महाभारत · Mahābhārata
पर्व 5 · उद्योग पर्व, शान्ति की आख़िरी कोशिश और उसकी हार
तेरह वर्ष पूरे हुए। पाण्डव अपना न्याय-पूर्ण भाग माँगते हैं। दोनों ओर से दूत चलते हैं, सन्धि-वार्ता होती है, स्वयं श्रीकृष्ण हस्तिनापुर जाते हैं। बीच में विदुर-नीति, सनत्सुजात-संवाद, और एक माँ-बेटे की वह छुपी मुलाक़ात जिसने इतिहास बदल देने की कोशिश की। मगर सब कोशिशें असफल। अंत में, दो विशाल सेनाएँ कुरुक्षेत्र में आमने-सामने।
1 · विराट-नगर में सन्धि-मण्डल
विराट-नगर के राज-महल में एक छोटा-सा सम्मेलन हुआ। एक तरफ़ बैठे थे श्रीकृष्ण, बलराम, सात्यकि, द्रुपद, विराट, और पाँचों पाण्डव। दूसरी ओर कोई नहीं था, यह उनकी आंतरिक सलाह-सभा थी।
श्रीकृष्ण ने बात की शुरुआत की। “हुज़ूर, अब तेरह वर्ष पूरे हो चुके। हस्तिनापुर के राज्य में आपका न्याय-पूर्ण भाग आपको लौटा देना चाहिए। मगर हम जानते हैं, दुर्योधन यह बात आसानी से नहीं मानेंगे। हमें पहले शान्ति का प्रस्ताव भेजना चाहिए, हम धर्म के पक्ष में हैं, यह दुनिया भी देखे।”
बलराम ने सहमति दिखाई, मगर एक चेतावनी भी जोड़ी, “और मेरी राय यह है कि हमें संधि का पूरा-पूरा प्रयास करना चाहिए। द्यूत में युधिष्ठिर भी कम दोषी नहीं थे, उन्होंने मना तो नहीं किया।” युधिष्ठिर ने सिर झुकाया, “हुज़ूर, सच है।”
सात्यकि उतावले हो उठे, “बलराम जी, अब संधि की क्या बात? तेरह वर्ष से न्याय रुका है। अब हथियार उठाने का समय है।” श्रीकृष्ण ने हाथ उठा कर सबको शान्त किया। “पहले एक दूत भेजते हैं। द्रुपद के पुरोहित को।”
द्रुपद के पुरोहित को हस्तिनापुर भेजा गया, यह सूचित करने कि “पाण्डव अपना भाग चाहते हैं। शान्ति-वार्ता के लिए तैयार हैं।”
2 · हस्तिनापुर का पहला उत्तर, संजय की यात्रा
द्रुपद-पुरोहित ने हस्तिनापुर में अपना सन्देश दिया। धृतराष्ट्र हिचके, मगर भीष्म, द्रोण, विदुर सब ने एक ही बात कही, “हुज़ूर, पाण्डवों को उनका भाग दे दीजिए। यही न्याय है।” मगर दुर्योधन ने ज़ोर पकड़ा, “एक सूई की नोक भर ज़मीन भी नहीं देंगे।”
धृतराष्ट्र ने एक अद्भुत चाल चली। उन्होंने अपने सूत संजय को पाण्डव-शिविर भेजा, यह कहलवाने कि “हम तो शान्ति चाहते हैं, मगर युद्ध की भी तैयारी आप मत कीजिए। हमारे पुत्र दुर्योधन ज़िद पर अड़े हैं, हम क्या करें?” यानी जिम्मेदारी पाण्डवों पर डाल दी।
संजय पहुँचे। युधिष्ठिर के सामने यह बात रखी। युधिष्ठिर ने स्पष्ट कहा, “संजय जी, धृतराष्ट्र-काका को हमारा सम्मान कहिए। हम युद्ध नहीं चाहते। हमें इन्द्रप्रस्थ का राज्य लौटा दीजिए,तो पाँच गाँव दे दीजिए, हम संतुष्ट होंगे।”
संजय वापस हस्तिनापुर पहुँचे, सब बता दिया। धृतराष्ट्र को रात भर नींद नहीं आई। उन्होंने विदुर को बुलाया।
