राजा लवण की वो एक रात
इन्द्रजालिक (magician) एक काला घोड़ा लेकर दरबार में आया। राजा घोड़े पर चढ़े, और एक रात में सौ बरस जिए। पर बाद की एक खोज ने सब बदल दिया।

वसिष्ठ ने एक छोटी साँस ली। पास के बबूल से एक पत्ता टूटकर पानी पर गिरा, थोड़ी देर तैरा, फिर बह गया।
“राम, यह प्रश्न जितना सीधा है, उतना ही गहरा है। तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर एक कथा में है। एक राजा थे, जिन्होंने एक रात में सौ बरस जिए। और जब वो जागे, तो उन्हें यह तय करने में बरसों लगे कि सच क्या है। सुनो उनकी कथा। फिर हम तुम्हारे प्रश्न पर लौटेंगे।”
राम बैठ गए, एक ओर हाथ टिकाकर। पानी का बहाव धीमा था।

“उत्तर पाण्डव देश में,” वसिष्ठ ने कहना शुरू किया, “एक राजा थे, नाम था लवण। राजा लवण हरिश्चन्द्र के वंश से, सूर्यवंशी राजा थे। उनके राज्य की सीमा पर पहाड़ थे, बीच में नदी थी, और राजधानी में एक ऐसा दरबार था जिसकी जाली पर पड़ती दोपहर की रोशनी देखकर परदेसी भी कुछ देर के लिए चुप हो जाते थे।”
इन्द्रजालिक
लवण के दरबार में उस दिन कोई ख़ास बात नहीं थी। दोपहर का पहर ढल रहा था। मंत्री अपनी पोथियाँ खोलकर बैठे थे, कोषाध्यक्ष कुछ हिसाब पढ़ रहा था, सेनापति ने अभी-अभी सीमा से एक संदेश दिया था, और लवण अपने सिंहासन पर थोड़ा झुककर सुन रहे थे। एक हाथ चन्दन की मूठ पर, दूसरा घुटने पर। उनकी उम्र अधेड़ की ओर जा रही थी। कनपटी के बाल हलके सफ़ेद हो चले थे। उनकी आँखों में वो थकान थी जो ऐसे राजा की होती है जिसने बहुत कुछ देख लिया है और अब उसे आश्चर्य कम होता है।
दरबार में दूर तक चाँदी के दीप जल रहे थे। हालाँकि बाहर दिन था, क्योंकि जाली से छनकर आती रोशनी अकेले काफ़ी नहीं थी। ऊँचे झरोखों से एक हलकी हवा आ रही थी जो कभी-कभी दीपों की लौ को हिला देती थी। बाहर के कबूतर बहुत दूर से सुनाई दे रहे थे। मंत्री किसी सिंचाई की बात कह रहे थे।
तभी द्वारपाल ने आगे क़दम बढ़ाया। उसकी आवाज़ में हलकी हिचक थी।
“महाराज, एक व्यक्ति बिना सूचना के दरबार में आ गया है। कह रहा है, आपको कुछ दिखाना है।”
लवण ने धीरे से सिर उठाया। मंत्री रुक गए। सेनापति ने अपनी तलवार की मूठ पर हाथ रखा, बस आदत से।
“आने दो,” लवण ने कहा।
द्वार खुला। एक बूढ़ा आदमी भीतर आया।
बूढ़ा कहना ठीक नहीं होगा। उम्र थी उसके चेहरे पर, पर हड्डियों में नहीं। दाढ़ी हलकी सफ़ेद, कनपटी पर बँधी एक काली पट्टी, हाथ में लकड़ी की कोई पुरानी छड़ी जिस पर तीन-चार मनके बँधे थे। पैर नंगे। कपड़े साधारण, लेकिन उन कपड़ों में कुछ ऐसा था जैसे वो धूल से ऊपर हों, जैसे धूल ने भी उनसे कुछ दूरी रखी हो। उसकी चाल में जल्दबाज़ी नहीं थी। दरबार के बीच आकर वो रुका और बिना अदब के लवण की ओर देखा। आँखें हलकी थीं, हँसती नहीं थीं पर चुप भी नहीं थीं।

“महाराज,” उसने कहा। आवाज़ बैठी हुई थी, लेकिन हर शब्द बीच के खाली में अपने आप अपनी जगह पकड़ रहा था। “मैं इन्द्रजालिक (जादूगर) हूँ। दूर से आया हूँ। आपके दरबार में बहुत कुछ है, बहुत बड़े-बड़े आदमी हैं, हीरे-जवाहर हैं। पर एक चीज़ है जो शायद आपने नहीं देखी।”
मंत्री ने हलका सा खाँसा। सेनापति का हाथ अब भी तलवार की मूठ पर था।
लवण ने इन्द्रजालिक को कुछ देर देखा। फिर एक हलकी मुस्कान उनके होंठों के कोने पर आई।
“क्या दिखाना चाहते हो?”
इन्द्रजालिक ने जवाब में कुछ कहा नहीं। उसने अपनी छड़ी ज़मीन पर एक छोटी सी आवाज़ के साथ रखी। फिर अपनी हथेली खोली और कुछ धीमे से ऊपर की ओर बढ़ाई, जैसे किसी अदृश्य परदे को उठा रहा हो।
और दरबार में एक घोड़ा खड़ा था।

मंत्री के हाथ से पोथी ज़मीन पर गिर पड़ी।
घोड़ा वहीं था, इन्द्रजालिक के पीछे, बीच दरबार में, जैसे वो हमेशा से वहीं रहा हो। काला। पूरा काला। इतना काला कि उसकी खाल पर पड़ती दीप की रोशनी रुक जाती थी, जैसे कोई पानी की सतह हो जिसमें रोशनी डूब रही हो। पैर लम्बे, गर्दन ऊँची, अयाल इतनी घनी कि नीचे ज़मीन तक छूती थी। उसकी साँस सुनी जा सकती थी, धीमी और भारी, जैसे कोई जीव-जन्तु जो बहुत दूर का सफ़र तय करके आया है और अब साँस सम्हाल रहा है। उसकी आँखें काली नहीं रह गई थीं। उसकी आँखें भीतर से जलती हुई लग रही थीं, जैसे कोई दीपक जिसकी लौ बाहर से न दिखे।
दरबार में सन्नाटा छा गया। कोई कुछ नहीं बोला। सिर्फ़ घोड़े की साँस सुनाई दे रही थी।
लवण ने इन्द्रजालिक को देखा। फिर घोड़े को। फिर इन्द्रजालिक को।
“यह क्या है?”
“महाराज, यह एक घोड़ा है।” इन्द्रजालिक की आवाज़ में कोई जोश नहीं था, कोई गर्व नहीं। जैसे वो किसी बच्चे को एक पत्थर के बारे में बता रहा हो।
“मैंने कई घोड़े देखे हैं।”
“यह उन सबसे अलग है, महाराज।”
लवण थोड़ा आगे झुके।
“कैसे अलग?”
