अरण्य काण्ड
सूर्पणखा, स्वर्ण-मृग, सीता-हरण · पूरी रामायण का pivot · 75 सर्ग
पहले एक बात
अरण्य काण्ड में एक specific दिन है जो पूरी रामायण का pivot है, जिस दिन सीता का हरण हुआ। उससे पहले की रामायण different कहानी है, उसके बाद की different। बाक़ी 4 काण्ड बस एक चीज़ की कहानी हैं, “सीता वापस कैसे आएगी।”
राम-सीता-लक्ष्मण चित्रकूट छोड़ कर दण्डक-वन की ओर बढ़े। दण्डक-वन तब का central India था, असाधारण घना जंगल, राक्षसों का राज। यहाँ ऋषि भी थे, मगर उनके आश्रमों पर लगातार आक्रमण हो रहे थे। राम ने एक vow किया था, “मैं इस वन के राक्षसों से ऋषियों को बचाऊँगा।” यह vow ही उसको रावण के साथ direct collision-course पर ले आया।
विराध, पहला राक्षस
जैसे ही तीनों दण्डक-वन में entered, एक भयानक राक्षस उन्हें मिला, विराध। उसका शरीर पर्वत जैसा, मुँह आग जैसा, सीने पर भालू जैसी छाती, हाथों में त्रिशूल। उसने सीधा सीता को उठा लिया, और कहा, “आप कौन हैं? यहाँ क्यों आए? यह स्त्री कौन?”
राम-लक्ष्मण ने तीर चलाए। तीर विराध के शरीर में घुस नहीं पाए, उसकी चमड़ी इतनी सख़्त थी। विराध ने हँसते-हँसते राम-लक्ष्मण को कांधे पर उठा लिया, सीता को ज़मीन पर पटक कर।
राम-लक्ष्मण ने उसके हाथों पर तीर मारे, उन्होंने हाथ कटवा कर खुद को छुड़ाया। मगर तीर से मरना नहीं था उसका भाग्य, ब्रह्मा का वरदान था। उन्होंने उसे एक गहरे गड्ढे में दबा दिया।
विराध मरते समय ने अपना past बताया, “मैं एक तुम्बुरु नाम का गन्धर्व था। मुझे शाप मिला राक्षस-रूप का। मेरी मुक्ति का तरीक़ा यही है, राम के हाथ से मारा जाना।” वो ज़मीन में चला गया, उसका शाप-शरीर वहीं छूट गया।
शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य
तीनों आगे बढ़े। एक के बाद एक तीन ऋषियों के आश्रम पहुँचे, शरभंगसुतीक्ष्णऔर सबसे famous, अगस्त्य।
शरभंग बूढ़े हो चुके थे, मरने वाले थे। उन्होंने राम का दर्शन कर के अपने deathbed पर आख़िरी हँसी हँसी, “राम आपको देख कर अब जाऊँगा।” अग्नि-समाधि ले ली।
सुतीक्ष्ण ने रात भर रुकाया, सुबह दिशा-निर्देश दिया, “अगस्त्य के पास जाएँ। वो आपको इस वन का map देंगे।”
अगस्त्य भारत के सबसे famous ऋषियों में से थे। उन्होंने vindhya पर्वत को झुका दिया था, समुद्र को पी लिया था एक बार, कई दिव्य-कार्य किए थे। उनका आश्रम वन के बीच में था, एक clearing में।
अगस्त्य ने राम को तीन दिव्य-वस्तुएँ दीं:
- विष्णु का धनुष (वही जो परशुराम से मिला था, अब अगस्त्य के पास था, वो “guardian” थे इसके)
- अक्षय तरकशतीर कभी ख़त्म नहीं होते
- ब्रह्मास्त्रसबसे भयानक अस्त्र (इसी से रावण मरेगा)
अगस्त्य ने सलाह दी, “पञ्चवटी में जा कर रहो। गोदावरी के तट पर। यह स्थान सुन्दर है, और आपको ऋषियों के काम भी आसान होंगे।”
जटायु, एक मित्र
