पर्व 3 · वन पर्व (आरण्यक पर्व)

महाभारत · Mahābhārata

पर्व 3 · वन पर्व, बारह वर्षों का जंगल और भीतर की पाठशाला

बारह वर्षों का वनवास, सबसे लम्बा पर्व, मगर इसमें सबसे अधिक उप-कथाएँ भी हैं। नल-दमयन्ती, राम-सीता, सावित्री-सत्यवान, यक्ष-प्रश्न, हनुमान-भीम-मिलन, अर्जुन की तपस्या और दिव्यास्त्र-संग्रह। जंगल अब तपोवन बन जाता है, और हर पेड़ कोई कहानी सुनाता है।

वन पर्व (आरण्यक पर्व) · कथा-रूप में संक्षेप · पर्व-सूची · पिछला: सभा पर्व

1 · हस्तिनापुर से विदा, काम्यक-वन में डेरा

पाण्डव हस्तिनापुर की सीमा पार कर गए। पाँचों भाई, द्रौपदी, और पुरोहित धौम्य। कुछ ब्राह्मण और सेवक उनके पीछे चल पड़े, कि “हम भी आपके साथ चलेंगे, हुज़ूर।” मगर जंगल में सबको भोजन देना सम्भव नहीं था। युधिष्ठिर के मन में चिंता बढ़ी।

धौम्य ने सुझाव दिया, “महाराज, सूर्य-देव का स्मरण कीजिए। वही भोजन के अधिकारी हैं, वही समाधान देंगे।” युधिष्ठिर ने तपस्या की। सूर्य प्रकट हुए, और एक अक्षय-पात्र, यानी कभी न ख़ाली होने वाला बर्तन, प्रदान किया। शर्त यह थी कि द्रौपदी जब तक भोजन नहीं कर लेतीं, यह पात्र ख़ाली नहीं होंगे। यानी जितने भी अतिथि आएँ, सबको भोजन मिलेगा, फिर द्रौपदी अंत में खाएँगी, और तब पात्र भर जाएगा। यह व्यवस्था सालों तक चलने वाली थी।

पाण्डव काम्यक-वन में डेरा डाले, फिर द्वैत-वन में। कभी एक जगह कभी दूसरी। बारह वर्ष का यह सफ़र सरल नहीं था, मगर भीष्म, द्रोण, विदुर, यहाँ तक कि स्वयं श्रीकृष्ण भी, समय-समय पर मिलने आते रहे।

2 · श्रीकृष्ण का आगमन, दुख का बँटवारा

द्यूत के समय श्रीकृष्ण द्वारका में नहीं थे, साल्व नाम के राजा से युद्ध में उलझे थे। ख़बर सुन कर तुरंत वन में आए। द्रौपदी से मिले, उन्होंने रोते-रोते सारी बात कह सुनाई, “हे माधव, आप कहाँ थे? मेरी पुकार सुनी तो थी, मगर रोक तो नहीं सके।”

कृष्ण की आँखें भी भर आईं। “बहन, अगर हम वहाँ होते, तो यह द्यूत होने ही नहीं देते। मगर अब जो हुआ सो हुआ। आपको एक बात का वचन देते हैं, इस अपमान का बदला हम लेंगे। जिस दिन कौरव-कुल का अंत होंगे, उसी दिन यह क़र्ज़ चुकेगा।”

कृष्ण के साथ सात्यकि, धृष्टद्युम्न, द्रुपद के पुत्र, भी आए थे। कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, “आप तेरह वर्ष का यह संकल्प निभाइए। मगर तेरहवें वर्ष के बाद, युद्ध तय है। हम तब आपके साथ हैं।” फिर वे लौट गए।

3 · दुर्योधन की वन-यात्रा, गन्धर्व की क़ैद, पाण्डवों का उपकार

हस्तिनापुर में दुर्योधन को आराम नहीं था। उसने सोचा, “एक बार जा कर देखें, ये पाण्डव वन में कैसे कष्ट उठा रहे हैं। उन्हें कष्ट में देख कर हमारा मन ठंडा होंगे।” तीर्थ-यात्रा का बहाना बना कर, ख़ूब साज-सजावट के साथ, बड़े लाव-लश्कर के साथ निकले।

