अयोध्या काण्ड
14 साल का वनवास, एक माँ का बदला, दशरथ की मृत्यु · 119 सर्ग
पहले एक बात
अयोध्या काण्ड पूरी रामायण का most-human chapter है। यहाँ कोई राक्षस नहीं, कोई धनुष नहीं टूटता, कोई दिव्य-अस्त्र नहीं चलता। यहाँ बस इंसान हैं, परिवार के, और परिवार के अंदर का राजनीति।
एक पिता जो अपने प्रिय बेटे को राजा बनाना चाहता है। एक माँ जो अपने सौतेले बेटे के बजाय अपने बेटे को राजा देखना चाहती है। एक दासी जो माँ के कान भरती है। एक भाई जो बिना सवाल माँ के पास खड़ा रहता है। एक पत्नी जो पति के साथ जाने के लिए ज़िद करती है। एक पिता जो शोक से मर जाता है। हर पात्र अपनी जगह सही है, और फिर भी दुख होता है। यही इस काण्ड का genius है।
14 साल का exile। यह exile बाक़ी रामायण का foundation है। बिना इसके, राम कभी जंगल नहीं जाते, सीता-हरण नहीं होता, हनुमान नहीं मिलते, और रावण का सिर सलामत रहता। एक माँ का “मेरा बेटा” वाला moment ही, बिना realize किए, दुनिया का इतिहास बदल देता है।
राज्याभिषेक का निर्णय
मिथिला से लौटने के बाद, राम 12 साल तक अयोध्या में रहे। वो विवाहित थे, सीता के साथ, और राज-कार्य में दशरथ का हाथ बँटाते थे। दशरथ अब बूढ़े हो गए थे, 60,000 साल के (कथा-काल में, यह एक symbolic बूढ़ापा है)।
एक दिन दशरथ ने मंत्रिमंडल बुलाया। बोले, “अब मैं चाहता हूँ कि राम को युवराज बना दूँ। मेरी आयु पूरी होने लगी है।” मंत्री खुश हो गए। राम पहले से ही जनता का प्रिय थे, उनके न्याय और सहजता के कारण। राज्याभिषेक की तारीख़ तय हुई, अगले दिन।
अयोध्या में उत्सव शुरू हुआ। हर घर सजाया गया, हर सड़क पर फूल, हर मंदिर में दीप। राम और सीता रात-भर उपवास में बैठे, परंपरा के अनुसार। दशरथ ने कौसल्या को बताया, “कल हमारा बेटा राजा होंगे।” कौसल्या के आँसू बह निकले, खुशी के।
एक चीज़ छूट गई इस तैयारी में, भरत को कोई सूचना नहीं भेजी गई। वो अपनी ननिहाल में था, माँ के भाई के पास, शत्रुघ्न के साथ। दशरथ ने सोचा, “भरत बाद में आएगा। पहले काम पूरा हो।” यह decision बहुत भारी पड़ने वाला था।
मन्थरा का विष
उसी रात कैकेयी के महल में एक दासी थी, मन्थरा। बूढ़ी, कुबड़ी, चालाक। उसने सोचा, “यदि राम राजा बना, तो कौसल्या रानी-माँ होगी। हमारी कैकेयी पिछली पंक्ति में। यह बर्दाश्त नहीं।”
मन्थरा कैकेयी के पास गई। कैकेयी सो रही थी। मन्थरा ने जगाया, बताया। कैकेयी ने पहले हँस कर कहा, “राम मेरा भी बेटा है, भरत के बराबर। राम राजा बनेगा तो हमें खुश ही होना चाहिए।”
मन्थरा ने धीरे-धीरे बात बदली। “रानी, राम राजा बना, तो कौसल्या के बेटे होंगे आगे राजा, उनके बेटे। भरत और उसके बच्चे हमेशा subordinate। यह आप चाहती हैं? आपका भरत dependent रहेगा? और कौसल्या…उसके पास तो बहुत-कुछ छिप कर बैठा है।दशरथ ने आपको युद्ध में बचाया था, और आपको दो वर दिए थे? वो वर अभी unused हैं। आज की रात पहले मौक़ा है।”
कैकेयी का चेहरा बदलने लगा। एक माँ के अंदर का आदिम-instinct जाग गया, “मेरा बेटा।” अब वो रात बिस्तर पर नहीं रही, “क्रोध-गृह” (anger-room) में चली गई, बाल खुले छोड़ कर, धूल में लोट कर, गहने उतार कर, सादे वस्त्रों में।
दो वरदान
दशरथ कैकेयी के पास आए (वो हमेशा देर रात किसी एक रानी के पास जाते थे, उस रात कैकेयी का turn था)। उन्होंने देखा कैकेयी ज़मीन पर, बाल बिखरे। वो घबरा गए। “क्या हुआ, प्रिये? कौन बीमार है? क्या चाहिए?”
