किष्किन्धा काण्ड · वाल्मीकि रामायण

वाल्मीकि रामायण · काण्ड 4

किष्किन्धा काण्ड

हनुमान, सुग्रीव, बाली-वध, खोजी-दल, हनुमान का जागरण · 67 सर्ग

पढ़ने का समय: लगभग 75 मिनट

पहले एक बात

किष्किन्धा काण्ड रामायण का राजनैतिक काण्ड है। यहाँ राम के तीन biggest companions जुड़ते हैं, हनुमान, सुग्रीव, और जाम्बवान। यहाँ एक specific moral-दुविधा है, बाली-वध, जिसको वाल्मीकि सॉफ़्ट नहीं करते, और हम भी नहीं करेंगे। और यहाँ हनुमान का जागरण है, अपनी असली शक्ति को याद करने का moment।

ऋष्यमूक का पर्वत

शबरी के आश्रम से आगे, राम-लक्ष्मण पम्पा-सरोवर पहुँचे। पास के ऋष्यमूक पर्वत पर एक छोटा वानर-समूह बैठा था। leader सुग्रीवअपने भाई बाली से छिप कर शरण ले रहा था यहाँ।

सुग्रीव की कथा: वो किष्किन्धा-राज्य का राजकुमार था, बाली का छोटा भाई। एक दिन एक राक्षस मायावी (दुन्दुभि-पुत्र) ने बाली को युद्ध-चुनौती दी। बाली अकेले गुफ़ा में लड़ने गया। एक साल बीता, गुफ़ा से ख़ून बहता दिखा। सुग्रीव ने सोचा बाली मर गया, मायावी निकलेगा। उसने एक भारी शिला से गुफ़ा-मुख बंद किया, किष्किन्धा वापस आ कर राज सम्भाला।

बाली कुछ महीने बाद लौटे (वो मायावी को मार चुके थे)। शिला हटा कर बाहर आए, सुग्रीव को राजा देखा। उन्होंने सीधा conclusion निकाला, “तूने मुझे मार देना चाहा।” सुग्रीव की explanation नहीं सुनी। उसकी पत्नी रुमा को छीन लिया (वानर-कुल practice थी), सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया।

सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर शरण लेने आया, क्योंकि एक ऋषि का शाप था बाली पर, “जो ऋष्यमूक पर्वत पर पैर रखेगा, मर जाएगा।” बाली यहाँ नहीं आ सकता था।

हनुमान का पहला मिलन

सुग्रीव ने राम-लक्ष्मण को देख कर डर लगा, “ये कौन? बाली-side के?” उसने हनुमान को कहा, “जा कर पता कर।”

हनुमान एक ब्राह्मण-तपस्वी का रूप ले कर आए, बहुत शुद्ध संस्कृत में बोलते। उन्होंने पूछा, “हे महाबाहु पुरुष-द्वय, आप कौन?”

लक्ष्मण ने जवाब दिया। हनुमान ने सुना। फिर अपनी कथा बताई, “मैं हनुमान, वायु-पुत्र, सुग्रीव-सेवक। वो आपकी मित्रता चाहते हैं।”

राम ने मुस्कुरा कर लक्ष्मण से कहा, “इस ब्राह्मण की बात सुन। बिना ऋग्वेद-यजुर्वेद-सामवेद के यह बोल नहीं सकता। यह वाक्य-कौशल असाधारण।”

यह राम का सबसे famous compliment हनुमान को। एक राजकुमार ने एक वानर को pure-grammar पर सम्मानित किया, मिलने के 30 सेकंड में।

हनुमान ने अपना असली रूप दिखाया, विशाल वानर। राम-लक्ष्मण को कांधे पर बिठा कर ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव के पास ले गए।

सुग्रीव-संधि

राम-सुग्रीव ने अग्नि-गवाह में संधि की: राम बाली को मारेगा, सुग्रीव सीता ढूँढेगा।

सुग्रीव ने एक important सूचना दी, “कुछ दिन पहले हम पर्वत-top पर थे। आसमान में एक रथ देखा, एक स्त्री बैठी, चीख रही। उसने आभूषण नीचे फेंके।” वो आभूषणों का बंडल राम को दिया।