इन्द्रजालिक ने अपनी छड़ी फिर उठाई, धीरे से, जैसे कोई फूल उठाता हो। उसने घोड़े की ओर एक हाथ बढ़ाया।
“महाराज, इस पर सवार होइए। एक क्षण के लिए। फिर मैं स्वयं बताऊँगा कि यह अलग कैसे है।”
मंत्री ने धीरे से कहा, “महाराज, सावधानी से।”
सेनापति की निगाह में भी वही चेतावनी थी। लवण ने उन्हें देखा, फिर इन्द्रजालिक को।
“तुम कौन हो?” उन्होंने पूछा। यह शायद उन्हें पहले ही पूछना चाहिए था।
“महाराज, मैं इन्द्रजालिक हूँ। और मेरा कोई ऐसा लक्ष्य नहीं है, आपको कोई दुख देने का।”
लवण ने एक पल को घोड़े को फिर देखा। घोड़े की वो आँख जो दीप जैसी थी। फिर वो उठे।
सिंहासन के पास से दो क़दम बढ़ाकर, वह घोड़े तक आए। हाथ बढ़ाकर अयाल को छुआ। अयाल नर्म थी, ठंडी थी, जैसे रात के पानी में डुबोकर निकाली गई हो।

लवण ने काठी की ओर हाथ रखा और एक छलाँग में सवार हो गए।
और दरबार चला गया।
जंगल
पहले रोशनी गई। फिर सुगन्ध। फिर वो हवा जो ऊँचे झरोखों से आ रही थी।
जब उन्होंने आँख खोली, तो वो ज़मीन पर पड़े थे।
ऊपर पेड़ थे। बहुत ऊँचे, बहुत घने, जिनकी पत्तियों के बीच से धूप टुकड़ों में नीचे आ रही थी। हवा में किसी जंगली फूल की गंध थी, मीठी और भीगी, जैसी राजमहल में कभी नहीं आती थी। पास कहीं पानी बह रहा था। किसी पंछी ने पुकारा। दूर से किसी और ने जवाब दिया। कोई कुत्ता भौंका। फिर चुप हो गया।

उन्होंने अपने हाथ देखे।
मिट्टी में सने, काले हाथ। हथेली खुरदुरी, इतनी खुरदुरी कि उँगलियों की पकड़ में अनाज की भूसी जैसी रेखाएँ बन गई थीं। नाख़ून मिट्टी से भरे। उँगलियों पर पुराने घाव के निशान, कुछ पुराने काँटों के, कुछ चाक़ू के।
फिर उनकी नज़र पैरों पर गई। पैर नंगे थे, और तलवों पर ऐसी मोटी खाल जमी थी कि लगा जैसे इन्होंने कभी चप्पल या जूते पहने ही न हों।
अब उन्होंने अपना सीना छुआ। चौड़ा था, पतला था। पसलियाँ हाथ के नीचे महसूस हुईं। और पीछे, कमर पर, एक तीर के सरकंडे का धनुष बँधा था। कमर में एक कपड़े की पट्टी थी जिसमें तीन-चार तीर खोंसे थे। पैर के पास एक मरा हुआ छोटा जानवर पड़ा था, खरगोश जैसा, ख़ून बह चुका था, अब सूख रहा था।
वो थोड़ी देर वैसे ही पड़े रहे। आँखें खुली थीं, पर भीतर कुछ काम नहीं कर रहा था।
लवण? लवण क्या होता है?
उन्होंने यह शब्द भीतर से ढूँढने की कोशिश की। शब्द आया, पर जुड़ नहीं रहा था। जैसे कोई नाम जो किसी और का हो और याद से छूट रहा हो। फिर वो शब्द भी धीरे-धीरे फीका पड़ा।
अब एक और नाम भीतर से उठा। यह उन्हीं के लिए था, पर इस आदमी के लिए जो ज़मीन पर लेटा था, जिसके हाथ काले थे। यह नाम भी पूरा नहीं था। यह नाम जैसे किसी और की आवाज़ में बोला जाता था, किसी औरत की आवाज़ में, जो उन्हें पुकारती थी जब वो देर तक नहीं लौटते थे।
उन्होंने उठने की कोशिश की। पैर थक चुके थे। शायद वो दिन भर से चल रहे थे। उठते समय उनके सीने में हलकी खाँसी उठी और दूर तक छूती हुई गई।
फिर वो खड़े हो गए।
जंगल चारों ओर था। हवा हलकी थी। मरा खरगोश उन्होंने उठा लिया, एक हाथ से, जैसे यह हर रोज़ का काम हो। उन्हें पता था किस दिशा जाना है। यह जानकारी कहाँ से आई, यह उन्हें ख़ुद नहीं पता था। बस आ गई थी, जैसे पानी मिट्टी के बर्तन में रिस आता है।
वो चलने लगे।
पाँव के नीचे सूखे पत्ते टूट रहे थे। हर क़दम पर भीतर कोई आवाज़ कुछ खोता जा रहा था। दरबार की चाँदी की दीपशिखा, जाली की रोशनी, मंत्री की पोथी, अपना सिंहासन, अपनी पगड़ी, अपनी राजमुद्रिका। हर चीज़ धीरे-धीरे ऐसी हो जा रही थी जैसे वो किसी और की कथा थी जिसे उन्होंने कभी बहुत पहले सुना हो। और कथा भी पूरी याद नहीं थी।
जब वो जंगल के किनारे पहुँचे, तो भीतर बस एक थका हुआ शिकारी रह गया था, जिसके कन्धे पर खरगोश था, जिसकी कमर में तीर थे, और जिसके पाँव घर की ओर अपने आप मुड़ रहे थे। लवण नाम कहीं पीछे गिर चुका था।
हारकेयूरी
घर एक झोंपड़ी थी। मिट्टी की दीवारें, ऊपर सूखी घास और पत्तियों की छत, एक तरफ़ एक छोटा सा द्वार जिसमें कपड़े का परदा था। पास एक बोझ-पत्थर पड़ा था जिस पर कोई कुल्हाड़ी की धार लगा करता था। ज़मीन साफ़ की हुई, झाड़ू के निशान। एक कोने में मटकी रखी थी, ऊपर ढक्कन के तौर पर एक पत्ता।
बाहर आग जल रही थी। आग के पास एक औरत बैठी थी।

वो साँवली थी। बहुत साँवली। उसका रंग ऐसा था कि शाम की रोशनी में वो आग और मिट्टी के बीच एक तीसरा रंग बनकर बैठी थी। बाल पीछे एक मोटे जूड़े में बँधे थे, ऊपर एक लाल कपड़े का छोटा सा टुकड़ा बँधा था। एक भौं के ऊपर एक पुराना निशान था, किसी काँटे का या किसी झगड़े का, और उस निशान के कारण उसकी एक भौं हमेशा थोड़ी ऊपर रहती थी, जिससे उसका चेहरा हमेशा थोड़ा प्रश्न पूछता हुआ सा लगता था। उसकी गर्दन लम्बी थी, हाथ पतले पर मज़बूत, उँगलियाँ काली पर तेज़।
वो किसी कन्द को कूट रही थी। उसके सामने मिट्टी का एक कटोरा था जिसमें कुछ हरा रस इकट्ठा हो रहा था। आग की ओर देखे बिना उसने आग को थोड़ा खिसकाया, एक छोटी सी लकड़ी से।
जब शिकारी पास पहुँचा, उसने आँख उठाई।
“लौट आए?” उसने पूछा। आवाज़ ज़्यादा ऊँची नहीं थी, पर हर शब्द भीतर से ठीक से निकल रहा था, जैसे वो कई बरस से बात करना सीख चुकी थी और अब कोई शब्द ज़रूरी हो तभी निकालती थी।
शिकारी ने खरगोश उसके सामने ज़मीन पर रख दिया।
“बस यही?” उसने खरगोश को देखा, फिर शिकारी को।
“दिन में और कुछ नहीं दिखा।”
“नहीं दिखा, या दिखा और तुम सो गए?” उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था। हलकी सी छेड़ थी। उसने एक भौं और थोड़ी ऊपर उठाई।
“दोनों,” शिकारी ने कहा। और अपनी पगड़ी, जो असल में सिर्फ़ एक कपड़े का टुकड़ा थी, उतारकर ज़मीन पर रखी।
औरत के गले से एक धीमी हँसी निकली, जो सीधे चेहरे तक नहीं आई। उसने कन्द कूटना बन्द किया।
“पानी पियो। फिर बैठो।”
उसने मटकी से एक कटोरी पानी निकाला और बढ़ाया। उसका हाथ पास आया तो शिकारी ने एक पल को रुककर उस हाथ को देखा। उँगलियों के पोर पर हरे कन्द का रंग चिपका था।
उसने पानी लिया। पिया।
“बच्चे कहाँ हैं?” उसने पूछा।
“नदी पर। बड़ा लड़का धनुष लेकर गया है, बेटी पीछे, छोटा बेटा भी साथ। शाम तक आ जाएँगे।”
शिकारी बैठ गया। आग के पास, ज़मीन पर। पीठ झोंपड़ी की दीवार से टिकाई।
औरत ने उसे देखा। बहुत देर तक नहीं, बस इतना कि उसका चेहरा देख सके।
“आज तुम कुछ अजीब हो।”
“कैसे?”
