दैत्य-राज्य फिर हार गया और उसकी बहुत-सी भूमि छिन गई।


प्रजा परेशान थी, व्यापार रुका हुआ था, खेतों की सिंचाई नहीं हो रही थी और फ़सलें मर रही थीं। बहुत-से बच्चे भूखे रह रहे थे।


A grieving mother kneeling outside the closed royal chamber doors cradling her dead child and crying out, a withered empty well and broken grain pots nearby, the kingdom in ruin behind her; sorrowful painterly classical Indian color illustration, dignified, no text

एक दिन एक माँ अपने मरे बच्चे को लेकर राज-कक्ष के बाहर आई और पुकारा – “महाराज!” कोई जवाब नहीं आया। उसने फिर कहा – “महाराज, मेरा बच्चा भूखे मर गया!” पर इस बार भी कोई जवाब नहीं आया।


वो माँ अपने मरे बच्चे को गोद में लिए बाहर ही बैठ गई, और देर तक वहीं बैठी रही।

तभी मन्त्री बाहर आए, और माँ को इस दशा में देखकर उससे बोले – “माँ, महाराज अभी यहाँ नहीं हैं।”

“कब लौटेंगे?” उसने पूछा।

“पता नहीं,” मन्त्री ने कहा।


माँ कुछ न बोली, बस अपने बच्चे को उठाया और चली गई।


मन्त्री ने यह सब देखा, और उनकी आँखें भीग आईं।


उन्होंने अपने सहयोगी से कहा – “भाई, यह ऐसे नहीं चल सकता।”

“पर हम करें क्या?” सहयोगी बोला।

“मुझे नहीं पता,” मन्त्री ने कहा।


इस बीच विष्णु को इस सब की ख़बर लग रही थी।


विष्णु

एक दिन यह बात विष्णु तक पहुँची, और उन्होंने स्वर्ग से नीचे देखा।

उन्होंने बिखरा हुआ दैत्य-राज्य देखा, और अपने कक्ष में ध्यान में डूबे प्रह्लाद को भी देखा। विष्णु बोले – “प्रह्लाद आधे ज्ञान में हैं, पूरे में नहीं। मुझे ख़ुद जाना होगा।”


Radiant four-armed blue Vishnu manifesting in the meditation chamber and sitting beside the long-motionless Prahlada whose body is thin from years of stillness, gently calling his name; luminous painterly classical Indian color illustration, dignified, no text

विष्णु प्रह्लाद के कक्ष में प्रकट हुए। प्रह्लाद बहुत बरस से वैसे ही बैठे थे, आँखें बन्द, और साँस इतनी धीमी कि लगभग रुकी हुई थी। विष्णु उनके पास बैठे और पुकारा – “प्रह्लाद।”


प्रह्लाद ने आँख नहीं खोली। विष्णु ने फिर कहा – “प्रह्लाद, उठो।” इस बार प्रह्लाद ने धीरे से आँख खोली और बोले – “भगवन्।”

“प्रह्लाद, तुम यह क्या कर रहे हो?” विष्णु ने पूछा।

प्रह्लाद बोले – “भगवन्, मैं अपनी असली अवस्था में हूँ। मैं वो हूँ, और मुझे अब और कुछ नहीं चाहिए।”

“प्रह्लाद, यह तो ठीक है,” विष्णु ने कहा, “पर तुम्हारा राज्य?”

“भगवन्, राज्य तो माया है। यह सब जो बाहर है, माया है।”


विष्णु बोले – “प्रह्लाद, तुमने जो जाना है, वो आधा ज्ञान है। अब पूरा सुनो।”


पूरा ज्ञान

प्रह्लाद ने अब पूरी आँखें खोलीं और बोले – “बताइए, भगवन्।” विष्णु उनके सामने बैठे।


“प्रह्लाद, तुमने अपने भीतर वो चेतना पहचान ली है जो सब के पीछे है, और यह बहुत बड़ी बात है। पर अब तुम एक नया भ्रम कर रहे हो।

“तुम सोचते हो कि बाहर माया है और भीतर सच है। पर यह भेद ख़ुद माया है।

“भीतर भी चेतना है, बाहर भी चेतना है, और दोनों एक ही हैं।

“जो बाहर है, वो भी तुम हो। तुम्हारा राज्य तुम हो, तुम्हारी प्रजा तुम हो, तुम्हारे दैत्य तुम हो। अगर तुम बाहर को छोड़ दोगे, तो असल में तुम अपने आप को ही छोड़ रहे हो।”


प्रह्लाद ने पूछा – “भगवन्, पर अगर सब चेतना ही है, तो मैं बाहर सम्हालूँ या भीतर?”