पञ्चवटी जाते हुए, एक विशाल पक्षी आकाश से उतरा, बूढ़ा, लाल आँखें, मगर तेजोमय। उसने कहा, “मेरा नाम जटायु। मैं आपके पिता दशरथ का मित्र था। मुझे दशरथ की मृत्यु का पता है। आपकी रक्षा करूँगा, जब तक मेरी जान है।”
जटायु एक गृध्र (vulture) था, मगर divine origin का, अरुण और सम्पाती का भाई। दिव्य पक्षी-जाति, जो devas के साथ काम करती थी। राम ने उसे गले लगाया, “पिता-तुल्य, हम धन्य हुए।”
जटायु ने पञ्चवटी में रहना तय किया, राम-सीता-लक्ष्मण के सुरक्षा के लिए। लक्ष्मण ने एक मज़बूत पर्ण-कुटी बनाई। गोदावरी का साफ़ पानी, अच्छा जंगल, ऋषियों के आश्रम near-by। एक dream-setting।
तीनों यहाँ रहे लगभग 13 साल। 14 साल का वनवास में, 13.5 साल यहीं बीते। मगर एक specific day सब बदल गया।
सूर्पणखा का आगमन
एक दिन एक राक्षसी पञ्चवटी पहुँची, सुन्दर-रूप में। उसका नाम सूर्पणखारावण की बहन। वो जंगल में घूम रही थी, और राम को देख कर मोहित हो गई।
सूर्पणखा ने जो asked the same is what makes her relevant in the story के time matters – उसने सीधा राम के पास जा कर कहा, “आप मुझसे विवाह करो। आप अद्भुत-सुन्दर हैं, मैं अनुपम-शक्तिशाली। मेरे साथ चलो लंका, राजा बना देंगे।”
राम ने मुस्कुरा कर कहा, “मेरा विवाह हो चुका है। यह सीता है, मेरी पत्नी। मगर मेरा भाई लक्ष्मण, उसके पास try करो।”
यह राम का throwaway-comment था, मगर बहुत expensive साबित हुआ। सूर्पणखा लक्ष्मण के पास गई। लक्ष्मण ने मना कर दिया, “मैं sevak हूँ, स्त्री-ख़ुशी नहीं दे सकता।”
सूर्पणखा वापस राम के पास गई। फिर लक्ष्मण के पास। फिर राम के। दो भाई उसे एक-दूसरे की तरफ़ pass-on कर रहे थे, यह उसे insult-राख़ लगने लगा।
उसने सोचा, “यह सब सीता की वजह से है। उसे ख़त्म कर देती हूँ।” वो अपने वास्तविक रूप में आ गई, भयानक राक्षसी-रूप, और सीता पर झपटी।
लक्ष्मण ने तुरंत तलवार उठाई, और एक ही वार में सूर्पणखा की नाक और कान काट दिए।
खर, दूषण, त्रिशिरा
सूर्पणखा रक्त-बहती, चीखती, अपने भाई खर के पास भागी। खर दण्डक-वन का राक्षस-कमांडर था, रावण ने उसे यहाँ राज देने के लिए रखा था। 14,000 राक्षसों की सेना उसके पास।
खर ने पहले 14 राक्षस भेजे राम पर। राम ने सब को बाणों से सेक दिया, 14 तीरों में।
फिर खर खुद आया, अपने भाइयों दूषण और त्रिशिरा के साथ, 14,000 राक्षसों के साथ। यह वाल्मीकि का signature-scene है, एक vs 14,000।
राम ने सीता को एक गुफ़ा में छिपा कर, लक्ष्मण को उसकी रक्षा के लिए लगा कर, अकेले युद्ध-मैदान में आए। फिर शुरू हुआ अद्भुत एक-vs-14,000 युद्ध।
राम का धनुष-कौशल इस scene में peak पर है। उन्होंने इतनी जल्दी तीर छोड़े कि देखने वालों को धनुष continuous दिख रहा था, drawn-state में। तीर हवा में मिलते-मिलते एक wall बनाते, फिर targets में घुसते। त्रिशिरा का सिर एक तीर में, दूषण का सीना दूसरे में, फिर खर अकेला बचा।