“पता नहीं। आँखों में कुछ है। जैसे कुछ देख आए हो।”
शिकारी ने आँखें झुका लीं। कुछ कहा नहीं।
औरत भी कुछ देर चुप रही। फिर उसने कूटना फिर शुरू किया।
“रात को पकाऊँगी,” उसने धीरे से कहा। “बेटी रोज़ कहती है, माँ कुछ नया बनाओ। तो आज यह बनाऊँगी।”
शिकारी ने आग देखी। आग की लौ हवा में हलकी हिल रही थी।
उसके भीतर लवण नाम का कोई अब नहीं था। पर एक चीज़ रह गई थी जो उसे ख़ुद समझ नहीं आ रही थी। एक पुरानी आदत, जैसे किसी और जीवन की किसी आदत का अधूरा हिस्सा। जब उसने औरत की हँसी सुनी, तो उसके भीतर हलकी सी हलचल हुई, जैसे कोई दूर का रिश्ता याद आ रहा हो। पर वो हलचल भी जल्दी डूब गई। औरत ने कन्द कूटना जारी रखा। आग जलती रही। दूर से पंछी आख़िरी बार चहचहाए।
“गुरुदेव,” राम ने यहाँ बीच में रोका। “क्या वो उसे पहचान नहीं रहा था? यह औरत, यह झोंपड़ी, यह जीवन, सब उसके लिए नया था। फिर भी वो ऐसे बैठा था जैसे यह सब उसका हो। यह कैसे संभव है?”
“राम,” वसिष्ठ बोले, “यह बात तुम अपने सपने से समझो। कल रात तुम्हारी माँ चली गई थीं। सपने में तुम जानते थे कि वो तुम्हारी माँ हैं, तुम्हें कोई सोचना नहीं पड़ा। वो जानकारी जिस तरह सपने में आती है, उसका कोई स्रोत नहीं होता। वो सिर्फ़ होती है। लवण के सपने में भी यह झोंपड़ी, यह स्त्री, यह जीवन सब उसके भीतर पहले से था, बिना याद के, बिना सीखे। यही चेतना की पहली शक्ति है। सुनो आगे।”
राम चुप होकर सुनने लगे।
बच्चे शाम को लौटे।
बड़ा लड़का सबसे आगे चल रहा था। चौदह बरस का, अपने पिता के क़द से अब बस थोड़ा छोटा, कन्धों पर पहले से एक मरा हुआ पंछी टँगा हुआ था। चेहरा गम्भीर। वो ज़्यादा हँसता नहीं था। वो उन बच्चों में से था जो बहुत जल्दी समझ जाते हैं कि घर में चीज़ें कितनी कम हैं।
उसके पीछे बेटी थी। ग्यारह बरस की। दौड़ती हुई आई, उसके बालों में सूखे पत्ते अटके हुए थे, हाथ में एक टहनी थी जिस पर उसने जंगल से लाए कुछ छोटे फल अटका रखे थे। उसका चेहरा गोल था, आँखें बड़ी, और जब वो माँ को देखती तो उसकी आँखें संगीत की तरह सुलगने लगती थीं। उसकी हँसी झोंपड़ी की मिट्टी की दीवारों तक नहीं रुकती थी, पड़ोस तक हर तरफ झलकती थी।

पीछे छोटा बेटा था, सात बरस का। चुप चाप पास आया। उसने माँ को देखा, फिर पिता को, और बिना कुछ कहे पिता के पास आकर ज़मीन पर बैठ गया, उसके पैर से अपना घुटना छुआ। उसके बाल माथे पर गिरे थे। उसकी आँखें बड़ी थीं, थोड़ी डरी हुई हमेशा, जैसे वो हमेशा कुछ देख रहा हो जो दूसरों को नहीं दिखता।
“बापू,” बेटी ने टहनी आगे बढ़ाई। “देखो, तीन फल, पूरे लाल।”
शिकारी ने टहनी ली। हाथ में रखी। बेटी का चेहरा देखा।
“बहुत अच्छे हैं।”
“मैंने सबसे पहले देखे थे। भैया कह रहा था, और ऊँचे जाते हैं, और अच्छे होते हैं। मैंने कहा, नहीं, यह वाले अच्छे हैं। और देखो, यह सबसे अच्छे हैं।”
शिकारी ने टहनी से एक फल तोड़ा। बेटी की हथेली पर रखा।
“पहले तुम।”
बेटी ने मना किया।
“नहीं। पहले बापू।”
“पहले तुम।”
“पहले बापू।”
यह बहस रोज़ की थी। आख़िर शिकारी ने फल अपने मुँह में रखा। मीठा था। बेटी ने तुरन्त अपना फल मुँह में रखा और हँसने लगी।
बड़े लड़के ने पंछी ज़मीन पर रखा।
“माँ। यह आज का।”
औरत ने पंछी देखा। बेटे का सिर प्यार से सहलाया, उसकी आँख में हलकी एक चमक थी, गर्व की।
“तेरे हाथ की चोट?”
“ठीक है।”
“दिखा।”
“माँ, ठीक है।”
माँ ने उसकी कलाई पकड़ी। कलाई पर एक खरोंच थी, ख़ून सूख चुका था। उसने एक पल देखा, फिर छोड़ दी।
“रात को थोड़ी हलदी लगा देना।”
“हाँ।”
छोटे बेटे ने एक टहनी से ज़मीन पर लकीर खींची। फिर मिटाई। फिर खींची।
शिकारी ने उसके सिर पर हाथ रखा। बच्चे ने सिर थोड़ा झुकाया, हाथ का बोझ अपनी ओर खींचा। आँखें बन्द नहीं कीं।
रात आई। औरत ने कन्द पकाया। तीनों बच्चे आग के चारों ओर बैठ गए। शिकारी ने बेटी की टहनी अपनी कमर की पट्टी में खोंस ली।
बेटी ने पूछा, “बापू, कल तुम मुझे जंगल ले जाओगे?”
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम अभी छोटी हो।”
“नहीं हूँ। भैया उस उम्र में जाता था।”
“भैया लड़का है।”
“तो?”
शिकारी रुक गया। उसने अपनी बीवी की ओर देखा। बीवी ने भवें ऊपर की।
“देखेंगे,” शिकारी ने कहा।
बेटी हँस पड़ी, क्योंकि उसके लिए यह “हाँ” ही था।
रात देर तक चली। आग के पास सब सोए। शिकारी सबसे आख़िर तक जागा। ऊपर तारे थे, इतने तारे कि उन्हें गिनने का कोई सवाल नहीं था। हवा हलकी थी। उसने अपनी हथेली देखी। काली थी। उसने जाना कि यह उसकी ही हथेली है। और अब उसे यह जानकर अजीब भी नहीं लग रहा था।
लवण नाम धीरे-धीरे डूब गया था। जैसे पानी में रखा गया कोई काग़ज़ धीरे-धीरे डूबता है, पहले हलका होता है, फिर भारी, फिर अदृश्य।
बरस
बरस बीते। नदी कई बार सूखी, कई बार भरी। मौसम बदले। एक मौसम में कुत्ता मरा, दूसरे में नया कुत्ता पाला गया। एक बरस झोंपड़ी का एक हिस्सा गिरा, फिर बना। बड़ा लड़का धनुष में पक्का हो गया। उसकी आवाज़ भारी हुई। कन्धे चौड़े हो गए। वो अब अकेले शिकार पर जा सकता था और अक्सर पिता से पहले लौटता था।
बेटी बड़ी हो गई। ग्यारह से तेरह, तेरह से पन्द्रह। उसकी हँसी अब थोड़ी कम बजती थी, पर जब बजती तो वैसी ही ज़ोरदार थी। उसने माँ से बाँधना सीख लिया। उसने बाल पीछे जूड़े में बाँधना सीख लिया। वो अब पानी का बोझ खुद उठा लेती थी। पर उसकी आँखें वही थीं, हमेशा कुछ पूछती हुई, हमेशा अड़ी हुई।
