त्रिपुरा रहस्य · हेमचूड़ और हेमलेखा दत्तात्रेय ने सत्संग का सूत्र खोला परशुराम ने दत्तात्रेय के सामने अपनी उलझन रखी। उन्होंने मान लिया था कि विचार के बिना मनुष्य बार-बार उन्हीं कारणों की ओर लौटता है जिनसे दुःख पैदा होता है। अब उनका प्रश्न यह था कि ऐसा विचार जागता कैसे है। किसी व्यक्ति में मुक्ति की जिज्ञासा प्रबल हो जाती है और कोई दूसरा उससे अधिक कष्ट सहकर भी अपने जीवन को परखना आरम्भ नहीं करता। इस अन्तर का निकट कारण क्या है? दत्तात्रेय ने कहा, “राम, कल्याण की जड़ सत्पुरुषों का संग है। योग्य संगति में सुना हुआ वचन मन में उस स्थान तक पहुँचता है जहाँ वह आचरण बदल सके। संवर्त के साथ तुम्हारी संगति ने तुम्हें इस प्रश्न तक पहुँचाया है। मनुष्य जिस समाज और जिस बुद्धि के निकट रहता है, वैसी ही दृष्टि उसके भीतर बल पाती है।” इसी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने हेमचूड़ और हेमलेखा का वृत्तान्त आरम्भ किया। दशार्ण देश के राजा मुक्तचूड़ के दो पुत्र थे, हेमचूड़ और मणिचूड़। दोनों सुन्दर, सुशील और अनेक विद्याओं में निपुण थे। एक दिन वे सैनिकों और सेवकों का बड़ा दल लेकर सह्य पर्वत के घने वन में आखेट के लिए गए। उनके हाथों में धनुष और बाण थे। दल ने हिरनों, सिंहों, वराहों, महिषों और भेड़ियों का पीछा किया। इसी बीच पर्वत पर विकराल आँधी उठी। हवा के साथ रेत, कंकड़ और छोटे पत्थर बरसने लगे। धूल ने आकाश ढक लिया और दिन में रात जैसा अँधेरा हो गया। पेड़, चट्टान, रास्ते और मनुष्य एक-दूसरे से ओझल हो गए। सैनिक कहीं शिलाओं के नीचे सिमटे, कहीं गुफाओं में घुसे और कहीं वृक्षों का सहारा लेने लगे। दोनों राजकुमार घोड़ों पर दूर निकल गए। उसी भागदौड़ में भाइयों का साथ छूट गया। दत्तात्रेय की कथा का मोड़ इसी आँधी में आता है। हेमचूड़ की तैयारी युद्ध और आखेट के लिए थी। आश्रम में मिला सत्संग थके हुए यात्री को दिए गए आतिथ्य से आरम्भ हुआ और आगे उनकी अपनी सुख-दृष्टि की परीक्षा बना। अँधेरे और धूल के बीच भटकते हुए हेमचूड़ एक तपस्वी के आश्रम में पहुँचे। उसके चारों ओर केले, खजूर और दूसरे फलदार वृक्षों का सुन्दर उपवन था। वहाँ उन्होंने एक युवती को देखा। उसका शरीर तपे हुए सोने जैसा दमक रहा था और वह निर्जन वन में पूर्ण निर्भयता से खड़ी थी। हेमचूड़ ने पूछा, “देवी, आप कौन हैं? यह वन हिंसक जीवों से भरा है। आप यहाँ अकेली किसके आश्रय में रहती हैं?” युवती ने प्रश्न का उत्तर देने से पहले अतिथि का ध्यान रखा। उसने कहा, “राजकुमार, आपका स्वागत है। घोड़े को उस खजूर के वृक्ष से बाँध दीजिए और आसन पर बैठकर विश्राम कीजिए। तेज हवा ने आपको बहुत कष्ट दिया है। तपस्वियों के यहाँ आए अतिथि का आदर पहले होता है, परिचय उसके बाद।” उसने उन्हें फल दिए, मधुर जल पिलाया और शरीर का श्रम उतर जाने दिया। कुछ देर बाद उसने कहा, “मेरा नाम हेमलेखा है। इस आश्रम के अधिष्ठाता महर्षि व्याघ्रपाद हैं। वे शिवपद में स्थित ज्ञानी हैं और अपनी तपस्या तथा करुणा के लिए पूजित हैं। मैं धर्मतः उनकी पुत्री हूँ। जन्म से मेरी माता विद्युत्प्रभा नाम की विद्याधरी थीं और पिता बंगदेश के राजा सुशेण थे।” हेमलेखा ने अपने जन्म की कठिन परिस्थिति भी साफ शब्दों में बताई। विद्युत्प्रभा वेणा नदी में स्नान के लिए आई थीं। उसी समय राजा सुशेण भी वहाँ पहुँचे। दोनों एक-दूसरे की ओर आकृष्ट हुए और उनके मिलन से गर्भ ठहरा। लोकनिन्दा के भय से विद्युत्प्रभा ने गर्भ त्यागने का प्रयास किया, फिर भी शिशु जीवित जन्मी। संध्या-उपासना के लिए नदी तट पर आए व्याघ्रपाद ने उस नवजात बालिका को देखा। वे उसे आश्रम ले आए और माता जैसी ममता से उसका पालन किया। “जो धर्मपूर्वक रक्षा और पालन करता है, वही पिता कहलाने योग्य है,” हेमलेखा ने कहा। “इसी नाते मैं व्याघ्रपाद की पुत्री हूँ और उनकी सेवा में रहती हूँ। उनके तप और मर्यादा के कारण देव या असुर भी दूषित भाव से इस आश्रम में प्रवेश नहीं कर सकते। आप थोड़ी देर ठहरिए। वे वन से लौटने वाले हैं। प्रणाम करके अपनी इच्छा उनके सामने रखिए।” हेमचूड़ हेमलेखा के सौन्दर्य और शिष्टता से आकृष्ट हो चुके थे। वे अपनी इच्छा कहने में संकोच कर रहे थे। हेमलेखा ने उनकी मनःस्थिति समझ ली और संयत स्वर में कहा, “राजकुमार, धैर्य रखिए। पिताजी आते ही होंगे। जो कहना है, उन्हीं से कहिए।” उसके वचन पूरे हुए ही थे कि व्याघ्रपाद दिखाई दिए। उनके हाथ में पूजा के लिए चुने हुए पत्तों और फूलों की टोकरी थी। हेमचूड़ उठे, मुनि के चरणों में प्रणाम किया और अपना नाम बताया। व्याघ्रपाद ने उन्हें बैठने का संकेत दिया। योगदृष्टि