कैकेयी ने धीरे से कहा, “मुझे दो वरदान चाहिए, जो आपने पहले दिए थे।” दशरथ ने तुरंत कहा, “जो भी हो। राम की शपथ।” यह raw oath बहुत भारी पड़ा।
कैकेयी ने pause किया, फिर कहा,
राघवस्तु महाबाहुर्वने वसतु वर्षवत् ॥
नव चैव तु वर्षाणि चतुर्दश च भूमिप ।
“महामते, आज मेरे पुत्र भरत का राज्याभिषेक करो। और महाबाहु राम 14 साल वन में जाए, चीर-वस्त्र में।”
दशरथ बेहोश हो गए। एक moment के लिए सुन्न रह गए। फिर “नहीं, नहीं” बोलते, गिरते-पड़ते। कैकेयी ने उन्हें उठाने की कोशिश नहीं की, बस याद दिलाई, “आपका वचन है। राम की शपथ।”
दशरथ रात-भर रोते रहे। उन्हें पहले ही signal था कि कुछ बुरा होने वाला है, मगर वो भी अपने वचन से बँधे हुए थे। सूर्योदय हुआ। राज्याभिषेक की तैयारी थी, मगर अब लगता था कोई death-procession हो रही है।
राम का स्वीकार
राम सुबह दशरथ के पास आए, उपवास के बाद। उन्होंने पिता को कैकेयी की गोद में सिर रखे, रोते देखा। पूछा, “पिता, क्या हुआ? कोई बीमार है? कौन-सी सेवा करूँ?”
दशरथ बोल नहीं पाए। कैकेयी ने बोला, “राम, आपके पिता ने मुझे दो वरदान दिए हैं। पहला, आप वन जाएँगे 14 साल। दूसरा, भरत को राज मिलेगा। यह आपकी ज़िम्मेदारी है इन वचनों को पूरा करने की, ताकि पिता का वचन सत्य रहे।”
राम ने pause किया। शायद 2 seconds। फिर बोले, “ठीक है, माँ। मैं अभी जाता हूँ। पिता का वचन मेरा कर्तव्य है।”
यह decision moment है पूरी रामायण का। राम ने एक भी question नहीं किया। “क्यों?” नहीं पूछा। “मेरा क्या दोष?” नहीं पूछा। “क्या यह न्याय है?” नहीं पूछा। सीधा accept। बहुत-से readers को यह irritate करता है। वो सोचते हैं, “राम, क्यों इतनी जल्दी झुक गए?”
