महाभारत · Mahābhārata
पर्व 4 · विराट पर्व, छद्म-वेश का एक साल
तेरहवाँ वर्ष, अज्ञातवास। पाण्डव-द्रौपदी विराट-नगर में, हर एक एक नई पहचान में। युधिष्ठिर ब्राह्मण-पासे-गुरु, भीम रसोइया, अर्जुन नृत्य-शिक्षिका, नकुल-सहदेव अश्व-गौ-सेवक, द्रौपदी रानी की दासी। एक साल का यह छद्म-वेश एक ही धागे से बँधा है, “पहचाने न जाएँ।” मगर इन्सानी कमज़ोरियाँ इस धागे को बार-बार खींचती हैं।
1 · नई-नई पहचानें
विराट-नगर के बाहर पाण्डव रुके। श्रीकृष्ण की सलाह से पाँचों ने अलग-अलग पहचानें चुनीं।
युधिष्ठिर ने “कङ्क” नाम लिया, एक ब्राह्मण जो राजा को पासे का मनोरंजन सिखाएगा। पासे में युधिष्ठिर अब काफ़ी कुछ सीख चुके थे, हालाँकि शकुनि-स्तर पर नहीं। फिर भी राजा को मनोरंजन देने लायक़ कुशल हो गए थे।
भीम ने “बल्लव” नाम लिया, राज-रसोइया। पकाने का शौक़ हमेशा से था, और बल भी काम आएगा।
अर्जुन के पास उर्वशी का शाप अनमोल साबित हुआ। उन्होंने स्त्री-वेश पहना, चूड़ी पहनी, केश लम्बे कर लिए, “बृहन्नला” बने, राज-कन्या उत्तरा को नृत्य-संगीत सिखाने के लिए। अर्जुन ने स्वर्ग में गन्धर्वों से यह विद्या सीखी ही थी।
नकुल “ग्रन्थिक” बने, अश्व-शाला के सेवक। सहदेव “तन्तिपाल” बने, गौ-शाला के देखभाल वाले। दोनों की पशु-विद्या असाधारण थी।
द्रौपदी “सैरन्ध्री” बनी, रानी सुदेष्णा की दासी, जो विशेष रूप से सुगन्ध-तेल बनाती है, बाल सजाती है। अपनी असली पहचान छिपाने के लिए द्रौपदी ने कहा कि उसके पाँच गन्धर्व-पति हैं, जो छिप कर देखते रहते हैं, इसलिए कोई उससे ज़्यादा निकटता न ले।
राजा विराट ने सब को रख लिया। साल शुरू।
2 · कीचक का अहंकार, द्रौपदी पर बुरी नज़र
विराट-राज के सेनापति थे कीचक, रानी सुदेष्णा के भाई। बहुत बलवान, मगर अहंकारी। द्रौपदी की सुन्दरता देख कर मोहित हो गया। पहले छुप-छुप कर देखा करता, फिर अपनी बहन रानी से सिफ़ारिश करवाई, “उस दासी को हमारे पास भेजिए।”
सुदेष्णा ने हिचक के साथ द्रौपदी को कीचक के यहाँ मद्य लेने भेज दिया। द्रौपदी जानती थी कीचक की नीयत। कीचक ने उसका हाथ पकड़ा, खींचने लगा। द्रौपदी झटका दे कर भागी, सीधे राज-सभा में पहुँची, जहाँ राजा विराट और कङ्क-वेश में युधिष्ठिर बैठे थे।
द्रौपदी ने कीचक की शिकायत की, “हुज़ूर, यह आपका सेनापति होने पर भी मर्यादा भूल चुका है।” राजा विराट हिचके। बोले, “देवी, आप गन्धर्व-पत्नी हैं। हम अंदरूनी झगड़े में नहीं पड़ना चाहते।” कीचक उनकी सेना का स्तम्भ था।
युधिष्ठिर ने भी कङ्क-वेश में कहा, “दासी, घर जाइए। आपके गन्धर्व-पति देखेंगे।” यह संकेत था, मगर द्रौपदी की आँखें जल रही थीं।