द्वैत-सरोवर के पास उनका पड़ाव था। वहाँ कुछ गन्धर्व पहले से तैरने आए हुए थे। दुर्योधन के सेवकों ने उन्हें भगाने की कोशिश की, झड़प हो गई। गन्धर्व-राज चित्रसेन कुपित हुए। दुर्योधन को मय-सेना सहित बँधी अवस्था में पकड़ लिया, साथ ले जाने लगे।

कौरव-सेवक भागते-भागते पाण्डव-शिविर पहुँचे, “हुज़ूर, युवराज दुर्योधन को गन्धर्व बँदी बना ले गए।” भीम ज़ोर से हँसे, “बहुत अच्छा हुआ। हमें क्या काम?” मगर युधिष्ठिर ने तुरंत रोका, “नहीं भाई। यह कौरव-कुल का अपमान है, और हम भी इसी कुल के हैं। हस्तिनापुर का सम्मान बचाना हमारा कर्तव्य है।”

अर्जुन और भीम ने जा कर गन्धर्वों से दुर्योधन को छुड़ाया। चित्रसेन ने पहचान कर कहा, “अर्जुन भाई, यह हमारा गुरु-भाई है, इन्द्र-लोक में हमने साथ गायन सीखा था।” बात कुछ-कुछ बनी। दुर्योधन को सकुशल मुक्त कर के पाण्डव-शिविर लाए, खाना-पानी दिया, फिर विदा किया।

दुर्योधन के लिए यह सबसे बड़ा अपमान था, अपने ही शत्रु से उपकार। हस्तिनापुर लौट कर वह कई दिन तक न बोल पाया। एक बार सोचा भी कि अब आत्म-हत्या कर ले। मगर कर्ण-शकुनि-दुःशासन ने उसे सम्भाला।

4 · भीम और हनुमान, सौगन्धिक-फूल की खोज

द्रौपदी एक दिन हवा में बहती एक अद्भुत सुगन्ध पकड़ ली। बोली, “भीम, यह कौन-सा फूल है? कैसी मधुर महक है। एक ले आइए न।” भीम पत्नी की चाह के लिए तुरंत निकल पड़े।

हिमालय की ओर भीम चले, चलते रहे, अपनी विशाल देह से वन-पथों को रौंदते हुए। एक संकरे रास्ते में एक बूढ़ा बन्दर पड़ा था, जिसकी पूँछ रास्ते के बीच में थी। भीम ने अहंकार-पूर्वक कहा, “अरे भाई, पूँछ हटाइए। हम पाण्डव-कुमार भीम हैं, हस्तिनापुर के, पवन-पुत्र।”

बूढ़ा बन्दर बोला, “पुत्र, हम बूढ़े हैं, उठ नहीं सकते। आप ही हमारी पूँछ हटा कर निकल जाइए।” भीम ने हाथ डाला, पूँछ हटाने की कोशिश की। उठी नहीं। पूरी ताक़त लगाई, फिर भी नहीं। पसीना-पसीना हो गए।

तभी बन्दर मुस्कुराया, अपना रूप प्रकट किया। यह हनुमान थे, उसी भीम के सगे भाई, क्योंकि दोनों के पिता वायु-देव हैं। हनुमान ने गले लगाया, बोले, “भाई, हमने अपनी पूँछ इसलिए नहीं उठाने दी कि आपके अहंकार को थोड़ा कम करें। बल का अहंकार सबसे झूठा अहंकार है।” फिर सौगन्धिक-फूल का रास्ता बताया, और एक वचन भी दिया, “महाभारत-युद्ध के समय हम अर्जुन के ध्वज पर बैठ कर उनकी रक्षा करेंगे।” यही कारण है कि अर्जुन की पताका को “कपि-ध्वज” कहा जाता है।

5 · तीर्थ-यात्रा, बहु-स्थलों के दर्शन

नारद और लोमश ऋषि बीच-बीच में आते रहे। उन्होंने सुझाव दिया, “महाराज, बारह वर्ष लम्बे हैं, क्यों न तीर्थ-यात्रा कर लें? पुष्कर, प्रयाग, गया, बद्रिकाश्रम, गोदावरी, अनेक तीर्थ हैं।” युधिष्ठिर ने हाँ की।