“दोनों,” विष्णु ने कहा।

“दोनों कैसे?”


विष्णु बोले – “प्रह्लाद, असली ज्ञान यह नहीं कि तुम बाहर को छोड़ दो। असली ज्ञान यह है कि तुम बाहर में रहो, पर भीतर वैसे ही रहो जैसे अभी हो। दोनों एक साथ।

“कर्म में रहो, पर कर्म तुम्हें न चलाए।

“यही जीवन-मुक्ति है।”


प्रह्लाद ने यह सुना और देर तक चुप रहे।


फिर उन्होंने पूछा – “भगवन्, तो मैं अब क्या करूँ?”

Vishnu standing and gesturing teachingly toward the kneeling Prahlada, explaining liberation-in-action, both bathed in soft divine light with a tray of offered flowers between them; warm painterly classical Indian color illustration, dignified, no text

“उठो, अपना राज्य सम्हालो, और अपनी प्रजा का न्याय करो। पर भीतर वो स्थिर चेतना अपनी रखो। दोनों एक साथ।”

“भगवन्, यह बात मुझे पहले क्यों नहीं समझ आई?”

विष्णु बोले – “प्रह्लाद, यह बात पहले ज्ञान के बाद ही समझ आ सकती है। बिना उस पहचान के अगर तुम राज्य सम्हालते, तो तुम राज्य के ग़ुलाम हो जाते। पर अब तुम राज्य सम्हालोगे, तो राज्य तुम्हारा साधन होगा, बँधन नहीं।”


“भगवन्, मेरे ध्यान में जो शान्ति है, क्या वो बाहर भी रहेगी?” प्रह्लाद ने पूछा।

“हाँ, बस उसका रूप बदल जाएगा।”

“कैसे बदलेगा?”

विष्णु बोले – “प्रह्लाद, ध्यान में शान्ति निष्क्रिय होती है। तुम बैठे रहते हो, कुछ नहीं करते, और शान्त रहते हो। पर बाहर की शान्ति सक्रिय होती है। तुम काम करते रहते हो, फिर भी भीतर शान्त रहते हो। दोनों एक ही शान्ति हैं, बस उनका रूप अलग है।”


प्रह्लाद ने फिर पूछा – “भगवन्, और एक प्रश्न। अगर मैं फिर बाहर में बह गया तो?”


विष्णु बोले – “प्रह्लाद, यह सम्भव है। पर एक बार तुमने अपनी असली स्थिति देख ली है। अब अगर तुम बहोगे, तो तुम्हें पता रहेगा कि तुम बह रहे हो, और यही जानकारी तुम्हारी पकड़ है। इसीलिए तुम लम्बे समय तक नहीं बहोगे।

“और कभी-कभी अगर बह भी जाओ, तो भी ठीक है। उसमें भी एक सीख है।”


प्रह्लाद यह सुनकर देर तक चुप रहे।


लौटना

फिर प्रह्लाद उठे। उन्होंने अपने देह को सीधा किया और आँखें खोलीं। बहुत बरस बैठे रहने से उनके पैर पतले हो गए थे, पर खड़े होने में देर नहीं लगी, क्योंकि देह तप से जवान रहता था।


उन्होंने अपने सेवक को बुलाया। सेवक चकित रह गया, क्योंकि बहुत बरस के बाद उसने महाराज की आवाज़ सुनी थी।

“महाराज,” सेवक बोला।

“मन्त्री को बुलाओ,” प्रह्लाद ने कहा।


मन्त्री आए और बोले – “महाराज?”

