कथा · ३४
हेतुक का जादू-नगर: एक हिरण के पीछे, बीस साल
शिकारी हिरण के पीछे दौड़ा। पेड़ों में घुसा। बीस साल बाद बाहर आया। लोगों ने कहा, “तुम तो पाँच मिनट पहले गए थे।” मगर भीतर – शादी, बच्चे, बुढ़ापा, सब था।
हेतुक एक शिकारी था। बहुत होशियार। दौड़ने में तेज़, धनुष में पक्का। उसके बाण कभी ख़ाली नहीं जाते। पास के गाँव वाले उसकी सहायता लेते – कभी जानवर भगाने को, कभी शिकार के लिए। हेतुक हाथ नहीं छुड़ाता।
एक दिन वो जंगल में निकला। साथी थे, कुछ नौजवान शिकारी, उसके अधीन। वो थोड़ा अलग हो गया, क्योंकि उसने एक हिरण देखा।
अनोखा हिरण
हिरण साधारण नहीं था। बहुत बड़ा, बहुत सुंदर। उसकी पीठ पर सुनहरी धारियाँ थीं। आँखें इस तरह चमकती थीं जैसे दीप जल रहे हों। सींग चाँदी जैसे।
हेतुक की साँस रुक गई। ऐसा हिरण ज़िंदगी में नहीं देखा था। उसने चुपचाप बाण साधा।
हिरण ने सिर उठाया। एक पल हेतुक की आँख से आँख मिली। फिर हिरण भागा।
हेतुक उसके पीछे भागा।
हिरण तेज़ था। हेतुक भी तेज़ था। पेड़ों के बीच से, झाड़ियों के पार। नदी पार की दोनों ने। फिर एक छोटी पहाड़ी।
थोड़ी देर बाद हेतुक को लगा कि जंगल बदल गया है। पेड़ बड़े हो गए हैं। पत्तियाँ रंगीन हैं। हवा अलग गंध की है। अनजाने रंगों के फूल।
उसने रुककर देखा। मगर हिरण आगे जा रहा था। उसने पीछा फिर शुरू किया।
एक झाड़ी के पीछे – एक नगर मिल गया।
अनदेखा नगर
हेतुक हैरान। नगर बड़ा। सड़कें चौड़ी। दीवारें ऊँची। लोग सुंदर कपड़ों में।
हिरण ग़ायब था। मगर हेतुक नगर में दाख़िल हुआ।
उसने अपने कपड़े देखे – शिकारी के, फटे हुए। आसपास के लोग साफ़ कपड़ों में। उसने सोचा – मैं यहाँ अजीब लग रहा हूँ।
एक स्त्री ने उसे देखा। पास आई। बोली, “तुम कौन हो? तुम्हारी पोशाक अजीब है।”
“मैं हेतुक हूँ। शिकारी।”
“आओ, मैं तुम्हें राजा के दरबार ले चलती हूँ।”
स्त्री उसे महल ले गई। राजा एक बूढ़े आदमी थे। उन्होंने हेतुक को देखा। फिर अपनी बेटी को बुलाया।
राजा की बेटी आई। बहुत सुंदर। नाम मधुलता। उसने हेतुक को देखा।
एक पल। फिर वो मुस्कुराई।
“पिताजी, यह वो है।”
“वो कौन?”
“मेरे सपने में जो आता है। मैं इससे शादी करूँगी।”
हेतुक हैरान। मगर बोला नहीं।
राजा ने कहा, “मेरी बेटी की मन की बात पूरी होगी। हेतुक, तुम मेरे दामाद बनोगे।”
शादी और राज
शादी हो गई। बहुत भव्य। हेतुक को नया पहनावा मिला। नया महल। नई दुनिया।
उसके भीतर एक संदेह था। शिकारी से दामाद कैसे? यह नगर असली है? यह सब क्या है?
मगर मधुलता का प्यार सच्चा था। उसकी आँखों में हेतुक के लिए कुछ था जो हेतुक रोक नहीं सकता था।
दिन बीते। साल बीते।
हेतुक के बच्चे हुए। तीन बेटे, दो बेटियाँ।
पहला – माधव। बहादुर, पिता जैसा।
दूसरा – माधुर्य। संगीत प्रिय।
तीसरा – मेघ। शांत।
पहली बेटी – मीनाक्षी। अपनी माँ जैसी।
दूसरी बेटी – मिता। चंचल, हँसमुख।
घर भरा-पूरा। हेतुक राजा के साथ बैठता। राज में पद मिला। पाँच साल बाद वो उप-राजा बन गया। फिर राजा बूढ़े हुए, उनकी मृत्यु हुई। हेतुक राजा बना।
राज चलाया। न्याय किया। पास के राज्यों से युद्ध हुए। कुछ जीते, कुछ हारे। फिर शांति हुई।
मधुलता बहुत प्यार करती। हर रात वो साथ बैठते, बच्चों की बात करते। हेतुक को कभी-कभी अपनी पुरानी ज़िंदगी याद आती – शिकारी की – मगर वो धुँधली थी, जैसे किसी सपने की।
बीस साल बाद
एक दिन – बीस साल बाद – एक भिखारी नगर में आया।
हेतुक दरबार में थे। भिखारी को दूर से देखा। चौंके।
भिखारी बिल्कुल हेतुक जैसा दिखता था। मगर बीस साल पुराना हेतुक। फटे कपड़ों में। हाथ में एक टूटा हुआ धनुष। बाल उलझे हुए।
हेतुक ने उसे पास बुलाया।
“तुम कौन हो?”