3 · विदुर-नीति
धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा, “विदुर, हम सो नहीं पा रहे। आप हमें कुछ ऐसा सुनाइए जो मन को विश्राम दे, और सही रास्ता भी दिखाए।”
विदुर ने पूरी रात धृतराष्ट्र को नीति-शास्त्र सुनाया। यह विदुर-नीति महाभारत का एक मणि-खण्ड है। इसमें राज-धर्म है, सत्संग की महिमा है, धर्म और अधर्म का विवेक है, इन्द्रिय-संयम का उपदेश है। संक्षेप में, विदुर ने यही कहा कि “हुज़ूर, पाण्डव आपके भतीजे हैं, उनके साथ अन्याय कीजिए तो आपका वंश तो जाएगा ही, धर्म भी जाएगा। दुर्योधन की ज़िद आपकी मोह की पैदाइश है, अब मोह तोड़िए।”
धृतराष्ट्र को यह बात ठीक से समझ में नहीं आ रही थी, या समझ कर भी पुत्र-मोह नहीं छूट रहा था। उन्होंने व्यास से प्रार्थना की, “हमें कोई ज़्यादा गहरा उपदेश चाहिए।” व्यास ने महर्षि सनत्सुजात को बुलवाया।
4 · सनत्सुजात-संवाद, मृत्यु की प्रकृति पर बात
सनत्सुजात ब्रह्मा के मानस-पुत्र थे, जिन्हें कभी-कभी “सनकादि” चार सिद्धों के साथ गिना जाता है। वे ब्रह्म-ज्ञानी थे, और बच्चे की तरह दिखते थे, फिर भी सबसे बड़े। उन्होंने धृतराष्ट्र को आत्मा-मृत्यु-ब्रह्म का गूढ़ उपदेश दिया।
“महाराज, मृत्यु एक अलग वस्तु नहीं है। यह प्रमाद है, असावधानी। जो आत्मा को नहीं जानता, उसके लिए ही मृत्यु है। जो जानता है, वह मृत्यु से परे हो जाता है। आप जो भय और मोह में जी रहे हैं, यही असली मृत्यु है। आपके पुत्र दुर्योधन को रोकिए, यही सच्चा प्यार है।मोह है।”
धृतराष्ट्र चुप रहे। बात उनके दिल तक पहुँची, मगर पुत्र-मोह का पर्दा हटा नहीं।
5 · श्रीकृष्ण का शान्ति-दूत बन कर हस्तिनापुर जाना
उद्योग-पर्व का सबसे ख़ास हिस्सा यही है। संजय की बात असफल हुई। अब स्वयं श्रीकृष्ण ने जिम्मा उठाया। पाण्डव-शिविर में निर्णय हुआ कि कृष्ण एक आख़िरी कोशिश करेंगे।
द्रौपदी ने पाँव छू कर कहा, “माधव, मेरे केश अब भी खुले हैं। दुःशासन ने जो हाथ मेरे केशों पर डाला था, उस हाथ का ख़ून लाएँगे जब। मगर अगर सच में शान्ति हो जाए, तो हमारी प्रतिज्ञाएँ रुक भी सकती हैं।”
कृष्ण मुस्कुराए, “बहन, हम चलते हैं। मगर पहले से जानते हैं, दुर्योधन नहीं मानेगा। फिर भी कोशिश करना धर्म है।”
कृष्ण रथ पर सवार हो कर निकले। रास्ते में रात कहीं रुकते, कहीं कोई संत या ऋषि के पास, कहीं विदुर के घर। हस्तिनापुर पहुँचने पर दुर्योधन ने एक भव्य स्वागत-स्थल तैयार करवाया था, सोने का दीवान, बहुमूल्य भोजन। मगर कृष्ण सीधे विदुर के सादा घर में रुके। यह संदेश था,धर्म-शान्ति की बात करने आए हैं।”
6 · कौरव-सभा में श्रीकृष्ण का प्रवचन