वाल्मीकि का जवाब इन-direct है। राम के लिए, “पिता का वचन” किसी भी और न्याय से ऊपर है। यह उनका धर्म-source है, उनकी identity-source है। एक राजकुमार जो पिता के वचन पर नहीं चलता, वो बाद में कोई और चीज़ पर भी नहीं चलेगा। यह पहला test है, और राम पास हो गए।
राम कौसल्या के पास गए। माँ को बताया। कौसल्या रोई, फिर ज़िद की, “मैं भी जाऊँगी।” राम ने कहा, “नहीं माँ, पिता के लिए आपको यहाँ रहना है।”
सीता और लक्ष्मण की ज़िद
राम सीता के पास आए। बोले, “सीते, मैं वन जा रहा हूँ 14 साल। आप यहाँ रहना, माताओं की सेवा करना।” सीता ने सुना। फिर बोली, “क्यों, स्वामी? मेरे बिना क्यों?”
राम ने explain किया वन की कठिनाइयाँ, “जंगली जानवर, बारिश, धूप, कोई आराम नहीं, राज-कन्या के लिए assistive भारी।” सीता ने मना कर दिया।
स्वानि पुण्यानि भुञ्जानाः स्वं स्वं प्राप्नुवते फलम् ॥
भर्तुर्भाग्यं तु भार्यैका प्राप्नोति पुरुषर्षभ ।
“पुरुषर्षभ, पिता-माता-भाई-बेटा-पुत्र-वधू-श्वसुर-बन्धु, सब अपने पुण्य अपने-अपने भोगते हैं, अपना फल पाते हैं। मगर पत्नी अकेली पति का भाग्य share करती है।”
राम स्तब्ध। सीता का logic वाटरटाइट था। पति के साथ ही पत्नी का destiny है, चाहे राज्य हो या वन। राम ने अनुमति दी।
लक्ष्मण ने सुना तो वो भी आ गया, “मैं भी जाऊँगा।” लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला को कुछ नहीं कहा गया (बेचारी 14 साल अयोध्या में अकेली रहेगी, बिना पति के, जागती हुई। यह तुलसी और बाद की परंपराओं में बहुत-कुछ explore हुआ है, मगर वाल्मीकि में बहुत brief है)।
तीनों ने राज-वस्त्र उतारे, चीर (छाल) पहन ली। दशरथ ने एक रथ का arrangement किया, सुमंत्र को सारथी बनाया।
नगर का विलाप
तीनों रथ पर बैठे, अयोध्या-नगर के बाहर निकले। पूरा शहर रास्ते पर खड़ा था। हर खिड़की से लोग देख रहे थे, “हमारे राम जा रहे हैं वन।” हज़ारों-लाखों लोग रथ के पीछे-पीछे चलने लगे। वो वापस लौटना ही नहीं चाहते थे।
राम ने रात होने तक रुक-रुक कर रथ चलाने को कहा। रात आधी रात के बाद, सुमंत्र को आदेश दिया, “जब लोग सो जाएँ, तब हम चुपके से निकल जाएँ।” यह राम का strategic-move था, ताकि लोग आगे न आएँ।
आधी रात सब सो गए थक कर। सुमंत्र ने रथ धीरे से मोड़ा, अलग दिशा। सुबह अयोध्या-वासी जागे, तो रथ कहीं नहीं था। पूरा शहर रोया। उस दिन कोई काम नहीं हुआ अयोध्या में। कोई आग नहीं जली, कोई खाना नहीं पका। यह “अयोध्या-वासी प्रलय” वाला moment था।
गंगा और गुह
रथ गंगा-तट पहुँचा, श्रृंगवेरपुर। यहाँ का राजा था गुहनिषाद-जाति का, राम का friend। गुह को सूचना मिली तो वो भागा आया, अपनी पूरी सेना के साथ।
