युद्ध काण्ड · वाल्मीकि रामायण

वाल्मीकि रामायण · काण्ड 6 · सबसे लम्बा काण्ड

युद्ध काण्ड

विभीषण-शरण, सेतु-निर्माण, लंका-घेराव, रावण-वध, अग्नि-परीक्षा · 128 सर्ग

पढ़ने का समय: लगभग 100 मिनट

पहले एक बात

युद्ध काण्ड पूरी रामायण का सबसे लम्बा काण्ड है, 128 सर्ग। यह यद्ध-कथा है, और साथ-साथ नैतिक test की कथा। यहाँ राम पहली बार proper-army का leader है। यहाँ रावण का असली scale सामने आता है। यहाँ कुम्भकर्ण और इन्द्रजित जैसे villains हैं जो “villains” से ज़्यादा complex हैं, उन्हें भी अपना धर्म दिखता है, मगर वो ग़लत-side पर खड़े हैं।

और काण्ड के end में एक scene है, अग्नि-परीक्षा, जो आधुनिक readers के लिए सबसे difficult है। हम उसको सॉफ़्ट नहीं करेंगे, वैसा ही रखेंगे जैसा वाल्मीकि ने लिखा है। फिर भी एक note add करेंगे कि यह scene 2,000 साल से commentators को बेचैन करता है।

विभीषण का shelter

हनुमान की लंका-वापसी के बाद, राम की सेना समुद्र-तट की ओर बढ़ रही थी। उसी समय लंका में, रावण की court में, एक decisive moment हो रहा था।

रावण के तीन भाइयों में सबसे छोटा विभीषण। हमेशा से धर्म-side पर। उसने रावण को बार-बार समझाया था, “बड़े भाई, सीता को वापस कर। यह कन्या किसी और की पत्नी है। यह adharma है।” रावण हर बार ख़ारिज करता।

एक दिन full दरबार में, मन्त्रियों के सामने, विभीषण ने एक और कोशिश की। रावण क्रोधित हो गया, अपने भाई को लात मारी, “आप मेरा भाई है मगर शत्रु के लिए advocate करता है। निकल यहाँ से।”

विभीषण ने अपने चार साथियों के साथ लंका छोड़ दी। वो आकाश में उड़ कर, समुद्र पार कर के, राम की सेना के पास पहुँचा। राम के camp के बाहर खड़ा हुआ, “मुझे शरण दो।”

राम के मन्त्रियों में मतभेद हुआ। सुग्रीव ने कहा, “यह रावण का भाई, चाल हो सकती है। मार दे।” हनुमान, अंगद, और जाम्बवान ने भी इसी पर voice दिया।

राम ने मुस्कुरा कर कहा,

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ॥

“जो एक बार भी “मैं आपका हूँ” कह कर शरण माँगे, उसको मैं सब-प्राणियों से अभय देता हूँ। यह मेरा व्रत है।”

राम ने विभीषण को न केवल शरण दी, उसको अभी से लंका का भावी-राजा declare कर दिया। “जब हम जीतेंगे, आप लंका का राजा होंगे।” यह राम का बहुत bold gesture था, युद्ध-शुरू-से-पहले उन्होंने defeated side की एक specific person को ताज़ चढ़ा दिया।

विभीषण से राम को बहुत important information मिली, रावण की सेना का breakdown, उसके बेटों और सेनापतियों की capabilities, लंका की defenses। यह intelligence-gathering का key moment था।

समुद्र की चुनौती

सेना समुद्र-तट पहुँची। 100 yojan का समुद्र, उस पार लंका। पुल के बिना सेना नहीं जा सकती थी।

राम ने पहले समुद्र-देव से प्रार्थना की। तीन दिन और तीन रातें, समुद्र के किनारे, ध्यान में बैठे। समुद्र-देव कोई जवाब नहीं दे रहा था।

तीसरे दिन के बाद राम का धीरज टूटा। उन्होंने धनुष उठाया, और ब्रह्मास्त्र चढ़ाया। “अगर समुद्र-देव शान्ति का संवाद नहीं दे सकते, मैं उन्हें सूखा देता हूँ। यह पूरा पानी भाप बना दूँगा।”

