एक अर्ध-श्लोक

कथा · ३९

एक अर्ध-श्लोक: आधी पंक्ति, पूरा जीवन

गुरु ने आधा वाक्य ही दिया था। शिष्य ने वह आधा वाक्य लेकर बीस साल बिताए। बाकी आधा उसने ख़ुद ढूँढा।

एक नौजवान ब्राह्मण था। नाम विद्याधर। उसने सुना था कि एक बहुत बड़े गुरु पास के वन में रहते हैं। वो उनसे शिक्षा लेने गया।

गुरु बहुत बूढ़े थे। बैठे थे एक पीपल के पेड़ के नीचे।

विद्याधर ने पाँव छुए। बोला, “गुरुजी, मुझे शिक्षा दीजिए।”

गुरु ने उसे देखा। फिर थोड़ी देर चुप रहे।

“बेटा, मेरी एक ही बात है तुझे देने को।”

“बताइए।”

“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या।”

विद्याधर ने सुना। “ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है।”

उसने इंतज़ार किया। और कुछ?

गुरु ने आँखें मूँद ली।

“और?”

“बस। यह आधी ही बात है। बाक़ी आधी तू ख़ुद ढूँढना।”

“मगर महाराज…”

“जा। बीस साल बाद आ। तब बाक़ी आधी मैं नहीं, तू बताएगा मुझे।”

विद्याधर खाली हाथ चला गया। मगर गुरु का वचन उसके भीतर था।

उसने सोचा – “ब्रह्म सत्य है। जगत मिथ्या है। मुझे जाँचना है यह बात।”

वो पहले एक नगर में गया। बाज़ार देखा। लोगों को देखा। हर चीज़ इतनी ठोस लगती थी। यह मिथ्या कैसे?

उसने एक चीज़ ली – एक आम। उसे काटा। खाया। मीठा था।

“यह आम सच्चा है। यह मिथ्या नहीं।”

मगर गुरु का वचन याद आया। उसने सोचा – “मैं इसे आम कहता हूँ। मैंने नाम दिया। क्या यह आम ख़ुद को आम कहता है?”

आम कुछ नहीं कहता।

“तो आम मेरा बनाया हुआ है। मेरे मन ने उसे आम बनाया।”

एक झलक मिली। फिर ग़ायब।

विद्याधर अगले गाँव गया। वहाँ एक राजा का यज्ञ था। बड़ा भव्य। हर तरफ़ रोशनी, संगीत, धन।

उसने देखा। “यह सब असली लगता है।”

मगर रात में जब सब चले गए, यज्ञशाला खाली हो गई। दीप बुझ गए। संगीत रुक गया। कुछ भी नहीं बचा।

“वो जो था, अब नहीं है। मगर मैं वही हूँ।”

एक और झलक।

उसने सालों यात्रा की। हर जगह एक ही बात पाई। चीज़ें आती-जाती हैं। उन्हें सच मानने वाला बना रहता है।

एक दिन उसकी पत्नी हुई। बच्चे हुए। फिर एक बच्चा बीमार हुआ। मर गया।

विद्याधर रोया। बहुत रोया।

मगर रोते-रोते उसे एक बात समझ आई – “मेरा बेटा देह से चला गया। मगर मेरा ‘मैं’ अभी भी है। और मेरा प्रेम अभी भी है। प्रेम का जो आधार है, वो नहीं गया। बस एक रूप गया।”

आँसू बहते रहे। मगर भीतर एक स्थिरता आई।

बीस साल बीते। विद्याधर बूढ़े गुरु के पास लौटे।

गुरु अब और बूढ़े थे। पीपल के नीचे बैठे थे।

“बेटा, बता।”

विद्याधर ने हाथ जोड़े।

“गुरुजी, आपने आधा कहा था – ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’। मैंने बीस साल बाद बाक़ी आधा पाया।”

“बता।”

“जीवो ब्रह्मैव नापरः।”

(आत्मा ब्रह्म ही है, और कोई नहीं।)

गुरु मुस्कुराए।

“बेटा, यह बात मैंने तुझे क्यों नहीं दी?”

“क्योंकि अगर आप देते, तो मैं बस सुनता। याद कर लेता। मगर समझता नहीं।

“मुझे ख़ुद ढूँढना था। तब मेरा बना। आप का बना हुआ ज्ञान, मेरा नहीं हो सकता था।”

गुरु ने सिर हिलाया।

“अब तू तैयार है। जा। तू भी अब किसी को आधा देना। बाक़ी उसे ख़ुद ढूँढने देना।”

विद्याधर ने पाँव छुए। चले गए।

आगे चलकर वो ख़ुद एक गुरु बने। उन्होंने भी हर शिष्य को आधा वचन दिया। बाक़ी ख़ुद ढूँढने को कहा।

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, ज्ञान कभी पूरा दिया नहीं जाता। आधा दिया जाता है, बाक़ी अनुभव से आता है। शिक्षा वही जो प्रश्न रहने दे, बाक़ी न दे। उत्तर शिष्य के भीतर ख़ुद उगता है।”

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