“भाई राम, यहाँ रुक जाएँ। मेरे पास सेना है, अयोध्या ले लूँगा आपके लिए।” राम ने मना किया। “गुह, यह मेरा कर्तव्य है। आप पार करा दे।” गुह ने नाव तैयार की। राम, सीता, लक्ष्मण नाव पर बैठे। सुमंत्र और रथ वापस अयोध्या लौट गए।
गंगा के दूसरे पार, राम-सीता-लक्ष्मण जंगल में अकेले। राम ने सबसे पहले उनके बाल जटाओं में बाँधे, वल्कल पहना। एक राजा-राजकुमारी से एक ऋषि-ऋषिकन्या में transition।
भरद्वाज और चित्रकूट
थोड़ी आगे चल कर एक ऋषि का आश्रम मिला। भरद्वाजजो वाल्मीकि-शिष्य भी थे। उन्होंने तीनों का स्वागत किया, रात रुकाया। सुबह सलाह दी, “चित्रकूट जाएँ। वहाँ रहो। वो स्थान शान्त है, फलदायी है, और सब ऋषि वहाँ बैठे हैं।”
राम-सीता-लक्ष्मण चित्रकूट पहुँचे, मन्दाकिनी नदी के किनारे। लक्ष्मण ने एक पर्ण-कुटी (पत्तों की झोंपड़ी) बनाई। तीनों यहाँ रहने लगे। फलाहार, कन्द-मूल, ऋषियों के साथ बैठक, ध्यान। एक तरह की रोज़मर्रा बन गई।
इधर अयोध्या में दूसरी कहानी चल रही थी।
दशरथ की मृत्यु, और श्रवण कुमार का शाप
दशरथ राम के जाने के बाद बिस्तर पर पड़ गए। वो खाते नहीं थे, सोते नहीं थे। 5वें दिन की रात, उन्होंने कौसल्या को बुलाया, बोले, “एक कथा सुनो।”
“मैं जवान था। राजा बना नहीं था अभी। एक रात, सरयू-तट पर शिकार खेल रहा था। अंधेरे में, मैंने एक पानी-भरने की आवाज़ सुनी, कोई हाथी की तरह। मैंने ‘शब्द-वेधी’ तीर चला दिया, बिना देखे, बस आवाज़ की दिशा में।”
“फिर एक मानव-cry सुनी। मैं डरते-डरते गया। एक बालक था, श्रवण कुमारअंधे माता-पिता का बेटा। वो उन्हें कावड़ में बिठा कर तीर्थ-यात्रा करा रहा था, यहाँ पानी लेने आया था। मेरे तीर ने उसका सीना छेद दिया था।”
“मरते-मरते उसने कहा, ‘पिता-माता को पानी ले जाएँ। उन्हें बताओ क्या हुआ।’ मैं पानी ले कर गया, उनके पास। बूढ़े माता-पिता ने सुना। माँ ने उसी moment प्राण छोड़ दिए। पिता ने मुझे शाप दिया,
एवं भविष्यति त्वं च मरणं पुत्रशोकजम् ॥
“जैसे मैं पुत्र-शोक से मर रहा हूँ, वैसे आप भी पुत्र-शोक से ही मरेगा।”
“कौसल्या, मैं तब उस शाप को भूल गया था। आज याद । मेरा अंत होंगे, राम के शोक से।”
उसी रात दशरथ ने प्राण छोड़ दिए। रामायण का पहला मुख्य death। और कथा-स्तर पर एक नया विषाद, अयोध्या अब बिना राजा।
भरत की वापसी
भरत और शत्रुघ्न को कैकेयी-पिता के घर से urgent बुलावा गया। आधे रास्ते में भरत को बुरा सपना आया, अशुभ-signs। वो जल्दी पहुँचे।
अयोध्या सूनी थी। महल में सब काले-वस्त्र। भरत भागते कैकेयी के पास गए। माँ ने सब बताया, खुश हो कर, “बेटा, अब आप राजा। राम वन गया, दशरथ मर गए। सब कुछ आपके लिए।”
भरत स्तब्ध। फिर क्रोधित। फिर पिता-शोक। माँ को बहुत कठोर शब्द कहे, “तूने जो किया, वो हत्या है। पिता को तूने मारा, राम को तूने वनवास दिया, माँ कौसल्या को विधवा बनाया। आप मेरी माँ नहीं हैं सकती। मैं आपको माँ नहीं मानूँगा।”