3 · भीम-कीचक का छुपा मुकाबला
रात को द्रौपदी रसोई में गई, भीम से मिली। रोते हुए सब बताया। भीम का खून खौल उठा। “एक ही पल लगेगा। यहीं ख़त्म करते हैं।” मगर युधिष्ठिर ने रोका, “भाई, हम पहचान खो देंगे। और भी रास्ता निकालिए।”
द्रौपदी ने स्वयं योजना बनाई। कीचक से कहलवाया कि वह रात को नृत्य-शाला में अकेले मिलने आए। कीचक मुर्गा बना, ख़ुश हो कर पहुँचा। नृत्य-शाला अंधेरी थी। एक स्त्री-रूप वाली आकृति बिस्तर पर लेटी थी। कीचक हाथ बढ़ाया, मगर वह तो भीम था, स्त्री-कपड़ों में।
भीम उठ पड़े। कीचक का गला पकड़ा, उठा कर हवा में घुमाया, उसकी सारी हड्डियाँ चकनाचूर कर दीं। फिर शरीर को एक पिण्ड-सा बना दिया, हाथ-पैर सब अंदर डाल कर, ताकि पहचान न हो। कीचक का “मांस-पिण्ड” वहीं छोड़ कर भीम वापस अपनी रसोई में।
सुबह जब कीचक नहीं मिला, उसकी खोज हुई। नृत्य-शाला में वह विकृत-पिण्ड मिला। सब हैरान। कीचक के 105 भाइयों (उसके परिवार के अन्य कीचक) ने आरोप द्रौपदी पर लगाया, “इस सैरन्ध्री ने हमारे भाई से कुछ करवाया है।” उन्होंने द्रौपदी को बँदी बनाया, चिता-स्थल पर ले गए, कीचक के साथ जलाने को।
द्रौपदी ने ज़ोर से पुकारा, “हे मेरे गन्धर्व-पति! आइए, बचाइए।” भीम पहुँचे, एक पेड़ उखाड़ कर, और 105 कीचक-भाइयों को मार डाला। द्रौपदी मुक्त। नगर में हाहाकार। राजा ने सोचा, “गन्धर्वों ने 106 लोगों को मारा है, क्या यह सैरन्ध्री हमें भारी पड़ रही है?” रानी ने द्रौपदी को कुछ दिन के लिए दूर भेजने का तय किया।
4 · कौरवों की चाल, गौ-हरण की योजना
कीचक की मृत्यु की ख़बर हस्तिनापुर पहुँची। दुर्योधन-कर्ण-शकुनि चकित थे, “कीचक तो अकेला एक सेना के बराबर था, उसे किसने मारा?” एक ही जवाब था, “भीम।” मगर अज्ञातवास के नियम कहते थे कि अगर पाण्डव पहचाने जाएँ, तो उन्हें फिर बारह वर्ष का वनवास करना होंगे। इसलिए दुर्योधन को कीचक-वध की पुष्टि चाहिए थी।
कर्ण ने सुझाव दिया, “हुज़ूर, विराट-नगर पर हमला कीजिए। उनकी गौओं को लूट लीजिए। अगर भीम-अर्जुन वहाँ हैं, तो वे ज़रूर सामने आएँगे। अगर पहचान लिए गए, हमारी जीत। अगर नहीं आए, गौओं की लूट तो हमारी रही ही।”
योजना दो-तरफ़ी हुई। त्रिगर्त-राज सुशर्मा को दक्षिण से हमला करने का काम मिला (वह कीचक का पुराना दुश्मन था)। दुर्योधन-कौरव-सेना ख़ुद उत्तर से। मतलब दो दिशा से एक साथ चढ़ाई।
5 · सुशर्मा का दक्षिण-हमला, युधिष्ठिर-भीम-नकुल-सहदेव का प्रत्युत्तर
