सुन्दर काण्ड
हनुमान का super-जर्नी · अकेला वानर लंका तक · 68 सर्ग
पहले एक बात
सुन्दर काण्ड रामायण का दिल है। पूरी रामायण के 24,000 श्लोकों में अगर एक काण्ड पढ़ना हो, यही। हनुमान का अकेला journey, समुद्र-लंघन, लंका में प्रवेश, सीता-दर्शन, अशोक-वाटिका का विनाश, लंका-दहन, वापसी, सब एक के बाद एक।
“सुन्दर” क्यों कहलाया? कुछ theories: एक, हनुमान का बचपन का नाम “सुन्दर” था। दो, इस काण्ड में हनुमान के सब-गुण display होते हैं, strength, wit, grammar-knowledge, bhakti, restraint, courage। तीन, वाल्मीकि की सबसे सुन्दर Sanskrit poetry यहाँ है।
हिन्दू परंपरा में सुन्दर काण्ड का self-contained पाठ बहुत common है, मंगलवार-शनिवार विशेष। 90 मिनट का पाठ। हनुमान-bhakti का foundation।
छलाँग की तैयारी
महेन्द्र-पर्वत के top पर हनुमान खड़े। समुद्र फैलता हुआ, 100 योजन दूर लंका।
हनुमान ने size बढ़ाया, पैर पर्वत पर मज़बूत, बाँहें फैलीं, छाती widened। एक deep साँस ली, फिर पर्वत को इतना धकेला कि वो ज़मीन में थोड़ा धँस गया। हनुमान आसमान में उड़े, गर्जना करते।
तद्वद् गमिष्यामि लङ्कां रावणपालिताम् ॥
“जैसे राम का छोड़ा बाण हवा की गति से जाता, वैसे ही मैं रावण की लंका तक जाऊँगा।”
मैनाक, समुद्र का स्वर्ण-पर्वत
आधे रास्ते में, समुद्र के बीच से एक स्वर्ण-पर्वत उभरा। यह मैनाक था, हिमालय का बेटा। पुरानी कथा थी, देवताओं के युद्ध में पर्वतों ने अपने पंख खो दिए थे, मैनाक ने समुद्र की शरण ले कर पंख बचाए। समुद्र ने उसको कहा, “जब इक्ष्वाकु-वंश का काम हो, मदद करना।”
हनुमान को देख कर समुद्र ने मैनाक को आदेश दिया, “उठो।” मैनाक उठा।
“रुक, वायु-पुत्र। मेरे ऊपर बैठ कर आराम कर। सेवा का अवसर माँग रहा हूँ।”
हनुमान ने रुकने से मना किया, बहुत respectfully।
न च मे विश्रमः कार्यो वहन्ति शिरसा स्थितः ॥
“राघव का बड़ा कार्य सामने है। मुझे विश्राम नहीं चाहिए।”
हनुमान ने हाथ से मैनाक को छुआ (respectful refusing-the-rest का touch), आगे उड़े।
सुरसा, सर्प-माता
देवताओं ने हनुमान का test लेने के लिए सुरसासर्प-गण की माता, को भेजा। उसने विशाल राक्षसी-रूप लिया, मुँह खोला, “वानर, मेरे मुँह में आ। आज मेरा भोजन।”
हनुमान ने मुस्कुरा कर कहा, “माते, राम के काम पर हूँ। काम पूरा होने पर वापस आऊँगा।” सुरसा ने हाँ नहीं कहा।
हनुमान ने size-race शुरू की। अपना size 10 yojan, सुरसा का मुँह 10 yojan। हनुमान 100 yojan, सुरसा 100। अचानक हनुमान ने अंगूठे-जितना छोटा कर के, सुरसा के मुँह में घुस कर बाहर निकले, 1 second में।
सुरसा हँस पड़ी। “आप intelligent है। हम देवताओं ने आपका test लिया, आप पास।” वो रास्ता छोड़ गई।
सिंहिका, छाया-राक्षसी
