उत्तर काण्ड · वाल्मीकि रामायण

वाल्मीकि रामायण · काण्ड 7 · अंतिम काण्ड

उत्तर काण्ड

रावण की पूरी कथा, सीता का अंतिम-त्याग, लव-कुश, राम का प्रस्थान · 111 सर्ग

पढ़ने का समय: लगभग 75 मिनट

पहले एक बात

उत्तर काण्ड रामायण का सबसे painful काण्ड है। बाक़ी 6 काण्डों में एक उम्मीद का thread था, “राम जीतेगा, सीता वापस होगी।” यहाँ सब-कुछ हो चुका है, मगर कथा end नहीं हुई है। एक उम्मीद-free काण्ड।

यहाँ चार chunks हैं: एक, रावण की पूरी back-story (हम पहले 6 काण्डों में रावण को सिर्फ़ “बुरा आदमी” देखते आए थे, यहाँ उसकी पूरी कहानी, उसका born, उसका rise, उसके पाप)। दो, राम-राज्य का golden era। तीन, सीता का दूसरा वनवास (एक धोबी की बात पर!) और लव-कुश का जन्म। चार, राम का अंत-यात्रा।

एक pre-note। आधुनिक विद्वान् मानते हैं कि उत्तर काण्ड वाल्मीकि का original हिस्सा नहीं, यह बाद में add हुआ है (लगभग 2,000 साल बाद)। मुख्य evidence: language-style different है, बाक़ी 6 काण्डों से। और एक specific decision (सीता-त्याग) वाल्मीकि के राम-character के साथ inconsistent लगता है। परंपरा फिर भी उत्तर काण्ड को include करती है, और हम भी करते हैं, मगर इस note के साथ।

रावण की पूरी कहानी

राज्याभिषेक के कुछ समय बाद, ऋषि अगस्त्य अयोध्या आए। उन्होंने राम को रावण के बारे में पूरी कथा सुनाई।

रावण के पिता विश्रवाएक brahman-ऋषि थे। दादा पुलस्त्यब्रह्मा के मानस-पुत्र। यानी रावण actually brahmanical-vansh का था, “राक्षस” वो later बने।

विश्रवा की दो पत्नियाँ थीं। पहली से कुबेर (धन-देव) पैदा हुए। यह कुबेर ही पहले लंका के राजा थे, जो ब्रह्मा से वरदान-स्वरूप पुष्पक-विमान भी पाए थे।

दूसरी पत्नी केकसीएक राक्षस-कुल की। उससे चार बच्चे, रावणकुम्भकर्णविभीषणऔर शूर्पणखा

रावण बचपन में बहुत intelligent था, सब वेद-शास्त्र पढ़े, सब मंत्र सीखे। मगर उसके अंदर ego बहुत प्रबल था। उसने ब्रह्मा की 10,000 साल तपस्या की, और एक specific वरदान माँगा,

अवध्योऽहं भवेयं हि देव-दानव-राक्षसैः ।
यक्षै-गन्धर्व-नागैश्च मा भवेन्मरणं मम ॥

“मुझे देव-दानव-राक्षस-यक्ष-गन्धर्व-नाग से मृत्यु न हो।”

रावण ने मनुष्य और वानर को list में नहीं रखा, क्योंकि वो उनको कमज़ोर समझता था। ब्रह्मा ने वरदान दे दिया। यह precise-loophole ही आगे चल कर एक मानव (राम) और वानर-सेना के द्वारा रावण के अंत का कारण बना।

वरदान के बाद रावण का rise शुरू हुआ। उसने पहले अपने सौतेले-भाई कुबेर से लंका छीन ली। पुष्पक-विमान भी। फिर तीनों लोकों पर हमले शुरू, सब को defeat किया। इन्द्र को बंदी बनाया (इन्द्रजित का जन्म इसी से), कुबेर को हराया, यम तक को चुनौती दी।

