पर्व 18 · स्वर्गारोहण पर्व

महाभारत · Mahābhārata

पर्व 18 · स्वर्गारोहण पर्व, अंतिम-परीक्षा और समापन

महाभारत का अंतिम पर्व। युधिष्ठिर स्वर्ग पहुँचते हैं, मगर पहले एक-चौंकाने-वाला-दृश्य देखते हैं। फिर एक-नर्क-दर्शन, जहाँ उनके अपने सब-कुछ चीख रहे हैं। यह अंतिम-परीक्षा है, जिसके पार जा कर अंतिम-सच्चाई खुलती है। और कथा यहीं नहीं रुकती, क्योंकि स्वयं व्यास ने यह सब-कुछ एक संदेश के रूप में दर्ज किया।

स्वर्गारोहण पर्व · कथा-रूप में संक्षेप · पर्व-सूची · पिछला: महाप्रस्थानिक पर्व

1 · स्वर्ग में पहली-झलक, चौंकाने वाला दृश्य

इन्द्र-रथ स्वर्ग में उतरा। युधिष्ठिर ने पैर रखे। चारों-तरफ़ अद्भुत-शोभा, सोने-चाँदी के महल, स्फटिक-तालाब, संगीत हवा में बहता। देवता-गन्धर्व-अप्सराएँ, सब-कुछ चमकता।

युधिष्ठिर ने एक-मुख्य-सिंहासन देखा। उस पर बैठा था, चकित-कर देने वाला कोई, दुर्योधन। वही दुर्योधन जो कुरुक्षेत्र-युद्ध का कारण था, जो अधर्म-पथ पर चला था। वह यहाँ-स्वर्ग में-सम्राट्-समान विराजमान था।

युधिष्ठिर की आँखें फटी की फटी रह गईं। “यह क्या? हमारे भाई कहाँ हैं? कर्ण, अभिमन्यु, द्रौपदी, द्रौपदी के पाँच-पुत्र? वे यहाँ क्यों नहीं? और यह दुर्योधन यहाँ-कैसे?”

क्रोध फूट पड़ा। युधिष्ठिर ने कहा, “यह स्वर्ग नहीं हो सकता। यह कोई-धोखा है। हम यहाँ नहीं रहेंगे। हमें हमारे भाइयों के पास ले-जाइए, जहाँ-भी वे हों।”

2 · नर्क-दर्शन, एक भयानक यात्रा

एक देव-दूत आगे आए, “महाराज, चलिए हम आपको आपके भाइयों के पास ले जाते हैं।” युधिष्ठिर पीछे-पीछे चले।

स्वर्ग की चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ी। फिर अंधेरा। फिर बदबू। फिर तेज़-गर्मी। फिर भयानक-चीखें। दूत ने पीछे मुड़ कर कहा, “महाराज, यह नर्क है। आपके भाई यहाँ हैं।”

युधिष्ठिर ने आगे देखा। एक तरफ़ कर्ण जल-कर तपते हुए। एक तरफ़ भीम, जो अपनी जीभ निगल-निगल कर खा रहे थे। एक तरफ़ अर्जुन, जिनकी आँखें फूट चुकी थीं, बार-बार। एक तरफ़ नकुल-सहदेव-द्रौपदी, सब-कुछ-कष्ट में।

“हुज़ूर, हमें यहाँ से ले जाइए! हमें इस-दृश्य से बचाइए!” युधिष्ठिर रो पड़े।

दूत ने मुस्कुरा कर कहा, “महाराज, यह नर्क है। आप वापस जा सकते हैं स्वर्ग। आपके भाई यहीं रहेंगे, उन्होंने अधर्म-कर्म किए थे।”

युधिष्ठिर ने सिर हिलाया। “नहीं। हम वापस नहीं जाएँगे। हम यहीं रहेंगे, अपने भाइयों के साथ। दुर्योधन के स्वर्ग से, हमारे भाइयों का नर्क अच्छा। आइए, हम यहीं रहते हैं।”

वे एक-कोने में बैठ गए, अपने भाइयों की ओर मुख कर के, उन्हें छूते-छूते कुछ-सान्त्वना देने की कोशिश में।

3 · सब-कुछ का असली-रूप, अंतिम-परीक्षा खत्म

एक क्षण के बाद, अचानक सब-कुछ बदला। नर्क का अंधेरा गायब। बदबू गायब। चीखें थम गईं। आसपास फिर वही स्वर्ग-शोभा।

इन्द्र, यम-धर्म, ब्रह्मा, स्वयं सब-कुछ देवता-गण आ कर सामने खड़े हुए।

इन्द्र ने कहा, “महाराज, यह आपकी अंतिम-परीक्षा थी, और सबसे-कठोर। आप जीवन-भर धर्म पर अडिग रहे, मगर मरते-समय भी अगर एक-स्वार्थ की झलक रहती (कि ‘हम तो स्वर्ग आ गए, हमारे भाइयों का जो होगा सो होगा’), तो आप पूर्ण-धर्म-राज नहीं कहलाते। आपने अपने भाइयों के साथ नर्क-वास को स्वर्ग के सिंहासन से ऊँचा चुना। यही धर्म की चरम-सीमा है।”

“और यह दुर्योधन, जिसे आपने सिंहासन पर देखा, यह भी एक-संकेत था। दुर्योधन क्षत्रिय-धर्म से युद्ध-भूमि में मरे थे, उन्हें भी क्षत्रिय-स्वर्ग का एक-छोटा-स्थान मिला है, जैसा-वीर-गति-मरण-वालों को मिलता है।एक-अल्प-काल का सम्मान है।”