पाण्डवों ने पूरे भरत-वर्ष की परिक्रमा की। हर तीर्थ पर पुरानी कथाएँ सुनी, यज्ञ किए, स्नान किए। यह यात्रा वर्षों लगी। कथा-सुनना और कथा-सुनाना भी एक तपस्या है, इसी से उन्होंने अपना मन कौरवों से बँधे क्रोध से कुछ-कुछ मुक्त किया।

6 · अर्जुन की तपस्या, किरात-वेश में शिव का परीक्षण

बीच में अर्जुन की एक ख़ास यात्रा हुई। व्यास जी ने युधिष्ठिर को सुझाव दिया कि अर्जुन को दिव्यास्त्र-संग्रह के लिए तपस्या करनी चाहिए। अर्जुन हिमालय की ओर निकले। एक एकांत स्थान चुना, ऊर्ध्व-बाहु तपस्या शुरू की।

तपस्या इतनी तेज़ कि देवताओं तक का सिंहासन काँपा। शिव जी ने स्वयं परीक्षा लेनी चाही। एक भील-वेश (किरात) में आए, अपनी पत्नी पार्वती को साथ ले कर। उसी समय एक मूक नामक राक्षस सूअर-रूप में अर्जुन को मारने आया था। शिव ने भी उस पर बाण चलाया, अर्जुन ने भी। दोनों के बाण एक साथ लगे, सूअर गिरा।

अब झगड़ा शुरू, “यह शिकार किसका? हमारा या आपका?” अर्जुन और किरात-वेशी शिव दोनों भिड़ गए। बाण-बाण, फिर तलवार, फिर मुक्क-मुक्की। अर्जुन हर अस्त्र चलाते रहे, शिव टूटते नहीं। थक कर अर्जुन ने मिट्टी का शिवलिंग बनाया, उस पर पुष्प चढ़ाना चाहा, मगर पुष्प तो किरात के सिर पर जा रहे थे। तब अर्जुन समझे, यह कोई साधारण भील नहीं।

शिव ने अपना असली रूप प्रकट किया। प्रसन्न हो कर पाशुपतास्त्र दिया, जो उनका सबसे शक्तिशाली अस्त्र है। फिर इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, सब आए और अपने-अपने अस्त्र अर्जुन को दिए। अर्जुन अब अद्वितीय थे। फिर इन्द्र ने उन्हें स्वर्ग-लोक में अपने यहाँ आमंत्रित किया।

7 · अर्जुन इन्द्र-लोक में, उर्वशी का शाप

अर्जुन इन्द्र-लोक पहुँचे, पिता इन्द्र से मिले। वहाँ पाँच साल बिताए, संगीत-नृत्य की शिक्षा लें, और दैत्य-नगर हिरण्यपुर पर इन्द्र की तरफ़ से चढ़ाई की। बहुत-से दैत्यों का संहार किया।

स्वर्ग में एक प्रसंग और हुआ। इन्द्र-सभा में अप्सरा उर्वशी अर्जुन को मन से चाह बैठी। इन्द्र ने उर्वशी को अर्जुन के पास भेज दिया, सोचा कि पुत्र को सुख मिले। मगर अर्जुन ने उर्वशी को अपनी माता के समान देखा, क्योंकि उर्वशी पुरूरवा-वंश की मूल पूर्वज थी, और पाण्डव भी उसी वंश से थे।

उर्वशी अपमानित हो गई। शाप दिया, “आप एक वर्ष के लिए अपनी पुरुषता खो देंगे, नर्तक बन कर रहेंगे।” अर्जुन को बुरा नहीं लगा, क्योंकि यह शाप तेरहवें वर्ष के अज्ञातवास में बहुत काम आने वाला था। इन्द्र ने हस्तक्षेप कर के समय को एक वर्ष तक सीमित किया।

अर्जुन ने अब हस्तिनापुर वापसी की राह नहीं ली, सीधे अपने भाइयों के पास, हिमालय के ऊपर के क्षेत्र में, जहाँ वे तीर्थ-यात्रा करते-करते पहुँच चुके थे। मिलन हुआ। दिव्यास्त्र-संग्रह सम्पन्न।

8 · नल-दमयन्ती की कथा

एक बार वन में युधिष्ठिर ने ऋषि बृहदश्व से अपनी चिंता कही, “ऋषि, क्या कभी किसी राजा ने हमसे बढ़ कर कष्ट उठाया है? जुए में सब हारना, पत्नी सहित वन में भटकना?” बृहदश्व मुस्कुराए, “हुज़ूर, हम आपको एक कथा सुनाते हैं, निषध-राज नल और विदर्भ-राजकुमारी दमयन्ती की।”