उसके पाप-list बहुत लम्बी थी। सबसे बुरा, उसने वेदवती नाम की एक तपस्विनी पर बल-प्रयोग की कोशिश की थी। वो जल-समाधि ले कर मरी, मरते-मरते एक शाप दिया, “अगले जन्म में मैं आपकी मृत्यु का कारण बनूँगी।” वेदवती का अगला जन्म, सीता।

(यह कथा एक important narrative-loop है। सीता-हरण actually karmically-pre-ordained था। रावण का अंत भी।)

एक और कथा सुनाई गई, नंदी (शिव का बैल) और वालि (किष्किन्धा का बाली) ने भी रावण को defeat किया था। बाली ने तो रावण को अपनी काँख में दबा कर 6 महीने तक घूमा था। मगर इन encounters के बाद भी रावण का ego कम नहीं हुआ।

अगस्त्य ने यह सब बताया, फिर बोले, “राम, आपका काम बहुत बड़ा था। आपने सिर्फ़ एक राक्षस नहीं मारा, एक 10,000-साल का adharm-cycle break किया।”

राम-राज्य

उत्तर काण्ड का अगला section, “राम-राज्य।” यह एक golden era का description है, जो आज भी political-discourse में reference है।

राम-राज्य की specific qualities, जैसा वाल्मीकि describe करते हैं:

  • कोई बीमारी नहीं। लोग 100+ साल जीते थे।
  • कोई crime नहीं। चोर-डाकू कहीं नहीं।
  • कोई बेरोज़गारी नहीं। हर एक के पास काम था।
  • कोई असम्मानजनक मृत्यु नहीं। बूढ़े लोग natural ही मरते थे।
  • बारिश सही समय पर, फ़सल सही समय पर।
  • कोई स्त्री-विधवा नहीं, क्योंकि पति पत्नी से पहले नहीं मरते थे।
  • कोई परिवार-conflict नहीं।

यह picture बहुत idealized है। मगर एक specific point है, राम-राज्य का concept एक benchmark बन गया, “perfect-राज्य कैसा होता है।” आज भी जब कोई politician अच्छे-शासन का वादा करता है, “राम-राज्य लाएँगे” बोलते हैं।

राम ने 11,000 साल राज किया (पुराण-समय-scale)। उसके राज्य में सीता रानी, भरत-लक्ष्मण-शत्रुघ्न साथ, हनुमान दरबार में specific-asset।

सीता गर्भवती हुई।

एक धोबी की बात

एक रात राम-वेश-बदले-हुए-गश्त पर निकले, अयोध्या के मोहल्लों में। यह उनकी एक practice थी, अपने राज्य को ज़मीन-stage पर देखना, क्या लोग ख़ुश हैं, कोई problem है।

एक धोबी (washerman) के घर के पास से गुज़र रहे थे। अंदर से एक झगड़ा सुनाई दिया। धोबी अपनी पत्नी को घर से निकाल रहा था, “आप दूसरे आदमी के घर में रात बिता कर आई है। आपका कोई explanation मेरे पास नहीं चलेगा।”

पत्नी रो रही थी, “मैं अपनी सहेली के घर थी, उसने tubewell-तालाब-वाली कथा है।” मगर धोबी सुन नहीं रहा था। फिर उसने एक specific वाक्य कहा,

“मैं राम जैसा मूर्ख-राजा नहीं हूँ, जो अपनी पत्नी को दूसरे आदमी के घर रह कर आने के बाद भी रखता है। निकल यहाँ से।”

राम के सिर पर मानो वज्र गिरा। यह एक धोबी, एक common-man, उनकी पत्नी सीता के बारे में बोल रहा था। मतलब उनके राज्य में सीता को ले कर rumours चल रहे थे। प्रजा शक करती थी।

राम वापस अपने महल आए, पूरी रात बिस्तर पर। सीता बग़ल में सो रही थी, गर्भवती। सुबह उन्होंने भाइयों को बुलाया, अपने मंत्रिमंडल को।

सीता का त्याग

राम ने एक decision बताया, बहुत formal का स्वर में, “सीता को वन भेजना है। मेरे राज्य में प्रजा शक करती है। एक राजा की पत्नी पर शक नहीं हो सकता। यह राज-धर्म है।”

सब भाई मना किया। “भैया, यह क्या? सीता तो pure है। अग्नि-परीक्षा हो चुकी है। एक धोबी की बात पर?”

