बाल काण्ड · वाल्मीकि रामायण

वाल्मीकि रामायण · काण्ड 1

बाल काण्ड

राम का जन्म, बचपन, और मिथिला तक की यात्रा · 77 सर्ग

पढ़ने का समय: लगभग 90 मिनट

पहले एक बात

बाल काण्ड में पूरी रामायण का foundation बैठाया जाता है। एक राजा जिसके बच्चे नहीं हो रहे, एक यज्ञ, चार बेटों का जन्म, एक ऋषि जो उन्हें माँगता है, और एक धनुष जो टूटता है। इन सब घटनाओं के पीछे एक थीम है, “क्या भाग्य से लड़ा जा सकता है?” वाल्मीकि का जवाब next 6 काण्ड में आएगा।

एक चीज़ ध्यान रखिए। यह कथा-संग्रह नहीं। वाल्मीकि की रामायण एक tightly-plotted novel है। हर scene किसी और scene के लिए setup है। बाल काण्ड में जो धनुष टूटता है, वो दशकों बाद किसी और संदर्भ में अपना weight दिखाता है।

नारद और वाल्मीकि: कौन है पूर्ण-पुरुष

एक दिन देव-ऋषि नारद वाल्मीकि के आश्रम पधारे। वाल्मीकि ने उनसे पूछा, “हे ऋषि, इस संसार में कोई ऐसा है जो हर guna का धारक हो? वीर भी हो, धर्मात्मा भी हो, कृतज्ञ भी, सत्यवादी भी, क्रोध-रहित भी?”

नारद ने सोचा। फिर कहा, “हाँ। एक है। उसका नाम राम। इक्ष्वाकु-वंश का। दशरथ का पुत्र। अयोध्या का राजकुमार।” फिर नारद ने compressed-रूप में पूरी रामकथा सुनाई, लगभग 100 श्लोकों में। यह “संक्षिप्त-रामायण” आज भी बाल काण्ड की शुरुआत में मिलती है।

यह interesting setup है। पूरी रामायण नारद की सूचना पर खड़ी है। वाल्मीकि के पास base-data नारद से आया, फिर वो detailed-संस्करण compose करते हैं।

क्रौंच पक्षी और पहला श्लोक

नारद के जाने के बाद, वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज के साथ तमसा नदी पर स्नान के लिए गए। नदी के किनारे पेड़ पर दो क्रौंच पक्षी, नर-मादा, अपनी रति-क्रीड़ा में लीन थे। तभी एक निषाद (शिकारी) ने तीर चला कर नर को मार डाला। मादा की आर्त-ध्वनि वाल्मीकि ने सुनी, और एक पंक्ति, बिना सोचे, उनके मुख से निकल पड़ी।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम् अगमः शाश्वतीः समाः ।
यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥

“हे निषाद! आपको शाश्वत-काल तक प्रतिष्ठा न मिले, जिसने काम-मोहित क्रौंच-जोड़े में से एक का वध किया।”

यह 32 syllables का perfect अनुष्टुप् छंद था। संस्कृत-काव्य का base-meter, जो आगे लगभग सब classical Sanskrit poetry में दिखाई देगा। मगर इस moment में पहली बार जन्मा।

शोक से श्लोक। दर्द से कविता। यह व्युत्पत्ति-कथा है, मगर यह बहुत कुछ कह जाती है। वाल्मीकि की रामायण का foundation एक मादा-पक्षी के विलाप पर खड़ा है, राम की महानता पर नहीं। बीच में सब महानता है, मगर origin एक करुणा।

थोड़ी देर बाद ब्रह्मा आए, और कहा, “वाल्मीकि, यह संयोग नहीं था। इसी छंद में राम की पूरी कथा लिख। मैं आपको वरदान देता हूँ, हर event आपको clearly दिखेगा, जैसे आँखों के सामने हो रहा हैं।” वाल्मीकि बैठ गए, ध्यान में, और 24,000 श्लोक उनके अंदर unfold हो गए।

दशरथ की समस्या: कोई पुत्र नहीं

अयोध्या के राजा थे दशरथइक्ष्वाकु-वंश के। उनके पास सब-कुछ था: एक समृद्ध राज्य, तीन पटरानियाँ, मंत्री, सेना, धर्म। मगर एक चीज़ नहीं थी। बच्चा। तीनों रानियों, कौसल्याकैकेयीऔर सुमित्रामें से एक भी मातृत्व का सुख नहीं पा सकी थी।

