महाभारत · Mahābhārata
पर्व 11 · स्त्री पर्व, युद्ध-भूमि में रानियों का विलाप
युद्ध समाप्त, मगर शोक शुरू। हस्तिनापुर की रानियाँ अपने पुत्रों-पतियों के शव खोजने कुरुक्षेत्र पहुँचती हैं। गांधारी की आँखों का पट्टा ज़रा-सा सरकता है। श्रीकृष्ण पर एक भारी शाप पड़ता है। और कुन्ती एक पुराना राज़ खोलती हैं, जो पाण्डवों को विजय में भी हार महसूस करवा देता है। यह पर्व छोटा है, मगर इसका भार पूरे महाभारत में सबसे अधिक।
1 · हस्तिनापुर में ख़बर पहुँचना
सुबह हस्तिनापुर का राज-महल। संजय ने आ कर पूरी रात की कहानी सुनाई। दुर्योधन की जाँघ का टूटना, सौप्तिक-काण्ड, पाण्डवों के पुत्रों का अंत, सब-कुछ।
धृतराष्ट्र अपने सिंहासन पर बैठे थे, बूढ़े-दुर्बल। उन्होंने एक बार ज़ोर से सिर पीटा, फिर शान्त हो गए। गांधारी की आँखों के पट्टे के नीचे आँसुओं की धाराएँ बह रही थीं, मगर पट्टा अभी भी बँधा था। उनके सौ-पुत्र, एक भी न बचा।
विदुर पास खड़े थे। उन्होंने धीमे से धृतराष्ट्र के कंधे पर हाथ रखा, “हुज़ूर, हम पहले से कहते आए। मगर मोह में आप सुन नहीं सके। अब समय है शोक करने का, और फिर शोक से ऊपर उठने का। मरने वालों के लिए अंतिम-संस्कार ज़रूरी है। चलिए कुरुक्षेत्र।”
धृतराष्ट्र ने सिर हिलाया। उनके पास अब कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
2 · विदुर का धैर्य-उपदेश
विदुर ने रास्ते में धृतराष्ट्र को धैर्य-उपदेश दिया। यह उपदेश पुराने विदुर-नीति का ही विस्तार था, मगर अब और भी सीधा, क्योंकि वह क्षण नैतिकता का था जिसमें मोह का परदा फट चुका था।
“महाराज, जो जन्मे हैं, उन्हें मरना है। यह जीवन का सबसे प्राथमिक नियम है। आप अपने पुत्रों के शोक में डूबे जा रहे हैं, मगर यह शोक अधूरा-धर्म है। उन्होंने भी अपना युद्ध-धर्म निभाया है, क्षत्रिय की मृत्यु युद्ध-भूमि में ही सबसे शुभ मानी जाती है।”
“और एक बात, हुज़ूर। यह सब-कुछ आपके ही पुत्र-मोह से हुआ। दुर्योधन को आपने जब-जब रोकना चाहिए था, रोका नहीं। न्याय आपके हाथ में था, मगर मोह बड़ा था। अब पछताने से क्या? बेहतर है आगे चल कर अंतिम-संस्कार सही-तरह से कीजिए, फिर वन में जा कर तपस्या-समाधि में लग जाइए।”
धृतराष्ट्र ने सिर हिला कर मान लिया।
3 · पाण्डव-दल का सामना, धृतराष्ट्र का छिपा क्रोध
हस्तिनापुर-दल कुरुक्षेत्र पहुँचा। पाण्डव, श्रीकृष्ण, सात्यकि, धौम्य, और अन्य पाण्डव-पक्ष के लोग सामने आए। युधिष्ठिर ने आगे बढ़ कर अपने अन्धे ताऊजी के पाँव पकड़े।
“युधिष्ठिर वत्स,” धृतराष्ट्र ने कहा, “हम आपका आलिंगन करना चाहते हैं।” युधिष्ठिर पास आए, अंक में लिए गए। फिर अर्जुन, नकुल, सहदेव।
अब भीम की बारी थी। श्रीकृष्ण को धृतराष्ट्र की एक छुपी-योजना का पता था। बूढ़े-अन्धे राजा के अंदर अभी भी एक क्रोध-ज्वाला थी, “जिसने हमारे दुर्योधन की जाँघ तोड़ी, उसे हम अपने आलिंगन में पकड़ कर कुचल देंगे।” धृतराष्ट्र के पास हाथ-पैर का बल अभी भी पर्याप्त था।