छोटा बेटा बढ़ा, पर वैसा ही चुप रहा। उसने पढ़ना नहीं सीखा, क्योंकि गाँव में कोई पढ़ाने वाला नहीं था। पर वो टहनियों से ज़मीन पर तरह-तरह की आकृतियाँ बनाता रहता। कभी पंछी, कभी पेड़, कभी कुछ ऐसा जो किसी को समझ नहीं आता। एक बार माँ ने पूछा, “यह क्या है?” तो उसने जवाब दिया, “कुछ नहीं,” और मिटा दिया।
औरत वैसी ही रही। थोड़ी पतली। एक भौं वैसी ही ऊँची। हँसी वैसी ही गले से बाहर आती। शिकारी ने बहुत बार अपने भीतर महसूस किया कि उसने इस औरत के बिना का जीवन नहीं जिया है। उसे लगता था कि वो हमेशा से उसके साथ रही है। उसकी आदतें उसके लिए हवा थीं। उसका हँसना, उसका कन्द कूटना, उसका रात को सोते समय अपने पैर को उसके पैर से छू लेना। यह सब उसके भीतर इतना उतर चुका था कि अलग करना संभव नहीं था।
बीच में एक और बच्चा हुआ। एक छोटी बेटी। दूसरी सर्दी में वो बीमार हुई, बुख़ार उतरा नहीं, और एक रात वो माँ की गोद में ही चल बसी। औरत बहुत देर तक रोई नहीं। वो बस उसे लिए बैठी रही। फिर सुबह उसने उसे एक कपड़े में लपेटा और शिकारी के साथ नदी के पास ले गई। मिट्टी खोदी। शव को नीचे रखा। मिट्टी डाली।
लौटकर औरत ने कन्द कूटना शुरू किया।
“रोओगी नहीं?” शिकारी ने धीरे से पूछा।
औरत ने सिर नहीं उठाया। बस उँगलियाँ कूटती रहीं।
“रोने का वक़्त बाद में आता है,” उसने कहा। “अभी और बच्चे हैं।”
शिकारी ने यह बात समझी नहीं। पर उसने कुछ कहा नहीं।
कई बरस ऐसे बीते जिसमें कुछ ख़ास नहीं हुआ। यही इन बरसों की ख़ास बात थी। उन्होंने जंगल जाना सीख लिया, उन्होंने मौसम पढ़ना सीख लिया, उन्होंने हर साँझ आग के पास साथ बैठना सीख लिया। शिकारी ने एक बार सोचा कि वो ख़ुश है, और फिर उसी क्षण उसने अपने आप से वो शब्द हटा दिया, क्योंकि उस शब्द में कुछ बेईमानी थी। वो ख़ुश नहीं था। वो बस था। और होने में जो शान्ति है, वो उसके भीतर थी।
लवण नाम कहीं ज़मीन के नीचे चला गया था, उस छोटी बेटी के साथ शायद।
सूखा
फिर एक बरस बारिश नहीं आई।
पहले पहले लोगों ने ध्यान नहीं दिया। दूसरे मौसम में थोड़ी हलकी सी आई थी। नदी पतली हुई पर बहती रही। कन्द कम हुए। पंछी कम हुए। पर अभी संकट का नाम किसी ने नहीं लिया।
दूसरे बरस भी बारिश नहीं आई।
अब नदी सच में पतली हो गई। उसके किनारों पर सूखी काई दिखने लगी, मछलियाँ कम हो गईं, कुछ जगहों पर पानी इतना कम हो गया कि बच्चे पार कर जाते थे जहाँ पहले बड़े नहाते थे। जंगल भीतर से बदल गया। पत्ते सूखकर पहले गिरते थे। पंछियों की आवाज़ें बदल गईं। हवा में एक ऐसी सूखी गंध भर गई जिसे पहले कभी इस जंगल में नहीं सूँघा गया था।

तीसरे बरस लोगों ने नाम लिया। सूखा। कुछ बूढ़ों ने कहा, यह वैसा ही है जैसा बहुत बरस पहले एक बार आया था। वो लोग अब नहीं थे, सिर्फ़ उनकी बात बची थी।
शिकारी सुबह जल्दी निकलने लगा। शाम को देर से लौटता। कभी एक छोटा सा खरगोश। कभी एक पंछी। कभी ख़ाली हाथ। बड़ा लड़का अपने तीर लेकर दूसरी दिशा में जाने लगा, कभी-कभी बिना खाए, पूरे दिन। औरत ने अब हर रात कन्द को सबसे पतले हिस्से में काटना सीखा। हर सुबह वो मटकी की नीचे पानी कम होते देखती। कुएँ के पास भीड़ बढ़ती गई। फिर कुछ कुएँ भी सूख गए।
गाँव में पहली मौत बूढ़ी सावित्री की हुई। वो किसी की पत्नी थी, किसी की माँ थी, पर वो अब बहुत साल अकेली रहती थी। एक सुबह उसकी झोंपड़ी से कोई धुआँ नहीं उठा। पड़ोसी ने जाकर देखा। वो अपनी चटाई पर थी, सिर एक ओर लुढ़का हुआ, मुँह थोड़ा खुला।
फिर एक बच्चा। फिर एक और बूढ़ी। फिर एक जवान आदमी, जो कमज़ोर हो चुका था, जिसने पानी पीने से पहले एक रात पास के कुत्ते को अपने थोड़े से बचे आटे का टुकड़ा दे दिया था। उसका देह सुबह ठंडा था।
शिकारी ने अपने बच्चों को कुछ नहीं कहा। पर हर रात आग पास सोते समय वो उन्हें गिनता था। बड़ा, बेटी, छोटा। तीनों साँस ले रहे थे। यह उसकी एकमात्र प्रार्थना थी, बिना शब्दों के।
बेटी अब चुप रहने लगी थी। उसकी हँसी कम हुई। पर उसकी आँखें वैसी ही थीं। एक रात उसने पूछा, “बापू, यह सूखा कब तक रहेगा?”
“पता नहीं।”
“लेकिन एक दिन ख़त्म होगा?”
शिकारी ने सोचा। फिर कहा, “हाँ। एक दिन ख़त्म होगा।”
बेटी शायद समझ गयी। यह उसके लिए शायद काफ़ी था।
छोटा बेटा पहले गया।
वो पहले से कमज़ोर था। हर शरीर अपनी एक सीमा लिए बैठा होता है, और इस बच्चे की सीमा शायद कम थी। उसने कभी ज़्यादा खाया नहीं था, कभी ज़्यादा माँगा नहीं था। उसका शरीर पतला था, हलकी हड्डियों का, और सूखे के तीसरे मौसम में उसकी आँखें भीतर धँस गई थीं। उसकी टहनी अब नहीं दिखती थी, पर वो ज़मीन पर उँगली से ही कुछ बनाता रहता था।
एक रात उसे बुख़ार आया। माँ ने उसे अपने पास लिटाया। माथा छुआ। माथा गरम था। उसने थोड़ा पानी पिलाया। फिर थोड़ी देर सिर पर हाथ रखा।
“माँ,” बच्चे ने कहा।
“बोलो।”
“मैं कुछ नहीं चाहता।”
औरत रुक गई।
“कुछ नहीं?”
“नहीं। सिर्फ़ तुम यहाँ रहो।”
माँ ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। उसका हाथ ठंडा था।
“मैं यहाँ हूँ।”
बच्चा थोड़ी देर चुप रहा। फिर बोला, “बापू कहाँ हैं?”
“बाहर। आग के पास।”
“उन्हें बुलाओ।”
औरत ने शिकारी को बुलाया। शिकारी आया, पास बैठा, बच्चे का दूसरा हाथ पकड़ा।
बच्चा कुछ देर अपने पिता को देखता रहा। फिर बोला, “बापू, मेरे ज़मीन पर वो जो लकीरें थीं, वो कोई पंछी था।”
“कौन सा पंछी?”