“आपका जो छोटा-सा अधर्म था, अश्वत्थामा-हतः वाला अर्ध-सत्य, उसका भी एक-छोटा-दण्ड था, और वह यह नर्क-दर्शन का क्षण था। एक-झूठ-छुपी का एक-झूठा-नर्क। अब वह दण्ड भी पूरा हुआ।”

4 · सब-कुछ का मिलन, अंतिम-शान्ति

देवताओं की एक-संकेत पर सब-पात्र प्रकट हुए। पाँच पाण्डव, द्रौपदी, कर्ण, अभिमन्यु, द्रौपदी के पाँच-पुत्र, धृष्टद्युम्न, यहाँ तक कि भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र, गांधारी, कुन्ती, विदुर। सब-कुछ-स्वर्ग में थे, सब-कुछ-शान्त, सब-कुछ-एक-दूसरे से मित्र।

कुरुक्षेत्र का सब-वैर अब समाप्त। यहाँ श्रीकृष्ण-बलराम भी, हर-एक की मूल-दिव्य-रूप में।

युधिष्ठिर ने सब को गले लगाया। कर्ण से सबसे-पहले, क्योंकि वह उनके ज्येष्ठ-भाई थे। फिर अपने सब-छोटे-भाइयों से। द्रौपदी और उत्तरा से। यह अंतिम-मिलन सब-दुख-दुर्भाव से ऊपर था।

उन्होंने अपने जो-रूप-धारण किए थे, उनसे ऊपर अपनी-मूल-स्वर्गीय-पहचानों में थे, युधिष्ठिर-धर्म-राज, भीम-वायु-पुत्र, अर्जुन-इन्द्र-पुत्र, नकुल-सहदेव-अश्विनी-कुमारों के अंश, द्रौपदी-अग्नि-से प्रकट होने वाली शक्ति। सब-कुछ अपने-दिव्य-स्थानों में।

5 · व्यास का अंतिम-संदेश, महाभारत का समापन

अब महाभारत-कथा अपने-अंत पर है। मगर एक-बात याद रहे। यह सब-कुछ हम तक कैसे पहुँचा?

व्यास जी ने यह सब अपनी रचना में संगृहीत किया। उन्होंने अपने प्रिय-शिष्य वैशम्पायन को सिखाया। वैशम्पायन ने राजा जनमेजय (परीक्षित के पुत्र, अर्जुन के परपौत्र) को सर्प-यज्ञ के अवसर पर सुनाया। वहाँ बैठे थे सूत-पुराणिक उग्रश्रवा (जिसका दूसरा नाम सौति), जिन्होंने यह सब सुन कर याद रखा।

आगे चल कर, नैमिषारण्य में शौनक-ऋषि का बारह-वर्षीय सत्र चल रहा था। वहाँ ब्राह्मणों-ऋषियों की एक बड़ी-सभा थी। सौति ने वहाँ पहुँच कर महाभारत-कथा सुनाई। शौनक और अन्य ऋषियों ने ध्यान से सुना, और यह कथा फिर आगे की पीढ़ियों को बताई गई।

व्यास ने अपनी-रचना के अंत में स्वयं कहा, “जो कुछ हम कह चुके, इसमें वह सब-कुछ है, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। ‘यन्न भारते तन्न भारते,’ यानी जो महाभारत में नहीं, वह भारत-वर्ष में नहीं। और जो भारत-वर्ष में नहीं, वह कहीं-नहीं।”

“जो इस ग्रन्थ को सुनेगा, पढ़ेगा, सोचेगा, उसकी आत्मा का बहुत-कुछ शुद्ध होगा। यह हमारी आख़िरी-इच्छा।”

6 · स्वर्गारोहण-पर्व का समापन, महाभारत का समापन

स्वर्गारोहण-पर्व यहीं समाप्त। महाभारत भी यहीं समाप्त।

एक-कथा जो शान्तनु और गंगा के मिलन से शुरू हुई थी, अब स्वर्ग में सब-पात्रों के मिलन से बंद होती है। बीच में चार-पीढ़ियाँ, अठारह-अक्षौहिणी सेना, अठारह-दिन का युद्ध, सौ-कौरव, पाँच-पाण्डव, एक-गीता, अनेक-उप-कथाएँ। सब-कुछ एक-घेरे में बंध जाता है।

एक-दर्पण है। महाभारत की हर-कथा में हम अपने आप का कुछ-न-कुछ देख सकते हैं। हर-पात्र हमारे-भीतर का एक-हिस्सा है। दुर्योधन की ज़िद, युधिष्ठिर का धर्म, अर्जुन का संशय, भीम का बल, द्रौपदी का धैर्य, कर्ण का त्याग, श्रीकृष्ण की शान्ति।

व्यास का यह दान भारत-वर्ष के लिए सदा-सदा रहेगा।

परिक्रमा-पूर्ण

आप ने सम्पूर्ण महाभारत के अठारह-पर्वों की यात्रा कर ली। हस्तिनापुर के राज-भवन से कुरुक्षेत्र की रक्त-भूमि तक, गीता-उपदेश से शर-शय्या-संवादों तक, और अंतिम-स्वर्ग-दर्शन तक। यह कथा यहीं रुकती है, मगर इसकी-गूँज जारी रहती है, हर-पाठक के मन में।

शान्ति-पर्व का धर्म, गीता का दर्शन, सब-कुछ अब आप का भी अपना। नमस्ते।

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स्रोत: महर्षि व्यास रचित मूल संस्कृत महाभारत; गीता-प्रेस संस्करण से सत्यापित। यहाँ कथा-सार है, श्लोक-दर-श्लोक नहीं। महाभारत के सब अठारह पर्व कथा-शैली में पूर्ण।