समुद्र-देव तुरंत प्रकट हुए, हाथ जोड़े। “हे राम, यह मेरा स्वभाव है, गहराई। मुझे सूखना आसान नहीं। मगर एक तरीक़ा है, आपकी सेना में दो engineer-वानर हैं, नल और उसका भाई नील। नल को विश्वकर्मा का वरदान है, उसके हाथ का छुआ हुआ कोई पत्थर पानी में डूबे नहीं। वो पुल बना सकता है।”

राम ने नल को बुलाया। नल ने कहा, “हाँ। मगर एक भी पत्थर मेरे हाथ से नहीं छूना चाहिए, सब वानर मुझे एक-by-एक पत्थर पास करें, मैं उन पर हाथ रखूँ, और राख्ने वाले उठा कर समुद्र में डालें।”

नल-सेतु

पाँच दिन का काम था। पहले दिन 14 yojan, दूसरे दिन 20, तीसरे दिन 21, चौथे दिन 22, पाँचवें दिन 23। कुल 100 yojan।

लाखों वानर पत्थर लाते, नल को देते, नल हाथ लगाते, राख्ने वाले समुद्र में डालते। पत्थर पानी पर float करते थे, डूबते नहीं।

एक specific परंपरा है तुलसी के रामचरितमानस में (वाल्मीकि में नहीं है), कि वानर पत्थर पर “राम” लिखते थे, फिर डालते। “राम-नाम” लिखे पत्थर तैरते थे। यह बहुत later addition है, मगर लोक-परंपरा में बहुत popular है। आज भी “रामेश्वरम्” से लेकर श्री लंका तक, इस setu के अवशेष “आदम-सेतु” या “Adam’s Bridge” के रूप में satellite-images में दिखते हैं।

पाँचवें दिन setu पूरा। राम की पूरी सेना, लाखों वानर-भालू, उस पुल से लंका के तट पर पहुँची।

रावण ने अपने guards से सुना। पहली बार, उसको थोड़ा डर लगा। “एक मानव-राजकुमार और वानर-भालू-सेना ने समुद्र पार कर लिया?” मगर ego-कारण उसने सोचा, “मेरी सेना है, मेरे बेटे हैं, मेरा कुम्भकर्ण है। यह नहीं जीत सकते।”

लंका का घेराव

राम की सेना लंका के बाहर camp किया। चारों गेट पर सेना तैनात। उत्तर-गेट पर राम-लक्ष्मण-विभीषण-हनुमान। पूर्व पर सुग्रीव-जाम्बवान। पश्चिम पर अंगद। दक्षिण पर नल-नील। पूरा परिमाप-cover।

राम ने एक आख़िरी कोशिश की, अंगद को राजदूत बना कर भेजा। अंगद रावण के दरबार में पहुँचा, खड़ा हो कर पैर ज़मीन में गाड़ दिया, “जो भी मेरा पैर हिला दे, राम वापस अयोध्या जाएगा।” रावण के सब बड़े-बड़े योद्धा, कुम्भकर्ण को छोड़ कर, एक-एक कर के try किए, हिला नहीं पाए।

अंगद ने रावण को एक warning भी दी, “अंतिम मौक़ा। सीता को सम्मान-सहित वापस कर, नहीं तो लंका मिट जाएगी।” रावण ने ख़ारिज कर दिया। अंगद वापस आ गया।

युद्ध शुरू हुआ।

नागपाश: इन्द्रजित का पहला हमला

पहले कुछ दिन छोटे-छोटे राक्षस मारे जाते रहे। फिर रावण ने अपने सबसे बड़े बेटे, इन्द्रजित (असली नाम मेघनाद) को सेना में उतारा। यह वो जिसने जवानी में इन्द्र को पराजित किया था, इसलिए उपाधि।

इन्द्रजित अदृश्य हो कर युद्ध करता था (उसके पास माया-अस्त्र थे)। एक दिन उसने अदृश्य रह कर राम और लक्ष्मण पर नागपाश चलाया, यानी “साँपों का जाल।” लाखों ज़हर-दँत-सर्प, अदृश्य-रूप से, राम-लक्ष्मण के शरीर में लिपट गए। दोनों भाई गिरे, मूर्छित।