“जो मैंने कभी नहीं देखा।”
शिकारी ने धीरे से कहा – “समझा।”
बच्चा फिर चुप हो गया। उसकी साँस धीमी होती गई।
रात के किसी पहर वो साँस लेना भूल गया।
औरत ने बहुत देर तक उसका हाथ छोड़ा नहीं। फिर भी रोई नहीं। शिकारी ने भी नहीं।
बड़ा लड़का दरवाज़े के बाहर खड़ा था। उसकी आँखें सूखी थीं। बेटी पीछे थी। उसने भाई को देखा। फिर ज़मीन देखी।
सुबह तीनों ने मिलकर उसे नदी के पास ले गए। बेटी ने ज़मीन खोदने में मदद की। उसकी छोटी सी हथेलियों में मिट्टी भर गई थी।
लौटकर औरत ने कन्द कूटना शुरू किया।
बड़ा लड़का गया फिर।
वो शिकार पर गया था। शाम तक नहीं लौटा। रात तक नहीं लौटा। शिकारी अगली सुबह उसे ढूँढने निकला। तीन दिन ढूँढता रहा। चौथे दिन उसने उसे पाया। जंगल के एक हिस्से में जहाँ पेड़ कम थे और ज़मीन सूखी थी, वो एक पेड़ के नीचे लेटा था, धनुष पास, तीर बिखरे। उसका मुँह खुला था। होंठ फटे हुए। चेहरे पर मक्खियाँ।
शिकारी कुछ देर खड़ा रहा। फिर वो नीचे बैठा। उसने अपने बेटे का सिर अपनी गोद में लिया। बेटे का चेहरा गन्दा था, बालों में पत्ते थे, मूँछों की हलकी रेखा अभी पूरी नहीं आई थी।
उसे ले जाना था। पर वो उठा नहीं।
वो बहुत देर बैठा रहा।
जब वो उठा, तो उसने बेटे को कन्धे पर उठाया। बेटे का शरीर हलका था। बहुत हलका। शिकारी इस हलकेपन को पहचान नहीं पाया, यह कितना ग़लत लग रहा था।
लौटकर उसने औरत को कुछ नहीं कहा। बस बेटे को ज़मीन पर रखा। औरत ने एक नज़र देखा। फिर मुँह दूसरी ओर कर लिया, थोड़ी देर। फिर लौटी। उसका कुछ नहीं कहा। उसने पानी की एक कटोरी ली और बेटे का मुँह धोना शुरू किया।
बेटी देखती रही। उसकी आँखों में अब वो रोशनी कम थी।
रात को नदी के पास उन्होंने उसे दफ़नाया।
लौटते समय बेटी ने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया।
“माँ।”
“बोलो।”
“क्या मैं अगली हूँ?”
औरत रुक गई। बेटी की तरफ़ देखा।
“नहीं।”
“पक्का?”
“पक्का।”
बेटी कुछ समझी, पर उसने हाथ नहीं छोड़ा।
“गुरुदेव,” राम ने कहा। आवाज़ काँप रही थी। “मुझे यह सुनना भारी पड़ रहा है।”
“राम, भारी पड़ना ज़रूरी है। इस कथा का मर्म इसकी पीड़ा में है। जो यह पीड़ा महसूस नहीं करेगा, उसके लिए लवण का जागना केवल एक चमत्कार रहेगा। जब तुम पीड़ा को इस गहराई तक महसूस करोगे, तब उसके अन्त में जो ज्ञान है, वो तुम्हारी हड्डियों तक उतरेगा। सुनो।”
राम अब ध्यान से सुन रहे थे। पानी की सतह पर एक मछली ने छलाँग लगाई। कोई दूर का पंछी पुकारा।
बेटी अब परिवार में अकेली बची थी।
वो दिन धीमे थे। बहुत धीमे। हर सुबह सूरज वैसा ही चढ़ता था जैसा हमेशा। नदी वैसी ही पतली थी। हवा वैसी ही सूखी। पर भीतर समय जैसे लटक रहा था, पकता हुआ, फटने को तैयार।
बेटी कमज़ोर हो रही थी। यह कोई एक रात की बात नहीं थी। यह कई हफ़्तों का धीमा हलकापन था। उसका रंग बदला नहीं, बस उसकी हडियाँ साफ़ दिखने लगीं। उसकी कलाई पतली हुई। उसकी आँखें बड़ी हुईं, पर उसके पीछे की रोशनी कम हुई।
औरत हर सुबह उसे कन्द का सबसे ऊपरी हिस्सा देती, अपना हिस्सा कम करती। शिकारी कुछ नहीं कहता। उसे पता था कि वो भी अपना हिस्सा कम कर रहा है। यह बात कभी कही नहीं गई। बस हो रही थी।
एक दोपहर बेटी आग के पास बैठी थी। पैर सामने फैलाए। हाथ अपने पेट पर। उसने शिकारी को देखा।
“बापू।”
“बोलो।”
“मुझे भूख लगी है।”
शिकारी ने सिर नहीं उठाया।
“मैं जा रहा हूँ। थोड़ी देर में लौटूँगा।”
“क्या लाओगे?”
“देखेंगे।”
“बापू।”
शिकारी ने आख़िर सिर उठाया।
“बोलो।”
बेटी ने सीधे उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखें अपनी माँ की भौं जैसी थोड़ी ऊँची थीं।
“बापू, कल कुछ मिलेगा?”
शिकारी ने एक पल को साँस रोकी।
“हाँ। कल कुछ मिलेगा।”
बेटी ने मुस्कुराने की कोशिश की। पूरी हो नहीं पाई।
“पक्का?”
“पक्का।”
शिकारी उठा और जंगल की ओर चला।
वो शाम तक चलता रहा। एक भी जीव दिखाई नहीं दिया। नदी के पास पहुँचा, पानी इतना कम था कि पत्थर साफ़ दिख रहे थे। मछलियाँ नहीं थीं। पंछी ऊँचे बादलों के पीछे थे, उन्हें मार पाना संभव नहीं था।
वो रुका। एक पत्थर पर बैठा। उसने अपनी हथेली देखी।
बेटी का चेहरा उसके भीतर बैठा था। उसकी आँखें, उसकी आधी हँसी, उसका अड़ना।
उसने पास के एक पेड़ की छाल खींची। चबाई। फिर थूक दी।
लौटते समय रास्ते में उसे एक छोटा सा कन्द मिला, सूखा हुआ, बस इतना सा कि शायद किसी एक के लिए। उसने उसे खोदा। हाथ में रखा।
घर पहुँचा।
बेटी आग के पास सो रही थी। माँ उसके पास बैठी थी।
शिकारी ने कन्द औरत को दिखाया।
“बेटी को दो।”
“तुम?”
“मुझे बाद में।”
“मैं भी तुम्हारे साथ खाऊँगा।”
“नहीं। बेटी पहले।”
शिकारी ने औरत के हाथ में कन्द रखा। औरत ने उसे आग पर रखा। थोड़ा पकाया। फिर बेटी को जगाया।
“उठो। थोड़ा खा लो।”
बेटी ने आँखें खोलीं। बहुत धीरे से। माँ का चेहरा देखा।
“माँ।”
“बोलो।”
“मुझे भूख नहीं लग रही अब।”
औरत के होंठ कुछ कहने को हिले। पर कुछ कहा नहीं।
“फिर भी थोड़ा खा लो।”
“नहीं।”
“बेटी।”
“नहीं माँ। तुम खा लो। बापू खा लें।”
औरत ने उसे ऊपर उठाया, उसे अपनी छाती से लगाया।
बेटी ने अपनी माँ के कन्धे पर सिर रखा।
“माँ।”
“बोलो।”
“मुझे एक कहानी सुनाओ।”
“कौन सी?”
“कोई भी। तुम कहो। मैं सुनूँगी।”
औरत ने एक कहानी शुरू की। किसी राजा की, किसी रानी की, किसी पंछी की जो जादू से बात कर सकता था। उसकी आवाज़ धीमी थी। उसने कहानी को धीरे-धीरे चलाया, हर शब्द को बेटी की साँस की रफ़्तार से जोड़ा।
बेटी कुछ देर सुनती रही। उसका हाथ माँ की कलाई पर था। हाथ हलका था।
कहानी के बीच में बेटी ने एक बार आँख खोली। शिकारी को देखा।
“बापू।”
“बोलो।”
“कल कुछ मिलेगा?”