भरत ने कौसल्या के पैर पकड़ लिए, उनसे माफ़ी माँगी (एक अपनी माँ का अपराध जो वो खुद नहीं कर रहा था, मगर माफ़ी माँगी)। कौसल्या ने उसे गले लगाया, “बेटा, आपका कोई दोष नहीं।”
भरत ने राज्य लेने से मना किया। बोला, “मैं अभी चित्रकूट जाऊँगा, राम को वापस लाऊँगा।” वो पूरा परिवार ले कर, मंत्रिमंडल ले कर, सेना ले कर चित्रकूट चल पड़ा।
चित्रकूट पर मिलन
राम लक्ष्मण के साथ बैठा था जब उसे एक large सेना दिखी। पहले तो लगा कोई दुश्मन, लक्ष्मण ने धनुष उठाया। मगर राम ने पहचान लिया, “यह भरत है, उसका रथ, उसकी ध्वजा।”
भरत राम के पास पहुँचा। दूर से ही उसने अपने chest पर हाथ रखा, मिट्टी में लोट गया, आँसू बह रहे थे। राम ने भरत को उठाया, गले लगाया। दोनों भाई बहुत देर तक मौन रहे।
फिर भरत ने पूरी कथा सुनाई, माँ की चाल, पिता की मृत्यु। राम का दर्द एक नई layer में आ गया, पिता अब नहीं। तीनों ने मिल कर अंत्येष्टि-कर्म किए।
फिर भरत ने request की, “भैया, अयोध्या लौट चलो। राज्य आपका है। मैं नहीं ले सकता।”
राम ने मना किया। “भरत, पिता ने कहा था 14 साल। मुझे वचन पूरा करना है। राज आप कर। आप मेरा भाई है, राज्य चलाओगे जैसे मैं चलाता।”
भरत बहुत देर तक debate करता रहा। राम पिघले नहीं। आख़िर भरत ने एक idea दिया, “तो मुझे अपने paduka (खड़ाऊँ) दे दो। मैं उन्हें सिंहासन पर रखूँगा। आप के नाम पर राज चलाऊँगा। 14 साल के बाद आप आओगे, मैं सब सौंप दूँगा।”
राम ने paduka दिए। भरत ने उन्हें सिर पर रख कर अयोध्या वापस ले गया। उसने अयोध्या में नहीं रहना तय किया, नन्दिग्राम (छोटा गाँव) में रहा। वहीं से 14 साल तक राज चलाता रहा, “regent” के रूप में, राम के नाम पर। पाँडुका सिंहासन पर रखे, सब आदेश “राम-नाम से।” यह उपासना के स्तर का loyalty था।
अयोध्या काण्ड के बाद
राम-सीता-लक्ष्मण चित्रकूट पर रहे कुछ समय। फिर सोचा, “यह जगह अयोध्या के बहुत क़रीब है, लोग आते रहेंगे, हमारी एकांत-तपस्या भंग होती रहेगी।” तीनों दण्डक-वन (दक्षिण की ओर) चल पड़े।
अयोध्या काण्ड का closing-frame है, “वन में, चित्रकूट के बाद, राम का जीवन एक नया phase में entered।” अरण्य काण्ड next।
एक note। तुलसी के रामचरितमानस में अयोध्या काण्ड का बहुत-कुछ same है, मगर तुलसी ने भरत को बहुत larger figure बनाया है। तुलसी के Bharata एक saint हैं, एक model of devotion। वाल्मीकि के Bharata भी loyal हैं, मगर human भी हैं, क्रोध भी करते हैं, माँ को कठोर शब्द भी कहते हैं। दोनों versions अपनी जगह सही हैं, बस different angles।
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- पिछला, बाल काण्ड
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- भगवद् गीता“कर्तव्य बिना attachment” वाला dilemma अयोध्या-काण्ड का echo है