राम ने सीधा कहा, “मेरे लिए सीता एक pal के लिए ही पत्नी है, ज़्यादातर वक़्त वो प्रजा की रानी है। और प्रजा की रानी पर अगर शक है, तो वो अब रानी नहीं हो सकती। मेरा राज-धर्म इस पर बँधा है। मेरा personal-दुख कुछ नहीं।”

लक्ष्मण को order दिया, “आप सीता को वन में छोड़ कर आ। एक pretext बना, कि वो ऋषि-आश्रम घूमने जाना चाहती है। फिर वहाँ ही छोड़ देना, बता देना यह राम का order है।”

लक्ष्मण रोने लगे। मगर order था। उन्होंने सीता को रथ पर बिठाया, “देवी, आप कुछ दिन के लिए ऋषि-आश्रम घूमने जाएँगी। राम ने कहा।” सीता ने खुशी से हाँ कहा, क्योंकि उसने इसको vacation-trip समझा।

गंगा-तट पर लक्ष्मण रथ रोके, सीता को उतारा, फिर बहुत-कठिनाई से बताया, “देवी, राम ने एक धोबी की बात सुनी, और आपको त्याग दिया है। आप यहाँ रहें, वाल्मीकि-आश्रम पास है, वो आपकी देख-भाल करेंगे।”

सीता समझ गई। एक pal के लिए वो खड़ी रही, फिर ज़मीन पर गिर पड़ी। बहुत रोई। फिर एक statement बोली, बहुत dignified,

अहं तपश्चरिष्यामि भर्तुर्धर्म-व्यपेक्षया ।
आत्मनो भर्तुश्चैव हृदये निहितस्य च ॥

“मैं तपस्या करूँगी, अपने पति के धर्म के विचार से, और अपने अंदर बैठे अपने पति के साथ।”

सीता ने lakshmana को कहा, “राम को बताना, सीता ने धर्म-स्वीकार किया, बिना शिकायत। मेरा कोई regret नहीं।” लक्ष्मण रोते-रोते लौटे।

(यह scene अग्नि-परीक्षा से भी ज़्यादा difficult है आधुनिक readers के लिए। सीता ने अग्नि-परीक्षा दे चुकी है, फिर भी एक धोबी की बात पर राम ने त्याग दिया। यह राम का एक deeply-flawed decision है, और tradition इसको explain करने में कठिनाई करती है। फिर भी हम honestly tell कर रहे हैं।)

लव-कुश का जन्म और शिक्षा

सीता वाल्मीकि के आश्रम पहुँची। वाल्मीकि ने उनको शरण दी, बहुत-दयालुता से, “बेटी, आप यहाँ रह। मेरा आश्रम आपका घर।”

कुछ महीने बाद, सीता ने दो जुड़वाँ-पुत्रों को जन्म दिया, लव और कुश। दोनों सुन्दर, तेजस्वी, राजकुमारों जैसे।

वाल्मीकि ने उनको खुद-शिक्षा दी। वेद, शास्त्र, धनुर्विद्या, सब। मगर एक specific चीज़ भी, उनको रामायण-recite करना सिखाया। वाल्मीकि ने अपनी रामायण-रचना खुद के आश्रम में पूरी की थी, और अब उसी रामायण के मुख्य पात्र के बेटे आश्रम में थे। यह एक meta-fictional-loop है।