शिकारी ने आँख से आँख मिलाई। उसने अपनी पूरी जान लगाई।
“हाँ।”
बेटी ने बहुत हलके से सिर हिलाया, फिर आँखें बन्द कर लीं।
औरत ने कहानी जारी रखी।
रात घनी थी। आग कम होती गई। शिकारी ने आग में लकड़ी डालनी छोड़ दी थी, क्योंकि अब लकड़ी भी कम थी।
औरत की कहानी कहाँ ख़त्म हुई, उसे ख़ुद पता नहीं चला। उसने कुछ देर तक यह जाना नहीं कि वो अब बस गुनगुना रही है, शब्द नहीं हैं। फिर वो भी रुक गई।
बेटी की साँस अब हलकी थी।
औरत ने उसकी कलाई थामी।
कलाई धीमी हुई।
फिर रुकी।
औरत ने उसे कुछ देर वैसे ही पकड़े रखा। अपनी छाती पर। उसकी पीठ पर अपना हाथ रखा। कुछ देर बेटी की पीठ ऊपर-नीचे हुई, पर वो माँ का अपना ही हाथ था जो हिल रहा था।
औरत ने आख़िर में बेटी का सिर वापस अपनी गोद में रखा।
शिकारी आग के पास बैठा रहा। उसने सिर नहीं उठाया।
बहुत देर तक कोई नहीं बोला।
जब बाहर हलकी रोशनी आई, औरत उठी। उसने बेटी को एक कपड़े में लपेटा। शिकारी ने कुदाल उठाई। वो दोनों नदी के पास गए।
मिट्टी खोदी।
बेटी को रखा।
मिट्टी डाली।
पास के तीन छोटे टीले थे अब।
लौटकर औरत आग पास बैठी। उसने कन्द नहीं कूटा। उसने आज पहली बार कुछ नहीं किया।
शिकारी ने उसे देखा।
औरत ने अपनी हथेलियाँ अपनी गोद में रखीं। दूसरी हथेली को पहली हथेली ने ढका। फिर वो आग की ओर देखती रही।
आख़िरी रात
रात आई।
औरत ने शिकारी से कहा, “कल।”
शिकारी ने उसे देखा।
“कल क्या?”
“कल मैं चलूँगी।”
शिकारी कुछ नहीं बोला।
औरत ने अपने जूड़े का कपड़ा खोल दिया, फिर वापस बाँधा।
“तुम जानते हो,” उसने कहा।
“हाँ।”
“मुझे आग चाहिए।”
“मुझे पता है।”
औरत ने एक पल को अपनी आँखें बन्द कीं। फिर खोलीं।
“मैं अब रह नहीं सकती। तीन ज़मीन के नीचे हैं। अब मेरी एक हड्डी भी इस झोंपड़ी में रहना नहीं चाहती। मेरी जगह वहीं है, उन तीनों के पास।”
शिकारी ने कुछ कहा नहीं।
“तुम चाहो तो आना। न आना चाहो तो रुकना। यह तुम्हारा फ़ैसला है।”
“मैं आऊँगा।”
कुछ देर वो दोनों आग के पास बैठे रहे। फिर औरत ने कहा, “एक बात याद रखना।”
“बोलो।”
“मैं तुमसे प्यार करती हूँ। बहुत बरस से करती आई हूँ। एक बार भी मैंने यह कहा नहीं था। आज कह रही हूँ। यह इसलिए नहीं कह रही कि कल मैं जा रही हूँ। यह इसलिए कह रही हूँ कि अब तक यह बात कहने का मौक़ा नहीं आया था।”
शिकारी ने आग देखी। आग की लौ हलकी थी। उसकी आँखों में थोड़ी सी रोशनी पड़ रही थी।
“मैं भी,” उसने कहा। और कुछ नहीं जोड़ा।
औरत हँसी। गले से बाहर वाली हँसी।
“तुम बहुत बात नहीं करते।”
“नहीं करता।”
“पर तुम्हारी चुप्पी अच्छी है। मुझे शुरू से अच्छी लगती थी।”
“पता है।”
“पता है? कैसे?”
“पहले दिन तुमने कहा था। याद नहीं?”
“नहीं।”
“मुझे है।”
औरत ने कुछ देर सोचा, फिर हँसी।
“तो कह दिया तुमने आज। मुझे लगा भूल गए होगे।”
“नहीं भूला।”
औरत चुप हो गई।
रात आगे बढ़ी।
सुबह जल्दी थी।
औरत ने अपनी झोंपड़ी झाड़ दी। उसने कन्द का कटोरा साफ़ करके उल्टा रखा। उसने पानी की मटकी ख़ाली की और उसे एक तरफ़ रखा। उसने अपने जूड़े का लाल कपड़ा खोला, फिर वापस बाँधा, फिर खोला। आख़िर में उसने उसे बिल्कुल नहीं बाँधा, बस ज़मीन पर रख दिया।
शिकारी ने नदी के पास लकड़ियाँ इकट्ठा कीं। उसने जो भी सूखी लकड़ी थी, सब इकट्ठा की। उसने एक चिता बनाई। बेटी की क़ब्र के बग़ल में।
औरत आई।
उसने तीनों टीलों को देखा।
“छोटा,” उसने धीरे से कहा। पहला टीला। फिर बड़ा। फिर बेटी।
उसने मिट्टी पर हाथ रखा। तीनों पर बारी-बारी से। उसकी हथेली देर तक नहीं रुकी।
फिर वो चिता की ओर मुड़ी।
शिकारी ने उसे देखा।
“रुको,” उसने कहा।
औरत रुकी।
शिकारी ने अपने हाथ की पट्टी से बेटी की वो टहनी निकाली। बहुत बरस पहले की टहनी। अब वो टहनी टूटी हुई थी, उसके फल कब के चले गए थे, सिर्फ़ टहनी का छोटा सा हिस्सा बचा था जो उसने अपनी पट्टी में रखे रखा था।
उसने वो टहनी औरत को दी।
“साथ ले जाओ।”
औरत ने टहनी ली और उसे अपनी मुट्ठी में बन्द कर लिया।

फिर वो चिता पर बैठ गई। नीचे की लकड़ियाँ हलकी सी हिलीं। उसने अपनी टाँगें मोड़ीं। हाथ अपनी गोद में रखे, एक हाथ में टहनी।
शिकारी ने आग जलाई।
लौ नीचे से उठी। पहले धीमी। फिर बढ़ी। औरत ने आँखें खोली रखीं। उसने शिकारी को देखा। उसकी एक भौं अब भी थोड़ी ऊपर थी।
“रुक मत जाना यहाँ। तीनों के पास से उठ जाना। ज़िन्दगी बहुत बची है तुम्हारी। पर मेरी जगह यहीं है।”
लौ ने औरत को छुआ।
औरत ने अपनी आँखें बन्द कीं।
शिकारी देखता रहा।
जब आग धीमी हुई, शिकारी ने अपनी पगड़ी का कपड़ा निकाला। उसने अपने ही पैरों के पास एक छोटी सी चिता बनानी शुरू की। उसने सूखी लकड़ी अपने पैरों के नीचे डाली। उसने सब कुछ ठीक से लगाया।
वो बैठने को था।
तभी कुछ हुआ।
जागना
उसकी आँखें खुलीं। दरबार था।
मंत्री, सेनापति, द्वारपाल, सब वहीं। वही दीप, वही जाली पर पड़ती शाम की रोशनी। वही कबूतर बाहर। वही हवा।
और सामने वो इन्द्रजालिक खड़ा था, होंठों पर वही हलकी मुस्कान।
लवण उठ बैठे। हाथ काँप रहे थे।

उन्होंने अपना हाथ देखा। हाथ काला नहीं था। काली खाल नहीं। कोई काँटों के निशान नहीं। अंगूठी थी, राजमुद्रिका, सोने की, हीरे की।
उन्होंने अपने पैर देखे। चप्पल थी। राजसी चप्पल।
उन्होंने अपनी छाती छुई। साँस तेज़ चल रही थी।
मंत्री ने आगे क़दम बढ़ाया।
“महाराज, सब ठीक है?”
लवण ने जवाब नहीं दिया।
उन्होंने इन्द्रजालिक की ओर देखा।
इन्द्रजालिक की मुस्कान वैसी ही थी।
“कितनी देर हुई?” लवण ने पूछा। आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी।
इन्द्रजालिक बोले – “एक रात, महाराज।”
“एक रात।”
“जी, महाराज।”
लवण ने अपनी हथेलियाँ देखीं। अपनी राजमुद्रिका देखी। हीरा बहुत साफ़ था। उसमें दीप की लौ कई बार बँट रही थी।
“एक रात,” उन्होंने फिर कहा। यह सवाल नहीं था। यह कुछ और था।
इन्द्रजालिक ने कुछ नहीं कहा।
मंत्री ने एक क़दम और बढ़ाया।
“महाराज, घोड़ा अब यहाँ नहीं है। आप एक क्षण के लिए जैसे चुप हो गए थे। बस इतना ही।”
“बस इतना ही,” लवण ने दोहराया।
उन्होंने इन्द्रजालिक को फिर देखा। बहुत देर तक देखा।
इन्द्रजालिक ने धीरे से कहा – “महाराज, मैं अब चलूँ?”
“रुको।”
इन्द्रजालिक रुका।
“तुम कौन हो, सच में?”