से उन्होंने अतिथि की मनोदशा समझी और यह सम्बन्ध उचित पाया। उन्होंने हेमलेखा को विवाह के लिए हेमचूड़ को सौंप दिया। राजकुमार उसे लेकर अपनी राजधानी लौटे। मुक्तचूड़ प्रसन्न हुए और उन्होंने विधिपूर्वक विवाह तथा राज्य में उत्सव कराया। विवाह के बाद हेमचूड़ और हेमलेखा ने राजप्रासादों, वन-उपवनों और नदी के रेतीले तटों पर साथ समय बिताया। हेमचूड़ का अनुराग बहुत प्रबल था। हेमलेखा स्नेह रखती थीं, फिर भी भोग की उत्तेजना उन्हें बाँध नहीं पाती थी। कभी हेमचूड़ पास बैठकर बात करते और उन्हें लगता कि पत्नी का ध्यान कहीं बहुत भीतर ठहरा हुआ है। कभी आलिंगन के बाद हेमलेखा सहज भाव से पूछतीं कि वे कब आए। एक दिन हेमचूड़ ने एकान्त में कहा, “प्रिय, मेरे मन में आपके लिए जितना अनुराग है, उतनी रुचि आपको इन सुखों में क्यों नहीं होती? मैं जिन व्यवस्थाओं को आपके आनन्द के लिए करता हूँ, वे आपको छूती हुई नहीं जान पड़तीं। आपकी प्रसन्नता के बिना मुझे भी उनमें स्वाद नहीं आता। कृपया बताइए कि आपका मन कहाँ रहता है।” हेमलेखा ने पति की बात सुनी और अपने ज्ञान को प्रश्न का रूप देकर उन्हें उसी अनुभव की जाँच के लिए आमन्त्रित किया जिसे वह सुख मानते थे। सुख की पहली जाँच हेमलेखा ने कहा, “आर्यपुत्र, मैं आपका स्नेह जानती हूँ। मेरे मन में एक खोज चल रही है। मैं ऐसा सुख पहचानना चाहती हूँ जो कुछ समय बाद फीका न पड़े और जिसकी तह में अगला दुःख छिपा न हो। अभी तक मैं निश्चित उत्तर तक नहीं पहुँच सकी हूँ। आप बुद्धिमान हैं, मुझे समझाइए कि स्थायी सुख किसे कहेंगे।” हेमचूड़ को प्रश्न सरल लगा। उन्होंने हँसकर कहा कि जो अच्छा लगे वह सुख है और जो अप्रिय लगे वह दुःख। जीव-जंतु भी अनुकूल वस्तु की ओर जाते और प्रतिकूल से बचते हैं। इतने सीधे विषय पर गम्भीर विचार की क्या आवश्यकता है? उनके स्वर में उस समय की सामाजिक दृष्टि भी थी, जिसके सहारे वे पत्नी की जिज्ञासा को स्त्री की अनिश्चयशीलता कहकर हल्का समझ बैठे। हेमलेखा ने प्रश्न को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा, “यदि मेरा निर्णय दुर्बल है, तो आप ही उसे सँभाल दीजिए। पहले इतना बताइए कि एक वस्तु सभी समय, स्थान और व्यक्तियों को एक जैसा सुख देती है क्या? अग्नि शीत ऋतु में प्रिय लगती है और तीखी गर्मी में असह्य हो जाती है। ठंड किसी को राहत देती है और किसी रोगी को पीड़ा। धन, पुत्र, पत्नी, राज्य और प्रतिष्ठा भी परिस्थिति बदलते ही चिन्ता के कारण बन सकते हैं।” उन्होंने मुक्तचूड़ का उदाहरण सामने रखा। राजा के पास परिवार, सेना, धन और अधिकार था, फिर भी राजकार्य की चिन्ताएँ प्रतिदिन उनका मन घेरे रहती थीं। संसाधन बहुत होने से मन की माँग समाप्त नहीं हुई। हेमलेखा ने पूछा, “जिस सुख में भय, थकान, खोने की आशंका और अगली इच्छा मिली हुई हो, उसे पूर्ण सुख कैसे मानें?” शारीरिक कष्ट और मानसिक कष्ट को अलग करते हुए उन्होंने इच्छा को भीतर के दुःख का बीज कहा। एक इच्छा पूरी होती है, तो थोड़ी देर के लिए तनाव रुकता है। शीघ्र ही दूसरी इच्छा अपना स्थान माँगने लगती है। उस छोटे विराम को मन सुख कह देता है, जबकि बेचैनी की जड़ बनी रहती है। इन्द्र और देवता अमृत तथा स्वर्गीय साधनों के बीच रहकर भी इच्छा के आदेश से मुक्त नहीं बताए गए हैं। हेमलेखा ने दाम्पत्य-सुख पर भी शिष्ट, स्पष्ट और निर्भीक विचार रखा। देह का स्पर्श किसी समय प्रिय लगता है, किसी दूसरे समय वही आग्रह असुविधा बन सकता है। मिलन के बाद थकान आती है। स्वप्न में मन किसी व्यक्ति की उपस्थिति के बिना भी वैसा ही आकर्षण और सुख रच लेता है। इससे पता चलता है कि अनुभूति में मानसिक छवि की बड़ी भूमिका है। इस बात के लिए उन्होंने एक पुराने राजकुमार की कथा कही। वह अत्यन्त सुन्दर था और अपनी पत्नी पर मोहित था। पत्नी का सम्बन्ध राजसेवक से था। सेवक राजकुमार को अधिक मदिरा पिलाकर उसके कक्ष में किसी दूसरी स्त्री को भेज देता। मदहोशी में राजकुमार उसे अपनी पत्नी मानता और अपने भाग्य पर प्रसन्न होता। एक रात मदिरा कम पड़ी। वह होश में था और उसे छल का पता चल गया। राजकुमार ने पत्नी को सेवक के साथ देखा, तो उसकी धारणा एक ही क्षण में बदल गई। जिस स्त्री को वह पहले अनुपम समझता था, उसी के प्रति घृणा उमड़ आई। उसने सभी स्त्रियों के विषय में कठोर और अनुचित बातें कहीं तथा वन चला गया। हेमलेखा ने इस प्रसंग से दिखाया कि आकर्षण और विकर्षण की मानसिक धारणाएँ एक ही रूप का अनुभव बदल देती हैं। उन्होंने कहा, “मन किसी रूप के बारे में बार-बार सोचता है, फिर उसी विचार को वस्तु में स्थापित देखता है। निरन्तर चिन्तन छवि को गाढ़ा करता