कथा · 08
भास और विलास: सात जन्मों की मित्रता
एक ही गुरुकुल में पले दो मित्र भास और विलास, फिर अलग रास्तों से तप करने गए। दशकों बाद बूढ़े होकर मिले। दोनों ने पाया कि अकेले कोई नहीं पहुँचा। एक-दूसरे के सामने अपनी असफलता मानने पर ही रास्ता खुला।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मित्रता ज्ञान के मार्ग पर मदद करती है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, भास और विलास की कथा सुनो। दो मित्र थे, जो एक ही आश्रम में बड़े हुए, फिर अलग रास्तों पर चले गए। बहुत बरस बाद जब वो मिले, तो जो उन्हें मिला, वो दोनों के साझे अनुभव से ही मिला।”
आश्रम

यह बहुत बरस पहले की बात है। एक ऋषि थे, आत्रि, और उनके आश्रम में दो लड़के बड़े हुए, भास और विलास।
दोनों अभी बच्चे ही थे, जब उनके माता-पिता ने उन्हें आश्रम में छोड़ा था।
भास के माता-पिता एक गाँव से थे, बहुत ग़रीब। उन्होंने अपने बेटे को आश्रम में इसलिए छोड़ा था, क्योंकि वो उसे खाना तक नहीं दे सकते थे।
विलास के माता-पिता एक राज-कुल से थे, बहुत धनी। उन्होंने अपने बेटे को आश्रम में इसलिए छोड़ा था, क्योंकि वो चाहते थे कि वो ज्ञान सीखे।
पर आश्रम में दोनों एक समान थे।
एक ही चटाई, एक ही पाठ, एक ही भोजन।
यूँ ही बहुत बरस बीतते रहे।
दोनों एक ही चटाई पर सोते थे, और रात को देर तक बातें करते।
एक रात विलास ने पूछा – “भास, तुम बड़े होकर क्या करोगे?”
भास बोले – “पता नहीं। तुम?”
“मुझे भी पता नहीं।” और दोनों हँस पड़ते।
दिन में दोनों एक साथ पाठ करते और बीच-बीच में एक-दूसरे को सिखाते भी रहते।
भास का स्मरण अच्छा था, वो श्लोक जल्दी याद कर लेता। विलास की समझ अच्छी थी, वो श्लोक का अर्थ जल्दी पकड़ लेता। इस तरह दोनों एक-दूसरे की पूर्ति करते थे।
दोनों एक ही फल खाते थे। आश्रम में भोजन बहुत साधारण था, कन्द, पत्तियाँ, और कभी-कभी कोई फल। फिर भी दोनों ख़ुश रहते।
यूँ बरस बीतते गए।
दोनों युवा हुए, बीस-इक्कीस बरस के।
जाना

एक दिन आत्रि ने उन्हें बुलाकर कहा – “बेटों, अब तुम जा सकते हो। अपना रास्ता ख़ुद ढूँढो।”
दोनों कुछ देर चुप रहे।
विलास ने पूछा – “गुरुदेव, पर क्यों?”
आत्रि बोले – “बेटा, जो सीखना था, वो तुमने सीख लिया। अब तुम्हें अपनी कथा जीनी है।”
“पर आश्रम में तो अच्छा है।”
“बेटा, आश्रम में अच्छा है, इसीलिए तुम्हें जाना है। अगर तुम यहीं रुक जाओगे, तो बच्चे ही बने रहोगे।”
दोनों ने सिर झुकाकर प्रणाम किया।
फिर भास और विलास ने एक-दूसरे की ओर देखा।
भास ने पूछा – “भाई, क्या हम साथ चलें?”
विलास बोले – “नहीं। हर एक का रास्ता अलग होता है। मुझे लगता है मेरा रास्ता उत्तर की ओर है।”
“और मेरा?”
“वो तुम ख़ुद तय करो।”
भास कुछ देर सोचकर बोले – “मैं दक्षिण की ओर जाऊँगा।”
विलास बोले – “फिर कभी मिलेंगे?”