अगले दिन कुरु-सभा सजी। भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर, दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण, शकुनि, सब बैठे थे। कृष्ण ने प्रणाम कर के बात शुरू की।
“हुज़ूर, हम पाण्डवों की ओर से शान्ति-दूत बन कर आए हैं। पाण्डव अपने न्याय-पूर्ण भाग की माँग करते हैं। अगर इन्द्रप्रस्थ नहीं, तो पाँच गाँव। अगर पाँच गाँव नहीं, तो पाँच घर, हर भाई के लिए एक।” कृष्ण की बात धीमी मगर अकाट्य थी।
दुर्योधन सिंहासन से उठा, क्रोध से लाल। “श्रीकृष्ण, हम पाँच घर तो क्या, सूई की नोक भर ज़मीन नहीं देंगे। पाण्डव हमारे शत्रु हैं, हमने उन्हें कभी पुत्र-समान नहीं माना, यह तो भीष्म-काका की बात है। हम लड़ने को तैयार हैं।”
भीष्म, द्रोण, विदुर, यहाँ तक कि गांधारी ने भी दुर्योधन को समझाने की कोशिश की। मगर वह नहीं माना। कृष्ण ने एक आख़िरी बार कहा, “दुर्योधन, इस ज़िद का परिणाम सोचिए। आपका पूरा वंश ख़त्म होंगे।” मगर दुर्योधन ने एक उत्तेजक चाल चली, “बल्कि हम ही श्रीकृष्ण को बँदी बनाएँगे, फिर पाण्डव अनाथ हो जाएँगे।”
7 · विश्वरूप-दर्शन, सभा में चकित-दृश्य
दुर्योधन के सैनिकों ने आगे बढ़ कर श्रीकृष्ण को पकड़ने की कोशिश की। उसी क्षण कृष्ण ने अपना विश्वरूप प्रकट किया। उनका शरीर बढ़ता ही गया, छत के पार, आकाश तक। हर अंग में सहस्रों सूर्य-समान तेज। हर अंग से ब्रह्मा, विष्णु, महेश प्रकट होने लगे। सब देवता-दानव, ऋषि-मुनि, पाण्डव-कौरव, सब उनके भीतर समाते दिखाई दे रहे थे।
सभा भौंचक रह गई। धृतराष्ट्र अन्धे थे, मगर कृष्ण ने उन्हें भी दिव्य-दृष्टि दी कि इस दृश्य को देख सकें। केवल कुछ क्षण के लिए धृतराष्ट्र की आँखें खुलीं, और उन्होंने अपने जीवन का पहला और अंतिम दर्शन किया, वह भी विराट-रूप का।
दुर्योधन काँप गया, मगर ज़िद से कहा, “यह माया है, हम नहीं डरते।” कृष्ण ने अपना विश्वरूप समेटा, सादा रूप में लौटे, सभा से उठे। “हस्तिनापुर का पतन तय है। हम जाते हैं।”
8 · कुन्ती-कर्ण-मिलन, माँ का बेटा से पहला परिचय
शान्ति-दूत-व्यतिक्रम के बाद, कृष्ण ने हस्तिनापुर छोड़ने से पहले एक काम और किया। वह कुन्ती से मिले। बहन-समान कुन्ती (कृष्ण के पिता वसुदेव की बहन) से कहा, “बहन, युद्ध तय है। अब आप एक काम कीजिए। अपने सबसे बड़े पुत्र कर्ण के पास जाइए, सत्य बताइए। शायद उसका दिल बदले।”
कुन्ती गंगा-तट पर गई, जहाँ कर्ण सूर्य-स्तुति के बाद ध्यान में बैठता था। वहीं प्रकट हुई।
“कर्ण, हम आपकी माँ हैं।”
कर्ण काँप उठा। मगर सम्भल कर बोला, “हुज़ूर, यह कैसी बात। माँ का परिचय पैंतालीस वर्ष बाद देने आई हैं? जब हमें अपमानित किया गया, सूत-पुत्र कहा गया, तब आप कहाँ थीं?”