है। उससे आसक्ति उठती है, इन्द्रियाँ सक्रिय होती हैं और मन अपनी बनाई धारणा की पुष्टि खोजता है। छोटे बच्चे और संयमी साधक उसी दृश्य से वैसी उत्तेजना अनुभव नहीं करते, क्योंकि उनके भीतर वह अभ्यासित छवि काम नहीं कर रही होती।” हेमलेखा ने शरीर की बनावट की ओर भी संकेत किया। त्वचा के भीतर रक्त, अस्थि, मांस, पित्त, कफ और उत्सर्जन की प्रक्रियाएँ हैं। भोजन अलग-अलग स्वाद और रूप में भीतर जाता है, फिर शरीर उसे बदलकर बाहर निकालता है। सौन्दर्य की अनुभूति को शरीर का शाश्वत गुण मानने से पहले इस संपूर्ण प्रक्रिया को देखना चाहिए। उनके शब्द इच्छा के बनाए चयन और विस्मरण को सामने ला रहे थे। हेमचूड़ ने इस संवाद के बाद अपने सुखों को नए ढंग से देखना आरम्भ किया। भोजन, वस्त्र, आभूषण, घोड़े, मित्र, महल और संगति पहले जैसे थे, पर उन्हें ग्रहण करने वाली दृष्टि बदल गई। हेमलेखा की जाँच ने अनुभव के घटकों को अलग-अलग कर दिया था। हेमचूड़ को राहत, उत्तेजना, कल्पना, इच्छा और शान्ति के बीच का अन्तर दिखाई देने लगा। दत्तात्रेय ने यहाँ परशुराम को कथा का परिणाम संक्षेप में पहले ही बता दिया। उन्होंने कहा कि हेमचूड़ आगे चलकर जीवन्मुक्त हुए, मणिचूड़ और मुक्तचूड़ ने उनसे शिक्षा पाई, रानी ने हेमलेखा से समझ ग्रहण की और विशाला नगर ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हुआ। परशुराम उस परिवर्तन की पूरी यात्रा सुनना चाहते थे। उनके आग्रह पर दत्तात्रेय उस समय की ओर लौटे जब वैराग्य जाग चुका था और पुरानी आदतें अभी जीवित थीं। आदत, वैराग्य और जीवन का रूपक हेमचूड़ की दशा कुछ दिनों तक अस्थिर रही। भोगों का आकर्षण टूट रहा था, पर वर्षों की आदत उन्हें उन्हीं रास्तों पर खींच ले जाती। वे पुराने सुखों में जाते तो हेमलेखा के वचन याद आते और संकोच होता। उनसे दूर रहते तो मन अभ्यासवश फिर वहीं लौटता। स्वादिष्ट भोजन, कीमती वस्त्र, रत्न, सजे हुए घोड़े और मित्रों की सभा उन्हें पहले जैसी प्रसन्नता नहीं देती थी। उनका रंग फीका पड़ने लगा और वे उदास रहने लगे। हेमलेखा उनके निजी कक्ष में आईं और स्वास्थ्य पूछा। उन्होंने शरीर के तीन दोषों की असंगति से होने वाले रोगों की प्राचीन धारणा का उल्लेख किया। भोजन, वस्त्र, वाणी, दृश्य, स्पर्श, ऋतु और यात्रा शरीर को प्रभावित करते हैं। ऐसे रोगों के उपाय वैद्य बताते हैं। फिर उन्होंने कोमलता से कहा, “आपकी उदासी किसी दिखाई देने वाले शारीरिक रोग जैसी नहीं लगती। मन की बात मुझे बताइए।” हेमचूड़ ने स्वीकार किया, “आपकी पिछली बात ने मेरे लिए भोग का स्वाद रोक दिया है। मृत्यु-दण्ड की प्रतीक्षा करता मनुष्य राजकीय व्यंजन भी कैसे खाएगा? मेरी बुद्धि पुराने मार्ग को दोषपूर्ण देखती है और आदत मुझे वहीं ले जाती है। मैं अपनी ही दो दिशाओं में खिंचा जा रहा हूँ। अब ऐसा सुख बताइए जिसमें यह विवशता समाप्त हो।” हेमलेखा ने समझ लिया कि वैराग्य सत्य-खोज की तैयारी बन चुका था। हेमचूड़ जानने के लिए तत्पर थे। उन्होंने सीधा सिद्धान्त सुनाने से पहले एक विस्तृत रूपक चुना। कहा, “मेरी माता ने बचपन में मेरी सेवा के लिए एक सुशील सखी दी थी। वह स्वभाव से निर्मल थी, फिर उसकी निकटता शून्य नाम की एक चतुर और अनिष्टकारी स्त्री से हो गई। उस दूसरी स्त्री को हर घड़ी नए रूप गढ़ने आते थे।” “मैं अपनी सखी से गहरा प्रेम करती थी, इसलिए उसकी संगति के प्रभाव से बच नहीं सकी। शून्य अपने मूढ़ नाम के मदोन्मत्त पुत्र को हमारी निकटता में लाई। इस उलझन से एक अत्यन्त चंचल बालक पैदा हुआ। उसका स्वभाव क्षण भर में दूर-दूर भटकने का था। कोई बाधा उसे देर तक रोक नहीं पाती थी। मैंने उसका नाम अस्थिर रखा।” “अस्थिर ने चपला नाम की स्त्री से विवाह किया। वह अपने पति की इच्छा के अनुसार अनगिनत रूप बना सकती थी। अस्थिर जहाँ जाना चाहता, चपला उसी क्षण उसके लिए दृश्य और परिस्थिति रच देती। दोनों के पाँच पुत्र हुए। वे अपने-अपने कौशल में निपुण थे और मैंने स्नेह से उनका पालन किया।” “पहले पुत्र ने ध्वनियों का भवन बनाया। वहाँ वीणा, वेदमन्त्र, शास्त्रपाठ, पक्षियों का कलरव और मधुमक्खियों की गूँज थी। उसी भवन में सिंह की गर्जना, मेघ का प्रचण्ड स्वर, समुद्र का कोलाहल, प्रसव की पुकार और शोक-विलाप भी सुनाई देते थे। अस्थिर कभी उनसे प्रसन्न होता और कभी विचलित।” “दूसरे पुत्र के भवन में कोमल और कठोर, गरम और ठंडी, चिकनी और खुरदरी वस्तुएँ थीं। तीसरे ने रंग, आकार और रूप सजाए। वहाँ लाल, श्वेत, पीले, नीले, धूमिल और काले दृश्य थे; लम्बे, छोटे, गोल, झुके, सुन्दर और विकराल आकार थे। चौथे पुत्र के घर में मीठे, खट्टे, तीखे, कसैले, चबाने, चूसने