कर्कटी

कथा · ०२

कर्कटी: सूई से ज्ञान तक

हिमालय की एक राक्षसी ने माँगा था सूई जैसा सूक्ष्म रूप, ताकि भीतर घुस-घुस कर खा सके। उसी सूक्ष्मता में उसे ज्ञान मिल गया। फिर एक रात उसने एक राजा और उसके मंत्री से सात प्रश्न पूछे।

हिमालय की एक गुफा में कर्कटी नाम की राक्षसी रहती थी। बड़ी विकराल। बाल खुले, आँखें लाल, हाथ लंबे। उसकी भूख कभी मिटती नहीं थी। दिन भर वो खाने की तलाश में घूमती। शिकारी भी पकड़ती, जानवर भी, मगर कुछ देर बाद फिर भूख लग आती।

एक रात उसने सोचा – “ऐसे कब तक? मेरे शरीर के लायक भोजन इस दुनिया में बहुत कम मिल रहा है। मुझे कोई ऐसी शक्ति मिलनी चाहिए कि मैं जब चाहूँ, जिसे चाहूँ, खा सकूँ।”

तपस्या

उसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या शुरू की। हज़ारों साल तक एक टांग पर खड़ी रही। बिना पानी। बिना भोजन। बिना नींद।

पहले हज़ार साल में उसके बाल मिट्टी हो गए। दूसरे हज़ार में उसकी आँखें धुंधलाने लगीं। तीसरे हज़ार में उसकी देह काली और कठोर हो गई – लगभग पत्थर सी।

आख़िर ब्रह्मा प्रसन्न हुए। हंस पर बैठे, चार हाथों में चार चीज़ें – कमंडल, माला, वेद, अमृत-कलश। उनके सामने प्रकट हुए।

“वर माँगो।”

कर्कटी ने हाथ जोड़े। मगर उसकी आवाज़ काँप नहीं रही थी।

“प्रभु, मैं चाहती हूँ कि सूई जैसी सूक्ष्म हो जाऊँ। इतनी कि किसी के भी शरीर में, उसके मन में, उसकी प्राण-नाड़ी में प्रवेश कर जाऊँ। फिर भीतर से ही उसे खा लूँ।”

ब्रह्मा ने उसे देखा। उनकी आँखें थोड़ी देर के लिए स्थिर हुईं। बोले, “तथास्तु। मगर एक शर्त है।”

“क्या?”

“तुम केवल उन्हीं को मार सकती हो, जो जीवन और मृत्यु के तत्व नहीं समझते। जो ज्ञानी हैं, उनकी हिंसा तुम्हें न करने का वचन देना होगा। और हर बार खाने से पहले, तुम्हें उनसे प्रश्न पूछने होंगे। यदि वो उत्तर दे दें, तुम्हें छोड़ देना पड़ेगा।”

कर्कटी ने एक पल सोचा। उसे लगा – यह शर्त मेरे हक़ में है। दुनिया में ज्ञानी कितने हैं? बहुत कम। बाक़ी सब मेरे होंगे।

“वचन देती हूँ।”

सूचिका बनना

ब्रह्मा अंतर्ध्यान हो गए। कर्कटी ने अपनी देह को सूक्ष्म होते महसूस किया। पहले छोटी हुई – बकरी जैसी। फिर और छोटी – बिल्ली जैसी। फिर चूहा। फिर मक्खी। फिर सूई। नाम पड़ा – ‘सूचिका’।

अब वो हर जगह घुस सकती थी। पहले तो वो पास के गाँव के एक शिकारी में घुसी। उसकी प्राण-नाड़ी में पहुँची। शिकारी ज़मीन पर गिर पड़ा। कर्कटी ने भीतर से उसे खाना शुरू किया।

स्वाद अच्छा था। मगर ख़त्म होते-होते कुछ अजीब हुआ। कर्कटी को संतुष्टि नहीं मिली। पेट भरा, मगर मन ख़ाली।

“और भी मारती हूँ।”

उसने एक पंडित में घुसकर खाया। फिर एक राजा में। फिर एक बच्चे में। फिर एक माँ में।

हर बार स्वाद थोड़ा कम होता गया। हर बार मन और ख़ाली।

अंदर का ज्ञान

एक दिन – कर्कटी एक ध्यान करने वाले मनुष्य में घुसी। उसकी प्राण-नाड़ी देखी। चकित हुई। यह नाड़ी अलग थी – शांत, गहरी, स्थिर।

उसने सोचा, “रुक। यह तो ज्ञानी है शायद। पहले प्रश्न पूछूँ।”

मगर वो कुछ कहती, इससे पहले उस मनुष्य ने अपनी समाधि पूरी की। आँखें खोलीं। मुस्कुराए।

“कौन है मेरे भीतर?”