राम ने पहचाना, “यह सीता का! मेरी विवाह-दात।” वो रो पड़े, मगर एक solid lead मिला, सीता दक्षिण की ओर गई।

बाली का वध (एक नैतिक दुविधा)

सुग्रीव किष्किन्धा गया, बाली को चुनौती दी। बाली निकले, उनकी पत्नी तारा ने रोकने की कोशिश की, “स्वामी, सुग्रीव के साथ राम है, 14,000 राक्षसों को अकेला मारा था। शान्ति बना।” बाली के ego ने सुना नहीं।

सुग्रीव-बाली का मल्ल-युद्ध। दोनों एक-जैसे दिखते थे। राम पेड़ की आड़ में था, पहचान नहीं पा रहा था। सुग्रीव हार कर भागा।

दूसरी बार सुग्रीव माला पहन कर लड़ने गया। फिर बाली आए। फिर युद्ध। फिर सुग्रीव हारने लगा।

राम ने इस बार तीर चलाया, पेड़ की आड़ से। बाली के सीने में। बाली गिरा।

बाली मरते-मरते बोले, “राम, आप कौन है? मुझे क्यों मारा? छिप कर तीर क्यों चलाया?”

राम का जवाब लम्बा था (वाल्मीकि में 4 सर्ग चलता है)। संक्षेप में:

  1. “तूने अपने भाई की पत्नी रुमा को बलात्कारित किया। यह आपका पहला अपराध।”
  2. “तूने भाई को अकारण exile दिया। दूसरा।”
  3. “मैं इक्ष्वाकु-कुल का। हमारा dharma है, धरती पर dharma स्थापित करना।”
  4. “आप पशु है, वानर। आप पर मनुष्य-योद्धा-rules apply नहीं होते।”

बाली ने accept किया, “आपकी बात में force है। अंतिम request, मेरी पत्नी तारा और बेटे अंगद का ख़याल रखना।” राम ने वचन दिया। बाली के प्राण निकले।

एक स्पष्टीकरण। बाली-वध रामायण का सबसे debated scene है। 2,000+ साल से commentators इस पर बहस कर रहे हैं। तुलसी ने इसे थोड़ा सॉफ़्ट किया है। आधुनिक readers को यह scene uncomfortable लगता है, और लगना भी चाहिए। हमने वाल्मीकि-version रखा, सॉफ़्ट नहीं किया।

तारा ने बहुत दुख का विलाप किया (वाल्मीकि की रामायण की सबसे सुन्दर poetic-passages में से एक)। बाद में राम से थोड़ी बहस भी की। मगर अंत में accept कर लिया। अंगद को युवराज नियुक्त किया गया, बाली का बेटा। तारा सुग्रीव के साथ रही, राज्य की मुख्य-सलाहकार के रूप में।

बारिश और सुग्रीव की भूल

4 महीने की बारिश आई। राम-लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत की गुफ़ा में रुके। सुग्रीव ने वादा किया था सीता-खोज शुरू करने का, मगर बारिश के बाद।

बारिश ख़त्म हुई। मगर सुग्रीव कुछ नहीं कर रहा था। वो किष्किन्धा में राज, औरतों, संगीत में डूबा था। राम ने हफ़्ते इंतज़ार किया।

लक्ष्मण का धीरज टूटा। “अभी जा कर सुग्रीव की समाप्ति।” राम ने रोका, “पहले warning दो।”

लक्ष्मण किष्किन्धा भागे, इतने क्रोधित-तेज से कि वानर डर कर भागे। हनुमान ने आगे बढ़ कर पूछा। लक्ष्मण ने situation बताई। हनुमान ने तुरंत सुग्रीव को जगाया, सब समझाया।

सुग्रीव डर गया, अपनी पत्नी रुमा के साथ बाहर आ कर लक्ष्मण के पैरों पर गिरा। “7 दिन दीजिए, सब तैयार।”

चारों दिशाओं में खोजी-दल

सुग्रीव ने पूरी वानर-सेना इकट्ठी की, लाखों वानर। चार दलों में बाँटा:

  • उत्तर-दल: हिमालय तक। नेतृत्व शतबली।
  • पूर्व-दल: पूर्व-समुद्र तक। नेतृत्व विनत।
  • पश्चिम-दल: पश्चिम-समुद्र तक। नेतृत्व सुषेण।
  • दक्षिण-दल: सबसे important। नेतृत्व अंगदसाथ में हनुमानजाम्बवान (बूढ़ा भालू-राजा), और नलनील (engineer-वानर)।

राम ने अंगद को कहा, “आप मेरे लिए सबसे important दल का leader।” फिर हनुमान को अलग बुलवाया, अपनी अंगूठी निकाली, “जब सीता को मिलो, यह दिखाना। उसको पता चलेगा आप मेरे भेजे हैं।”

राम ने अंगूठी हनुमान को दी, अंगद को नहीं। एक sense था राम के अंदर, “सीता को हनुमान ही पाएगा।”

सम्पाती से जानकारी

तीन दल लौट आए, सीता नहीं मिली। दक्षिण-दल आगे बढ़ता रहा। महीना बीत गया, समुद्र-तट पहुँचे। हताशा। सुग्रीव का दिया समय ख़त्म।

एक पुरानी गुफ़ा में एक बूढ़ा गरुड़ था, बहुत बूढ़ा, अपनी आख़िरी साँसें। यह सम्पाती था, जटायु का बड़ा भाई। बचपन में सूर्य की ओर उड़ने में सम्पाती के पंख जल गए थे, सम्पाती ने अपने आप को shield की तरह use किया जटायु को बचाने के लिए। वर्षों से इस गुफ़ा में था।

वानरों ने “जटायु, राम, सीता, रावण” शब्द बोले। सम्पाती चौंका, “मेरा भाई! कहाँ है?” उन्हें बताया, जटायु ने रावण से लड़ कर सीता-रक्षा में प्राण दिए।

सम्पाती बहुत रोया, फिर बोला, “मेरी मदद करूँगा। मेरी दिव्य-दृष्टि अभी भी काम करती है। मैं देख रहा हूँ, समुद्र-पार, लंका में, अशोक-वाटिका में, एक स्त्री बैठी है, रावण की कारागार में। यह सीता है।”

लंका 100 योजन दूर थी। कोई आम-वानर इतनी छलाँग नहीं लगा सकता।

जाम्बवान ने हनुमान को जगाया

वानरों ने आपस में बहस की, “कौन छलाँग लगाएगा?” अंगद बोला, “मैं जा सकता हूँ, मगर वापस नहीं।” बाक़ी सब छोटी-छोटी capacities बता रहे थे।

तब बूढ़ा भालू-राजा जाम्बवान आगे आया। हनुमान को देखा, जो शान्त बैठा था।

“हनुमान, आपको याद नहीं? आप वायु-पुत्र हैं। बचपन में, आपने सूर्य को फल समझ कर खाना चाहा था, छलाँग लगा कर। इन्द्र ने वज्र मारा, ठुड्डी टूटी (इसलिए नाम Hanuman)। फिर ऋषियों ने शाप दिया, अपनी शक्ति भूल जाएँ। condition यह थी, जब कोई आपकी ज़रूरत बताएगा, आपको याद आ जाएगा।”

हनुमान ने ध्यान किया। एक shudder। फिर मुस्कान। उन्होंने अपना size बढ़ा कर पर्वत-सा कर लिया।

सोऽहं रावणमुत्साद्य सपुत्रसुहृद्बान्धवम् ।
आनयिष्यामि वैदेहीं प्रहृष्टैरिव कोशिकैः ॥

“मैं वो हूँ, जो रावण को उसके पुत्र-मित्र-बन्धु सहित उखाड़ कर सीता को ले आएगा।”

हनुमान महेन्द्र-पर्वत के top पर pace किया। यहाँ से छलाँग लगाएँगे। किष्किन्धा काण्ड ख़त्म, सुन्दर काण्ड शुरू।

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स्रोत: वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, 67 सर्ग।

license: मूल Sanskrit text public-domain। हिन्दी narrative retelling, lulla.net, CC BY-NC 4.0।