लव और कुश बहुत-अच्छा गाना सीखा। उन्हें यह नहीं पता था कि कथा उनके अपने पिता की है। सीता ने जान-बूझ कर नहीं बताया।

दोनों भाई बड़े हुए। 12 साल के होने पर, वो वाल्मीकि के आश्रम के बाहर भी जा कर रामायण-recite करते थे, गाँव-गाँव। बहुत-popular हो गए।

अश्वमेध-यज्ञ

अयोध्या में, राम ने एक specific decision लिया, “अश्वमेध-यज्ञ करना है।” यह एक राजसूय का स्तर का यज्ञ है, जिसमें एक specific विधि है, एक राज-घोड़ा छोड़ दिया जाता है पूरे देश में, साल भर के लिए। जिन-जिन राज्यों में वो घोड़ा प्रवेश करे, उनको दो options, या तो उस राज्य को submit करें, या युद्ध करें। साल बाद जब घोड़ा वापस आए, यदि unchallenged आया है, यज्ञ पूरा।

राम ने अश्वमेध-यज्ञ शुरू किया। एक स्वर्ण-घोड़ा, सिर पर “राम” लिखा, छोड़ा गया। साथ में शत्रुघ्न की सेना, घोड़े की रक्षा के लिए।

घोड़ा पूरे भारत में घूमा, सब-राज्यों ने submit कर लिया। एक-by-एक। 11 महीने।

आख़िरी महीने में, घोड़ा वाल्मीकि के आश्रम के पास से गुज़रा। लव-कुश दोनों आश्रम के बाहर खेल रहे थे। उन्होंने घोड़े को देखा, “यह स्वर्ण-घोड़ा कितना सुन्दर! इसको पकड़ लें।”

दोनों ने घोड़े को पकड़ कर रोक लिया, एक पेड़ से बाँध दिया।

शत्रुघ्न vs लव-कुश

घोड़े के guards ने देखा। कोई बच्चा यह दुस्साहस कैसे कर सकता है? उन्होंने challenge की। लव-कुश ने धनुष उठाए। दोनों 12-साल के बच्चे, सेना के सामने।

पहली skirmish में, guards मारे गए। बच्चों के तीर-कौशल अद्भुत था (वाल्मीकि ने सिखाया था)।

सूचना शत्रुघ्न तक पहुँची। वो ख़ुद आया, अपनी पूरी सेना के साथ। दो बच्चे, हज़ार warriors के सामने।

लव-कुश ने unfaltering खड़े-हो कर लड़े। दिव्य-अस्त्र निकाले (वाल्मीकि ने उनको सब अस्त्र सिखाए थे, सब-मंत्र-समेत)। शत्रुघ्न की सेना के बहुत-से warriors मारे गए या मूर्छित हो गए।

शत्रुघ्न ख़ुद युद्ध में आया। लव ने उन्हें भी एक तीर से मूर्छित कर दिया।

News अयोध्या पहुँची, “शत्रुघ्न गिर गए। दो बच्चों ने।”

राम-लक्ष्मण-भरत तीनों भागे आश्रम की ओर। तीन बड़े warriors एक साथ, दो बच्चों के सामने।

लव-कुश ने तीनों से भी लड़ाई की। बहुत-देर तक। आख़िर में, राम ने कोई decisive अस्त्र चलाया, बच्चे थोड़े थक गए।

पहचान का moment

तब-तक वाल्मीकि आश्रम के बाहर आ चुके थे। उन्होंने सब रुकाया, “रुक! युद्ध बंद!”