दशरथ का सबसे विश्वस्त मंत्री सुमंत्र था। उसने सुझाव दिया, “महाराज, यदि ऋष्यशृंग ऋषि को बुला कर पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराएँ, तो ज़रूर संतान होगी।”

ऋष्यशृंग कोई साधारण ऋषि नहीं थे। वो अंग-देश के राजा रोम-पाद के दामाद थे। उनकी एक specific कथा है, कि वो वन में पले-बढ़े, उन्होंने पहले कभी स्त्री नहीं देखी थी, और अंग-देश में सूखा पड़ा था जब तक उनको शान्ता (राजा की बेटी) के माध्यम से अंग-देश नहीं लाया गया। उनके आने से बारिश हुई। तो यज्ञ-कौशल के मामले में वो एक specific authority थे।

दशरथ ने ऋष्यशृंग को बुलवाया। यज्ञ की तैयारी कई महीनों चली। हवन-कुंड बने, बेस्ट ब्राह्मण आमंत्रित हुए, चारों दिशाओं से सामग्री इकट्ठी हुई।

दिव्य पायस और चार जन्म

यज्ञ के अंत में, अग्नि-कुण्ड के बीच से एक तेजोमय पुरुष प्रकट हुआ, हाथ में एक स्वर्ण-पात्र, उसमें खीर (पायस)। उसने कहा, “दशरथ! यह दिव्य पायस अपनी रानियों को दो। उनकी कोख से पुत्र जन्म लेंगे।”

दशरथ ने पायस को तीन हिस्सों में बाँटा। आधा कौसल्या को दिया (वो सबसे बड़ी थीं), आधा बचे का आधा कैकेयी को (वो सबसे प्रिय थीं), और जो बचा वो सुमित्रा को (जिन्होंने अपना हिस्सा दोनों के साथ बाँट लिया, इसलिए उनको दोनों आधे-आधे मिले)।

नौ महीने बाद, चैत्र-शुक्ल-नवमी (आज का राम-नवमी) को, चार पुत्रों का जन्म हुआ:

  • रामकौसल्या से (पूरा एक हिस्सा खाने से, वो विष्णु के आधे-अवतार थे)
  • भरतकैकेयी से
  • लक्ष्मण और शत्रुघ्नसुमित्रा से (जुड़वाँ; लक्ष्मण राम-शत्रुघ्न भरत-attached हुए, जो आगे चल कर bonds दिखेगा)

राज्य में 14 दिन उत्सव चला। सब brahmins को दान, सब temples में मिठाई बँटी, सब prisoners रिहा हुए। चार बच्चे एक साथ बड़े होने लगे।

उनके गुरु थे वसिष्ठइक्ष्वाकु-कुल के राज-गुरु। उन्होंने चारों को वेद, धर्म, राज-नीति, और शस्त्र-विद्या में formal training दी। चारों excellent students थे, मगर राम विशेष थे, हर subject में सबसे आगे, बिना किसी का arrogance के।

विश्वामित्र की माँग

एक दिन एक ऋषि अयोध्या पधारे। उनका नाम विश्वामित्र। यह कोई ordinary ऋषि नहीं थे। पहले वो राजा थे (कौशिक-राजा), फिर वो ऋषि बने, तपस्या के बल पर “ब्रह्मर्षि” पद तक पहुँचे। वो भारत के सबसे powerful tapasvi थे उस समय।

दशरथ ने उनको आदर-सहित बैठाया। पूछा, “हे ऋषि, क्या सेवा करूँ? मेरा सब-कुछ आपका है।”

विश्वामित्र ने सीधा कहा, “मुझे आपका बेटा राम चाहिए। मेरा यज्ञ है, उसकी रक्षा करनी है। दो राक्षस, मारीच और सुबाहु, यज्ञ-कुण्ड में मांस-रक्त गिरा कर उसे dirty कर देते हैं। उनको मारना ज़रूरी है। राम यह काम कर सकता है।”

दशरथ का चेहरा पीला पड़ गया। राम तब केवल 16 साल का था। पिता कैसे अपने बेटे को राक्षसों के साथ लड़ने भेजे? दशरथ ने नम-आँखों कहा, “ऋषि, मुझे क्षमा करें। मैं अपनी सारी सेना भेज देता हूँ, मगर इतना छोटा बच्चा…?”