पहले सुशर्मा ने दक्षिण से गौओं की लूट शुरू की। ख़बर मिलते ही राजा विराट निकले। उनके साथ कङ्क-युधिष्ठिर, बल्लव-भीम, ग्रन्थिक-नकुल, तन्तिपाल-सहदेव भी चले, मगर अपनी पहचान छुपा कर। कहा कि “हम राजा की सेवा में रहने वाले हैं, युद्ध भी जानते हैं।”
विराट और सुशर्मा के बीच ज़बरदस्त युद्ध हुआ। एक समय राजा विराट सुशर्मा से बँदी बन गए। पाण्डवों ने अपनी असली शक्ति का संकेत-मात्र दिखाया, सुशर्मा को हराया, राजा को छुड़ाया।
विराट उन पर बहुत प्रसन्न हुए, “हे कङ्क, हे बल्लव, आप कौन हैं?” मगर पाण्डवों ने कुछ न कहा।
6 · उत्तर-कुमार और बृहन्नला, गाण्डीव-धारी का पर्दा-फाश
उधर उत्तर से दुर्योधन-कौरवों ने हमला कर के गौओं को लूट लिया। राजा विराट तो दक्षिण में था, उसकी राजधानी ख़ाली। राज-कुमार उत्तर-कुमार, राजा का पुत्र, बढ़-चढ़ कर बात करता था, “अकेले मैं सबको हराऊँगा, अगर सारथी हो।”
राज-कन्या उत्तरा (वही जिसे बृहन्नला नृत्य सिखाती थी) ने तुरंत बृहन्नला को भेजा। “भैया, इन्हें ले लीजिए, ये अच्छे सारथी होंगी।” उत्तर-कुमार राज़ी हो गया (मन में सोचा, “नर्तकी का क्या, चलो हो जाए”)।
रथ पर सवार हो कर युद्ध-भूमि की ओर निकले। दूर से कौरव-सेना देखी, उत्तर-कुमार थर-थर काँपने लगे। “बृहन्नला, रथ मोड़िए, वापस ले चलिए। यह तो भीष्म, द्रोण, कर्ण, सब हैं। हम तो मर जाएँगे।” बृहन्नला ने रथ को रोका, उतर पड़ीं, राज-कुमार के पीछे दौड़ कर पकड़ा।
“राजकुमार, ठहरिए। आप एक बात मानिए,हम ही असली योद्धा हैं। आप सारथी बनिए, हम अकेले सेना को रोकेंगे।” उत्तर-कुमार थोड़ा अचरज में थे, मगर डर इतना था कि कुछ भी मान लें।
बृहन्नला ने उत्तर-कुमार से कहा, “उस शमी-वृक्ष के पास चलिए। ऊपर एक ‘लाश’ बँधी है, जो वास्तव में अस्त्रों का बंडल है।” शस्त्र खोले। फिर वहीं अर्जुन ने अपनी असली पहचान प्रकट की, बृहन्नला का स्त्री-वेश एक ओर रख कर, गाण्डीव धनुष उठाया। उत्तर-कुमार की आँखें फटी की फटी रह गईं।
तेरह वर्ष का अज्ञातवास उस समय तक लगभग पूरा हो चुका था, यह बहस आगे चलेगी। मगर अभी समय की चिन्ता नहीं थी, युद्ध की थी।
7 · अर्जुन का एकल-युद्ध, सम्मोहन-अस्त्र का प्रयोग
अर्जुन ने अपने नाम घोषित किए (दस नाम, जो उनकी विभिन्न अवस्थाओं के थे), अपना शंख फूँका। कौरव-सेना में आवाज़ पहचानी गई। भीष्म ने अपनी आँखें बँद कर लीं, “अब परदा फट गया।”
एक-के-बाद-एक कौरव-योद्धा सामने आए। पहले कर्ण, फिर दुःशासन, फिर विकर्ण। अर्जुन ने सब को घायल कर के पीछे हटा दिया। फिर भीष्म आए, थोड़ा-बहुत मुक़ाबला हुआ। द्रोण आए, उनके साथ भी।