और पीने योग्य स्वाद थे। पाँचवें ने सुगन्ध, दुर्गन्ध, तीखी, मन्द, जाग्रत करने वाली और निद्रा लाने वाली गन्धें रखीं।” “अस्थिर बारी-बारी से पाँचों भवनों में जाता। जो कुछ वहाँ ग्रहण करता, उसका अंश चुपके से चपला के पास ले आता। बाद में वही सामग्री उसके अपने घर में नए रूप लेकर उभरती। पाँचों पुत्र भी पिता की अनुपस्थिति में किसी वस्तु का उपयोग नहीं कर पाते थे। उनकी सक्रियता अस्थिर की उपस्थिति से जुड़ी थी।” “फिर अस्थिर ने महाशना नाम की दूसरी स्त्री से विवाह किया। वह कितना भी पा ले, भूखी रहती थी। पति और पाँचों पुत्र दिन-रात उसके लिए सामग्री जुटाते, फिर भी उसकी माँग समाप्त नहीं होती। उसके दो पुत्र हुए, ज्वालामुख और निन्द्यवृत्त। ज्वालामुख के निकट अस्थिर क्रोध में जलने लगता। निन्द्यवृत्त को गले लगाते ही लोभ और कृपणता उसे संसार की दृष्टि में गिरा देते।” “पूरा परिवार दस द्वारों वाले नगर में बस गया। वहाँ सुख की खोज चलती और परिणाम में बेचैनी बढ़ती। नगर का एक प्रहरी था, प्रचार। वह दो ऊपरी द्वारों से आता-जाता, सभी निवासियों को जीवित रखता और उन्हें सूत्र में पिरोए मनकों की तरह सँभालता। नगर टूटने लगता, तो प्रचार निवासियों को समेटकर दूसरे नगर में ले जाता।” “जब अस्थिर सोता, पाँचों पुत्र, दोनों पत्नियाँ और घर के दूसरे लोग भी अपने कार्य रोक देते। उस विराम में मैं अपनी परम निर्मल माता की गोद में जाकर आनन्द पाती। जागते ही मुझे फिर नगर और परिवार के साथ लौटना पड़ता। लोगों ने उनके व्यवहार के कारण मुझे भी उन्हीं जैसा समझ लिया, हालांकि विवेकी व्यक्ति जानते थे कि मेरा अपना स्वरूप शुद्ध रहा।” “मेरी सखी अन्ततः अपनी दुर्दशा से थककर मेरे पास आई। उचित सलाह से उसने सद्गुणी पति को अपनाया, अस्थिर के शासन का अन्त किया और उसके पुत्रों को संयम में रखा। फिर वह मेरे साथ मेरी माता के निकट पहुँची। वहाँ उसका भेद मिटा और वह आनन्द में स्थित हुई। आर्यपुत्र, आपके भीतर की उलझन भी इसी परिवार की तरह समझी जा सकती है।” हेमचूड़ रूपक सुनकर चकित हुए। उन्होंने उसे शाब्दिक वृत्तान्त समझा और हँस पड़े। बोले, “आपकी आयु इतनी नहीं कि कई पीढ़ियों का जीवन देख चुकी हों। आपके साथ रहने वाली ऐसी कोई सखी राजमहल में नहीं है। दस द्वारों वाले नगर, पाँच भवन और इतने विचित्र सम्बन्ध कहाँ हैं? यह कथा आकाश में युद्ध करते बाँझ स्त्री के पुत्र जैसी असम्भव जान पड़ती है।” हेमलेखा ने उनके उपहास को धैर्य से सुना। कहा, “मेरे शब्दों का फल पहले अपने भीतर देखिए। सुख और सौन्दर्य पर हुई बातचीत ने आपकी रुचि और दृष्टि बदल दी। मेरे वचन आपको सत्य की दिशा में ले जा रहे हैं। रूपक की भाषा को घटना-विवरण की तरह पढ़ेंगे, तो अर्थ हाथ से छूट जाएगा। फिर भी आपके प्रश्न उचित हैं। पहले हमें यह समझना होगा कि विश्वसनीय वचन, श्रद्धा और परीक्षा का सम्बन्ध क्या है।” श्रद्धा, तर्क और त्रिपुरा की उपासना हेमलेखा ने कहा, “किसी हितैषी के वचन को आरम्भ से ही छल मान लेना मनुष्य को सीखने से वंचित करता है। शिशु माता पर विश्वास के सहारे बढ़ता है। किसान बीज, ऋतु और श्रम के सम्बन्ध पर भरोसा रखकर खेत जोतता है। परिवार, व्यापार और शासन में लोग एक-दूसरे के कथन और आचरण पर उचित सीमा तक विश्वास करते हैं। हर सम्भावना को पहले ही अस्वीकार कर दिया जाए, तो कोई प्रयत्न आरम्भ नहीं होगा।” हेमचूड़ ने सावधानी रखी। बोले, “विश्वास उसी पर किया जा सकता है जो योग्य हो। अयोग्य व्यक्ति पर भरोसा करके कल्याण चाहना काँटे में लगे चारे की ओर दौड़ती मछली जैसा है। मुझे पहले वक्ता की पात्रता जाननी चाहिए।” हेमलेखा ने उत्तर दिया, “पात्रता की परीक्षा आवश्यक है। फिर उस परीक्षा का मापदण्ड कौन तय करेगा, उसके मापदण्ड को कौन जाँचेगा, इस क्रम को अनन्त बनाना भी बुद्धिमानी नहीं। जीवन उचित प्रमाण, अनुभव, सत्पुरुषों की दृष्टि और अपने विचार को साथ रखकर चलता है।” उन्होंने सह्य पर्वत पर गोदावरी के पास रहने वाले कौशिक मुनि का प्रसंग सुनाया। कौशिक के शिष्य एक दिन गुरु की अनुपस्थिति में दर्शन पर चर्चा कर रहे थे। शुङ्ग नाम का अत्यन्त कुशल वादक वहाँ आया। वह हर प्रमाण के लिए दूसरा प्रमाण माँगता और अगले प्रमाण के लिए तीसरा। अपने तर्क से उसने कहा कि किसी मानदण्ड को अन्तिम रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता, इसलिए सत्य भी सिद्ध नहीं हो सकता। फिर उसने अपने इसी निष्कर्ष को भी असिद्ध कहकर सब कुछ शून्य घोषित कर दिया। कुछ शिष्य उसकी वाक्पटुता से प्रभावित हुए और तर्क के चक्र में भटक गए। विवेकी शिष्यों ने उसके प्रश्न अपने गुरु