कुन्ती की आँखों से आँसू बहे। उसने सब बताया, दुर्वासा का मंत्र, सूर्य का प्रकट होना, पेटी में रख कर बहा देना, सूत-राज द्वारा पाला जाना। “बेटा, अब हमारा अपराध समझ कर, कौरव-पक्ष छोड़ कर पाण्डव-पक्ष में आ जाइए। आप ज्येष्ठ पुत्र हैं, सम्राट् बनेंगे। द्रौपदी छह पतियों की पत्नी होंगी।”
कर्ण मुस्कुराया, मगर वह मुस्कुराहट तीखी थी। “माते, अब बहुत देर हो चुकी। दुर्योधन ने हमें अपमान के समय गले लगाया, अंग-देश का राजा बनाया। हम उनके मित्र हैं, मरते दम तक उनके पक्ष में रहेंगे। मगर हम आपको एक वचन देते हैं, युद्ध में हम केवल अर्जुन को मारेंगे, अन्य पाण्डवों को नहीं छुएँगे। आपके पुत्र पाँच ही रहेंगे, या तो हम सहित पाँच, या अर्जुन सहित पाँच। संख्या नहीं बदलेगी।”
यह वचन कुन्ती के लिए मीठा और कड़वा, दोनों था। कर्ण आगे जा कर इसी वचन को पूरी तरह से निभा भी देंगे, यह उद्योग-पर्व का सबसे करुण अध्याय है।
9 · कर्ण-कृष्ण-संवाद, असली पहचान का खुलासा
कुन्ती से पहले कृष्ण ने भी कर्ण से एक बात की थी। रथ पर साथ बिठा कर ले गए। बोले, “कर्ण, हम आपका असली परिचय जानते हैं। आप कुन्ती के ज्येष्ठ पुत्र हैं, इसलिए पाण्डवों के बड़े भाई। आप आइए हमारे पक्ष में। युधिष्ठिर अपना ताज आपको दे देंगे, क्योंकि आप ज्येष्ठ हैं। पाँचों भाई आपके पाँव में बैठेंगे। द्रौपदी भी, धर्म-शास्त्र के अनुसार, आपकी ही पत्नी मानी जाएगी।”
कर्ण ने एक लम्बी साँस ली। “वासुदेव, हमें यह सब पता है, आप जानते हैं। मगर हम वहाँ नहीं जा सकते। दुर्योधन का नमक हमने खाया है। हमारे लिए अब उस ओर से युद्ध करना ही धर्म है। और सच कहें, माधव, हम जानते हैं इस युद्ध में कौन जीतेगा। जिस ओर आप हैं, उसी ओर विजय। मगर हमें हारना मंज़ूर, मित्र के साथ हारना। यह बात आप समझेंगे।”
कृष्ण की आँखें भर आईं। उन्होंने कर्ण को गले लगाया। “कर्ण, आप जैसा मित्र पाने वाला दुर्योधन भाग्यशाली है। मगर आप ग़लत समझे हुए मित्र हैं।” कर्ण मुस्कुराया, “हुज़ूर, यह तो हम मानते हैं। मगर अब रास्ता बदलने का समय नहीं।”
10 · दुर्योधन-कृष्ण का अंतिम विनिमय, सेना-चयन का खेल
कृष्ण पहले भी एक बार दुर्योधन और अर्जुन दोनों के पास गए थे, युद्ध से पहले। शर्त रखी थी, “मैं स्वयं अकेले एक तरफ़, और मेरी पूरी यादव-सेना (नारायणी-सेना) दूसरी तरफ़। आप दोनों चुन लें।”
अर्जुन और दुर्योधन एक-साथ पहुँचे। दुर्योधन ने पहले पहुँच कर कृष्ण के सिर के पास बैठा था, अर्जुन पैरों के पास। कृष्ण ने जब आँख खोली, पहले पाँव वालों को देखा, यानी अर्जुन को। बोले, “जो छोटा है, उसे पहले चुनने का अधिकार।” अर्जुन ने तुरंत कहा, “हुज़ूर, हमें केवल आप चाहिए, चाहे आप शस्त्र न उठाएँ।” दुर्योधन को भीतर ही भीतर बहुत प्रसन्नता हुई कि “नारायणी-सेना मिल गई।”