पूरी वानर-सेना में हाहाकार। हनुमान, सुग्रीव, विभीषण, सब घबरा गए। राम-लक्ष्मण के शरीर ज़हर से नीले हो रहे थे।

विभीषण ने idea दिया, “हनुमान, गरुड़ को बुलाओ। गरुड़ साँपों का जन्म-शत्रु। उसके आने से ये सब सर्प भाग जाएँगे।”

हनुमान ने ध्यान किया। गरुड़विष्णु का वाहन, आकाश में उतरा। उसके पंखों की हवा से नागपाश के सब सर्प भाग गए। राम-लक्ष्मण उठे, बच गए।

गरुड़ ने राम को pranam किया, और वायु में लौट गया। यह एक “divine intervention” का scene था, मगर वाल्मीकि ने इसे casual रखा, बहुत संयमित।

कुम्भकर्ण का जागरण

रावण देख रहा था अपने सब-से-शक्तिशाली योद्धा अब-तक नहीं उतरे, मगर हनुमान-अंगद-सुग्रीव-नील ने उसके बहुत-से सेनापति मार दिए हैं। उसने decision लिया, “कुम्भकर्ण को जगाओ।”

कुम्भकर्ण रावण का छोटा भाई था, मगर बहुत बड़ा शरीर। बचपन में ब्रह्मा से एक वरदान माँगा था, “मुझे इन्द्र-पद चाहिए,” मगर सरस्वती ने उसकी जीभ पर बैठ कर “इन्द्र-शय्या-पद” बोलवा दिया, यानी “इन्द्र-जैसी नींद।” तब से कुम्भकर्ण 6 महीने सोता था, 1 दिन जागता था।

उसे जगाना एक pretty operation था। हज़ार राक्षस उसके कानों में ढोल बजाते थे, उसकी छाती पर हाथी चढ़ाते थे, खाना ले कर खड़े रहते थे, सब बेकार। आख़िर में उसे जगाया गया।

कुम्भकर्ण उठा। 100 भैंसे एक बार में खाईं, 1,000 घड़े मद-पान किया। फिर रावण के पास गया।

रावण ने situation बताई। कुम्भकर्ण ने सुना। फिर बहुत dignified बात कही, बहुत honest। यह वाल्मीकि की रामायण के सबसे touching scenes में से एक है:

पुरा त्वमेव श्रुत्वैव साम-दान-विधानतः ।
दण्डेन साधयेच्छक्तः कार्यं नात्र विचारणा ॥
तदा त्वया कृतं कार्यं इदानीं सर्व सङ्क्षयम् ।

“भाई, पहले आपको साम-दाम-दण्ड के सब means का इस्तेमाल करना चाहिए था। अब सब कुछ बर्बादी की ओर है। तूने एक स्त्री को छीन कर सब को मुसीबत में डाल दिया।”

कुम्भकर्ण ने रावण को कहा, “तूने ग़लत किया। सीता वापस कर, यही धर्म है।” रावण क्रोधित हो गया। कुम्भकर्ण ने फिर एक solid statement की, “मगर अब बात ख़त्म हो गई है। आप मेरा भाई है। आपकी रक्षा मेरा दायित्व है। मैं युद्ध-मैदान में जाता हूँ, राम और उसकी पूरी वानर-सेना को आज खा जाऊँगा।”

यह कुम्भकर्ण की क्या-क्या-है। वो जानता था रावण ग़लत है, मगर भाई-loyalty से युद्ध में गया।

कुम्भकर्ण-वध

कुम्भकर्ण युद्ध-मैदान में आया। पर्वत जैसी size, सूँड जैसे हाथ। वो वानरों को मुठ्ठियों में पकड़ कर खा रहा था, हज़ारों एक बार में।

पहले हनुमान ने एक पर्वत उसके सिर पर पटका, वो हँस पड़ा। फिर सुग्रीव ने एक पेड़ उठा कर मारा। फिर अंगद। फिर लाखों वानर एक साथ। कुम्भकर्ण ने सब को उछाला।

राम ने अपना ब्रह्मास्त्र निकाला। एक-एक करके अंग-अंग काटा। पहले बाएँ हाथ का बाण, फिर दाएँ का, फिर दोनों पैर, फिर सिर। कुम्भकर्ण मरते-मरते, अपने टुकड़े-शरीर के साथ, समुद्र की ओर गिरा। उसके खून से समुद्र लाल हो गया।