खर और राम का एक-on-एक का युद्ध 3 घंटे चला। आख़िर में राम ने आग्नेय-अस्त्र चलाया, खर का शरीर भस्म।
14,000 राक्षस मरे। दण्डक-वन में पहली बार चुप्पी।
सूर्पणखा रावण के पास
सूर्पणखा रक्त-बहती, बिगड़े-चेहरे, लंका भागी, अपने भाई रावण के पास। रावण के दरबार में, सूर्पणखा रोते-गिरते आई।
“भाई, राम-नामक एक मनुष्य ने मेरी नाक काटी, मेरी 14,000 की सेना मिटा दी। और उसकी पत्नी सीता, ऐसी सुन्दर है कि देखो, उसे आपकी रानी बनाओ। मेरी पीड़ा का बदला लो।”
रावण ने सूर्पणखा को देखा। फिर उसने मन में कुछ-कुछ सोचा। राम-नामक मनुष्य की 14,000 राक्षस मार सकता है, यह कोई ordinary मनुष्य नहीं। और सीता “अनुपम सुन्दर,” यह challenge interesting है। रावण ने पहले से सुना था कुछ धुँधले-prophesies कि “एक स्त्री के कारण लंका डूबेगी।” उसके अंदर एक mix उठा, ego (इसके पीछे) + lust (सीता का description) + curiosity (राम कौन)।
उसने मारीच को बुलवाया। मारीच, जो वर्षों पहले राम के मानवास्त्र से समुद्र-पार फेंका गया था (बाल काण्ड में), वो अब एक तपस्वी के रूप में रहता था, क्योंकि राम के साथ collision-course से बच रहा था। उसको रावण-दूत ने ज़बरदस्ती लाया।
स्वर्ण-मृग
रावण ने मारीच से कहा, “आप स्वर्ण-मृग (golden deer) बन कर पञ्चवटी जा। सीता को आकर्षित करना। राम आपका पीछा करेगा। उसके दूर जाते ही मैं आ कर सीता को ले आऊँगा।”
मारीच ने कहा, “नहीं भाई। राम के साथ झगड़ा मेरे लिए मृत्यु है। मैं नहीं जाऊँगा।” रावण ने तलवार निकाल ली, “जाएँ या यहाँ मरो।” मारीच ने सोचा, “राम के हाथ से मरने में कम से कम मुक्ति है।” वो तैयार हुआ।
मारीच ने स्वर्ण-मृग का रूप लिया, सोने के रंग का, चाँदी-धब्बों वाला, अद्भुत आकर्षक। वो पञ्चवटी के बाहर घास खाता रहा, धीरे-धीरे पर्ण-कुटी के पास आता।
सीता ने उसे देखा। पहले पल में लुभा गई। “स्वामी, यह मृग कितना सुन्दर है। आप पकड़ कर लाओ? मेरे महल में रखेंगे।”
राम ने एक बार सोचा। उन्हें doubt भी था (राक्षसों की चालें वो जानते थे)। मगर सीता की पहली ही माँग 14 साल में, मना नहीं करना था। उन्होंने धनुष उठाया, “ठीक है। मगर एक चीज़, लक्ष्मण, आप सीता के पास रहो। एक pal भी मत हटना।”
लक्ष्मण ने हाँ कहा। राम मृग के पीछे चले गए।
“हे लक्ष्मण, हे सीता!”
राम ने मृग का बहुत पीछा किया, करोड़ों योजन तक (अतिशयोक्ति, मगर idea यह है कि वो बहुत दूर निकल गए)। आख़िर में, जब उन्होंने realize किया कि यह कोई दिव्य-मृग है, उन्होंने तीर चलाया। मारीच गिरा, मरते-मरते उसने आख़िरी काम किया, राम की आवाज़ नकल की,
व्याजहार महानादं सीतया तत्समं स्वरम् ॥
“हे सीते! हे लक्ष्मण! मैं विपत्ति में हूँ! बचाओ!” अपनी आख़िरी साँस में मारीच ने राम की आवाज़ नकल की, ऐसी कि सीता confused हो जाए।
आवाज़ पञ्चवटी तक पहुँची। सीता ने सुनी। डर गई। “लक्ष्मण, राम संकट में है! जाएँ, उन्हें बचाओ!”