तीसरा obstacle, सिंहिका। एक राक्षसी जो उड़ते प्राणियों की छाया पकड़ कर खींच लेती थी।
उसने हनुमान की छाया पकड़ी। हनुमान ने नीचे देखा। सिंहिका ने मुँह खोला, निगलने को।
हनुमान ने size छोटी कर के मुँह में घुसे, अंदर से सीना चीर दिया। सिंहिका मरी, समुद्र में डूब गई। हनुमान बाहर निकले, आगे उड़े।
लंका का तट
हनुमान लंका के तट पर पहुँचे। एक island, बहुत समृद्ध। महल, बाग़, सड़कें, सब सोने के। वाल्मीकि की description, “स्वर्ण-लंका।”
हनुमान ने size बिल्ली जितनी कर ली, रात होने का इंतज़ार किया। आधी रात, चाँद उगा, हनुमान दीवार पर चढ़े।
एक भयानक रूप सामने आया, लंकिनीलंका-नगर की देवी।
“रुक, वानर!” वो बोली। “permission बिना नहीं घुस सकते।”
हनुमान ने एक मुक्का सीधा सीने पर मारा। लंकिनी, जो ब्रह्म-वरदान से unbreakable थी, ज़मीन पर गिरी। फिर उठ कर बोली, “हनुमान, मेरा prophecy था, जब वानर मुझे मुक्का मारेगा, लंका का अंत शुरू होंगे। आज वो दिन। आप जा।”
लंका की तलाशी और रावण
हनुमान ने पूरी लंका search की। हर महल, हर कमरा। सब बेड पर एक स्त्री, मगर सीता नहीं। एक बार रावण की पटरानी मन्दोदरी को देख कर pal के लिए “सीता?” लगा, मगर तुरंत रिजेक्ट किया।
रावण को भी देखा, सोता हुआ। 10 सिर, 20 हाथ, बेहद-शक्तिशाली शरीर। हनुमान ने observe किया, “यह कोई ordinary दुश्मन नहीं।”
आख़िर, सब महलों के बाद, बाग़ की ओर निकले। यहाँ था अशोक-वाटिका।
अशोक-वाटिका में सीता
एक पेड़ के नीचे, राक्षसी-पहरेदारों से घिरी, एक स्त्री। वल्कल पहने, धूल लगी, बाल अनकंघे, चेहरा मुर्झाया। मगर एक aura।
हनुमान ने पेड़ की डाल पर बैठ कर देखा। यह सीता थी। एक pause, “कैसे approach करूँ? वानर-रूप में अचानक आया, डर जाएँगी। human-रूप में आया, रावण की चाल समझेंगी।”
हनुमान ने अद्भुत idea apply किया। उन्होंने धीरे-धीरे, पेड़ की ऊँचाई से, राम-कथा सुनानी शुरू की। बहुत-धीमी आवाज़ में, अपने आप से बोलते-बोलते, मगर सीता को सुनाई दे।
“अयोध्या के राजा दशरथ थे। चार पुत्र, राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न। राम ने सीता से विवाह किया। 14 साल का वनवास…” पूरी रामायण-संक्षेप।
सीता ने सुना, चौंकी, “कौन बोल रहा है?” ऊपर देखा। एक छोटा वानर। डर गई पहले।
हनुमान ने राम की अंगूठी पेड़ से गिराई, सीता के पैरों के पास।
त्रिजटा का स्वप्न
(कुछ time पहले, अशोक-वाटिका में।) राक्षसी-पहरेदारों में एक थी त्रिजटा। उसके सपने सच होते थे।
एक रात त्रिजटा ने सपना देखा। बाक़ी राक्षसियों को बताया, “मैंने देखा, राम चार-दाँत हाथी पर आए। रावण को मारा। लंका टूटी, समुद्र में डूबी। मेरा सपना clear है, सीता वापस होगी।”
त्रिजटा ने warn किया, “सीता पर बुरी निगाह न डालो। उल्टा शुभकामना माँगो।” बहुत-सी राक्षसियाँ डर कर सीता के साथ नरम होने लगीं।