“महाराज, मैं इन्द्रजालिक हूँ।”
“और जो मैंने देखा?”
इन्द्रजालिक ने एक पल सोचा, फिर कहा।
“महाराज, जो आपने देखा, उसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। एक बात कह सकता हूँ। आप अपने राज्य के बाहर एक तरफ़ देखिए। जहाँ पहाड़ हैं। उन पहाड़ों के पीछे एक जंगल है। उस जंगल में एक छोटा सा गाँव है। वहाँ जो भी है, वो आप देख चुके हैं। आपके राज्य के सिपाही उसे ढूँढ सकते हैं।”
इन्द्रजालिक ने एक बार और सिर झुकाया। फिर वो मुड़ा, और दरबार से बाहर निकल गया। दरवाज़े पर पहुँचकर वो रुका नहीं। एक क्षण को मंत्री ने उसे जाते देखा, फिर लौटकर लवण को देखा। लवण की आँखें इन्द्रजालिक पर नहीं थीं। वो अपनी हथेली देख रहे थे।
तलाश
रात भर लवण नहीं सोए।
अपने कक्ष में वो अकेले बैठे रहे। बाहर पहरेदार थे, पास सोने का बिस्तर था, ऊपर रेशम की चन्दौवा थी। उन्होंने इनमें से किसी को छुआ नहीं।
उनके भीतर एक झोंपड़ी थी, मिट्टी की दीवारें थीं, ऊपर सूखी घास की छत थी। एक औरत थी जो भौं ऊपर करके बैठती थी, एक बेटी थी जो टहनी पर फल लाती थी, एक लड़का था जो धनुष सीख रहा था, एक छोटा बेटा था जो टहनी से ज़मीन पर लकीरें बनाता था।
ये कौन थे?
ये अगर सपना थे, तो उनकी मौत क्या थी? अगर उनकी मौत सपना थी, तो उनके मरने पर जो भीतर टूटा, वो क्या था? और अगर वो टूटना सच था, तो ये भी सच थे।
सुबह उन्होंने अपने सबसे विश्वासी मंत्री को बुलाया।
“पहाड़ों के पीछे,” उन्होंने कहा। “उत्तर की दिशा। वहाँ जंगल है। उस जंगल में चांडाल लोगों का एक गाँव है। मुझे उसकी पूरी जानकारी चाहिए।”
मंत्री ने आदेश स्वीकार किया, यह पूछे बिना कि क्यों।
“महाराज, कब तक?”
“जितना जल्दी हो।”
सिपाही गए। दस दिन उन्हें लगे जाने में, पहाड़ पार करने में, जंगल खोजने में। लवण रोज़ राजकाज में बैठे रहे, पर उनका आधा मन कहीं और था। मंत्री ने एक बार धीरे से कहा, “महाराज थोड़े बदले हुए लगते हैं।” लवण ने इस बात पर कुछ कहा नहीं।
बाईसवें दिन सिपाही लौटे।
मंत्री उनके साथ आए। उनके चेहरे पर एक भाव था जो लवण ने पहले नहीं देखा था।
“महाराज।”
“बताओ।”
“वो गाँव है।”
लवण ने एक पल को साँस रोकी।
“बताओ।”
मंत्री ने सिपाहियों की ओर इशारा किया। सबसे बूढ़े सिपाही ने आगे क़दम बढ़ाया।
“महाराज, हम पहाड़ पार करके जंगल पहुँचे। तीन दिन ढूँढते रहे। चौथे दिन एक छोटा सा गाँव मिला। दस-बारह झोंपड़ियाँ। चांडाल लोगों का। वहाँ सूखा पड़ा था। बहुत बुरा सूखा। कई लोग मर चुके थे। बाक़ी कमज़ोर थे। हमने अनाज बाँटा, पानी बाँटा।”
“और?”
“महाराज, उस गाँव में एक झोंपड़ी थी जो ख़ाली थी। उसके पास तीन छोटे टीले थे। मिट्टी ताज़ी थी, कुछ बरस पुरानी नहीं। और झोंपड़ी के पास, थोड़ी दूर, एक चिता की राख थी। पुरानी। उसके बीच एक छोटी सी टहनी का जला हुआ हिस्सा पड़ा था।”
लवण ने हाथ अपने मुँह के पास लाया।
“और?”
“महाराज, हमने गाँव वालों से पूछा। उन्होंने बताया कि उस झोंपड़ी में एक शिकारी रहता था, उसकी पत्नी हारकेयूरी, और उसके तीन बच्चे। सूखे में बच्चे एक-एक करके चले गए। फिर पत्नी ख़ुद चिता पर बैठ गई। शिकारी अगले दिन से ग़ायब है। कहीं नहीं मिला।”
लवण ने आँखें बन्द कीं। उन्होंने एक हाथ अपने दूसरे हाथ की कलाई पर रखा। वो कलाई जो कभी काली थी।
“और?” उन्होंने आँखें बन्द किए हुए ही पूछा।
“महाराज,” सिपाही ने धीरे से कहा। “एक और बात है।”
“बोलो।”
“उस गाँव में एक छोटी लड़की है। शायद बारह बरस की। वो हारकेयूरी की भतीजी है। उसकी माँ भी सूखे में चली गई। अब वो अपनी एक मौसी के पास रहती है। वो हारकेयूरी जैसी दिखती है, महाराज। बिल्कुल। और उसकी एक भौं हमेशा थोड़ी ऊपर रहती है। उसके बालों में लाल कपड़े का टुकड़ा बँधा है। उसकी आँखें ऐसी हैं जो हमेशा कुछ पूछती हैं।”
लवण की आँखें खुलीं।
वो कुछ देर तक मंत्री को देखते रहे।
“मुझे वहाँ ले चलो,” उन्होंने कहा।
लवण ख़ुद गए।
बिना राजकीय शोभा के। एक साधारण घोड़े पर। तीन सिपाही साथ। मंत्री साथ।
पहाड़ पार करने में पाँच दिन। फिर जंगल। फिर वो गाँव।
जब वो पहुँचे, तो लवण ने घोड़ा रोका।
झोंपड़ियाँ। मिट्टी की। ऊपर सूखी घास की छत। एक ज़मीन के साफ़ की हुई आँगन। एक तरफ़ एक बोझ-पत्थर।
उन्होंने उतरकर पैर ज़मीन पर रखा। पाँव के नीचे की मिट्टी जानी पहचानी थी। उन्हें यह जानने की कोई ज़रूरत नहीं थी कि वो कहाँ हैं।
वो झोंपड़ी की ओर बढ़े। वो ख़ाली थी। द्वार पर अब कोई कपड़े का परदा नहीं था। भीतर मिट्टी पर वही पुराने झाड़ू के निशान।

बाहर तीन छोटे टीले थे।
लवण उनके पास गए। नीचे बैठे। पहले टीले पर हाथ रखा।
“छोटा,” उन्होंने धीरे से कहा।
दूसरे टीले पर हाथ रखा।
“बड़ा।”
तीसरे टीले पर हाथ रखा।
“बेटी।”
उनकी हथेली मिट्टी पर देर तक रही। आँसू बाहर नहीं आए। उनकी पलकें भारी थीं, पर सूखी, जैसे रोने का वक़्त बहुत पहले गुज़र चुका हो।
थोड़ी देर बाद, उनके पीछे एक हलकी सी आहट हुई।
लवण ने मुड़कर देखा।
एक लड़की खड़ी थी। बारह बरस की होगी। साँवली। एक भौं हलकी सी ऊपर। बालों में लाल कपड़े का टुकड़ा। आँखें बड़ी, कुछ पूछती हुई।
लवण उठे। वो उसे देखते रहे।
लड़की ने भी उन्हें देखा। बिना डर के। बिना झुके।
“आप कौन हैं?” उसने पूछा।
लवण ने एक पल को मुँह खोला। पर शब्द नहीं निकले।
“आप राजा हैं?” उसने फिर पूछा।
“हाँ।”
“फिर आप यहाँ क्यों आए हैं?”
लवण ने बहुत धीरे से सिर झुकाया।
“कुछ देखने आया था।”
“क्या?”