“मिलेंगे। किसी न किसी दिन।”

दोनों ने एक-दूसरे को प्रणाम किया। विलास उत्तर की ओर गए, और भास दक्षिण की ओर।
उत्तर
विलास उत्तर के पहाड़ों में गए। पहले उन्होंने एक गाँव में रुकना चाहा, पर भीतर एक प्यास उठी कि मुझे और दूर जाना है।

वो एक के बाद एक पहाड़ चढ़ते गए, और आख़िर एक ऊँची चोटी पर पहुँचे। वहाँ एक गुफ़ा थी, और विलास ने वहीं बैठना शुरू किया।
और तप शुरू हुआ।
पहले बरस उनका मन भागता रहा, आश्रम की यादें और भास की याद बार-बार लौट आतीं। बीच-बीच में उन्हें लगता कि वो वापस लौट जाएँ, पर हर बार वो रुककर अपने को याद दिलाते कि मुझे तप करना है।
दूसरे बरस मन कुछ शान्त हुआ, और तीसरे बरस और भी।
विलास ने सोचा कि यह बात अच्छी जा रही है, और उन्होंने अपना तप और कठोर कर दिया।
उन्होंने भोजन कम कर दिया। अब वो दिन में बस एक बार पत्तियाँ खाते, और कुछ नहीं। इससे उनका देह पतला हो गया।
उन्होंने सोना भी कम कर दिया। रात को बस दो पहर सोते, बाक़ी समय ध्यान में बिताते। इससे उनकी आँखें भीतर धँस गईं।
यूँ बहुत बरस बीत गए।
पर एक बात थी। कुछ भी नहीं खुला।
विलास ने सोचा कि मेरा तप अभी कम है, मुझे और करना चाहिए।
उन्होंने और कठोर तप किया। भोजन और कम कर दिया, सोना और कम, और ध्यान और बढ़ा दिया।
पर फिर भी कुछ नहीं खुला।
यूँ ही और बहुत बरस बीत गए।
विलास बूढ़े हो गए। उनका देह पतला पड़ गया था, बाल सफ़ेद हो गए, और दाढ़ी भी सफ़ेद। पर भीतर वही प्यास बनी रही।
दक्षिण
भास दक्षिण के जंगलों में गए।

जंगल बहुत घने थे। भास ने पहले एक जगह साफ़ करके एक झोंपड़ी बनाई, और फिर तप शुरू किया।
भास का तरीक़ा थोड़ा अलग था। विलास ने पहाड़ इसलिए चुना था, क्योंकि उन्हें लगता था कि ऊँचाई से नज़दीकी होगी। भास ने जंगल इसलिए चुना, क्योंकि उन्हें लगता था कि घनेपन से नज़दीकी होगी।
भास ने भी बहुत बरस तप किया।
पर उनका तरीक़ा अलग था। वो भोजन साधारण रखते, न ज़्यादा, न कम। वो तब सोते जब नींद आती, नियम से नहीं। और ध्यान भी तब करते जब मन भीतर उठता, ज़बरदस्ती नहीं।
तरीक़ा विलास से अलग था, पर परिणाम वही रहा।
कुछ नहीं खुला।
भास भी बूढ़े हो गए। उनका देह पतला तो हुआ, पर विलास की तरह नहीं। भास का देह कमज़ोर नहीं था, बस उम्र का असर था।
पर भीतर वही प्यास बनी रही।
मिलन
बहुत बरस बीत गए, और दोनों बूढ़े हो चुके थे।
एक दिन भास ने सोचा कि मैं अकेले कहाँ तक चलूँगा। मुझे विलास से मिलना चाहिए, शायद वो मेरे प्रश्न का जवाब जानता हो।
भास ने अपनी झोंपड़ी छोड़ी और उत्तर की ओर चल पड़े।
उसी समय विलास ने भी सोचा कि मैं अकेले कहाँ तक चलूँगा। मुझे भास से मिलना चाहिए, शायद वो मेरे प्रश्न का जवाब जानता हो।
विलास ने अपनी गुफ़ा छोड़ी और दक्षिण की ओर चल पड़े।
आख़िर दोनों रास्ते के बीच एक जंगल में आमने-सामने आ गए।

दोनों बहुत बूढ़े हो चुके थे, इसलिए कुछ देर तक एक-दूसरे को पहचान ही नहीं पाए। फिर भास ने आँखें सिकोड़कर पूछा – “विलास?”