एक तरह से रावण ने अपना सबसे बड़ा asset आज खो दिया। मगर वो ego में डूबा रहा।

इन्द्रजित और झूठी सीता

कुम्भकर्ण के बाद, इन्द्रजित का दूसरा बड़ा हमला। इस बार उसने एक specific psychological trick की।

उसने माया-शक्ति से एक झूठी सीता का रूप बनाया, उसको अपने रथ पर बिठाया, और राम-सेना के सामने ले आया। फिर सबके सामने, अपनी तलवार से, “सीता” का सिर काट दिया।

हनुमान ने दूर से देखा। एक pal के लिए, उन्होंने believe कर लिया। दौड़ कर राम के पास गए, सीने पर हाथ रख कर, “राम, राम, हो गई! इन्द्रजित ने सीता को सबके सामने मार दिया!”

राम ज़मीन पर गिरे, मूर्छित। पूरी वानर-सेना में हाहाकार। यह war-collapse का moment था, सेना का मनोबल टूट जाने वाला था।

विभीषण ने आ कर सीधा situation समझाई, “नहीं। यह माया है। राम-deception। इन्द्रजित ने सीता को नहीं मारा, वो अशोक-वाटिका में है। यह उसका psychological-trick है।”

विभीषण ने explain किया, “इन्द्रजित को पता है, सीता मरने के बाद राम मनोबल खो देगा। मगर असली सीता ज़िंदा है। मैं रावण का भाई हूँ, मैं इस family की chal-chala-cha को जानता हूँ।”

राम धीरे-धीरे उठे। शक हुआ, मगर विभीषण की logic accept किया। मनोबल वापस आया।

(यह scene psychological warfare का एक early example है। एक pretend-kill से दुश्मन-सेना का मनोबल तोड़ने की कोशिश। 2,500 साल पहले भी यह tactic थी।)

लक्ष्मण का गिरना और संजीवनी

इन्द्रजित ने तीसरा हमला किया। इस बार अदृश्य रह कर लक्ष्मण पर एक specific अस्त्र चलाया, शक्ति-अस्त्र। लक्ष्मण के सीने में लगा, वो गिरे।

राम लक्ष्मण के पास पहुँचे, उठाने की कोशिश की, मगर लक्ष्मण साँस नहीं ले रहा था। दिल बैठ गया।

राम के camp में एक राक्षस-वैद्य था, सुषेण (विभीषण का परिचित था)। उसने जाँच की, बोला, “लक्ष्मण ज़िंदा है, मगर बहुत कमज़ोर। एक specific जड़ी-बूटी चाहिए, संजीवनी, मरे को ज़िंदा करने वाली। यह हिमालय के द्रोणागिरि पर्वत पर है। अगर सूर्योदय से पहले लाई जाए, लक्ष्मण बच जाएगा।”

सब ने हनुमान की ओर देखा। पहले मारुत-पुत्र, फिर लंका-लंघन-कर्ता, अब यह।

हनुमान ने size बढ़ाई, हिमालय की ओर उड़े। 4-5 घंटे में पहुँच गए। मगर एक problem, द्रोणागिरि पर्वत पर बहुत-सी जड़ी-बूटियाँ थीं। संजीवनी कौनसी? पहचान कैसे?

हनुमान ने एक practical decision लिया, “पूरा पर्वत ही उठा कर ले जाता हूँ।” उन्होंने पूरे द्रोणागिरि-पर्वत को उठाया, हाथ में रखा, वापस लंका की ओर उड़े।

सूर्योदय से पहले पहुँच गए। सुषेण ने सही जड़ी पहचानी, लक्ष्मण के नाक के पास रखी। लक्ष्मण ने साँस ली, उठ बैठे।

राम ने हनुमान को गले लगाया। फिर हनुमान वापस उड़े, द्रोणागिरि-पर्वत को उसकी original जगह पर रखा। यह scene तुलसी के रामचरितमानस में expand हुआ है, हनुमान को “संजीवनी-धर पर्वत-हाथ-में-वाले” के रूप में दिखाया गया है, यह image अब हर हनुमान-मूर्ति का signature है।