कृष्ण ने एक शर्त रखी थी, “हम अर्जुन के सारथी बनेंगे, मगर हमारे हाथ में चाबुक होंगे, शस्त्र नहीं।” अर्जुन ने स्वीकार किया। यही व्यवस्था कुरुक्षेत्र में हुई।
11 · दोनों सेनाओं का संगठन
दोनों ओर से सेनापति चुने गए।
कौरव-पक्ष: भीष्म प्रमुख सेनापति (पहले दस दिन)। उनके बाद द्रोणाचार्य (पाँच दिन)। फिर कर्ण (दो दिन)। फिर शल्य (आधा दिन)। फिर अश्वत्थामा (रात्रि-काण्ड में)।
पाण्डव-पक्ष: धृष्टद्युम्न प्रमुख सेनापति, क्योंकि उसका जन्म ही द्रोण-वध के लिए हुआ था। उनके सहायक: अर्जुन (कुछ भी), भीम (दुर्योधन-दुःशासन के लिए), सात्यकि, अभिमन्यु, द्रौपदी के पाँच पुत्र (उपपाण्डव), और कई पुराने मित्र-राजा।
कौरव-सेना ग्यारह अक्षौहिणी (एक अक्षौहिणी = 21,870 रथ + 21,870 हाथी + 65,610 अश्व + 1,09,350 पैदल; अनुमान-शास्त्र है)। पाण्डव-सेना सात अक्षौहिणी। कुल अठारह।
एक रोचक बात: शल्य, जो पाण्डवों के नकुल-सहदेव के मामा थे (माद्री के भाई), पहले पाण्डव-पक्ष के लिए जा रहे थे। मगर रास्ते में दुर्योधन ने उन्हें इतना भव्य आतिथ्य दिया, कि शल्य ने वचन दे दिया, “हुज़ूर, हम आपका साथ देंगे।” बाद में पाण्डवों को पता चला, युधिष्ठिर ने शल्य से एक वचन माँगा, “मामा, आप कौरवों के साथ रहिए, मगर एक काम कीजिए। अगर कर्ण का सारथी बनने का अवसर आए, तो स्वीकार कीजिए, और युद्ध के बीच उसका मनोबल तोड़िए।” शल्य ने यह करार किया। यह बहुत-दूर-तक की राजनीति थी।
12 · कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाओं का जमावड़ा
कुरुक्षेत्र की वह विशाल भूमि, जिसे “धर्म-क्षेत्र” कहा गया है, अब दोनों ओर से सेनाओं से भरने लगी। पाण्डव-शिविर एक ओर, कौरव-शिविर दूसरी ओर। बीच में लाखों योद्धा, हाथी, घोड़े, रथ। ध्वजाओं की लहरें, शंखों की आवाज़, घोड़ों की हिनहिनाहट, तलवारों की झंकार।
पहले दिन के युद्ध के नियम तय हुए, दोनों पक्ष इकट्ठा बैठ कर। दिन में युद्ध, रात में शान्ति। एक ही श्रेणी के योद्धा एक-दूसरे से लड़ें (रथी रथी से, हाथी हाथी से, पैदल पैदल से)। निरस्त्र, घायल, भागते हुए, या किसी और से लड़ रहे योद्धा पर वार न हो। हालाँकि ये नियम युद्ध बढ़ने के साथ-साथ टूटते भी जाएँगे।
उद्योग-पर्व यहीं समाप्त। अगला पर्व, भीष्म-पर्व, युद्ध का पहला दौर है। और उसी में, युद्ध-भूमि के बीच, श्रीमद्भगवद्गीता प्रकट होती है।
आगे
भीष्म-पर्व, युद्ध का पहला दौर, भीष्म के सेनापति-काल के दस दिन। पहले ही दिन, अर्जुन के मन में मोह जागता है, “इन सब अपनों को मार कर हम क्या पाएँगे?” वहीं श्रीकृष्ण उन्हें वह अमर उपदेश देते हैं जो “भगवद्गीता” के नाम से जाना जाता है। (गीता पहले से प्रकाशित है, यहाँ पढ़िए।)