“भास?” और दोनों हँस पड़े।
दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए।
पहले कुछ देर दोनों चुप रहे और बस एक-दूसरे को देखते रहे। विलास के बाल पूरे सफ़ेद थे, दाढ़ी भी सफ़ेद, और आँखें भीतर धँसी हुई थीं। भास के बाल सफ़ेद तो थे, पर इतने नहीं, दाढ़ी कम सफ़ेद थी, और आँखें वैसी ही थीं, बस थोड़ी पुरानी।
विलास ने कहा – “भाई, बहुत बरस बीत गए।”
भास बोले – “हाँ।”
फिर विलास ने कहा – “भाई, मुझे ज्ञान नहीं मिला।”
भास बोले – “मुझे भी नहीं।”
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। विलास ने पूछा – “क्या हमने कुछ ग़लत किया?”
भास बोले – “पता नहीं।”
बात
दोनों कुछ देर चुप रहे। फिर भास ने पूछा – “भाई, तुम क्या ढूँढ रहे थे?”
विलास बोले – “मुझे जानना था कि मैं कौन हूँ।”
“मैं भी यही ढूँढ रहा था। और तुम्हें मिला?”
“नहीं।”
“मुझे भी नहीं।”
फिर भास ने पूछा – “तुमने क्या किया?”
विलास ने अपनी सारी कथा सुनाई, और उनकी आवाज़ में एक कड़वाहट थी, जिसे भास ने भी सुना।
विलास बोले – “भाई, मैंने पचपन बरस उस गुफ़ा में बिताए। मेरी छाती की हड्डियाँ अब बाहर दिखती हैं। मेरी आँखें इतनी भीतर धँस गईं कि कभी-कभी मुझे लगता कि मैं अब देख नहीं पाऊँगा। मेरे पाँवों पर बहुत बार पाला पड़ा, और दो उँगलियाँ तो मैंने खो ही दीं।
“पैंतीसवें बरस मुझे लगा कि अब खुलेगा, पर नहीं खुला।
“पैंतालीसवें बरस मुझे लगा कि बस अब खुलेगा, पर नहीं।
“और पचपनवें बरस मुझे कुछ नहीं लगा, बस एक थकान रह गई, और उसके साथ एक कड़वाहट भी।
“मैंने अपने तप में क्या ग़लती की, यह मैं आज तक नहीं समझ पाया। मैंने वो सब किया जो शास्त्रों में लिखा है, फिर भी कुछ नहीं मिला।”
भास चुपचाप सुनते रहे।
फिर विलास ने पूछा – “और तुम्हें, भाई?”
विलास ने भास को ग़ौर से देखकर कहा – “भाई, तुम्हें देखकर मुझे एक बात लगती है।”
“क्या?”
“तुम्हारा देह मेरे जैसा टूटा हुआ नहीं।”
भास बोले – “भाई, मेरा तरीक़ा अलग था।”
विलास कुछ देर चुप रहे, फिर पूछा – “भाई, तो क्या तुम्हारा तरीक़ा अच्छा था?”
“मुझे भी तो कुछ नहीं मिला।”
“पर तुम टूटे नहीं।”
भास बोले – “विलास, मैं टूटा नहीं, पर मैं भी थका। बस मेरी थकान भीतर की है, जबकि तुम्हारी थकान देह में दिखती है।”
विलास कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले – “भाई, मुझे एक बात बताओ।”
“बोलो।”
“तुम्हें कभी क्रोध आया?”
भास कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “भाई, हाँ। बहुत बार।”
“किस पर?”
“पहले अपनी असफलता पर, फिर अपनी कोशिश पर, और फिर अपने आप पर।”
“और अब?”