इन्द्रजित-वध

विभीषण ने एक important जानकारी राम को दी, “इन्द्रजित को अदृश्य-शक्ति एक specific यज्ञ से मिलती है। अगर वो यज्ञ-समाप्ति से पहले baahar निकाला जाए, उसकी शक्ति टूट जाएगी।”

“वो यज्ञ कहाँ?” राम ने पूछा।

“निकुम्भिला, लंका के बाहर एक secret place।”

राम ने लक्ष्मण को भेजा, साथ में हनुमान, विभीषण, और कुछ चुने हुए वानर। यह specific assignment लक्ष्मण को क्यों? क्योंकि एक prophecy थी, इन्द्रजित को सिर्फ़ एक specific तरह का व्यक्ति मार सकता था, “जिसने 14 साल बिना सोए, बिना खाए, और बिना अपनी पत्नी से मिले बिताए हैं।” लक्ष्मण इस criterion पर पूरा था (14 साल जागते-जागते राम-सीता की रक्षा की, ज़्यादातर समय बिना खाए, और पत्नी उर्मिला से तो अलग ही था पूरे 14 साल)।

लक्ष्मण निकुम्भिला पहुँचा। इन्द्रजित बैठा था, अपनी आख़िरी आहुति देने को ही था। लक्ष्मण ने उसको चुनौती दी, “इन्द्रजित, उठ। मैं आपके यज्ञ को तोड़ने आया।”

इन्द्रजित ने मुस्कुरा कर कहा, “लक्ष्मण। मुझे पता है आपकी qualifications क्या हैं। मेरा destiny है। मगर मैं आपको आसान नहीं रहने दूँगा।”

दोनों का युद्ध 4 दिन और 4 रातें चला। दिव्य-अस्त्र एक-दूसरे पर बरसते। इन्द्रजित की माया, लक्ष्मण की तपस्या-शक्ति। आख़िर में, चौथे दिन की रात, लक्ष्मण ने एक ऐन्द्र-अस्त्र चलाया, इन्द्रजित का सिर कट गया।

लंका में मातम। रावण ने सुना, अपने सबसे-बड़े-बेटे की मृत्यु। बहुत देर तक चुप रहा। फिर एक अद्भुत बात कही, “अब मैं ख़ुद युद्ध में आऊँगा।”

आदित्य-हृदय

रावण के सेना में आने का news सब-को पहुँचा। राम ने सुना। पहली बार, राम के अंदर एक थोड़ा-सा doubt आया। “रावण, जिसने 10 सिर हैं, 20 हाथ हैं, सब-वरदान हैं, मैं उसको हराऊँ कैसे?”

उसी moment, ऋषि अगस्त्य राम के camp में पधारे। वो जो बाल काण्ड में राम को दिव्य-अस्त्र दे चुके थे। अब उन्होंने एक new gift दी, आदित्य-हृदय स्तोत्रसूर्य-देव की स्तुति।

आदित्य-हृदयं पुण्यं सर्व-शत्रु-विनाशनम् ।
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षयं परमं शिवम् ॥

“आदित्य-हृदय पवित्र है, सब-शत्रुओं को नष्ट करने वाला, विजय देने वाला, यदि नित्य जपा जाए। अक्षय परम-शिव।”

“राम, यह सूर्य की 31-श्लोक की स्तुति है। ध्यान-से जप। आपको शक्ति आ जाएगी।” राम ने सूर्य की ओर देख कर 3 बार जप किया। उनके चेहरे पर तेज आ गया। थकान-doubt सब चले गए।

(यह स्तोत्र आज भी रोज़ बहुत-से Hindus जपते हैं, बीमारी-कठिनाई में। यह वाल्मीकि की रामायण का सबसे प्रसिद्ध स्तोत्र है, गायत्री-मन्त्र के बाद।)

राम vs रावण

रावण आया, अपने 10 सिर वाले रूप में, सबसे बड़े रथ पर, सबसे बड़ी सेना के साथ। मगर इस बार के युद्ध का scale अलग था, यह एक-on-एक होने वाला था।