लक्ष्मण ने sense किया कि यह trick है। “देवी, राम सकं नहीं हो सकते। यह कोई और चाल है।” मगर सीता ने ज़िद की, frantic state में। उसने लक्ष्मण को बहुत harsh शब्द भी कहे (वाल्मीकि में ये शब्द बहुत harsh हैं, सीता ने लक्ष्मण पर “हम पर बुरी नज़र” तक का आरोप लगा दिया)।
लक्ष्मण मजबूर। उन्होंने pace किया। फिर एक idea, धरती पर एक रेखा खींची, “देवी, इस रेखा के अंदर रहो। यह सुरक्षित है।” सीता ने सुना मगर पूरी तरह attention नहीं था।
एक clarification। “लक्ष्मण-रेखा” वाल्मीकि के मूल text में कहीं नहीं आती; यह बात पहली बार तुलसी के रामचरितमानस में मिलती है। वाल्मीकि में लक्ष्मण बस “इस आश्रम के अंदर रहो” कहते हैं। मगर लक्ष्मण-रेखा वाली कथा इतनी famous है कि अब popular-कथा का हिस्सा बन गई। हम इसे यहाँ note करते हैं, fairness के लिए।
लक्ष्मण राम के पीछे चले गए। सीता अकेली थी।
रावण और सीता-हरण
जैसे ही लक्ष्मण गया, एक ब्राह्मण-वेषधारी आदमी पर्ण-कुटी के बाहर आया। वो भिक्षा माँग रहा था। सीता ने सोचा, “एक ब्राह्मण भूखा है,” भिक्षा देने बाहर आई।
जैसे ही वो दहलीज़ के बाहर आई, ब्राह्मण का रूप ग़ायब हुआ, और सामने खड़ा था रावण10 सिर वाला, 20 हाथ वाला, सोने का मुकुट, तेज-तर्रार आँखें।
रावण ने जल्दी से सीता को बाँहों में पकड़ा, अपने पुष्पक-विमान (आकाशी रथ) पर बिठाया, और लंका की दिशा में उड़ा। सीता का चीख ख़ुले आकाश में बिखर गई। “राम! राम! रक्षा करो!”
आकाश में जाते हुए, सीता ने अपने आभूषण एक-एक कर के नीचे फेंके, कुछ अरण्य में, कुछ ऋष्यमूक पर्वत पर (जो आगे चल कर बहुत relevant होगा)। वो आभूषण breadcrumbs थे, ताकि राम उन्हें trace कर सके।
जटायु का बलिदान
जटायु पञ्चवटी के एक पेड़ पर सो रहा था। उसने रावण के विमान की आवाज़ सुनी, सीता की चीख सुनी, उठा।
“रावण! रुक!” वो आसमान में रावण के विमान के सामने आ गया।
रावण ने हँस कर कहा, “बूढ़े पक्षी, हट जा। मेरी काम पूरी होने तक आप नहीं चाहता बीच में आना।”
जटायु ने युद्ध शुरू किया। चोंच से रावण की छाती में मारा, पंजों से उसके बाल खींचे, पंख से उसके मुकुट को गिराया। रावण ने अपने अस्त्र निकाले। एक बूढ़ा vulture, vs 10-headed राक्षस।
जटायु ने रावण के सारथी को मार डाला, घोड़े मार डाले। विमान धरती पर उतरा। कुछ देर के लिए रावण भी डगमगाया।
मगर अंत में, रावण ने तलवार से जटायु के दोनों पंख काट दिए। फिर उसका सीना चीर दिया। जटायु धरती पर गिरा, खून बहते।
रावण ने सीता को फिर विमान में डाला, लंका की ओर उड़ा।
राम-लक्ष्मण की वापसी
राम और लक्ष्मण कुटी पर लौटे। खाली। सीता नहीं। राम का चेहरा बदल गया। पहली बार कथा में राम emotionally-break हुए, “हे सीते! हे प्राण!”