विश्वामित्र क्रोधित हो गए। “दशरथ, यदि आप वचन-भंग करेंगे, मैं श्राप देता हूँ।” तब वसिष्ठ ने beech में आ कर समझाया, “महाराज, यह ऋषि कोई साधारण नहीं। राम को भेज दीजिए। राम पर भरोसा करें।” दशरथ ने भारी मन से अनुमति दी। और एक decision, “लक्ष्मण भी जाएगा। दोनों भाई कभी अलग नहीं रहे, अब भी नहीं।” राम-लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ जंगल की ओर चल पड़े।

ताड़का-वध, पहला kill

विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को ताड़का-वन ले गए। यह एक हरा-भरा क्षेत्र था पहले, मगर एक राक्षसी ने उसे बिगाड़ दिया था। उसका नाम ताड़का। एक यक्षी, जिसको शाप मिला था राक्षस-रूप का। एक ही bear/elephant 5,000 हाथियों जितनी शक्तिशाली। ब्राह्मणों को मार-मार कर वन को बंजर बना दिया था।

विश्वामित्र ने कहा, “राम, आपको इसका वध करना है।” राम ने सकुचा कर कहा, “ऋषिवर, यह स्त्री है। मैंने स्त्री-वध की training नहीं ली।” विश्वामित्र ने कहा, “धर्म-शास्त्र में लिखा है कि लोक-कल्याण के लिए, किसी भी person का, यदि वो जनता का दुश्मन है, वध स्वीकार्य है। चाहे स्त्री हो, चाहे ब्राह्मण हो। राम, यह आपका पहला युद्ध है, और आपका पहला moral test।”

राम ने धनुष उठाया। ताड़का गर्जना करते हुए आगे बढ़ी, धूल का तूफ़ान उठा, पेड़ उखड़ कर हवा में उड़े। राम ने tracking-shot लिया, धनुष की टंकार सुन कर ताड़का की दिशा से, और तीर सीधा उसके सीने में लगा। ताड़का गिरी, और वहाँ के सब प्राणी, जो उसके भय से जंगल छोड़ कर भाग गए थे, धीरे-धीरे लौटने लगे।

विश्वामित्र ने प्रसन्न हो कर राम को दिव्य अस्त्र दिए, उनके मंत्र-समेत। ये Sanskrit साहित्य के legendary weapons हैं: ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, इंद्रास्त्र, वायव्य-अस्त्र, आग्नेय-अस्त्र, और कई। हर अस्त्र एक specific deity की शक्ति carry करता था, और मंत्र-द्वारा activate होता था।

मारीच और सुबाहु, यज्ञ-रक्षा

विश्वामित्र अपने आश्रम सिद्धाश्रम पहुँचे, यज्ञ शुरू किया। राम-लक्ष्मण ने 6 दिन और 6 रातें यज्ञ-कुण्ड के चारों ओर पहरा दिया। 7वें दिन, राक्षस आए, दो भाई, मारीच और सुबाहुराक्षसों की एक पूरी सेना के साथ।

राम ने पहले एक “मानवास्त्र” चलाया, जिसकी विशेषता थी कि वो दुश्मन को मारता नहीं, सिर्फ़ बहुत दूर फेंक देता था। मारीच इसी से सैकड़ों योजन दूर समुद्र में फेंका गया। यह decision interesting है, क्योंकि मारीच आगे चल कर सुवर्ण-मृग बन कर सीता-हरण की trick में काम आएगा। राम ने उसे जान-बूझ कर तब नहीं मारा। यह बीच की कई plot-threads में से एक है।

सुबाहु को राम ने “आग्नेय-अस्त्र” से मार डाला, सीने में सीधा। बाक़ी राक्षसों को वायव्य-अस्त्र से उड़ा दिया। यज्ञ निर्विघ्न पूरा हुआ।

राम-लक्ष्मण ने अपना पहला major battle जीता था। राम 16 साल का था।

अहल्या का उद्धार

यज्ञ के बाद विश्वामित्र ने कहा, “राम, अब मिथिला चलते हैं। राजा जनक के पास एक धनुष है, उसको देखना है।” वो रास्ते में थे, जब एक खाली पड़े आश्रम के पास पहुँचे। चारों ओर वीरानी, सूना-सूना सा। राम ने पूछा, “यह किसका आश्रम है?”