राम के पास रथ नहीं था (वो पैदल थे, वन-वासी राजकुमार)। तो इन्द्र ने अपना दिव्य-रथ राम को भेजा, सारथी मातलि के साथ। राम उस पर चढ़े। अब दोनों warriors रथ पर।

युद्ध शुरू हुआ। दोनों के बीच 7 दिन और 7 रातें का सबसे epic युद्ध चला। दिव्य-अस्त्र, मानवास्त्र, आग्नेय, वायव्य, ब्रह्मास्त्र, इन्द्र-अस्त्र, ऐन्द्र-अस्त्र, सब। आसमान में आग की बारिश, धरती पर रक्त।

राम एक तीर से रावण का एक सिर काटते, मगर रावण के सिर के पुनः-उग आते। तीसरा सिर, चौथा, पाँचवाँ। राम चकित।

विभीषण ने rath पर से सलाह दी, “राम, रावण का जीवन एक specific जगह पर है, उसकी नाभि (navel) में। नाभि में दिव्य-अमृत का घड़ा है, उसी से सब सिर regenerate हो रहे हैं। नाभि पर तीर मारो।”

राम ने ब्रह्मास्त्र निकाला, अंत-समय का अस्त्र। उस पर specific मंत्र पढ़े। फिर रावण की नाभि की ओर निशाना लगा, बाण छोड़ा।

ब्रह्मास्त्र सीधा रावण की नाभि में लगा, अमृत-घड़ा फूटा। फिर बाण रावण के पूरे शरीर को चीर गया, उसके सब 10 सिर एक साथ कटे, उसका रथ टूट गया।

रावण गिरा।

पपात च तदा भूमौ रावणो राक्षसेश्वरः ।
निःश्वासाश्च गताः स्वर्गं चक्षुषी निमिषेऽनिमे ॥

“रावण, राक्षसों का राजा, धरती पर गिरा। उसकी साँसें स्वर्ग की ओर गईं, उसकी आँखें moment के लिए खुली रहीं।”

विभीषण का राज्याभिषेक

रावण की मृत्यु के बाद, रावण की पटरानी मन्दोदरी बाहर आई। बहुत dignified-शोक। उसने अपने मरे पति का सिर अपनी गोद में लिया, और एक लम्बा विलाप किया, बहुत poetic। उसकी बात का essence यही था, “आप सबसे बड़ा warrior था, मगर ego ने सब बर्बाद कर दिया।”

राम ने मन्दोदरी को सम्मान दिया, अंतिम-संस्कार के लिए facility दी। रावण के सब बेटे, मंत्री, और बाक़ी मरे राक्षसों को भी proper-rites मिले।

फिर राम ने अपना वचन पूरा किया, विभीषण को लंका का राजा बना दिया। वही जिसने तब-तब-समझाया था, अब-राज पर बैठा। यह एक specific reward था धर्म-side पर खड़े रहने का।

अग्नि-परीक्षा

अब comes the most-difficult scene in the whole Ramayana।

हनुमान सीता को लाने अशोक-वाटिका गए। सीता बाहर आई, राम के पास, बहुत ख़ुश। 14 साल और 6 महीने का इंतज़ार आख़िरकार ख़त्म।

मगर राम का चेहरा बदला हुआ था। उन्होंने एक formal का स्वर में कहा, “सीते, मैंने आपको मुक्त करा लिया है, मेरा कर्तव्य पूरा। मगर आप दूसरे आदमी के घर में रही है इतने महीने। मेरे clan का सम्मान कहता है, आप अब मेरी पत्नी नहीं रह सकती।”

सीता ने सुना। पूरी सेना के सामने। अपमान। 14 साल के सब त्याग एक pal में मिट गए। उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया।

उसने लक्ष्मण को कहा, “लक्ष्मण, अग्नि जलाओ। बहुत बड़ी।” लक्ष्मण ने pause किया, फिर राम की ओर देखा। राम ने सिर हिलाया, allow किया।

एक चिता तैयार हुई। सीता ने सबके सामने प्रार्थना की, “अग्नि-देव, यदि मैं pure हूँ, तो मुझे बचा। नहीं तो मुझे जला।” फिर वो जलती-अग्नि में चली गई।