भिखारी ने कहा, “मैं हेतुक हूँ। शिकारी। मैं एक हिरण का पीछा कर रहा था। फिर सब अजीब हो गया। मैं इस नगर में पहुँचा। दरबार में आया। मगर सब लोग मुझसे डरकर भागते हैं। पागल मानते हैं।”
हेतुक के होश उड़ गए।
“मैं भी हेतुक हूँ। मैं भी एक हिरण का पीछा कर रहा था।”
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
राजा हेतुक की पत्नी मधुलता पास आई। उसने भिखारी को देखा। फिर अपने पति को। दोनों एक थे।
“यह क्या है?” मधुलता ने काँपती आवाज़ में पूछा।
हेतुक ने कुछ नहीं कहा।
“मैं भी हेतुक हूँ।” “मैं भी।”
दो हेतुक। एक मेज़ पर बैठा राजा। एक नीचे खड़ा भिखारी। एक चेहरा दो शरीरों में।
तभी हेतुक बेहोश हो गया। उसका सिर मेज़ पर गिर पड़ा।
आँख खुलना
आँख खुली – तो वो जंगल में था।
ज़मीन पर पड़ा। पाँच मिनट पहले जहाँ रुका था। हिरण का कोई निशान नहीं। उसके साथी आ रहे थे – दूर से।
“भाई, कहाँ गए थे?”
हेतुक उठा। हाथ पैर देखे। पुराने कपड़े। पुराना धनुष। न पत्नी, न बच्चे, न महल, न राजा।
“मैं… मैंने… एक हिरण देखा था।”
“पाँच मिनट से नहीं दिख रहा था। डरे क्यों हो?”
हेतुक ने ख़ुद को छुआ। पुराना शरीर। पुराने कपड़े।
मगर भीतर – बीस साल का अनुभव। मधुलता का प्यार। माधव, माधुर्य, मेघ। मीनाक्षी की आँखें। मिता की हँसी।
सब याद। सब असली।
उसकी आँखों में आँसू आ गए। मगर पुराने साथियों को क्या समझाता? वो साथियों के साथ लौटा। मगर वो वैसा नहीं रहा।
नया जीवन
हफ़्तों बाद उसने शिकार छोड़ा।
उसने सोचा – “मैंने बीस साल जिए हैं। पाँच बच्चे पाले। एक राज्य चलाया। अब फिर शिकार के पीछे क्यों?”
उसने एक छोटा सा खेत बनाया। पास के गाँव में बस गया।
लोगों ने पूछा, “तुम बदल गए हो।”
उसने कहा, “मैंने एक बीस साल का जीवन पाँच मिनट में जिया। उसके बाद यह वाला जीवन भी मुझे ऐसा ही लगता है। हलका। आता-जाता। पकड़ने योग्य नहीं।”
एक दिन उसने अपने बच्चे को (इस जीवन के बच्चे को) कहा – “बेटा, मेरे एक बेटे का नाम माधव था। एक बेटी मीनाक्षी। मगर वो दूसरी जगह की हैं।”
बच्चे ने पूछा, “कहाँ?”
“मेरे मन में।”
बच्चे ने कुछ नहीं समझा। मगर हेतुक के लिए वो बच्चे बहुत असली थे। उन्हें वो रोज़ याद करता।
एक दिन वो भी मरे। शांति से। मरते समय उन्हें मधुलता की आँखें दिखीं।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, समय और अनुभव दोनों मन के खेल हैं। पाँच मिनट में बीस साल हो सकते हैं। बीस साल पाँच मिनट जैसे बीत सकते हैं।
“हेतुक का जादू-नगर हम सब के भीतर है। हम सब रोज़ उसमें घूमते हैं, पता नहीं चलता। एक रोज़ की कल्पना – ‘अगर मेरी ज़िंदगी ऐसी होती तो…’ – इसमें भी हम मिनटों में बरस जी सकते हैं।
“और याद रखो – जो तुमने ‘सच’ जिया है और जो ‘कल्पना’ में जिया है, दोनों समान असली हैं तुम्हारे मन के लिए। फ़र्क़ बस इतना है कि एक को दुनिया देखती है, दूसरे को नहीं। मगर दोनों तुम पर असली असर डालते हैं।”
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