विश्वामित्र ने एक पुरानी कथा सुनाई। यह ऋषि गौतम का आश्रम था। उनकी पत्नी अहल्याजो ब्रह्मा की sculpted-creation थी, सब लोकों में सबसे सुन्दर। इंद्र (देवताओं के राजा) उन पर मोहित था। एक दिन इंद्र ने गौतम का रूप धारण किया, और अहल्या के पास आया जब गौतम स्नान के लिए गए थे। अहल्या ने पहचान लिया कि यह असली गौतम नहीं हैं, मगर एक moment के लिए मोह में आ गई।

गौतम जब लौटे, सब समझ गए। उन्होंने इंद्र को शाप दिया (इंद्र पूरे शरीर पर 1,000 vagina-शाप पाए, फिर देव-stupendous request के बाद वो आँखें बन गईं), और अहल्या को कहा, “आप पत्थर बन कर इस आश्रम में रहोगी, जब तक राम यहाँ आ कर आपके चरण-स्पर्श न करें। तब आप मुक्त होगी।” वो moment था अब।

विश्वामित्र ने इशारा किया। राम धीरे से एक बड़े पत्थर के पास गए, उस पर हाथ रखा। पत्थर के अंदर से एक स्त्री का रूप उभरा, अहल्या, ज्योतिर्मय। उसने राम को नमस्कार किया, अपना धन्यवाद कहा। आश्रम में सब-कुछ खुल गया, फूल खिले, पक्षी लौटे। गौतम भी हिमालय से लौटे, अहल्या को अपना लिया।

यह पहला moment है जब राम का divine-aspect दिखाई देता है। पत्थर को इंसान बनाना, यह कोई ordinary राजकुमार नहीं कर सकता।

मिथिला और जनक

विश्वामित्र, राम, और लक्ष्मण मिथिला पहुँचे। यह विदेह-राज्य की राजधानी थी। राजा थे जनक“विदेही” यानी “देह से अलग,” philosopher-king। जनक के बारे में Upanishads में बहुत कथाएँ हैं (बृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य-जनक संवाद famous है, जो हम बाद में मिथिला में देखेंगे)। मगर रामायण में जनक पिता के रूप में आते हैं।

जनक की पुत्री सीता। वो जन्म से असाधारण थीं। कथा है कि एक दिन जनक खेत जोत रहे थे (मिथिला की एक traditional किसानी थी), तब हल की नोक पर एक धरती-गर्भ से बच्ची मिली। उन्होंने उसे उठा कर अपनी बेटी मान लिया। नाम “सीता” (हल की नोक से जन्मी) रखा। पृथ्वी-कन्या, इसलिए “जानकी” भी कहलाई।

सीता अब विवाह-योग्य हो गई थीं। जनक ने एक स्वयंवर रखा था, और शर्त रखी थी, “जो भी इस धनुष को उठा सके और प्रत्यंचा चढ़ा सके, सीता उसकी पत्नी होगी।”

यह धनुष क्या था? यह शिव का धनुष था, “पिनाक।” शिव ने इसे जनक के पूर्वज देवरथ को दिया था, सुरक्षा के लिए। यह इतना भारी था कि 5,000 आदमी मिल कर एक रथ पर लाद कर लाते थे। अब तक कोई भी राजा इसको उठा भी नहीं सका था, चढ़ाना तो दूर।

विश्वामित्र ने जनक से कहा, “ये दो राजकुमार राम और लक्ष्मण हैं। राम धनुष को try करना चाहते हैं।” जनक ने हँस कर कहा, “ऋषि, इस bratबाल को धनुष-दर्शन तो करवा देता हूँ, मगर…” उनके आधे शब्द बीच में रह गए जब राम ने धनुष के पास जा कर देखा।

धनुष-भंग

राम ने हाथ बढ़ाया, धनुष को उठाया, एक हाथ से। लोगों की साँस रुक गई। फिर उन्होंने प्रत्यंचा (string) पकड़ी, और चढ़ाने की कोशिश की। जैसे ही उन्होंने धनुष को खींचा, इसकी bow छटक गई, बीच में से।

तस्य शब्दो महानासीद् निर्घातसमनिःस्वनः ।
भूमिकम्पश्च सुमहान् पर्वतस्येव दीर्यतः ॥

“उसकी आवाज़ एक भयंकर वज्रपात जैसी थी। पृथ्वी ऐसी काँपी जैसे एक पर्वत फट रहा हैं।”