(वाल्मीकि बहुत-संयमित ढंग से दिखाता है, “evil-side” monolithic नहीं।)
अंगूठी, चूड़ामणि, संदेश
सीता ने अंगूठी देखी। “राम का नाम!” अंगूठी हाथ में, चेहरे पर लगाई, रो पड़ी।
हनुमान धीरे नीचे आए। “देवी सीते, राम-दूत हनुमान। राम जल्दी आएगा, लंका को नष्ट करेगा, मुक्त कराएगा।”
सीता ने राम के बारे में 100 सवाल पूछे, उनकी health, location, sequence। एक भक्त की प्यासे-सवाल। हनुमान ने हर एक का जवाब दिया।
सीता ने संदेश दिया, “मैं अशोक-वाटिका में हूँ। रावण ने 12 महीने का deadline दिया है। राम जल्दी आए।”
हनुमान ने offer की, “देवी, अभी आप को अपनी पीठ पर बिठा कर ले जा सकता हूँ।” सीता ने मना किया, “नहीं। राम मेरी मुक्ति खुद करेंगे। यह उनका यश है।”
सीता का यह decision बहुत specific है। अपने 6 महीने का additional वनवास stretch किया, सिर्फ़ इसलिए कि राम स्वयं आ कर रावण को मारे।
सीता ने अपनी चूड़ामणि (एक मणि-jewel) उतार कर दी, “यह राम को दो।” हनुमान ने पूँछ में बाँधी।
अशोक-वाटिका का विनाश और अक्ष-वध
हनुमान ने सोचा, “एक impact छोड़ कर जाना है।” Size बढ़ाया, अशोक-वाटिका को तोड़ना शुरू किया। पेड़ उखाड़े, फूल कुचले, झरने तोड़े। सिर्फ़ सीता-पेड़ छोड़ा।
हलचल मची। पहले पहरेदार, फिर सेना, फिर रावण के 7 मंत्रिपुत्र। हनुमान ने सब को मारा।
रावण ने अपने प्रिय पुत्र अक्ष को भेजा। एक प्रतिभाशाली युवा-योद्धा। उसने 5 तीर एक साथ चलाए, सब हनुमान के माथे पर।
हनुमान ने impressed हो कर कहा, “अद्भुत-योद्धा। मगर मेरा काम।” फिर अक्ष की रथ-घोड़े मारे, रथ तोड़ा, आख़िर में अक्ष की जान ली। यह hanuman का tough-est kill, क्योंकि अक्ष truly योग्य था।
ब्रह्मास्त्र और हनुमान का स्वैच्छिक-बंधन
रावण ने अपने सबसे बड़े पुत्र इन्द्रजित को भेजा। यह वो जिसने इन्द्र को पराजित किया था। उसके पास ब्रह्मास्त्रसबसे शक्तिशाली अस्त्र।
इन्द्रजित ने ब्रह्मास्त्र चलाया। हनुमान ने जान कर resist नहीं किया, सम्मान दिया। ब्रह्मास्त्र उन पर बँधा, धरती पर गिरे।
राक्षसों ने रस्सियों से भी बाँधा (ब्रह्मास्त्र-protocol-violation, मगर वो ignore कर रहे थे)। उठा कर रावण के दरबार में ले गए।
रावण और हनुमान का संवाद
दरबार में, 10 सिर वाला रावण देख रहा था।
“आप कौन?” रावण ने पूछा।
“मैं हनुमान, वानर। राम का दूत। राम आपकी लंका तोड़ेगा, सीता वापस ले जाएगा। बेहतर, अभी सीता को सम्मान-सहित वापस कर। आपकी जान बचेगी।”
रावण क्रोधित। मार देना चाहा। मगर एक मंत्री विभीषण ने beech में आ कर रोका, “महाराज, राक्षस-धर्म में दूत-वध निषिद्ध है।” यह विभीषण का पहला major scene, उसने हनुमान की जान बचाई।
रावण ने sentence बदला, “इसकी पूँछ में आग लगा दो।”