भास बोले – “भाई, अब तो क्रोध भी थक गया। अब बस एक प्रश्न रह गया है।”
“कौन सा प्रश्न?”
“कि क्या मैंने सारी ज़िन्दगी एक ग़लत जगह ही ढूँढा?”
विलास ने भास को देर तक देखा।
फिर बोले – “भाई, मेरे भीतर भी यही प्रश्न है।”
दोनों कुछ देर चुप रहे।
फिर विलास बोले – “भाई, मुझे अपनी ज़िन्दगी पर कड़वाहट है। पर तुम्हें देखकर वो कड़वाहट थोड़ी कम हुई है।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम मेरे जैसे नहीं, फिर भी तुम वहीं हो जहाँ मैं हूँ। मतलब, अलग-अलग रास्ते भी एक ही जगह पहुँचाते हैं। और शायद वो जगह कोई और ही है।”
भास ने धीरे से हाँ में सिर हिलाया।
दोनों कुछ देर चुप रहे।
फिर विलास ने एक गहरी साँस ली और बोले – “भाई, शायद हम ग़लत जगह ढूँढ रहे थे।”
“कैसे?”
“हम बाहर ही जा रहे थे, तप, अकेलापन, भोजन कम करना। पर भीतर तो हम वैसे ही रहे जैसे आश्रम में थे।”
भास चुपचाप सुनते रहे।
विलास कुछ देर रुके, फिर एक बहुत हलकी हँसी हँसे, जिसमें दर्द भी था।
“भाई, मैंने अपने देह को बहुत बरस तक मारा, और मेरी चेतना वहीं की वहीं रह गई जहाँ थी।”
भास ने विलास का हाथ अपने हाथ में ले लिया। विलास के हाथ बहुत हलके थे, हड्डियाँ बाहर निकली हुई थीं, पर भास ने उन्हें कसकर पकड़ा।
भास बोले – “भाई, अब छोड़ो।”
विलास की आँखों में नमी आ गई, पर वो रोए नहीं।
भास बोले – “भाई, चलो अभी यहीं बैठते हैं, तुम और मैं, एक-दूसरे के साथ। न कोई बाहरी कठिनाई, न कुछ और। बस बैठते हैं।”
बैठना
दोनों ने आँखें बन्द कर लीं और चुप हो गए। बस साँस चलती रही।
बहुत देर तक दोनों वैसे ही बैठे रहे। न कोई तप, न कोई कोशिश, न कोई इच्छा। बस होना।
ऊपर पेड़ की डाली से एक पत्ता गिरा। विलास ने उसे सुना, पर आँख नहीं खोली।
एक पंछी आया, पास के पेड़ पर बैठा, फिर उड़ गया। भास ने उसे महसूस किया, पर आँख नहीं खोली।
हवा हलकी-हलकी बहती रही। समय बीतता गया, पर समय अब उनके लिए वो नहीं रहा जो पहले था।

एक समय बाद दोनों के भीतर कुछ स्थिर-सा खुला, एक प्रकाश, बिना किसी स्रोत के।
विलास के भीतर भी खुला, और भास के भीतर भी, दोनों के भीतर एक साथ।
दोनों ने अपने को देखा। मैं हूँ।
बीच की रात
एक रात की बात है। दोनों आँखें बन्द किए बैठे थे।
भास ने एक पल को आँख खोलकर विलास को देखा। विलास का देह बहुत पुराना हो चला था, और उनकी छाती हलके-हलके ऊपर-नीचे हो रही थी।
भास ने सोचा कि मेरा मित्र, इतने बरसों के बाद।
भास ने फिर अपनी आँखें बन्द कर लीं।
विलास ने भी एक पल को आँख खोलकर भास को देखा।
विलास ने सोचा कि मेरा मित्र, इतने बरसों के बाद।
विलास ने भी फिर अपनी आँखें बन्द कर लीं।
दोनों ने एक-दूसरे को कभी नहीं बताया कि उन्होंने यह क्षण देखा था। पर दोनों के भीतर वो क्षण बना रहा।
बहुत देर बाद, जब उनकी मुक्ति खुली, तो दोनों उस क्षण को बिना कहे साथ-साथ याद कर रहे थे।
हँसी
जब दोनों ने आँखें खोलीं, तो वो हँस रहे थे।
विलास ने कहा – “भाई, बहुत बरस लग गए।”
भास बोले – “हाँ।”
“और जो मिला, वो हम दोनों ने साथ पाया।”
“हाँ।”
विलास कुछ देर सोचते रहे, फिर पूछा – “भाई, हमने जो किया, वो सब बेकार था?”