के सामने रखे। कौशिक ने उन्हें प्रमाणों की मर्यादा, अनुभव की भूमिका और साधना के उद्देश्य को समझाया। वे शान्त हुए। हेमलेखा ने कहा, “तर्क का काम मार्ग साफ करना है। वह हर मार्ग को खोदकर खाई बना दे, तो यात्री कहीं नहीं पहुँचता। उपयोगी विचार के बाद उचित प्रयत्न आरम्भ होना चाहिए।” मन की चंचलता पर उन्होंने विशेष ध्यान दिलाया। “बिखरे हुए मन से सुना वचन चित्र में बने फलदार वृक्ष जैसा है। उसका रूप दिखता है और उससे पोषण मिलना असम्भव है। पहले ध्यान स्थिर कीजिए। फिर उस उपाय को चुनिए जिसे अनुभवी ज्ञानी कल्याणकारी बताते हैं। उचित चर्चा से चयन कीजिए और पूरे मन से अभ्यास कीजिए। निष्फल वाद में बीता जीवन किसी सत्य को अनुभूति नहीं बनाता।” हेमलेखा ने संसार की उपलब्धियों का मूल्य भी उनके परिणाम से जाँचा। धन, संतान, पत्नी, राज्य, कोष, सेना, यश, विद्या, बुद्धि, शरीर और रूप सभी परिवर्तन तथा मृत्यु के अधीन हैं। उनमें अपना उचित स्थान और व्यवहार है, पर वे उस परम कल्याण का भार नहीं उठा सकते जिसे हेमचूड़ खोज रहे थे। ऐसा उपाय चाहिए जो मन को फिर उसी असन्तोष में न बाँधे। उन्होंने कहा कि जगत की उत्पत्ति और व्यवस्था के मूल की ओर श्रद्धा से मुड़ना साधना की पहली सीढ़ी है। सीमित जादूगर भी दर्शक की दृष्टि को भ्रमित कर सकता है। व्यापक माया से निकलने के लिए उसके अधिष्ठान की कृपा आवश्यक मानी गई है। इसलिए सृष्टि के परम कारण के प्रति समर्पण, नियमित उपासना और आत्मपरीक्षण को साथ रखना चाहिए। मनुष्य का परिश्रम कृपा के लिए पात्रता तैयार करता है और कृपा उसके प्रयत्न को भीतर की दिशा देती है। उपासना की तीन प्रवृत्तियाँ बताते हुए हेमलेखा ने कहा, “कोई संकट से मुक्ति के लिए ईश्वर को पुकारता है। कोई धन, सफलता या दूसरी कामना के लिए पूजा करता है। कोई अपना जीवन किसी निजी सौदे के बिना अर्पित कर देता है। पहले दो मार्ग अपने प्रयोजन के अनुसार सीमित फल देते हैं। तीसरे में उपासक अपनी माँग से अधिक अपने को समर्पित करता है। वही दृढ़ और शीघ्र फल देने वाली भक्ति है।” उन्होंने मार्कण्डेय का परिचित उदाहरण रखा। मृकण्डु को अल्पायु, तेजस्वी पुत्र मिला था। पुत्र ने सोलहवें वर्ष की नियति जानकर शिव की उपासना की और दिव्य अनुग्रह ने नियत सीमा को बदल दिया। हेमलेखा हेमचूड़ को निष्क्रिय नियतिवाद से बचा रही थीं। विवेकपूर्ण पुरुषार्थ, भक्ति और आत्मसंयम मनुष्य की दिशा बदल सकते हैं। हेमचूड़ ने पूछा, “जिस परम कारण की उपासना करनी है, उसे किस नाम से जानूँ? कोई विष्णु कहता है, कोई शिव, गणेश, सूर्य, नृसिंह, बुद्ध, अर्हत, वासुदेव, चन्द्र, अग्नि, कर्म या प्रकृति। सम्प्रदाय अपने देवता को सर्वोच्च कहते हैं। इनमें निर्णय कैसे हो?” हेमलेखा ने उत्तर दिया, “विभिन्न भक्त जिस परम सत्ता को अपने प्रिय नाम से पुकारते हैं, उसकी चेतना सबको देखती, धारण करती और जगत को प्रकट करती है। वह शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य और चन्द्र के रूप में पूजी जा सकती है। किसी एक देह, नाम या सम्प्रदाय में उसकी पूर्ण सीमा बाँधना उचित नहीं। सृष्टि का मूल स्वयं पूर्ण है और उसे काम करने के लिए बाहरी उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती।” उन्होंने स्वप्न का उदाहरण दिया। स्थूल शरीर शय्या पर पड़ा रहता है और मन अपने संस्कारों से पूरा दृश्य-जगत बना लेता है। इससे इतना समझ आता है कि देह चेतना के अधीन साधन है। परम सृजनशील सत्ता को सीमित शरीर और उपकरणों पर निर्भर मानने से उसकी पूर्णता घट जाएगी। भक्त किसी प्रिय मूर्ति में ध्यान करे, तो वही चेतना उस रूप के माध्यम से कृपा करती है। रूप साधना का द्वार बन सकता है। हेमलेखा ने उस परम चेतना का नाम त्रिपुरा बताया। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, इन तीन अवस्थाओं को प्रकाशित करने वाली सत्ता स्वयं किसी एक अवस्था में सीमित नहीं रहती। वह शुद्ध संवित् है। जैसे स्वच्छ दर्पण में अनेक प्रतिबिम्ब उभरते हैं और दर्पण अपनी चमक नहीं खोता, वैसे ही जगत की विविधता उस एक चेतना में प्रकट होती है। साधक सूक्ष्म तत्त्व समझ सके, तो निराकार चेतना की उपासना करे। उसकी बुद्धि अभी रूप से सहारा चाहती हो, तो अपने हृदय के अनुकूल पवित्र रूप में उसी सत्ता को पूजे। हेमचूड़ ने योग्य गुरुओं से त्रिपुरा की उपासना-विधि सीखी। कुछ महीने वे गहरी श्रद्धा और एकाग्रता से अभ्यास करते रहे। उनका मन विषयों से लौटकर सत्य की प्रत्यक्ष खोज में लग गया। भोग से विरक्ति ने स्पष्ट लक्ष्य और सावधान ऊर्जा का रूप ले लिया। उसी परिपक्वता के बाद वे फिर हेमलेखा के पास