लंका-दहन
पूँछ में कपड़े लपेटे, घी डाला, आग लगाई। हनुमान ने let it happen। उनकी पूँछ की लम्बाई बढ़ती गई (magical-ability), कपड़ा-घी ख़त्म नहीं होते।
जलती पूँछ के साथ, हनुमान ने सोचा, “इस आग को waste नहीं करना है।” Size छोटी की, रस्सियाँ ढीली, free। फिर एक छलाँग एक छत पर, जलती पूँछ से छत में आग। फिर दूसरी छत। तीसरी। पूरी लंका को एक-by-एक house आग।
लङ्कां समुद्रेणानन्तां वियुक्तरमणीयकाम् ॥
“उठती ज्वालाएँ हर तरफ़। एक समुद्र की तरह, लंका का सुन्दर रूप अब छिन्न-भिन्न।”
लंका जलती रही पूरी रात। एक specific moment में, हनुमान को याद आया, “रुक! सीता कहाँ?” अशोक-वाटिका की ओर देखा, सीता वहीं, पेड़ अभी भी हरा। राहत।
(वाल्मीकि की philosophical note: हनुमान की पूँछ की आग “धर्म-fire” है, सीता-pure-स्त्री पर नहीं लगती।)
हनुमान ने समुद्र में पूँछ डाल कर आग बुझाई। अशोक-वाटिका वापस गए, सीता को अंतिम-दर्शन दिया, छलाँग की तैयारी।
वापसी और “दृष्टा सीता”
हनुमान ने लंका छोड़ी, समुद्र पार किया वापस। महेन्द्र-पर्वत पर उतरे।
वानर-दल राह देख रहा था। हनुमान ने दो शब्द बोले:
“सीता को देख लिया।”
दो शब्द। मगर इन में पूरी कथा का pivot है। सब वानर ख़ुश, गले मिले, आँसू।
अंगद ने पूछा, “वो कहाँ?” हनुमान ने सब बताया, अशोक-वाटिका, राक्षसियाँ, अक्ष-वध, लंका-दहन। चूड़ामणि दिखाई।
राम के पास, चूड़ामणि
राम ऋष्यमूक पर्वत पर चिंतित। हनुमान आए सीधा।
“राम! देख ली। सीता को।”
राम के चेहरे पर रौनक़। एक pal के लिए “मरुम-मानव” से “विवाहित-पति” बने। हनुमान ने चूड़ामणि दी। राम ने सीने पर लगाई, रोते थोड़ी देर।
“हनुमान, आप मेरी जान बच गई। बिना आपके, कोई काम नहीं हो सकता था।”
सिद्धमेव हनूमंस्ते कर्म तदभुजं प्रभो ॥
“शत्रु-दमन हनुमान, जो काम कोई नहीं कर सकता था, तूने वो कर डाला। आपका काम सिद्ध, प्रभो।”
राम ने हनुमान को “प्रभो” कहा। यह राम का सबसे ऊँचा सम्मान। हनुमान ने सिर झुका कर, “राम, मैं दास। और जो काम है, बताओ।”
सुन्दर काण्ड यहाँ ख़त्म। राम-हनुमान का संबंध जो devotional-literature का foundation बनेगा, यहीं से शुरू।
आगे का प्लान
“हनुमान, अब क्या?” राम ने पूछा।
“राम, लंका पर हमला करना है। मेरे पास map है। मगर एक problem, समुद्र। 100 yojan। सेना कैसे पार होगी?”
“नल-नील-engineer कैसे?”
“वो setu (पुल) बना सकते हैं। उनके हाथ में जो भी पत्थर हो, डूबता नहीं, उनकी विशेषता।”
राम ने countdown शुरू किया। पूरी वानर-सेना इकट्ठी, समुद्र-तट पर, पुल, फिर पार। सब अगले काण्ड, युद्ध काण्ड, में।
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- हनुमान चालीसा, गहरी डुबकीहनुमान-रहस्य
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