“मन्त्री, अब मैं राज्य सम्हालूँगा। बताओ, क्या-क्या बिगड़ा है।”

मन्त्री को पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया, फिर उसके चेहरे पर एक हँसी आ गई – “महाराज, बहुत कुछ बिगड़ा है। पर अब आप यहाँ हैं, तो सब ठीक हो सकता है।”

“मैं यहाँ हूँ,” प्रह्लाद ने कहा।


मन्त्री ने राज्य की बातें बतानी शुरू कीं, बहुत-सी बातें और बहुत-सी समस्याएँ। प्रह्लाद ने एक-एक करके सब सुनीं, और फिर एक के बाद एक निर्णय देते गए।


मन्त्री ने ध्यान दिया कि महाराज अब पहले से अलग हैं। पहले प्रह्लाद कभी-कभी क्रोधित होते थे, अब नहीं होते। पहले वो कभी-कभी जल्दबाज़ी में निर्णय लेते थे, अब नहीं लेते। पहले वो कभी-कभी अपने अहम् से बात करते थे, अब नहीं करते। अब वो पूरी तरह शान्त थे।


राज्य

Elder Prahlada restored on his throne in a flourishing court, citizens bringing baskets of grain and offerings, a mother holding a healthy child in the foreground, fields and markets thriving beyond the palace; abundant painterly classical Indian color illustration, dignified, no text

प्रह्लाद ने राज्य को फिर से खड़ा किया। सबसे पहले उन्होंने सेना ठीक की, दूसरे राज्यों से सन्धि की, और जो भूमि छिनी थी, वो वापस ले ली। फिर उन्होंने सिंचाई का प्रबन्ध किया और खेतों में पानी पहुँचाया। फिर व्यापार सम्हाला और बाज़ार खुले, और फिर शिक्षा की ओर ध्यान दिया और बच्चों के लिए स्कूल खोले।


इस तरह बहुत बरस बीते, और राज्य फिर से समृद्ध हो गया।


प्रजा ने अब एक नया प्रह्लाद देखा। पहले वो प्रजा से दूर रहते थे, पर अब वो हर सप्ताह एक दिन एक खुले दरबार में प्रजा से मिलते, जहाँ कोई भी आ सकता था। लोग आते, अपनी समस्याएँ बताते, प्रह्लाद उन्हें सुनते और फिर समाधान देते। उनकी आँखों में अब पहले जैसी कोई दूरी नहीं थी।


एक बार एक बच्चा आया और बोला – “महाराज।”

“बोलो, बेटा,” प्रह्लाद ने कहा।

“मेरे पिता मर गए, मेरी माँ अकेली है, और हमारे पास खाना नहीं है।”

प्रह्लाद ने उसकी बात सुनकर कहा – “बेटा, राज्य का खज़ाना तुम्हारे लिए खुला है। मन्त्री, इन्हें हर महीने अनाज भेजना। और बच्चा बड़ा हो रहा है, तो इसे एक स्कूल में डालो।”

बच्चे की आँखें भीग आईं और वो बोला – “महाराज, धन्यवाद।”

“बेटा, धन्यवाद की क्या ज़रूरत। यह तो तुम्हारा अधिकार है।”


बच्चा चला गया। मन्त्री ने प्रह्लाद को देखा और बोला – “महाराज, आप पहले से बहुत बदल गए हैं।”

प्रह्लाद बोले – “मन्त्री, बदला नहीं हूँ। बस अब मैं पूरा हूँ, पहले आधा था।

“और एक बात।”

“बोलिए।”

“नरसिंह के बाद का प्रह्लाद का जीवन हम बहुत कम सुनते हैं।”

“हाँ।”

“क्यों?”