कर्कटी हैरान। उसे पकड़ लिया गया था।

“मैं… मैं कर्कटी हूँ। राक्षसी।”

“तू मेरे भीतर क्या कर रही है?”

“खाने आई थी।”

मनुष्य हँसे। “बेटी, यहाँ कुछ खाने को नहीं। यह देह तो है, मगर इसके भीतर ‘मैं’ नहीं। तू ख़ाली देह को क्या खाएगी?”

कर्कटी कुछ नहीं समझी।

“भीतर बैठ।”

वो बैठ गई – सूक्ष्म रूप में। मनुष्य ने अपनी सुषुम्ना नाड़ी की यात्रा शुरू की – मूलाधार से लेकर सहस्रार तक। कर्कटी ने देखा। पहली बार उसने प्राण-नाड़ी का पूरा खेल देखा। चक्र, ध्यान, साँस का आना-जाना। सब कुछ।

उसके भीतर कुछ खुला।

“महाराज, यह क्या है?”

“यह तू है। और मैं भी। हम दोनों एक ही हैं, बस रूप अलग।”

कर्कटी रोई – पहली बार। आँसू उसकी सूक्ष्म-देह में भी आए।

“मगर मैंने इतने मनुष्य खाए…”

“तूने अपने को ही खाया। हर बार।”

कर्कटी ने उस मनुष्य के भीतर समाधि लगाई। पहली बार। बहुत साल तक वहीं रही, मनुष्य की प्राण-नाड़ी में। वो मनुष्य भी उसके होने की वजह से और गहरा गया।

वचन की मजबूरी

आख़िर कर्कटी ने तय किया – वो हिंसा नहीं करेगी। मगर ब्रह्मा का वचन तो था। हर मनुष्य से प्रश्न पूछना ही था। उसने तय किया – प्रश्न पूछूँगी। उत्तर मिले तो छोड़ दूँगी, ना मिले तो भी छोड़ दूँगी, मगर शायद उन्हें सिखाऊँगी।

वो अपने विकराल रूप में लौटी। हिमालय के एक रास्ते पर बैठी रहती। शिकार करना नहीं था अब, मगर पुराने वचन के कारण उसे प्रश्नकर्ता बनना ही था।

राजा विक्रम और मंत्री

एक रात राजा विक्रम और उनके मंत्री वन में पैदल चल रहे थे। कोई काम था पास के एक गाँव में। उन्होंने सोचा था पैदल चले जाएँगे, घोड़े नहीं लेंगे।

तभी पेड़ों के पीछे से कर्कटी निकली। अपने विकराल रूप में। बाल खुले, आँखें लाल, ज़ोर से ज़मीन पर पैर पटकती हुई।

“रुको।”

राजा-मंत्री खड़े हो गए, मगर डरे नहीं। दोनों ज्ञानी थे। दोनों ने पास की राक्षसी कथाओं में सुना था कि एक ऐसी सूचिका है जो प्रश्न पूछती है।

राजा बोले, “देवि, हम सुनेंगे।”

कर्कटी ने उन्हें एक पल देखा। फिर सात प्रश्न पूछे। एक के बाद एक।

सात प्रश्न

पहला प्रश्न: “वो कौन सा सूक्ष्म तत्व है जो सब में रहता है मगर दिखता नहीं?”

राजा ने कहा, “वो आत्मा है। हर देह में, हर प्राणी में रहती है। मगर इंद्रियों से नहीं दिखती। बुद्धि से अनुभव होती है, और भी गहरे जाने पर अपने ही रूप में पहचानी जाती है।”

कर्कटी ने सिर हिलाया।

दूसरा प्रश्न: “वो कौन है जो जागता भी है, सोता भी है, मगर बदलता नहीं?”