गए। रूपक की कुंजी हेमलेखा ने पति को दूर से आते देखा, उठकर स्वागत किया, अपना आसन दिया, उनके चरण धोए और प्रणाम किया। फिर स्नेह से पूछा कि इतने दिनों तक वे मिलने क्यों नहीं आए। उन्होंने कहा, “पहले एक क्षण का वियोग भी आपको लम्बा लगता था। अब कई दिन बीत गए। आपका स्वास्थ्य ठीक है? रातें कैसे बीतती हैं?” इतना कहकर उन्होंने आलिंगन किया और विरह से व्याकुल होने का भाव दिखाया। हेमचूड़ उस अभिनय से विचलित नहीं हुए। बोले, “प्रिय, अब आपकी स्थिरता को थोड़ा समझने लगा हूँ। बाहरी घटना आपके सहज आनन्द को हिला नहीं सकती। आप मेरी परीक्षा ले रही हैं। मैं उस पुराने रूपक का अर्थ पूछने आया हूँ। आपकी माता, सखी, उसके सम्बन्धी, पाँच पुत्र, दस द्वारों का नगर और चलायमान प्रहरी, ये सब मेरे जीवन से कैसे जुड़े हैं?” हेमलेखा प्रसन्न हुईं। उन्होंने देखा कि पति का मन प्रश्न के योग्य निर्मल और दृढ़ हो चुका था। बोलीं, “मेरी माता परात्पर शुद्ध चेतना है। मेरी सखी विवेक करने वाली बुद्धि है। उसकी शून्य नाम की अनिष्टकारी संगिनी अविद्या है, जो रस्सी में साँप दिखाकर भय पैदा कर सकती है। अविद्या के संग से बुद्धि अपना स्वच्छ निर्णय खो देती है और अस्थिर मन का शासन आरम्भ होता है।” “अस्थिर की पत्नी चपला संकल्प, कल्पना और विचार की बदलती धारा है। उनके पाँच पुत्र श्रवण, स्पर्श, दृष्टि, रसना और घ्राण हैं। उनके भवन कान, त्वचा, आँख, जिह्वा और नाक हैं। मन इन्द्रियों के विषय ग्रहण करके उनके संस्कार भीतर रखता है। बाद में वही संस्कार स्वप्न और कल्पना में नए दृश्य बनाते हैं। रूपक में अस्थिर का इन्द्रिय-भवनों से वस्तु चुराकर पत्नी के साथ बाँटना इसी प्रक्रिया का संकेत था।” “महाशना इच्छा है। उसके पुत्र ज्वालामुख रूपी क्रोध और निन्द्यवृत्त रूपी लोभ हैं। माँग पूरी न हो, तो क्रोध जलाता है। वस्तु मिल जाए, तो लोभ उसे पकड़कर और अधिक चाहता है। दस द्वारों वाला नगर शरीर है। उसकी इन्द्रियाँ और कर्म-द्वार भीतर के व्यापार को बाहरी जगत से जोड़ते हैं। जीव उन्हीं के माध्यम से संसार का व्यवहार करता है।” “नगर का सदा चलता प्रहरी प्राणशक्ति है। वह श्वास की गति के साथ शरीर और इन्द्रियों को जोड़कर रखती है। नींद में मन और इन्द्रियों का बाहरी व्यापार शान्त पड़ता है। बुद्धि भी अपनी सक्रिय विवेचना छोड़ देती है। उस विराम में चेतना अपनी उपस्थिति खोती नहीं, इसलिए जागने पर व्यक्ति कहता है कि वह सुख से सोया और कुछ नहीं जानता था।” “रूपक के अलग-अलग नगर जन्मों और शरीरों की शृंखला का संकेत हैं। पुराना शरीर काम करना छोड़ता है, तो संचित संस्कार और प्राणगत प्रवृत्ति दूसरे आश्रय की ओर बढ़ते हैं। विवेक-बुद्धि जब अविद्या की संगति पहचानती है, मन की निरंकुशता रोकती है और इच्छा, क्रोध तथा लोभ को संयम में रखती है, तब वह अपनी मूल चेतना की ओर लौट सकती है।” “मेरी सखी का सद्गुणी पति समाधि है, विवेक-बुद्धि की परिपक्व विश्रान्ति। अस्थिर पुत्र का वध मन की स्वेच्छाचारिता के अन्त का प्रतीक है। उसके पुत्रों को बन्द करना इन्द्रिय-व्यापार को मर्यादा में रखने का संकेत है। मेरी माता के कक्ष में प्रवेश पूर्ण मुक्ति का संकेत है। मेरे पास जो प्रभावशाली मन्त्र था, वह आत्मस्वरूप की पहचान थी।” हेमलेखा ने कहा, “यह रूपक प्रत्येक जीव की अन्तर्व्यवस्था का नक्शा है। चेतना सदा निर्मल है। बुद्धि अविद्या के संसर्ग में अपनी दिशा खोती है। मन कल्पना के साथ विषयों में दौड़ता है। इच्छा उसके श्रम को अनन्त बनाती है। विवेक जागता है, तो यही व्यवस्था आत्मपहचान की ओर मुड़ती है।” हेमचूड़ के सामने अब पूरी कथा खुल गई। उन्होंने माना कि हेमलेखा ने जिन पात्रों को मानवीय सम्बन्ध दिया था, वे मन के भीतर साथ काम करने वाली शक्तियों के प्रतीक थे। उनका पहला उपहास रूपक को गलत धरातल पर पढ़ने से पैदा हुआ था। श्रद्धा ने उन्हें अर्थ समझने तक संवाद में ठहरने और उत्तर को जाँचते रहने की क्षमता दी। नौवीं मंज़िल पर आत्मविचार हेमचूड़ ने अगला प्रश्न रखा, “आपकी माता शुद्ध चेतना हैं, तो मैं उन्हें कैसे जानूँ? हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है?” हेमलेखा ने कहा, “आत्मा किसी बाहरी वस्तु की तरह दिखाया नहीं जा सकता। शिक्षक आपकी दृष्टि को उसकी ओर मोड़ सकता है। अपनी आँख को उसी आँख से सामने रखकर देखने की कठिनाई समझिए। आत्मा देखने वाले की ही सत्ता है।” उन्होंने निर्देश दिया, “जिसे आप मेरा कहते हैं, उसे एक-एक करके देखिए। मेरा भवन, मेरा राज्य, मेरा शरीर, मेरी श्वास, मेरा मन, मेरी बुद्धि, इन सभी वाक्यों में जानने वाला कौन है? सम्बन्धित वस्तु को