नल और दमयन्ती का प्रेम-विवाह हुआ, फिर एक बार राजा नल भी पासे के खेल में अपने भाई पुष्कर से सब हार बैठे। राज्य गया, वल्कल पहन कर दोनों वन में निकले। एक रात नल ने सोचा कि दमयन्ती के साथ चलने से उन्हें कष्ट हो रहा है, इसलिए सोते में उसका वस्त्र-छोर काट लिया, और अकेले चला गया। दमयन्ती जागी, अकेली रोई, फिर भी हिम्मत न खोई। कई वर्षों बाद, अद्भुत संयोगों के बाद, दोनों फिर मिले, राज्य भी वापस मिला।

“देखिए महाराज,” ऋषि ने अंत में कहा, “क्षत्रिय-पुरुष पर ऐसी विपत्तियाँ आती हैं, मगर धैर्य अंत में फल देता है। आप भी धैर्य रखिए।” युधिष्ठिर को सान्त्वना मिली।

9 · राम-कथा, मार्कण्डेय के मुख से

एक और बार महर्षि मार्कण्डेय आए, जो कल्प-कल्प से जीवित थे, सात कल्पों के साक्षी। उन्होंने भी युधिष्ठिर को सान्त्वना देने के लिए दशरथ-पुत्र राम और सीता की कथा सुनाई।

“राम-सीता, चौदह वर्ष का वनवास। सीता-हरण लंका-नरेश रावण के द्वारा। समुद्र-पार सेना ले जाना। युद्ध। रावण-वध। सीता की अग्नि-परीक्षा। फिर अयोध्या-वापसी।” मार्कण्डेय ने पूरी कथा संक्षेप में बाँधी, मगर उसका रस अपार था। “महाराज, सीता-राम ने भी चौदह वर्ष कष्ट उठाए, मगर अंत में धर्म की जय हुई। आपके केवल तेरह वर्ष हैं।”

(पूरी राम-कथा का विस्तार लुल्ला-नेट पर अलग है, वाल्मीकि रामायण-पर्व देखिए।)

10 · सावित्री-सत्यवान, मृत्यु को बहकाने वाली स्त्री

मार्कण्डेय ने एक और कथा सुनाई, मद्र-नरेश की पुत्री सावित्री की।

सावित्री ने स्वयं अपने पति का चुनाव किया था, सत्यवान, जो वन में अपने अंधे माता-पिता के साथ रहता था। ज्योतिषी नारद ने पहले ही कह दिया था, “यह नौजवान साल भर बाद मर जाएगा।” मगर सावित्री ने वचन तोड़ा नहीं, उससे विवाह किया।

नियत दिन यम-राज सत्यवान के प्राण लेने आए। सावित्री उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। यम ने रोका, “बेटी, यह रास्ता आपका नहीं।” मगर सावित्री हर बार ऐसी सूक्ष्म धर्म-बात कहती कि यम को रुकना पड़ता, बोलना पड़ता। यम ने कई वर दिए, सिर्फ़ पति का प्राण न दिया।

अंत में सावित्री ने ऐसा वर माँगा, “हे यमराज, हमें सौ पुत्रों का वर दीजिए।” यम ने अनजाने में हाँ कह दी। फिर सावित्री बोली, “अब प्रभु, सौ पुत्र बिना पति के तो हो नहीं सकते। आप अपना वचन कैसे निभाएँगे?” यम मुस्कुरा कर हार गए, सत्यवान को छोड़ दिया। दम्पति लौटे, पुत्र हुए, अंधे माता-पिता की दृष्टि भी लौट आई।

“देखिए महाराज,” मार्कण्डेय ने कहा, “द्रौपदी की भी ऐसी ही पतिव्रता है, वह आपके पाँचों भाइयों की रक्षा करेगी, सावित्री की तरह।”

11 · कर्ण का कवच-कुण्डल, इन्द्र की चाल

उधर इन्द्र को चिन्ता हैं रही थी। उन्हें मालूम था कि कर्ण के साथ जन्म से ही दिव्य कवच-कुण्डल हैं, जब तक वे शरीर पर हैं, कर्ण अमर है। उनके पुत्र अर्जुन का सामना कर्ण से होने वाला है, यह तो तय है। कुछ करना ही पड़ेगा।

