कथा · ०४
राजा लवण की वो एक रात
एक मोर-पंख ने राजा को छुआ, और एक मुहूर्त में उसने पूरा एक जीवन जी लिया। बाहर सिर्फ़ आधा घंटा बीता था। मगर बाद में एक खोज ने सब बदल दिया।
राजा लवण की एक बात थी। हरिश्चंद्र के वंश से थे। वंश में सच्चाई की परंपरा थी। लवण भी न्यायी राजा थे। बड़ा यज्ञ करवा रहे थे एक दिन – अश्वमेध जैसा कुछ।
उनके दरबार में एक दिन एक घुमक्कड़ सिद्ध आ गए। साधारण कपड़े, मगर आँखों में एक अलग चमक। मोर-पंख हाथ में लिए हुए। राजा के सामने खड़े हुए।
“महाराज, एक चीज़ दिखाऊँ?”
राजा बोले, “दिखाओ।”
सिद्ध ने मोर-पंख से राजा को छुआ। बस। राजा ने पलक झपकी।
और उसके भीतर कुछ अजीब होने लगा।
जंगल में
राजा को लगा, वो दरबार में नहीं बैठा है।
वो जंगल में था। पैरों के नीचे सूखे पत्ते। ऊपर बड़े पेड़। दूर से एक नदी की आवाज़।
उसके कपड़े गायब थे। राजसी पोशाक नहीं। बस कमर पर एक मेखला। शरीर साँवला। हाथ में एक धनुष, कमर में एक तरकश।
उसने ख़ुद को देखा। यह कौन है? वो खड़ा हुआ। देखा – उसकी ज़बान पर एक नाम था जो उसका पुराना नाम नहीं था। अब उसका नाम कुछ और था।
याददाश्त बदल गई। वो भूल गया कि लवण कौन है। अब वो एक चांडाल शिकारी था।
शिकारी का जीवन
दिन शुरू हुआ। उसने पास के पेड़ों में गुज़र किया। एक हिरण देखा। बाण साधा। बाण उतर गया। हिरण को मारा।
उसके कबीले में लाया। बाँट दिया। यह उसकी रोज़ की कमाई थी।
उसी कबीले में एक लड़की थी। नाम कुसुम। वो उससे प्यार करती थी, और वो उससे। उन्होंने शादी की – कबीले के तरीक़े से। आग के सात फेरे नहीं, मगर पेड़ के सात चक्कर। दोनों ने वचन दिया।
घर बसा। बच्चे होने लगे।
पहला बेटा – माँझा। हँसमुख बच्चा। दौड़ता-कूदता। पाँच साल का होते-होते शिकार सीखने लगा।
दूसरा – बबलू। थोड़ा शांत। माँ के पास रहना पसंद था।
तीसरा – तीसरी थी। कोली। बहुत ज़िद्दी।
चौथा – सोनू।
पाँचवीं – रानी। सबसे छोटी। उसकी आँखों में कुछ अजीब चमक थी।
घर भरा-पूरा। मगर ज़िंदगी कठिन। शिकार में नियम नहीं। कभी मिलता, कभी नहीं। कभी पाँच दिन तक भूख।
अकाल का साल
एक साल अकाल पड़ा।
बारिश नहीं हुई। पेड़ सूख गए। फल नहीं लगे। जानवर ख़ुद भूखे, उन्हें ढूँढना मुश्किल। शिकारी कुछ नहीं ला पाते।
कबीले में रोज़ कोई न कोई मरता।
उसके बच्चे एक-एक करके भूख से मरने लगे।
पहले माँझा। उसकी हड्डियाँ निकलने लगीं थीं। एक रात सोते-सोते चला गया।
लवण-शिकारी ने उसे चिता पर रखा। आँसू बहे। मगर अकाल चलता रहा।
फिर बबलू। शांत बच्चा था, चुपचाप गया।
फिर कोली। ज़िद्दी थी, मगर भूख ने उसकी ज़िद हरा दी।
फिर सोनू।
चार बच्चे मिट्टी में मिल गए। बस छोटी रानी बची।
कुसुम पागल सी हो गई थी। दिन भर रोती। रात भर बच्चों के नाम लेती।
एक रात उसने कहा, “अब तो मेरा भी जी नहीं लग रहा।”
उसने रानी को लवण के हाथ में दिया। फिर एक बड़ी आग जलाई – बाहर। सब्ज़ी काटने वाली आग नहीं, बहुत बड़ी।
लवण ने रोका। मगर कुसुम ने नहीं सुना।
“मैं अब और नहीं रह सकती। बच्चे कहाँ हैं? पास के बच्चे चले गए। मेरे भी।”
आग में कूद गई।
लवण-शिकारी ने आँखें बंद कर लीं। फिर खोलीं। तब तक राख बचा था।
अंतिम क़दम
लवण ने रानी को सीने से लगाया। बेटी की उम्र थी पाँच साल। उसकी आँखें उसकी माँ जैसी।
“बेटी, अब हम क्या करेंगे?”