वसिष्ठ बोले – “राम, क्योंकि नरसिंह वाली कथा बहुत नाटकीय है। उसमें पिता है, पुत्र है, युद्ध है, चमत्कार है। लोग वही याद रखते हैं।

“पर प्रह्लाद की असली कथा तो वो है, जो उसके बाद हुई। जब वो दैत्यों के राजा बने, जब वो विष्णु से मिले, और जब वो जीवन-मुक्त बने।

“यह कथा कम सुनी जाती है, पर ज़्यादा गहरी है।”


राम बोले – “गुरुदेव, यह बहुत सच है।”

“राम, और एक बात,” वसिष्ठ ने कहा, “प्रह्लाद की कथा से एक सबक मिलता है।”

“बताइए।”


“जब तुम्हारी ज़िन्दगी में कुछ बहुत बड़ा होगा, चाहे वो अच्छा हो या बुरा, तो लोग उसी बड़ी घटना को याद रखेंगे।

“पर तुम्हारी असली कथा तो वो है, जो उस घटना के बाद घटती है। तब तुम क्या बने।

“उसी से तुम्हें मापा जाएगा।”


राम बोले – “गुरुदेव, मेरे पिता का राज्य बहुत बड़ा है, और शायद मेरी कथा भी बड़ी होगी। पर मेरी असली कथा?”

“वो उसके बाद की होगी,” वसिष्ठ ने कहा।


राम कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, मुझे यह बात समझ आ रही है।”


और एक बात

कुछ देर दोनों चुप रहे।


फिर राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या जीवन-मुक्ति पाया हुआ व्यक्ति हमेशा शान्त रहता है?”

वसिष्ठ बोले – “राम, नहीं।”

“फिर?”

“राम, जीवन-मुक्त का देह भी तो मनुष्य का ही होता है। उसे भी कभी ग़ुस्सा आता है, कभी दुख, कभी ख़ुशी।

“पर उसके भीतर एक स्थिर चेतना रहती है, जो इन सब को देखती रहती है।

“वो स्थिर चेतना कभी नहीं हिलती, पर ऊपर की हलचलें होती रहती हैं।”


राम ने पूछा – “प्रह्लाद को भी?”

“हाँ, प्रह्लाद को भी।”

“उन्हें क्या आता था?”


वसिष्ठ बोले – “राम, उन्हें अपने पिता की याद आती थी, बहुत बार।”

“पर पिता तो उनके दुश्मन थे।”

“हाँ, पर थे तो पिता ही।

“प्रह्लाद ने अपने पिता को बहुत बार समझाने की कोशिश की थी, पर पिता नहीं माने।

“और फिर पिता मरे, नरसिंह के हाथों।

“यह पीड़ा प्रह्लाद के भीतर हर रोज़ रहती थी।”


राम कुछ देर ठहर गए, फिर बोले – “गुरुदेव, यह बात मुझे पहले नहीं पता थी।”

“हाँ, यह कथा कम सुनी जाती है।”

“और प्रह्लाद ने फिर क्या किया?”


वसिष्ठ बोले – “राम, प्रह्लाद कभी-कभी अकेले में रोते थे। पर अपने राज्य में वो स्थिर रहते, और प्रजा को कुछ नहीं दिखाते थे। बस एक मन्त्री को पता था। वो प्रह्लाद के साथ बिना कुछ कहे बैठ जाते। प्रह्लाद रोते, फिर शान्त होते, और अगले दिन फिर काम पर लग जाते।”


राम बोले – “गुरुदेव, यह बात बहुत मार्मिक है।”

“हाँ।”

“और मेरे जीवन में?”


वसिष्ठ बोले – “राम, तुम्हारे जीवन में भी ऐसे क्षण आएँगे, तुम्हारी अपनी पीड़ा, तुम्हारे अपने आँसू। पर तुम्हें भी एक मन्त्री मिलेगा, कोई जो तुम्हारे साथ बिना कुछ कहे बैठे। यही मनुष्य का सबसे बड़ा सहारा है।”


जीवन-मुक्त

बहुत बरस तक प्रह्लाद ऐसे ही रहे। राजा, पर राजा नहीं। ध्यानी, पर ध्यानी नहीं। दोनों एक साथ।


एक दिन वो अपने कक्ष में अपने बूढ़े मन्त्री के साथ बैठे थे, और बोले – “मन्त्री, मुझे एक बात बताइए। मेरे राज्य की प्रजा क्या मुझे प्रेम करती है?”