आधे लोग बेहोश हो गए शोर से। जनक देखते रह गए। फिर वो धीरे से बोले, “राम, आपका होंगे सीता का हाथ।”

दशरथ को मिथिला बुलवाया गया। वो बाक़ी तीन बेटों, मंत्रिमंडल, और रानियों के साथ आए। एक नहीं, चार विवाह तय हुए। जनक की दो बेटियाँ थीं, सीता और उर्मिला। और उनके भाई कुशध्वज की दो बेटियाँ थीं, माण्डवी और श्रुतकीर्ति

  • राम + सीता
  • लक्ष्मण + उर्मिला (एक tragic-pairing आगे, क्योंकि 14 साल लक्ष्मण वन में जाएगा बिना उर्मिला के)
  • भरत + माण्डवी
  • शत्रुघ्न + श्रुतकीर्ति

एक साथ चार विवाह, अद्भुत समारोह। मिथिला से अयोध्या तक की वापसी की तैयारी हुई।

परशुराम का आगमन

वापस जा रहे थे, जब बीच रास्ते में आसमान काला हो गया, हवा रुक गई, और एक तेजोमय आकृति प्रकट हुई। पीठ पर परशु (कुल्हाड़ा), हाथ में धनुष, चेहरे पर क्रोध।

यह थे परशुरामविष्णु के छठे अवतार, “क्षत्रिय-नाशक।” परंपरा के अनुसार उन्होंने 21 बार पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश किया था। अब वो वृद्ध थे, मगर शक्ति वैसी ही।

उन्होंने राम से कहा, “आपने शिव का धनुष तोड़ा। यह अपमान है। मेरे पास विष्णु का धनुष है, इसे उठा कर दिखाओ। यदि उठा सके, तो ठीक। नहीं तो मेरा परशु आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।”

राम धीरे से आगे बढ़े। परशुराम का विष्णु-धनुष लिया, उठाया, प्रत्यंचा चढ़ाई (बिना तोड़े), और बाण रख कर पूछा, “अब इस बाण को कहाँ छोड़ूँ? आपके आगे का रास्ता रोक दूँ, या आपकी तपस्या-शक्ति को नष्ट कर दूँ?”

परशुराम स्तब्ध हो गए। उन्होंने पहचान लिया कि राम वो हैं, जिनकी प्रतीक्षा थी। उन्होंने आदर-सहित कहा, “मेरी तपस्या-शक्ति लो। मैं अब महेन्द्र-पर्वत जाता हूँ, ध्यान करने।” और परशुराम चले गए।

यह scene रामायण में बहुत symbolic है। विष्णु का छठा अवतार (परशुराम) अपनी शक्ति विष्णु के सातवें अवतार (राम) को सौंप रहा है। एक era का अंत, अगला era का शुरुआत।

बाल काण्ड के पीछे क्या बैठा है

बाल काण्ड में बहुत-कुछ हुआ, मगर इन सब घटनाओं के पीछे एक specific architecture है। वाल्मीकि ने राम को एक growing-व्यक्ति के रूप में दिखाया है। सुपरमैन के रूप में नहीं। हर event एक specific lesson सिखाती है:

  • ताड़का-वध: दुश्मन-गुणों पर over-ride नहीं, धर्म-driven action।
  • मारीच को छोड़ देना: कई बार दुश्मन को नहीं मारना भी रणनीति का हिस्सा है।
  • अहल्या-उद्धार: जो doomed लगती है, वो भी redeem हो सकती है।
  • धनुष-भंग: योग्यता बाहरी performance से प्रमाणित होती है, घोषणा से नहीं।
  • परशुराम-encounter: power-transitions का गरिमामय model।

आगे अयोध्या काण्ड में यह सब tested होंगे, जब कैकेयी अपनी चाल चलेगी।

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स्रोत: वाल्मीकि रामायण, बाल काण्ड। संस्कृत श्लोक sanskritdocuments.org और Sacred-Texts archive से verified।

एक note। बाल काण्ड में 77 सर्ग हैं। हमने इस retelling में सब key episodes cover किए हैं, मगर हर सर्ग की micro-details cover नहीं हुई हैं। यह compressed retelling है, intended for casual reading। पूरी detail के लिए मूल वाल्मीकि-text consult करें।

license: मूल Sanskrit text public-domain। हिन्दी narrative retelling, lulla.net, CC BY-NC 4.0।