कर्ण ने एक संकल्प ले रखा था, सूर्य-स्तुति के बाद कोई भी ब्राह्मण कुछ माँगने आए, उसे मना नहीं कहूँगा। इन्द्र ने ब्राह्मण-वेश में आ कर कर्ण से कहा, “बेटा, हमें भिक्षा दीजिए। आपका कवच और कुण्डल दे दीजिए।” सूर्य ने पहले से कर्ण को सपने में सावधान कर दिया था, “कोई आएगा, कुछ माँगेगा, मत देना।” मगर कर्ण ने सूर्य की बात भी टाल दी, “पिताजी, हमारा वचन-धर्म टूटेगा नहीं।”

कर्ण ने तीखे चाकू से अपना कवच-कुण्डल काट कर निकाला, ख़ून बहता रहा, चेहरे पर एक मुस्कान आई। इन्द्र को सौंप दिया। इन्द्र चकित रह गए, बोले, “बेटा, आपका दान-बल अद्भुत है। हम आपको एक अस्त्र देते हैं, इन्द्रास्त्र (या वासवी-शक्ति), यह केवल एक बार चल सकता है, मगर अमोघ है।” इन्द्र ने यह जान-बूझ कर एक-बार-वाला अस्त्र दिया।

कर्ण ने उस अस्त्र को आगे चल कर घटोत्कच पर खर्च किया, क्योंकि घटोत्कच रात के युद्ध में पूरी कौरव-सेना का नाश करने वाला था। अर्जुन के लिए इन्द्र की चाल यहाँ कामयाब हो गई।

12 · जयद्रथ का दुस्साहस, द्रौपदी का अपहरण

एक बार पाण्डव शिकार पर गए हुए थे। द्रौपदी अकेली कुटी में थी। उसी समय सिन्धु-राज जयद्रथ, जो दुर्योधन की बहन दुःशला का पति था, वहाँ से गुज़र रहा था। द्रौपदी की सुन्दरता देख कर मोह में पड़ गया।

द्रौपदी ने उसे पहचान कर अदब से कहा, “हुज़ूर, आप हमारे रिश्तेदार हैं। अंदर पधारिए, अतिथि-सत्कार के बाद हमारे पति लौटें, तब आप विदा लीजिए।” मगर जयद्रथ की नीयत बिगड़ चुकी थी। उसने द्रौपदी को बलात् रथ में डाला, ले उड़ा।

पाण्डव लौटे, द्रौपदी न मिली। उनकी पुरानी सेविका धात्रेयिका ने ख़बर दी। पाँचों भाई पीछे दौड़े। जयद्रथ-सेना को कुचल कर, जयद्रथ को बँदी बना लाए। द्रौपदी मुक्त।

भीम जयद्रथ को मार ही डालने वाले थे, मगर युधिष्ठिर ने रोका, “वह हमारी बहन दुःशला का पति है, उसे जीवन-दान दीजिए, मगर अपमानित कर के।” भीम ने उसके केश काट कर पाँच चोटियाँ बनाईं, यह आजीवन कौरव-पक्ष में उसका अपमान बन गई। जयद्रथ शिव की तपस्या करने हिमालय गया, और एक वर पाया कि एक दिन वह सब पाण्डवों को रोक देगा, अर्जुन को छोड़ कर। यह वर कौरव-युद्ध में अभिमन्यु-वध का कारण बना।

13 · यक्ष-प्रश्न, धर्म की परीक्षा

वनवास के अंत के क़रीब एक अद्भुत घटना हुई। एक ब्राह्मण की अरणि-समिधा (यज्ञ-कुण्ड में आग जलाने वाली लकड़ी) एक हिरण की सींगों में फँस कर भाग गई थी। ब्राह्मण ने पाण्डवों से मदद माँगी। पाण्डव हिरण के पीछे निकले, मगर वह भागता ही गया।

दूर निकल जाने पर सब प्यासे हो गए। नकुल को युधिष्ठिर ने भेजा, “जाइए, कहीं जल हो तो लाइए।” नकुल एक सरोवर तक पहुँचे। पानी पीने को झुके, तभी एक आकाशवाणी, “ठहरिए! पहले हमारे प्रश्नों का उत्तर दीजिए, फिर पानी पीजिए।” नकुल ने आवाज़ नज़र-अंदाज़ की, पानी पिया, गिर पड़े, बेहोश।