मन्त्री हँसे और बोले – “महाराज, प्रजा आप पर जान देती है। पर एक बात कह दूँ, आप के राज्य में जो प्रेम है, वो आप के लिए नहीं है।”

“फिर किसके लिए है?”

“आप के राज्य की प्रजा एक-दूसरे से प्रेम करती है। और यह आप ने सिखाया है, बिना सिखाए, बस अपने उदाहरण से।”

यह सुनकर प्रह्लाद कुछ देर शान्त रहे।


फिर उन्होंने कहा – “मन्त्री, मेरा समय आ रहा है।”

“महाराज?”

“मैं अब बहुत बूढ़ा हो गया हूँ।”

“पर महाराज, आप तो तप से जवान हैं।”

“हाँ। पर मैंने अब निर्णय कर लिया है। मैं अपना देह छोड़ूँगा।”


मन्त्री कुछ देर कुछ न बोल सका, फिर पूछा – “महाराज, और राज्य?”

“मेरा कोई पुत्र नहीं, पर तुम तो हो। तुम सम्हालना।”

“पर महाराज…”

“मन्त्री, तुम मेरे बेटे जैसे हो। तुम सम्हाल लोगे।”

मन्त्री ने सिर झुका लिया।


प्रह्लाद ने आँखें बन्द कीं, और विष्णु प्रकट हुए।

“प्रह्लाद।”

“भगवन्।”

“समय आ गया है।”

“हाँ।”

“तुम कहाँ जाना चाहते हो?”


प्रह्लाद बोले – “भगवन्, मुझे कहीं नहीं जाना। मैं जहाँ हूँ, वहीं हूँ।”

विष्णु हँसे और बोले – “बहुत अच्छा कहा, प्रह्लाद।”


और प्रह्लाद का देह छूट गया। पर उनकी चेतना कहीं नहीं गई, क्योंकि वो तो हर जगह थी।


राज्य में लोगों ने सुना कि प्रह्लाद ने देह छोड़ दिया, और बहुत रोए। पर कुछ बूढ़े लोग, जिन्होंने प्रह्लाद को बहुत बरस तक देखा था, मुस्कुरा दिए और बोले – “राजा कहीं नहीं गए। वो जहाँ हैं, वहीं हैं।”

राम बोले – “गुरुदेव, मैं समझ गया।”

“क्या समझे?”

“मुझे जब ज्ञान मिलेगा, तब भी मुझे राज-काज नहीं छोड़ना है।”

“बिल्कुल।”

“पर भीतर वो स्थिर चेतना रखनी है।”

“बिल्कुल।”

“और तब मैं अपना राज-काम और अपना मूल स्वरूप, दोनों एक साथ निभा सकूँगा।”

वसिष्ठ बोले – “राम, तुम मुझे आजकल बहुत जल्दी समझ रहे हो।”

राम मुस्कुराए।


“और एक बात, राम।”

“बोलिए।”

“प्रह्लाद का राज्य चलाना उनके देह का काम था, पर उनकी चेतना उससे अलग थी। तुम जब अयोध्या लौटोगे और राज्य चलाओगे, तब भी ऐसा ही होगा। तुम राज्य चलाओगे, पर भीतर तुम वही रहोगे जो हर काम के पीछे है। यह बात भीतर बैठ जाए, तो राज्य का बँधन कम हो जाता है।”


राम ने पूछा – “गुरुदेव, प्रह्लाद का अन्तिम क्षण तो आप ने नहीं बताया।”

“बोलूँ?”

“बोलिए।”


वसिष्ठ बोले – “राम, प्रह्लाद दैत्यों के राज्य में बहुत बरस तक रहे और बहुत बूढ़े हुए। उनके आसपास के लोग बदल गए, नई पीढ़ी आ गई, पर प्रह्लाद वहीं रहे।

“एक दिन उन्होंने अपने सबसे प्रिय मन्त्री को बुलाया, वही जो बहुत बरस से उनके साथ था।

“उन्होंने कहा – मन्त्री, अब समय आ गया। मन्त्री ने सिर झुका लिया।

“प्रह्लाद ने पूछा – मेरे बाद क्या होगा? मन्त्री ने कहा – राज्य चलता रहेगा। यह सुनकर प्रह्लाद हँसे।”


राम ने सुना और पूछा – “फिर?”