भास बोले – “नहीं, भाई। बेकार नहीं। उसी से तो यह आया।”
“कैसे?”
“क्योंकि हमने सारी कोशिश कर डाली। हमने अपने-अपने तरीक़े से देखा, अपने-अपने तरीक़े से तप किया, और हर तरीक़ा थककर रह गया। तभी हम मिले, और जब मिले, तो हमने अपनी कोशिशें छोड़ दीं। तब जाकर यह खुला।
“अगर हमने पहले से कोशिश न की होती, तो यह मिलना भी काम न आता।
“कोशिश पहले ज़रूरी थी, और कोशिश का छूटना बाद में।”
विलास ने हाँ में सिर हिलाया और बोले – “भाई, तुम सही कहते हो।”
आगे
दोनों कुछ बरस साथ रहे।
विलास का देह बहुत पुराना हो चुका था, बहुत बरसों के कठोर तप का असर था। एक रात उन्होंने भास से कहा – “भाई, मुझे लग रहा है कि मेरा समय आ रहा है।”
भास बोले – “भाई, मुझे भी।”
दोनों एक-दूसरे को देखकर हँसे। विलास ने पूछा – “साथ?”
भास बोले – “साथ।”
दोनों एक-दूसरे के पास बैठ गए और आँखें बन्द कर लीं।
रात के एक पहर में दोनों एक साथ चले गए।
लोगों ने सुना कि दो तपस्वी एक साथ चले गए। कोई नहीं जानता था कि वो कौन थे, कि वो बहुत बरस पहले के दो विद्यार्थी थे।
फिर भी लोगों ने उनकी स्मृति में एक छोटा मन्दिर बनाया।
मन्दिर में पत्थर की दो मूर्तियाँ रखी गईं, दोनों बैठी हुई, आँखें बन्द किए, चेहरे शान्त। लोग कहते – “यहाँ दो मित्र थे। बहुत बरस अलग रहे, फिर मिले, और मुक्ति भी साथ ही पाई।”
राम ने सिर हिलाकर पूछा – “गुरुदेव, तो क्या अकेले किया गया तप कभी कम पड़ जाता है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, तप अकेले हो या साथ में, बात इससे नहीं बदलती। बात यह है कि तप किस दिशा में है। अगर तप बाहर की ओर है, तो वो कुछ नहीं देगा। अगर तप भीतर की ओर है, तो वो हर जगह से देगा। भास और विलास का तप बाहर की ओर था। जब वो साथ बैठे, बिना कुछ माँगे, तब उनके भीतर खुला।
“और एक बात। मित्रता का अपना मूल्य है। मित्रता एक दूसरी आँख देती है। हम अपनी ही कोशिशों में फँसे रह सकते हैं, पर मित्र हमें वो कोशिश छोड़ने का साहस देता है।”
राम ने सिर हिलाकर पूछा – “गुरुदेव, क्या मेरा भी कोई ऐसा मित्र होगा?”
वसिष्ठ कुछ देर चुप रहे, फिर हलके से मुस्कुराकर बोले – “राम, होगा। एक नहीं, कई होंगे। पर एक ख़ास होगा, और उसका नाम तुम्हें बाद में पता चलेगा।”
राम ने कुछ देर सोचकर फिर पूछा – “गुरुदेव, भास-विलास की कथा में एक और बात है।”
वसिष्ठ बोले – “क्या?”
