कथा · ३३
बिल्व-फल का ब्रह्मांड
ऋषि ने एक बिल्व-फल खोला। भीतर एक पेड़ था। उस पेड़ पर एक और बिल्व-फल। उसके भीतर एक और पेड़। बात यहीं रुकी नहीं।
एक ऋषि अपने आश्रम में बैठे थे। पास में एक बिल्व-फल पड़ा था। पका हुआ। उन्होंने उसे उठाया।
“देखूँ इसके भीतर क्या है।”
उन्होंने फल को धीरे से तोड़ा। मगर तोड़ते ही कुछ अजीब हुआ।
फल के भीतर बीज नहीं थे। एक छोटा पेड़ था। पूरा बिल्व-वृक्ष। पत्तियों के साथ, फलों के साथ, टहनियों के साथ।
ऋषि हैरान। उन्होंने ध्यान दिया।
उस छोटे पेड़ पर भी फल लगे थे। एक फल हाथ में लिया, उसे भी तोड़ा। उस फल के भीतर भी एक पेड़ था। फिर एक फल। फिर एक पेड़। फिर एक फल।
हर फल में पेड़। हर पेड़ में फल। अंत नहीं था।
ऋषि ने नीचे की दिशा में देखना बंद किया। ऊपर की दिशा देखी।
उन्होंने अपने आश्रम के बाहर बगीचा देखा। सोचा – “यह बगीचा भी कहीं किसी फल के भीतर का पेड़ नहीं है?”
आँखें मूँदीं।
उन्हें दिखा – उनका बगीचा एक बहुत बड़े बिल्व-फल के भीतर एक पेड़ था। उस फल को कोई और पेड़ धारण कर रहा था। उस पेड़ का फल कोई और पेड़ धारण कर रहा था।
दोनों दिशाओं में अंत नहीं था।
ऋषि बैठ गए ज़मीन पर। हाथ में अधूरा बिल्व-फल अभी भी था।
“तो असली कहाँ है?”
एक आवाज़ आई। उनके भीतर से।
“असली वो है जो देख रहा है। नीचे का अंत नहीं। ऊपर का अंत नहीं। मगर देखने वाला हमेशा वही है। उसे ढूँढो।”
ऋषि ने उस देखने वाले को ढूँढा। मगर वो देखने वाला उनके भीतर नहीं था। वो देखने वाला सब के भीतर एक था। वो देखने वाला हर बिल्व-फल के भीतर के हर पेड़ में था। हर पेड़ के हर फल में था।
“एक चेतना। अनगिनत रूप।”
ऋषि ने हाथ का बिल्व-फल देखा। साधारण फल। मगर अब उन्हें यह पता था कि उसके भीतर ब्रह्मांड हैं। और उसके बाहर भी ब्रह्मांड हैं।
“छोटा क्या? बड़ा क्या? सब बस आकार है। चेतना सब आकारों में बराबर है।”
उन्होंने फल को बाक़ी हिस्से के साथ जोड़ा। उसे ज़मीन पर रखा। अपने नियम से वापस होने दिया। शायद कोई और इसे देखेगा। शायद कोई और इसे खोलेगा। शायद कोई और जानेगा।
उठे। आश्रम के अंदर गए। फिर ध्यान में बैठ गए।
उनके शिष्यों ने पूछा, “गुरुजी, आज क्या हुआ?”
उन्होंने एक छोटी सी बात कही – “एक फल खोला। पूरा ब्रह्मांड मिला। फिर मैंने ख़ुद को खोला। उसी का प्रतिबिंब मिला।”
शिष्य कुछ समझे, कुछ नहीं। मगर उसके बाद वो हर फल को बहुत ध्यान से देखने लगे।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, छोटा-बड़ा बस मन की पकड़ है। एक बिल्व-फल में पूरा ब्रह्मांड है। और पूरा ब्रह्मांड किसी का बिल्व-फल है। यह जानने पर मन हलका होता है। चीज़ें वही रहती हैं, मगर उन्हें देखने वाला बदल जाता है।”
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