पहचानिए और उससे तादात्म्य छोड़ते जाइए। ग्रहण और त्याग के विचार से भी पहले जो जागरूक उपस्थिति है, उसी में ठहरने का प्रयत्न कीजिए।” हेमचूड़ तत्काल उठे, घोड़े पर बैठे और नगर से बाहर राजकीय उपवन में पहुँचे। वहाँ एक विशाल स्फटिक-प्रासाद था। वे उसकी नौवीं मंज़िल की उस दृष्टिशाला में गए जहाँ से दूर तक देखा जा सकता था। सेवकों को आदेश दिया कि उनके विचार में बैठे रहने तक मन्त्री, वृद्ध अधिकारी और स्वयं राजा मुक्तचूड़ भी भीतर न आएँ। फिर वे कोमल आसन पर बैठ गए। उन्होंने अपने जीवन को भीतर से देखना शुरू किया। “घर, धन, राज्य, कोष, स्त्रियाँ और पशु मेरे हैं, इसलिए मैं इनमें से कोई नहीं। शरीर को मैं अपना स्वरूप मानता आया हूँ, पर यह रक्त, अस्थि और दूसरे घटकों से बना है और हर क्षण बदलता है। बदलते शरीर को जानने वाली निरन्तरता उससे अलग होनी चाहिए। प्राण, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि भी मेरे उपकरण की तरह जाने जाते हैं।” यहाँ पहुँचकर उन्होंने प्रश्न किया कि बुद्धि को प्रकाशित कौन करता है। वस्तु इन्द्रियों से जानी जाती है, इन्द्रियों का व्यापार मन से और मन का निर्णय बुद्धि से। बुद्धि के उपस्थित होने की खबर जिस जागरूकता में मिलती है, उसे किसी अगली इन्द्रिय से पकड़ना सम्भव नहीं। हेमचूड़ ने सोचा कि अनात्म विचारों की लगातार उपस्थिति उस जागरूकता को ढक रही है। उन्होंने बलपूर्वक विचार रोक दिया। पहले गहरा अन्धकार दिखाई दिया। उन्होंने उसे आत्मा समझा और प्रसन्न हुए, फिर जाँच के लिए दुबारा मन रोका। इस बार आदि और अन्त से रहित तेज का पुंज उभरा। लौटने पर उन्होंने सोचा कि एक आत्मा के इतने बदलते रूप कैसे हो सकते हैं। तीसरे प्रयास में नींद आ गई और अनेक स्वप्न चले। जागने पर अन्धकार और प्रकाश भी उन्हें स्वप्न जैसी मानसिक घटनाएँ लगे। चौथे प्रयास में मन कुछ समय स्थिर रहा और वे विलक्षण आनन्द में डूब गए। बाहरी विषय का कोई स्पर्श नहीं था, फिर भी वह सुख उनके जाने हुए सभी सुखों से अधिक था। अवस्था चली गई, तो संशय फिर खड़ा हुआ। अन्धकार, प्रकाश, स्वप्न और आनन्द में से आत्मा कौन है? जो आता और जाता है, उसकी निरन्तरता कहाँ है? उन्होंने हेमलेखा को बुलाने के लिए द्वारपाल भेजा। एक मुहूर्त के भीतर हेमलेखा प्रासाद पहुँचीं। उन्होंने पति को शान्त, निश्चेष्ट और प्रसन्न देखा। पास बैठीं, तो हेमचूड़ ने आँखें खोलीं और पूरे अनुभव का क्रम बताया। बोले, “मैंने विचार रोके। पहले अन्धकार, फिर प्रकाश, उसके बाद नींद और स्वप्न, फिर अद्वितीय सुख आया। इनमें आत्मस्वरूप कौन है, कृपया स्पष्ट कीजिए।” हेमलेखा ने कहा, “मन को बाहर से लौटाना श्रेष्ठ आरम्भ है। बलपूर्वक रोकने से मन की गति शान्त होती है और आत्मा हर अवस्था में पहले से उपस्थित रहती है। उत्पन्न वस्तु परिवर्तन के अधीन होती है। अन्धकार और प्रकाश दोनों आपके सामने प्रकट हुए। स्वप्न को आपने जाना। आनन्द की अवस्था के आने और जाने का भी आपको ज्ञान है। इन सबको प्रकाशित करने वाला साक्षी उनकी बदलती सामग्री से परे है।” उन्होंने खोई हुई थैली का उदाहरण दिया। व्याकुल व्यक्ति अपनी ही रखी थैली भूल जाता है। शान्त होकर स्मरण करता है और कहता है कि थैली मिल गई। शान्ति ने पहले से रखी थैली का परिचय लौटा दिया। अँधेरे कमरे में दीपक वहाँ रखी वस्तुओं को प्रकाशित करता है। इसी प्रकार मन की स्थिरता परिचय का अवसर देती है और आत्मा उस अवसर में पहले से उपस्थित रहती है। “अन्धकार दिखाई देने से ठीक पहले का क्षण देखिए,” हेमलेखा ने कहा। “विचार रोकने का प्रयास समाप्त हो चुका था और अगला दृश्य अभी उभरा नहीं था। उस सहज अन्तराल में कोई वस्तु नहीं थी, फिर भी आपकी उपस्थिति थी। लोग वस्तुओं में इतने अभ्यस्त हैं कि वस्तुरहित जागरूकता को पहचान नहीं पाते। मूर्तिशास्त्र पढ़ लेने से कोई व्यक्ति अभ्यास के बिना मूर्तिकार नहीं बनता। आत्मा पर चर्चा जान लेने से भी प्रत्यक्ष विश्रान्ति अपने आप नहीं आती।” उन्होंने स्थान का दृष्टान्त रखा। हर वस्तु आकाश में दिखाई देती है, पर ध्यान वस्तुओं में लगा रहने से आकाश की ओर नहीं जाता। दर्पण में छवियाँ दिखाई देती हैं, पर दर्शक छवियों में उलझकर चमकते आधार को भूल सकता है। ज्ञान, ज्ञेय और जानने वाला चेतना में ही प्रकट होते हैं। समय और स्थान भी ज्ञात अवधारणाएँ हैं। उन्हें प्रकाशित करने वाली जागरूकता को किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। हेमलेखा ने पति को नींद और जागरण के बीच, एक वस्तु के हटने और दूसरी के पहचाने जाने के बीच, तथा दो विचारों के मध्य के शान्त अन्तराल में सावधान रहने को