राम ने वाल्मीकि को देखा। फिर बच्चों को। वो जान गए। वो उनके बेटे थे।

वाल्मीकि ने बताया सब, “ये आपके ही बेटे हैं, राम। 12 साल पहले सीता ने इन्हें मेरे आश्रम में जन्म दिया। मैंने इनको पाला, सिखाया।”

राम के मन में एक pal के लिए हज़ार emotions उठीं। शोक, अपराध-बोध, पिता-प्यार, सब एक साथ।

उन्होंने बच्चों को गले लगाया।

“और सीता?” राम ने पूछा।

“वो अंदर है।”

सीता का अंतिम-प्रस्थान

राम ने सीता को बुलवाया। पूरे यज्ञ-मण्डप में, सब ऋषियों, मंत्रिमण्डल, सेना के सामने। राम ने एक formal-वाक्य दी,

“सीते, मैं आपको फिर रानी बनाने को तैयार हूँ। मगर एक condition, आप सब-के-सामने फिर एक oath ले, कि आप pure है। फिर हम वापस अयोध्या जाएँगे।”

सीता ने सुना। 12 साल वाल्मीकि के आश्रम में बिताए, अकेले, गर्भवती, बच्चे पाले। और अब एक और oath?

उसका धीरज इस बार पूरी तरह टूटा।

उन्होंने राम की ओर नहीं देखा। ज़मीन की ओर देखा। फिर हाथ जोड़ कर, बहुत dignified का स्वर में, बोलीं,

यथाहं राघवादन्यं मनसापि न चिन्तये ।
तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥

“यदि मैंने राघव (राम) के सिवा किसी और का भी चिन्तन नहीं किया है, तो हे माधवी देवी (भूमि-माता), मुझे एक विवर (छेद) देने योग्य है।”

तभी, धरती फटी। ज़मीन से एक स्वर्ण-सिंहासन उभरा, उस पर भूमि-देवी (सीता की असली माँ, क्योंकि सीता जन्म से ज़मीन-कन्या थी, राजा जनक को हल जोतते-जोतते मिली थी) बैठी थीं।

भूमि-देवी ने सीता की ओर बाँहें फैलाईं, “बेटी, आ। आप अब मेरी ज़िम्मेदारी।”

सीता उठ कर, बिना राम की ओर देखे, सिंहासन पर बैठ गई।

फिर सिंहासन धीरे-धीरे ज़मीन में नीचे जाने लगा, और सीता उसके साथ।

राम ने हाथ बढ़ा कर रोकने की कोशिश की, चीख कर पुकारा, “सीते! रुक!” मगर सीता बिना मुड़े, बिना देखे, धरती में चली गई।

धरती बंद हो गई।

राम वहीं ज़मीन पर बैठ गए। बहुत देर तक चुप, फिर शुरू रोते।

(यह scene रामायण का सबसे painful moment है। यह अग्नि-परीक्षा से भी ज़्यादा। सीता ने राम को second-chance दे दिया था अग्नि-परीक्षा में, मगर अब वो ख़त्म हो गई। वाल्मीकि की रामायण का यह permanent-tragedy है, राम को सीता हमेशा खो दी।)

राम का अंतिम-काल

सीता के जाने के बाद, राम ने राज जारी रखा, मगर वो हमेशा एक adha-आदमी थे। हर public-ceremony में सीता की एक सोने की मूर्ति रखी जाती थी, “रानी के स्थान पर।” यह राम का way था, सीता को honour करने का, अब-गए-बाद।

हज़ारों साल बीते। राम-राज्य चलता रहा। फिर एक दिन, यम-देव (मृत्यु के देव) ने राम के पास आ कर बताया, “आपका अवतार-काल पूरा हैं रहा है। आप विष्णु हैं, पृथ्वी पर 11,000 साल पूरे। अब वैकुण्ठ वापस जाएँ।”

राम ने सब अंतिम-व्यवस्था कर ली। अयोध्या को बेटे लव-कुश को बाँट दिया (एक को कोशल-दक्षिण, एक को उत्तर)। भरत-शत्रुघ्न को भी राज्य दे दिए। हनुमान को कहा, “आप ज़मीन पर रहेगा, राम-कथा-rakshak, चिरंजीवी, अमर।”