राम बोले – “दोनों ने बहुत बरस अकेले तप किया, पर कुछ नहीं मिला।”
“हाँ।”
“पर जब मिले, तब मिला।”
“हाँ।”
“पर क्यों?”
वसिष्ठ बोले – “राम, क्योंकि साधना अकेले होती है, पर मुक्ति कभी अकेले नहीं होती।”
“क्यों?”
वसिष्ठ बोले – “राम, अकेलापन एक रूप है, और उसमें एक अहम् बन जाता है, कि मैं अकेला साधक हूँ, मैं अकेले ही सब सीख रहा हूँ। यह सोच ख़ुद एक बँधन है। पर जब दो लोग मिलते हैं, और एक-दूसरे के सामने अपनी असफलता स्वीकार करते हैं, तब वो अहम् छोटा होता है, और तभी मुक्ति की राह खुलती है।”
राम बोले – “गुरुदेव, यह तो बहुत गहरी बात है।”
वसिष्ठ बोले – “हाँ।”
राम ने फिर पूछा – “गुरुदेव, भास-विलास ने एक-दूसरे को पहली बार कब देखा था?”
वसिष्ठ कुछ देर सोचकर बोले – “राम, तब वो बहुत छोटे थे, शायद तीन-चार बरस के।”
“और एक-दूसरे को पहचान लिया?”
“हाँ, तुरन्त।”
“पर कैसे?”
वसिष्ठ बोले – “राम, कुछ रिश्ते बहुत पुराने होते हैं, शायद पिछले जन्म से। जब वो लोग इस जन्म में मिलते हैं, तो तुरन्त पहचान लेते हैं।”
बाहर रात गहरा रही थी, और राम को हलकी जम्हाई आई।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मैं अब चलूँ?”
वसिष्ठ बोले – “चलो।”
दोनों उठे।
रास्ते में राम ने ऊपर आसमान की ओर देखा। सप्तर्षि चमक रहे थे।
बहुत बरस पहले के वो सात ऋषि, जो अब राम के लिए परिचित हो चले थे।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या भास और विलास भी सप्तर्षि के पास होंगे?”
वसिष्ठ बोले – “राम, शायद। अच्छे मित्र हमेशा साथ रहते हैं, चाहे जहाँ भी जाएँ।”
राम ने हाँ में सिर हिलाया।
बाहर रात घनी हो चली थी।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5.65-66 पर आधारित है। दो आजीवन मित्रों की मित्रता और उनकी संयुक्त मुक्ति शास्त्र की एक कोमल कथा है। दोनों के अलग तरीक़े, और अन्ततः उनकी कोशिशों का थक जाना, और मित्रता का सहारा बनना, यह इस कथा का सूक्ष्म पहलू है।
दर्शन-दृष्टि
भास और विलास आत्रि के आश्रम में बड़े होते हैं। फिर अलग हो जाते हैं, अलग-अलग वनों में अलग-अलग तप करते हैं, बिना ज्ञान के। बूढ़े होकर मिलते हैं, और एक-दूसरे की कथा सुनकर ही पहचानते हैं कि तप अकेला अधूरा था, उसके साथ विवेक चाहिए था। उसी बातचीत में, मित्रता के बीच, उन्हें बोध होता है। कथा यह कहती है कि साधना अकेलेपन में पूरी नहीं होती, उसे एक संगी चाहिए जिसकी आँख से अपनी कमी दिख सके।
विवेकानन्द (1863-1902) ने अपनी Karma Yoga (1896) में बार-बार कहा कि केवल तप से, या केवल कर्म से, या केवल ध्यान से कोई पूरा नहीं होता, हर मार्ग को दूसरे की झलक चाहिए, और ज्ञान बिना तप अधूरा है जैसे तप बिना विवेक। भास और विलास की कथा इसी चेतावनी का जीता रूप है। दोनों ने जीवन भर तप किया, पर एक चीज़ नहीं की, अपने तप को दूसरे की कसौटी पर परखा। अन्त में मित्रता ही उनकी कसौटी बनी, और तभी ज्ञान खुला।