वसिष्ठ बोले – “फिर प्रह्लाद अपने कक्ष में गए और आँखें बन्द कीं। बहुत देर तक वो ऐसे ही बैठे रहे, फिर उनके चेहरे पर एक मुस्कान आई, और फिर उनकी साँस रुक गई।

“मन्त्री बाहर रोए, पर भीतर ही भीतर एक ख़ुशी भी थी। क्योंकि उन्हें पता था कि प्रह्लाद कहीं नहीं गए, वो वहीं हैं। बस उनका देह नहीं रहा।”


राम ने फिर पूछा – “और प्रजा?”

“प्रजा बहुत रोई, एक बड़ा राज-शोक हुआ। फिर प्रह्लाद के परिवार से एक नया राजा बना, पर वो प्रह्लाद नहीं था, बस उनकी एक छाया-भर था। क्योंकि प्रह्लाद जैसे राजा एक पीढ़ी में एक ही होते हैं।”


राम बोले – “गुरुदेव, यह कथा सुनकर मुझे एक बात महसूस हो रही है।”

“क्या?”

“मेरे पिता भी एक दिन ऐसे ही जाएँगे, और तब मुझ पर ज़िम्मेदारी आ जाएगी।”

वसिष्ठ बोले – “राम, हाँ। हर पुत्र को एक दिन यह बोझ उठाना पड़ता है। पर तुम तैयार होगे।

“कैसे?”

“क्योंकि तुमने ये कथाएँ सुनी हैं। तुम्हारे भीतर अब प्रह्लाद हैं, शुक्र हैं, लीला है, चूड़ाला है, ये सब हैं। जब तुम पर बोझ आएगा, तब ये सब तुम्हारे साथ होंगे।”

राम बोले – “गुरुदेव, यह बहुत बड़ी बात है।”

“हाँ।”


यह कहकर राम कुछ देर चुप रहे।


साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5.30-41 पर आधारित है। प्रह्लाद का प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर जाना, फिर विष्णु के द्वारा पुनः प्रवृत्ति में लौटाया जाना, यह जीवन-मुक्ति के सिद्धान्त का सबसे साफ़ चित्रण है। यह गीता के कर्मयोग के समानान्तर शिक्षा है। पारम्परिक कथा में प्रह्लाद नरसिंह के द्वारा बचाए जाते हैं। योग वासिष्ठ में वो उसके बाद के जीवन की बात करता है, जो अधिक रहस्यमय और दार्शनिक है।

दर्शन-दृष्टि

प्रह्लाद विष्णु-भक्ति में इतने गहरे उतरते हैं कि बाहर का राज्य छूट जाता है। दैत्य-लोक अराजक हो जाता है। तब विष्णु स्वयं आकर उन्हें जगाते हैं और कहते हैं कि बोध के बाद कर्म त्यागने को नहीं, उसे जागे रहकर करने को है। कथा यह कहती है कि अन्तर्मुख और बहिर्मुख का द्वैत बोध के बाद नहीं रहता, जीवन्मुक्त वही है जो भीतर शान्त रहकर बाहर का काम करता रहे।

स्वामी विवेकानन्द (1863-1902) ने अपनी Karma Yoga (1896) में बार-बार यही बात रखी, कि सच्ची भक्ति या सच्चा ज्ञान कर्म से भागने का बहाना नहीं बनता, उल्टे वो कर्म को निष्काम बना देता है। उनके अनुसार जीवन्मुक्त वही है जो बाज़ार, राजसभा, और श्मशान में एक-सा रहे। प्रह्लाद की कथा उनके लिए एक ठोस उदाहरण थी, कि भक्ति का चरम अन्तर्मुख-समाधि नहीं, बोध के बाद का स्वाभाविक कर्म है।