फिर राम सरयू नदी की ओर चले। पूरी अयोध्या-वासी पीछे-पीछे। सब ने जान-लिया था कि यह अंतिम-यात्रा है।

राम सरयू में उतरे, धीरे-धीरे। आधी छाती तक पानी आया। तब विष्णु के असली-रूप में बदल गए, चार-हाथ, शंख-चक्र-गदा-पद्म। फिर पानी के अंदर ही, वैकुण्ठ-लोक की ओर निकल गए।

पूरी अयोध्या के लोगों ने उसी moment सरयू में डुबकी ली, सब विष्णु-लोक चले गए, राम के साथ।

सर्वे ते रामसहिता ब्रह्मलोकं समापुः ।
आदित्य-वर्णा वज्र-शरीराः सद्योनिर्गत-कल्मषाः ॥

“सब-के-सब राम के साथ ब्रह्म-लोक पहुँचे, सूर्य-वर्ण के, वज्र-शरीर के, सब-पाप दूर हो कर।”

अयोध्या ख़ाली हो गई, हनुमान, लव, कुश, और कुछ-संत के अलावा।

उत्तर काण्ड का अंत

रामायण यहाँ ख़त्म होती है। एक 24,000-श्लोक का epic, एक माँ-पक्षी के विलाप से शुरू हुआ था, एक राजा की वैकुण्ठ-यात्रा पर ख़त्म होता है।

वाल्मीकि ने अपनी रचना complete कर ली थी। उनके आश्रम में लव-कुश रामायण-recite करते रहे। फिर यह कथा generations-down पहुँची, brahmans-shishyas के माध्यम से। 2,500 साल पहले first compiled, और आज भी हर भारतीय घर में, हर पीढ़ी में, हर रूप में, सुनी जाती है।

“राम” शब्द आज भी इस-तरह से ढाला हुआ है कि वो सुनते ही एक specific resonance होता है। एक pure-king, जिसने सब-कुछ खोया, मगर dharma को कभी नहीं। यह आदर्श वाल्मीकि की रचना है, मगर आज पूरी दुनिया का।

एक closing thought

आधुनिक readers के लिए, उत्तर काण्ड बहुत-कठिन है accept करना। राम का सीता-त्याग एक धोबी की बात पर। सीता का दूसरा वनवास। सीता का अंतिम-प्रस्थान, राम को unforgiven। यह सब “इदियल-राम” के साथ inconsistent लगता है।

बहुत-से commentators ने यह उत्तर काण्ड को “later-addition” माना है, इन्हीं inconsistencies की वजह से। मगर tradition इसको include करती है, और इसमें भी एक wisdom है, “एक perfect-king की भी limits हैं। राम भी एक mortal-king था जब वो धोबी की बात सुन कर decision कर रहा था। उसका adharm भी रामायण का हिस्सा है।”

वाल्मीकि की genius यही है, उसने अपने hero को बिना-तत्व-blemish present नहीं किया। राम के अंदर भी कमज़ोरियाँ हैं, और वाल्मीकि ने उनको छुपाया नहीं। यह honesty ही रामायण को 2,500 साल से alive रखे हुए है।

रामायण-commission पूरा। 5 phases, 7 kandas + index। एक 24,000-श्लोक के epic का हिन्दी retelling। हम धन्य हैं इस काम को कर पाने का।

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स्रोत: वाल्मीकि रामायण, उत्तर काण्ड, 111 सर्ग।

विद्वान्-debate। उत्तर काण्ड को आधुनिक scholars बाद का addition मानते हैं, मूल वाल्मीकि का नहीं। हमने इसको include किया है, परंपरा-respect के लिए, मगर इस note के साथ।

रामायण-commission पूरा। 5 phases, 8 pages, 24,000-श्लोक के epic का हिन्दी retelling।

license: मूल Sanskrit text public-domain। हिन्दी narrative retelling, lulla.net, CC BY-NC 4.0।