रानी ने कुछ नहीं कहा। बस देखती रही।
लवण-शिकारी ने सोचा। उसे लगा – “बेटी भी कमज़ोर है। एक हफ़्ता और जीगी, फिर वो भी जाएगी। मैं भी कब तक? मैं भी अब नहीं रह सकता।”
उसने पास के पुजारी को ढूँढा। एक छोटा सा मंदिर पास के गाँव में था। पुजारी से कहा, “बेटी रख लो। मैं नहीं हूँ अब।”
पुजारी ने देखा। पुजारी की भी कोई बेटी नहीं थी। पत्नी मरी थी। उन्होंने रानी को ले लिया।
लवण-शिकारी झोपड़ी लौटा।
आग पास खड़ा हो गया।
“कुसुम, बच्चों, मैं आ रहा हूँ।”
उसने पाँव बढ़ाया।
जैसे ही उसने पैर बढ़ाया, सब कुछ धुँधला हो गया।
दरबार में
आँख खुली।
राजा लवण अपने सिंहासन पर था। दरबार वैसा ही था। सिद्ध सामने खड़े थे। मोर-पंख अभी हाथ में था।
राजा ने अपने हाथ देखे। साफ़, राजा के हाथ। अंगूठियाँ। राजसी पोशाक।
मगर भीतर – कुसुम का चेहरा। माँझा की हँसी। बबलू की चुप्पी। कोली की ज़िद। सोनू की आवाज़। रानी की आँखें।
राजा ने कहा, “कितनी देर हुई?”
सिद्ध ने कहा, “एक मुहूर्त। शायद आधा घंटा।”
राजा ने सोचा, “मगर मैंने तो पूरा जीवन जिया। बच्चे, पत्नी, अकाल, मृत्यु, सब कुछ। यह कैसे संभव है?”
सिद्ध मुस्कुराए। बोले, “महाराज, समय मन में होता है। बाहर नहीं। आपका जो जीवन अभी है, वो भी ऐसा ही एक स्वप्न है। बस आप अभी जागे नहीं।”
लवण की आँखें खुली रह गईं।
खोज
सिद्ध चले गए। मगर लवण को चैन नहीं मिला।
उन्हें कुसुम का दर्द याद आता। बच्चों के नाम। उनकी मौतें। यह सब इतना ज़िंदा था।
उन्होंने अपने मंत्रियों से कहा, “एक टीम भेजो। दूर के जंगलों में चांडाल कबीले ढूँढो।”
मंत्रियों ने पूछा, “क्यों, महाराज?”
“बस ढूँढो।”
मंत्री गए। हफ़्तों बाद लौटे। एक छोटा सा कबीला मिला था। वो चांडाल थे। पास के एक मंदिर में एक छोटी सी लड़की भी थी। पुजारी ने बताया कि उसकी “उपज” चांडाल थे, मगर सब मर गए।
लवण ख़ुद उस मंदिर में गए। बेटी को देखा। बेटी की उम्र पाँच साल। आँखें कुसुम जैसी।
लवण ने पुजारी से पूछा, “बेटी का क्या हाल है?”
“महाराज, अनाथ है। पिता ने चिता बना ली थी। यहाँ छोड़ गया।”
“पिता का नाम?”
“उन्होंने बताया नहीं। बस कहा – ‘बेटी रख लेना। मैं नहीं हूँ अब।’”
लवण ने रानी को देखा। फिर सिर हिलाया। उन्होंने पुजारी को सोना दिया – बच्ची की देख-भाल के लिए।
लौटते हुए वो रोते रहे।
उन्हें अब पता था – उनका स्वप्न कहीं असली भी था। मन की रचना कहीं बाहर भी हो रही थी।
बदला हुआ राजा
उस दिन से लवण बदले हुए राजा थे।
उन्होंने अपने राज्य में चांडालों की मदद के लिए नियम बनाए। अकाल के समय राज्य का अनाज खुलता। कोई भूख से नहीं मरता।
उन्होंने कई बच्चों को अनाथ-आश्रमों में रखा। हर एक के लिए ख़र्च का इंतज़ाम। रानी (उनकी “स्वप्न-बेटी”) को भी पाला। मंदिर से लाए, राजकुमारी की तरह।
लोग चकित। “महाराज, इतनी ममता क्यों?”
लवण कहते, “मैंने एक रात में पाँच बच्चे खोए। एक पत्नी जलते देखी। एक बेटी अनाथ छोड़ी। तब समझ आया कि मेरी प्रजा भी ऐसा ही दर्द झेल रही है। राजा होकर भी मुझे यह बात पता नहीं थी।”
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, समय और संसार दोनों मन की लीला हैं। एक मुहूर्त में पूरा जीवन समा सकता है। और एक पूरा जीवन एक मुहूर्त सा बीत सकता है। जो जागता है, उसके लिए ये दोनों एक ही हैं।
“और याद रखो – कभी-कभी एक स्वप्न ज़रूरी होता है। क्योंकि स्वप्न ही तुम्हें दिखाता है कि तुम्हारी प्रजा कैसे जीती है। राजा होकर भी।”
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