अंत में, सेना को थका देख कर, अर्जुन ने सम्मोहन-अस्त्र चलाया। यह वह अस्त्र है जिससे एक पूरी सेना नींद-सी अवस्था में चली जाती है, बेहोश। सब कौरव-योद्धा गिर पड़े। अर्जुन ने उत्तर-कुमार से कहा, “जाइए, इनके वस्त्र उतार लाइए, हम राजकुमारी उत्तरा के लिए ट्रॉफी ले जाएँगे।”
उत्तर-कुमार ने ख़ुशी से सब प्रमुख-योद्धाओं के उत्तरीय (दुपट्टे) उतारे, रथ में रखे। अर्जुन ने फिर सम्मोहन हटाया, कौरव होश में आए, अपमानित, बिना युद्ध के विजय न हुई, बिना यश के लौटना। दुर्योधन गाली देता रहा।
8 · पहचान का प्रकाश, उत्तरा-अभिमन्यु की भूमिका
अर्जुन और उत्तर-कुमार लौटे। राजा विराट उन्हीं समय दक्षिण-युद्ध से लौटे थे। उन्हें पता चला कि “अकेले उत्तर-कुमार ने पूरी कौरव-सेना भगाई।” वह गर्व से फूल गए। मगर कङ्क-युधिष्ठिर ने मुस्कुरा कर सुधार किया, “महाराज, यह यश वास्तव में बृहन्नला का है, या यों कहें, बृहन्नला के पीछे जो असली व्यक्ति हैं, उनका।”
विराट को संदेह हुआ। फिर पाण्डव-द्रौपदी सब अपने वास्तविक रूप में आए। विराट ने पैर पकड़ लिए, “हुज़ूर, हमें माफ़ कीजिए। हम कैसे भी जानते कि सम्राट् युधिष्ठिर हमारे महल में पासे का सेवक हैं?”
विराट ने अपनी पुत्री उत्तरा का हाथ बृहन्नला, यानी अर्जुन को देने का प्रस्ताव रखा। अर्जुन ने अदब से इनकार किया, “हुज़ूर, उत्तरा हमारे लिए पुत्री-समान हैं, हमने नृत्य सिखाया है। हम उन्हें अपने पुत्र अभिमन्यु के लिए माँगते हैं।” विराट को यह और भी अच्छा लगा। उत्तरा और अभिमन्यु का विवाह हुआ। यह विवाह बहुत प्यारा था, और दुखद भी, क्योंकि उत्तरा को कुछ ही वर्षों बाद विधवा होना था।
9 · विराट-पर्व का समापन
तेरह वर्ष पूरे। पाण्डव अब अज्ञातवास से बाहर। श्रीकृष्ण और अन्य रिश्तेदार-मित्र आए। एक संधि-मण्डल बना। निर्णय हुआ कि अब हस्तिनापुर से अपना न्याय-पूर्ण राज्य वापस माँगना है। पाँच गाँव भी मिल जाएँ, तो भी पाण्डव संतुष्ट होंगे, यह बात युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से कही।
श्रीकृष्ण ने स्वयं हस्तिनापुर जा कर शान्ति-वार्ता करने का बीड़ा उठाया। यही उद्योग-पर्व का प्रारम्भ है।
विराट-पर्व यहीं समाप्त। एक साल की वह कमज़ोर लाइन जो पहचान-छुपाने पर खिंची हुई थी, अब अंतिम-दिनों में टूट चुकी थी, मगर ठीक समय पर। आगे का रास्ता खुला।
आगे
उद्योग-पर्व, युद्ध की तैयारी। श्रीकृष्ण शान्ति-दूत बन कर हस्तिनापुर जाएँगे, मगर खाली हाथ लौटेंगे। विदुर-नीति, सनत्सुजात-संवाद, संजय का वचन, सब-कुछ इसी पर्व में। फिर कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ जमा।