मंत्री ने कहा, “वो साक्षी चेतना है। जब हम जागते हैं, वो जागृति को देखती है। जब सोते हैं, वो सपने को देखती है। जब गहरी नींद आती है, वो उस ख़ालीपन को भी देखती है। चेतना ख़ुद नहीं बदलती, बस भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को देखती है।”

तीसरा प्रश्न: “वो क्या है जिसके बिना न आँख देख सकती, न कान सुन सकता, मगर वो स्वयं इंद्रिय नहीं?”

राजा ने कहा, “वो जीवात्मा है, या कहो प्राण-शक्ति। आँख का होना तो ज़रूरी है, मगर देखने वाला आँख नहीं है। आँख तो उपकरण है। उपकरण के पीछे जो उपयोग करता है, वो जीवात्मा है।”

चौथा प्रश्न: “वो क्या है जो हर रूप का आधार है, मगर ख़ुद रूप-रहित है?”

मंत्री ने कहा, “वो ब्रह्म है। चेतना का अंतिम रूप। उससे सब रूप निकलते हैं, मगर वो ख़ुद किसी रूप में नहीं। जैसे मिट्टी से अनेक मूर्तियाँ बनती हैं, मगर मिट्टी ख़ुद किसी मूर्ति में नहीं बँधती। मिट्टी हर मूर्ति का आधार है। ब्रह्म वैसा ही है।”

पाँचवाँ प्रश्न: “वो क्या है जिसे न दान दिया जा सकता, न लिया जा सकता, मगर पाने पर सब कुछ मिल जाता है?”

राजा ने कहा, “वो आत्म-ज्ञान है। यह कोई वस्तु नहीं जो दी-ली जाए। यह एक पहचान है। अपने अंदर की पहचान। जब यह पहचान खुलती है, तो बाहर की हर चीज़ अपने आप अर्थपूर्ण हो जाती है।”

छठा प्रश्न: “वो क्या है जो सबसे क़रीब है, मगर सबसे दूर लगता है?”

मंत्री ने कहा, “वो स्व-स्वरूप है। हम ख़ुद। हमारे भीतर ही है, मगर हम बाहर ढूँढते रहते हैं। ज्ञान का सबसे बड़ा रहस्य यही है – जिसे ढूँढ रहे हो, वो ढूँढने वाला है।”

सातवाँ प्रश्न: “और सबसे आख़िरी – वो क्या है जिसे जानने पर मृत्यु का भय मिट जाता है?”

राजा और मंत्री दोनों ने एक साथ कहा, “अपनी अमरता का बोध। शरीर मरता है, मगर देखने वाला नहीं। जो खो जाता है वो वस्त्र है। जो धारण करने वाला है, वो स्थिर है। यह बोध जिसे हो जाए, उसे मृत्यु से डर नहीं रहता।”

शिष्यता

कर्कटी सुनती रही। हर उत्तर ने उसके भीतर एक तार खींचा। उसने जो उस ध्यानी मनुष्य के भीतर देखा था, वो बातें इन दो ने एक के बाद एक कह दी थीं।

आख़िर सब प्रश्न पूरे हुए।

“हे श्रेष्ठ पुरुषो, मैं आज से तुम्हारी शिष्या हूँ। मुझे और सिखाओ।”

राजा ने उसे साथ ले लिया। वर्षों तक उसे धर्म का उपदेश दिया। कर्कटी ने हिंसा छोड़ दी। फिर वो एक तपस्विनी बन गई। मनुष्यों की रक्षा करने लगी, खाने की जगह।

उसने अपनी पूर्व-कर्म के लिए प्रायश्चित में, अनेक मनुष्यों को बीमारी से बचाया। एक छोटे से वन में बैठती। जो भी बीमार आता, उसे वो अपनी सूक्ष्म-शक्ति से ठीक करती।

लोग उसे “देवी कर्कटी” कहने लगे। पुराना नाम भूल गए।

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, ज्ञान कहीं भी पनप सकता है। यहाँ तक कि एक राक्षसी के भीतर भी। जब प्रश्न ईमानदार हो, तो उत्तर मार्ग बन जाता है। और जब उत्तर हृदय से दिए जाएँ, तो वो प्रश्न पूछने वाले को बदल देते हैं।

“कर्कटी ने आरंभ हिंसा से किया। मगर जिस सूक्ष्मता से वो हिंसा करना चाहती थी, उसी सूक्ष्मता ने उसे ज्ञान दिया। यह माया का खेल है। बुरी इच्छा भी अगर सच्ची हो, तो किसी मोड़ पर ज्ञान का मार्ग खोल देती है।”

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