लवण ने उसकी ओर देखा। उसकी एक भौं हलकी ऊपर थी।
“तुम्हें।”
लड़की ने सिर एक ओर किया। उसने यह जवाब समझा नहीं। पर उसने पूछा भी नहीं।
लवण ने अपनी राजमुद्रिका उतारी। हीरा वाली। उन्होंने उसे लड़की की हथेली पर रखा।
“यह तुम्हारी मौसी को देना। कह देना, राजा भेज रहे हैं। और कह देना, इस गाँव में जो भी चाहिए, वो आएगा।”
लड़की ने अंगूठी देखी। फिर लवण को।
“लेकिन हमें इसकी ज़रूरत नहीं। हमें खाना चाहिए।”
लवण के होंठों पर एक छोटी सी मुस्कान आई, बहुत बहुत हलकी।
“खाना भी आएगा।”
लड़की ने अंगूठी अपनी मुट्ठी में बन्द कर ली।
लवण ने आख़िरी बार उन तीन टीलों को देखा। फिर मुड़े। वो वापस अपने घोड़े की ओर गए।
जाते-जाते उन्होंने मंत्री से कहा, “अनाज इस सप्ताह में पहुँचना चाहिए। पानी का प्रबन्ध। बीमारों का इलाज। और एक नया कुआँ। इस गाँव में।”
“महाराज, और कुछ?”
लवण रुके। उन्होंने पीछे लड़की को देखा। लड़की वहीं खड़ी थी, मुट्ठी बन्द।
“एक बात और।”
“बोलिए।”
“राज्य में जो भी चांडाल बस्ती है, सबमें एक-एक अन्न का गोदाम बनवाओ। सूखे की हालत में पहले उन तक पहुँचे। और कोई भी अनाथ बच्चा सड़क पर न रहे। उनके लिए एक घर बनवाओ। राजधानी में, और हर बड़े नगर में।”
मंत्री ने आदेश शिरोधार्य किया।
लवण घोड़े पर सवार हुए। उन्होंने पीछे मुड़कर एक बार और देखा।
लड़की वहीं थी। उसकी एक भौं हलकी ऊपर।
घोड़ा चला।
लौटना
राजधानी लौटकर लवण बदले हुए लग रहे थे। पर बदलाव दिखता नहीं था, सुनाई देता था।
वो दरबार में पहले से कम बोलते थे। पर जो बोलते थे, वो हर शब्द किसी जगह से आता था। मंत्रियों ने जल्दी ही सीखा कि महाराज से कोई भी बात अब वैसे ही नहीं कही जा सकती जैसे पहले। उन्हें झूठ नहीं भाता था। बेबुनियाद बात नहीं भाती थी। प्रजा की पीड़ा की जब कोई रिपोर्ट आती, वो उसे पूरी सुनते थे, बीच में नहीं रोकते थे।
राज्य में परिवर्तन धीमे आए। पर वो आए। चांडाल बस्तियों में अनाज के गोदाम बने। अनाथों के लिए घर बने। सूखे की स्थिति में पहले उन तक मदद पहुँचाने का नियम बना। एक नया विधान आया कि कोई भी अधिकारी किसी भी बस्ती को बिना उसकी जाति की जानकारी के सहायता दे, और अगर कोई अधिकारी इस नियम का उल्लंघन करे तो उसका पद जाएगा।
लवण ने एक छोटी सी बात भी की जो कोई नहीं समझा। उन्होंने अपने महल के एक कक्ष को ख़ाली रखवाया। उसमें कुछ नहीं था। बस मिट्टी का फ़र्श, सादी दीवारें। एक कोने में एक मटकी। एक तरफ़ एक चटाई। द्वार पर कोई कपड़े का परदा।
रात को कभी-कभी वो अकेले वहाँ जाते। कुछ देर बैठते। फिर लौट आते।
एक रात मंत्री ने पूछा, “महाराज, यह कक्ष क्या है?”
लवण ने थोड़ा रुककर जवाब दिया।
“एक झोंपड़ी।”
मंत्री ने सिर झुकाया, समझा नहीं, पर पूछा भी नहीं।
राम लम्बे समय तक चुप थे। पानी पर शाम और घनी हो गई थी। सरयू अब काली हो रही थी, बीच में सिर्फ़ कुछ जगहों पर सूरज की आख़िरी पट्टियाँ चमक रही थीं। दूर एक मछुआरे की नाव हलकी हिल रही थी।
“गुरुदेव,” राम ने आख़िर कहा। “वो सपना था या सच?”
वसिष्ठ ने पानी की ओर देखा। फिर राम की ओर।
“राम, वो दोनों था।”
राम ने सुना, पर समझे नहीं।
“लवण के भीतर जो जीवन बीता, वो उनकी अपनी चेतना में बीता। पर उसी समय एक गाँव था, एक स्त्री थी, उसके बच्चे थे, एक सूखा था। वो सब अपनी जगह पर भी था। चेतना जब तीव्र होती है, तो भीतर और बाहर एक ही धागे के दो रंग बन जाते हैं। तुमने सपने में अपनी माँ को खोया। उस क्षण तुम्हारा दर्द वैसा ही था जैसा सच में होता। तुम्हारी चेतना दोनों में एक थी। यही कारण है कि वो दर्द तुम्हें इतनी देर तक छोड़ता नहीं।”
“तो कौन सा सच है?”
वसिष्ठ हँसे। बहुत हलकी हँसी।
“जो भीतर तक उतर जाए, वो सच है।”
राम चुप रहे।
वसिष्ठ ने हाथ बढ़ाकर पानी छुआ। पानी ठंडा था।
“राम,” उन्होंने कहा। “लवण के बाद उनके राज्य में कोई बच्चा भूख से नहीं मरा। चालीस बरस तक। यह उनके सपने का असली फल था। उन्होंने अपनी प्रजा के दुख को इतनी तह तक जाना कि अब वो उसकी अनदेखी नहीं कर सकते थे। जो लोग अपनी प्रजा का दुख इस तह से जान लेते हैं, उनके लिए वो प्रजा अब बाहर की चीज़ नहीं रहती। वो अपने ही देह का अंग हो जाती है।”
राम ने पानी पर एक छोटे से पंछी को उड़ते देखा।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, उस लड़की का क्या हुआ?”
वसिष्ठ ने मुस्कुराहट छिपाई नहीं।
“वो बड़ी हुई। पढ़ी। राज्य में सबसे पहले चांडाल बस्ती से जो स्त्री राजसभा में आई, वो वही थी। उसका नाम भी हारकेयूरी रखा गया। यह उसकी मौसी का अनुरोध था।”
राम कुछ कहे बिना उस ओर देखते रहे।
पानी पर पंछी अब दूर तक उड़ गया था।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3.1104-109 पर आधारित है। हारकेयूरी का नाम मूल संस्कृत में सर्ग 106, श्लोक 46 में आता है। “एकरात्र्या समाः शतम्” (एक रात में सौ बरस) का सूत्र सर्ग 60 में मिलता है। चेतना में बीतने वाले समय और बाहर के समय के सम्बन्ध की यह सबसे प्रसिद्ध कथा है, और स्वामी वेंकटेशानन्द के अनुवाद में भी इसका विस्तार से वर्णन है।
दर्शन-दृष्टि
लवण की एक रात में सौ बरस बीतते हैं। चांडाली से विवाह, पाँच बच्चे, अकाल, एक-एक करके बच्चों की मृत्यु, पत्नी का चिता पर चढ़ना, और जागने पर वही सिंहासन, वही दरबार, वही दीप जलते हुए। बाहर का समय एक रात, भीतर का समय एक पूरा जीवन। कथा यह कहती है कि समय कोई बाहरी नदी नहीं जिसमें हम बहते हैं, वो चेतना का एक रूप है, और चेतना के ढाँचे के अनुसार खिंचता-सिकुड़ता है।
आधुनिक भौतिकी में अल्बर्ट आइन्स्टीन (Albert Einstein, 1879-1955) ने अपनी विशेष सापेक्षता (Special Relativity, 1905) में दिखाया कि गति और गुरुत्व समय को खींचते हैं। दो घड़ियाँ, एक तेज़ चलती गाड़ी में, दूसरी स्थिर, दोनों के समय एक नहीं रहते। यह बाहर का समय-विस्तार है। लवण की कथा भीतर का है। दोनों एक ही बात की दो दिशाओं से पुष्टि करते हैं, कि समय अपने आप में कोई स्थिर वस्तु नहीं, किसी न किसी ढाँचे के सापेक्ष ही उसका अर्थ बनता है।