लक्ष्मण ने राम को संभाला। दोनों भाई जंगल में दौड़े, सीता को ढूँढते। “सीता! सीता!”
थोड़ी दूर एक पेड़ के नीचे, घायल जटायु पड़ा था। मरने वाला था। उसने अपनी आख़िरी ताक़त लगा कर बताया, “रावण ले गया है। लंका की दिशा में। मैंने रोकने की कोशिश की, सफल नहीं हुआ।”
राम ने जटायु के पास बैठ कर उसके सिर को अपनी गोद में रखा। जटायु ने अपनी आख़िरी साँस राम की गोद में ली। राम ने उसे अंतिम-संस्कार दिए, जैसे एक पिता के लिए देते हैं।
“पिता, आप भी गया।” राम ने कहा।
कबन्ध और शबरी
राम-लक्ष्मण आगे बढ़े, दक्षिण की ओर। एक बहुत भयानक प्राणी मिला, कबन्ध। यह एक headless body था, सिर्फ़ धड़, और एक विशाल बाह जो हर दिशा में फैल कर लोगों को पकड़ कर खा जाती थी।
कबन्ध ने राम-लक्ष्मण को अपनी बाहों में लिया। दोनों ने तुरंत तलवारें निकालीं, कबन्ध की दोनों बाहें काट दीं।
कबन्ध मरते-मरते बोला, “मुझे जला दो। मेरा शाप-शरीर है यह। पहले मैं गन्धर्व था, अब मुक्त हो जाऊँगा।” उन्होंने उसे अग्नि-दाह दिया।
अग्नि से एक दिव्य-पुरुष निकला, सुन्दर, divine। उसने राम को सलाह दी, “ऋष्यमूक पर्वत पर जाएँ। वहाँ सुग्रीव नाम का वानर रहता है, उसकी मदद से सीता को ढूँढो। वो जानता है रावण के बारे में।”
राम-लक्ष्मण आगे बढ़े। एक छोटा सा आश्रम मिला, बहुत साधारण। एक बूढ़ी स्त्री, शबरीउन्हें देख कर रोई। “मेरे राम! मैंने आपकी प्रतीक्षा सालों से की।”
शबरी निषाद-जाति की थी, ऋषियों की एक सेवक। उसने अपना सब जीवन एक specific moment के लिए spend किया था, “राम आएँगे, मेरे जंगल में।” उसने जंगल में सब बेर इकट्ठा कर रखे थे, हर एक चख कर check किया था, खट्टे फेंक कर मीठे रखे थे, राम के लिए।
राम ने shabari के बेर खाए, सब एक-एक कर। यह कोई अपनी पवित्रता का concern नहीं था, यह pure-bhakti का reception था। तुलसी ने इस scene को बहुत expand किया है, “एठे जूठे” कथा। वाल्मीकि में यह compressed है, मगर substance same।
शबरी ने अपनी कथा सुनाई, और प्रश्न पूछे। उसके सब spiritual-doubts राम ने clear किए। उसने अनुमति माँगी, “अब मैं जा सकती हूँ?” राम ने हाँ कहा। शबरी ने अग्नि-समाधि ले ली, अपनी सब वर्षों की प्रतीक्षा के अंत में।
शबरी का आश्रम पम्पा-सरोवर के पास था, ऋष्यमूक पर्वत के foothills में। राम-लक्ष्मण आगे बढ़े। यहाँ अरण्य काण्ड ख़त्म होता है, अगला काण्ड किष्किन्धा शुरू।
साथ में पढ़ें
- रामायण index
- पिछला, अयोध्या काण्ड
- बाल काण्ड (मारीच की पहली encounter)
- विभीषण गीता“धर्म-रथ” का concept, राम-रावण-encounter के पहले की बात