कुछ देर बाद, अग्नि-देव सीता को गोद में उठा कर बाहर निकले। पूर्णतः unhurt। यह वाल्मीकि का “divine intervention” था, सीता को pure prove करने का।

राम ने तुरंत सीता को गले लगाया, “मेरी प्रिय, मुझे पता था आप pure है। मगर मैंने यह public-demonstration इसलिए कराई, ताकि लोगों के मन में कोई शंका न रहे। मेरा clan का सम्मान complete हो गया।”

एक note। अग्नि-परीक्षा रामायण का सबसे difficult scene है आधुनिक readers के लिए। राम ने अपनी पत्नी को सबके सामने एक oath of fidelity देने को कहा। यह आज की sensibility में patriarchy-driven लगता है, और लगना भी चाहिए। बहुत-से commentators ने इसको soften करने की कोशिश की है, कई परंपराओं में सीता को बचाने के लिए “actual-Sita-कभी-रावण-के-घर-में-नहीं-थी, छाया-सीता थी” वाली कथा है। मगर वाल्मीकि का text यही कहता है। हम इसे honest रख रहे हैं, मगर एक note add कर रहे हैं कि यह scene 2,000 साल से uncomfortable रहा है।

पुष्पक-विमान और अयोध्या-वापसी

राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव, विभीषण, सब लंका से अयोध्या वापस। राम ने रावण का स्वर्ण-पुष्पक-विमान (आकाशी रथ) उपयोग किया, सब सेना उसमें बैठी।

रास्ते में राम ने सीता को हर specific जगह दिखाई, जहाँ-जहाँ वनवास के 14 साल बीते। “यह पंचवटी है, यह वो जगह जहाँ आपको हरण किया गया था, यह जटायु की समाधि, यह शबरी का आश्रम।” यह एक specific gesture था, सीता के अनुभव को honour करने का।

14 साल पूरे होने के दिन ही, सूर्य-डूब से पहले, सब अयोध्या पहुँचे। भरत नन्दिग्राम से चलते-चलते बारी-पावा होने वाला था, उसके 14-साल का countdown ख़त्म हो रहा था। हनुमान आगे जा कर बताया, “राम आ रहे हैं!”

भरत भागते-दौड़ते राम को मिले। 14 साल बाद, अयोध्या में फिर एक-साथ। पूरा परिवार, सब माताएँ, सब भाई, सीता।

राज्याभिषेक और राम-राज्य

अगले दिन ही राज्याभिषेक हुआ। वसिष्ठ, भरद्वाज, अगस्त्य, सब ऋषि उपस्थित। राम राजा बने, सीता रानी। भरत युवराज। लक्ष्मण, शत्रुघ्न, बाक़ी राज-कुटुम्ब।

राम ने हनुमान को विशेष-वरदान दिए। “आप जब-तक रामायण की कथा पृथ्वी पर चलेगी, तब-तक ज़िंदा रहेगा।” इसीलिए हिन्दू-परंपरा में हनुमान “चिरंजीवी” माने जाते हैं, अमर। वो अभी भी ज़िंदा हैं, कथा-तरह से।

विभीषण को लंका-राज्य देने के बाद, सुग्रीव-अंगद किष्किन्धा वापस गए। सब अपने-अपने जगह वापस।

राम-राज्य शुरू हुआ, 11,000 साल का (पुराण-काल में)। यह वो golden-era माना जाता है, जहाँ कोई दुख नहीं, कोई बीमारी नहीं, कोई crime नहीं, सब लोग ख़ुश। आज भी अच्छे राज को “राम-राज्य” कहा जाता है, यही reference।

युद्ध काण्ड यहाँ ख़त्म होता है। मगर रामायण-कथा का एक aftermath है, उत्तर काण्ड, जहाँ कुछ unfinished business है। अगले काण्ड में।

साथ में पढ़ें

स्रोत: वाल्मीकि रामायण, युद्ध काण्ड, 128 सर्ग।

एक key note। अग्नि-परीक्षा scene को हमने सॉफ़्ट नहीं किया, मगर एक context-note add किया कि यह आधुनिक readers के लिए uncomfortable है, और 2,000+ साल से commentators ने अलग-अलग तरीक़े से explain करने की कोशिश की है।

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