कहा। देखने की भावना को भी ढीला करना था। “मैं आत्मा देख रहा हूँ” का दावा देखने वाले और आत्मा के बीच नया भेद बना देता है। हेमचूड़ ने निर्देश ग्रहण किया। मन की गति शान्त हुई और वे अपने स्वरूप में निर्विकल्प समाधि में स्थित हुए। खुली आँखों की समाधि हेमलेखा ने देखा कि हेमचूड़ परम शान्ति में हैं। उन्होंने कोई व्यवधान नहीं डाला। एक मुहूर्त के बाद हेमचूड़ ने आँखें खोलीं। उस अनुभव में फिर लौटने की उत्कंठा से वे तुरन्त पलकें बन्द करने लगे। हेमलेखा ने उनके दोनों हाथ थाम लिए और पूछा, “नाथ, आँख बन्द करने से आपको कौन-सी वस्तु मिलती है और खोलने से क्या खो जाती है?” हेमचूड़ ने कहा कि उन्हें भीतर निष्कलुष आनन्द मिला है और बाहरी व्यवहार अब फीका लगता है। उन्होंने हेमलेखा से प्रार्थना की कि उन्हें फिर उसी शान्ति में जाने दें। हेमलेखा मुस्कराईं। बोलीं, “आपने बहुत मूल्यवान अनुभव पाया है, फिर भी उसकी मर्यादा समझनी होगी। यदि पलक के उठने या गिरने से सत्य बदल जाए, तो वह अखण्ड कैसे हुआ? आठ जौ जितनी पलक से असीम चेतना कहीं अधिक व्यापक है। उसी में असंख्य जगत की कल्पना समाती है।” उन्होंने हेमचूड़ को बची हुई गाँठें दिखाईं। पहली गाँठ शरीर को आत्मा मानना थी। अब एक सूक्ष्म गाँठ भीतर और बाहर का भेद बना रही थी। दूसरी गाँठ जगत को चेतना से अलग वस्तु मानती थी। फिर जीवों को एक-दूसरे से और क्रिया को शान्ति से अलग समझा जाता था। जब तक ये धारणाएँ सत्य जैसी लगती हैं, आँख बन्द करने पर मिला आनन्द व्यवहार के बीच स्थिर नहीं होगा। हेमलेखा ने कहा, “जो कुछ भी ज्ञात है, वह चेतना से बाहर प्रमाणित नहीं होता। दूर देश, पुराना समय और आने वाली घटना की कल्पना भी अभी की जागरूकता में उपस्थित होती है। दर्पण से अलग प्रतिबिम्ब नहीं टिक सकता। इसी तरह चेतना के बिना जगत का अनुभव नहीं मिलता। पूरे दृश्य को अपने आत्मप्रकाश में उठता और शान्त होता देखिए। फिर ‘मैं सबमें आत्मा देखता हूँ’ वाला विचार भी छोड़ दीजिए और स्वाभाविक सत्ता में रहिए।” इस शिक्षा के बाद हेमचूड़ की समझ धीरे-धीरे स्थिर हुई। वे हेमलेखा और परिवार के साथ प्रसन्न जीवन बिताते हुए राज्य चलाने लगे। युद्ध उपस्थित हुआ, तो शत्रुओं का सामना किया। शास्त्र सुने, स्वयं पढ़े और दूसरों को सुनाया। कोष व्यवस्थित किया, अश्वमेध और राजसूय जैसे राजकीय यज्ञ किए और राज्य को समृद्ध रखा। समाधि अब किसी बन्द कक्ष की विशेष घड़ी पर निर्भर नहीं रही। हेमचूड़ दो अयुत वर्ष, अर्थात परम्परागत गणना से बीस हज़ार वर्ष, जीवन्मुक्त रहकर राज्य और परिवार के बीच विचरते रहे। मुक्तचूड़ और मणिचूड़ ने हेमचूड़ में परिवर्तन देखा। अत्यन्त सुख मिलने पर वे उछलते नहीं थे और गहरा दुःख आने पर टूटते नहीं थे। लाभ और हानि, मित्र और शत्रु के बीच उनका निर्णय सम रहता। वे रंगमंच के अभिनेता की तरह राजकीय भूमिका पूरी सावधानी से निभाते, भीतर भूमिका के आग्रह से मुक्त रहते। पिता और भाई ने एकान्त में इसका कारण पूछा। हेमचूड़ ने अपनी स्थिति बताई और दोनों ने उनसे उपदेश ग्रहण किया। वे भी जीवन्मुक्त हुए। राजपरिवार से यह समझ मन्त्रियों तक पहुँची। फिर नागरिकों, कारीगरों, सेवकों, दास-दासियों, स्त्रियों, पुरुषों, बच्चों और वृद्धों तक उसका प्रसार हुआ। नगर का व्यवहार चलता रहा। माता शिशु को झुलाते हुए आत्मतत्त्व की लोरी गाती। कलाकार ज्ञान से जुड़ी कथा मंच पर रखते। गायक उसी सत्य के पद गाते। विदूषक अज्ञान की विसंगति दिखाकर लोगों को हँसाते। शिक्षा की सभाओं में चेतना और आत्मज्ञान पर विचार होता। संसार का व्यवहार उस नगर में चलता रहा। लोग अपने संस्कार और दायित्व के अनुसार काम करते थे। उनका ध्यान वर्तमान कर्म पर रहता था। अवसर के अनुरूप हँसते, रोते, उत्सव करते, श्रम करते और निर्णय लेते। भीतर वे जानते थे कि भूमिका चेतना में उठती है और उसी में शान्त होती है। सनक और दूसरे ऋषि विशाला आए। उन्होंने पिंजरों में बैठे तोतों तक को चेतना का विचार दुहराते सुना। पक्षी कहते थे कि ज्ञात वस्तुएँ आत्मप्रकाश से अलग नहीं, जैसे दर्पण के भीतर दिखने वाली छवियाँ उसकी चमक पर आश्रित हैं। ऋषियों ने उस नगर को पृथ्वी की ज्ञानपुरी कहा। विशाला की प्रसिद्धि हेमलेखा की बुद्धि, हेमचूड़ की ग्रहणशीलता और उनसे फैले सत्संग के कारण हुई। दत्तात्रेय ने परशुराम को आरम्भ का सूत्र फिर स्मरण कराया। हेमलेखा के संग से हेमचूड़ में विचार जागा। हेमचूड़ के आचरण और उपदेश से परिवार तथा राज्य में वही दृष्टि पहुँची। उचित संगति ने प्रश्न जगाया, प्रश्न ने साधना को दिशा दी और स्थिर समझ ने पूरे समाज के व्यवहार को नया आधार दिया।