एक-एक करके सहदेव, अर्जुन, भीम सब वही ग़लती कर बैठे। अंत में युधिष्ठिर पहुँचे। चार भाइयों के मृत-सा शरीर देख कर तड़प उठे। मगर सम्भले। आकाश से आवाज़ आई, फिर वही चेतावनी। युधिष्ठिर ने हाथ जोड़ कर कहा, “हुज़ूर, आप कौन हैं, और क्या प्रश्न हैं? हम उत्तर देने का प्रयास करेंगे।”

एक यक्ष प्रकट हुए, सरोवर के स्वामी। उन्होंने सत्तरों प्रश्न पूछे, कुछ हम याद रखिए:

“सूर्य को कौन उगाता है?” युधिष्ठिर बोले, “ब्रह्म।”
“सूर्य के साथ कौन चलते हैं?” “देवगण।”
“सूर्य को कौन अस्त करते हैं?” “धर्म।”
“मनुष्य की मृत्यु क्या है?” “प्रमाद (असावधानी)।”
“मनुष्य की संगति किसके साथ रहती है?” “धैर्य के।”
“सबसे आश्चर्य की बात क्या है?” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “हर रोज़ लोग मर रहे हैं, मगर बाक़ी सब समझते हैं कि हम अमर हैं, यह सबसे बड़ा आश्चर्य।”

यक्ष अति-प्रसन्न हुए। बोले, “एक भाई जीवित कर दिया जाएगा, चुनिए।” युधिष्ठिर ने सोचा, और कहा, “नकुल।” यक्ष ने पूछा, “भीम सबसे बलवान है, अर्जुन सबसे शूर है, उन्हें क्यों नहीं चुना?” युधिष्ठिर बोले, “हुज़ूर, हमारी दो माताएँ थीं, कुन्ती और माद्री। कुन्ती के तीन पुत्रों में से हम बच गए। माद्री के पुत्रों में से एक तो रहना ही चाहिए। न्याय का पालन करना है।”

यक्ष ने अपना असली रूप प्रकट किया, यह स्वयं धर्म-राज थे, युधिष्ठिर के अपने पिता। उन्होंने चारों भाइयों को जीवित किया, और एक वर भी दिया कि तेरहवें वर्ष के अज्ञातवास में कोई पहचान नहीं पाएगा। यह वर बहुत मूल्यवान था।

14 · वनवास का अंत, अज्ञातवास की तैयारी

बारह वर्ष पूरे हुए। पाण्डव अब तेरहवें वर्ष के अज्ञातवास के लिए तैयार होने लगे। कहाँ रहें कि कोई पहचान न पाए? यह कठिन प्रश्न था। मगर धर्म-राज का वर सहायक था।

श्रीकृष्ण आए, सलाह दी। द्रौपदी, धौम्य, और सेवकों को विदा किया गया। शस्त्र एक शमी-वृक्ष के ऊपर एक लाश की तरह बाँध कर रख दिए, ताकि कोई पास न जाए। फिर पाँचों भाई और द्रौपदी छ:-छ: छद्म-वेश में निकले, विराट-नगर की ओर। वहाँ के राजा विराट के यहाँ सेवक बन कर एक वर्ष काटना था।

वन-पर्व यहीं समाप्त। अगला पर्व छद्म-वेश का है, सबसे साँस-रोकू।

आगे

विराट-पर्व, अज्ञातवास का तेरहवाँ वर्ष। पाण्डव विराट-नगर में, हर एक एक नई पहचान में। युधिष्ठिर “कङ्क” ब्राह्मण, भीम “बल्लव” रसोइया, अर्जुन “बृहन्नला” नर्तकी, नकुल-सहदेव सेवक, द्रौपदी “सैरन्ध्री” रानी की दासी। कीचक नाम का अहंकारी सेनापति आगे की कहानी बिगाड़ता है।

स्थायी URL: /mahabharata/vana-parva/

स्रोत: महर्षि व्यास रचित मूल संस्कृत महाभारत; गीता-प्रेस संस्करण से सत्यापित। यहाँ कथा-सार है, श्लोक-दर-श्लोक नहीं।