श्रीकृष्ण ने धीरे से भीम को पीछे खींचा, और भीम के स्थान पर पहले से तैयार लोहे की एक मूर्ति, भीम-जैसी, सामने रखी। धृतराष्ट्र ने उसी मूर्ति को आलिंगन में लिया, अपनी पूरी ताक़त से दबाया। मूर्ति टूट कर बिखर गई, धृतराष्ट्र की मुट्ठियाँ छिल गईं।
उस क्षण उनको होश आया, “हे प्रभु, हमने यह क्या किया?” उन्होंने भीम को (असली भीम को, जो अब सामने आ चुके थे) गले लगाया, “वत्स, क्षमा कीजिए। यह क्षण-भर का क्रोध था, हम पर हावी हो गया था।” भीम ने पाँव छू लिए, “हुज़ूर, हमने कुछ नहीं देखा। आप हमारे ताऊजी हैं।”
4 · गांधारी का अपने पुत्रों को देखना
अब गांधारी की बारी थी। उन्होंने युधिष्ठिर के पाँव पर हाथ रखा, “वत्स, आइए, हम सब मिल कर कुरुक्षेत्र-भूमि पर चलते हैं।” वहाँ हज़ारों-हज़ार लाशें पड़ी थीं, गिद्ध-कुत्ते लूट रहे थे।
गांधारी की आँखों पर अब भी पट्टा बँधा था। मगर अब, पहली बार जीवन-भर में, उन्होंने पट्टे के नीचे से ज़रा-सी झलक ले ली। यह कोई आम बात नहीं थी, उन्होंने अपनी पतिव्रता का व्रत तोड़ा था, मगर पुत्र-मोह से। पट्टे के नीचे की एक उँगली-चौड़ी जगह से एक तेज़ दृष्टि निकली, जो उनकी जीवन-भर की तपस्या से अर्जित थी।
उस दृष्टि के सबसे पहले शिकार हुए युधिष्ठिर के पाँव के नाख़ून, जो काले पड़ गए। गांधारी ने तुरंत होश से दृष्टि वापस ले ली, मगर थोड़ी देर बाद ही फिर खोली, इस बार अपने पुत्रों के शव देखने को।
एक-एक करके वे अपने पुत्रों के पास गईं। दुर्योधन के पास सबसे पहले, फिर दुःशासन, फिर एक-एक। हर एक के पास बैठ कर रोईं, चूमा, फिर अगले के पास।
एक जगह छोटे लड़कों के शव थे, द्रौपदी के पाँच पुत्र। गांधारी और कुन्ती दोनों एक-साथ रोईं, अपने-अपने पोतों के लिए। यहाँ वंश-भेद मिट गया था, सब एक ही माटी के थे।
5 · गांधारी का श्रीकृष्ण को शाप
घूमते-घूमते गांधारी ने पूरे कुरुक्षेत्र की दूरस्थ देख ली, गिद्धों-कुत्तों-स्यारों का यह नर्क-दृश्य देख कर उनका मन और भी जल गया। उन्होंने अपनी आँखें श्रीकृष्ण की ओर मोड़ीं।
“वासुदेव, आप सब कुछ कर सकते थे। आप त्रिकाल-दर्शी हैं, इस युद्ध को रोक सकते थे, मगर आपने रोका नहीं। आप जान-बूझ कर इस अधर्म-यज्ञ के होने दिया। हमारे सौ पुत्रों के शव, हमारे पतिवंश का अंत, इन सबके पीछे आप हैं।”
“हम तपस्विनी हैं, हमारी तपस्या का बल है। हम आपको शाप देती हैं, छत्तीस वर्ष बाद, आपका अपना यदुवंश आपस में लड़ कर समाप्त होंगे। आप, श्रीकृष्ण, अपनी आँखों से अपने कुल का संहार देखेंगे। एक तुच्छ-शिकारी आपके पाँव का अंगूठा निशाना कर के, और आप अपनी देह त्याग देंगे, बिना किसी सम्मान-संस्कार के।”
शाप दे कर गांधारी एक क्षण के लिए घबरा गईं, “हे माधव, यह क्या कहा हमने?” मगर शब्द निकल चुके थे।
श्रीकृष्ण ने मुस्कुरा कर हाथ जोड़े। “माते, आपका शाप शिरोधार्य। हम जानते थे यह आएगा, और हमने इसे स्वीकार किया है। यदुवंश को हमने स्वयं भार-स्वरूप दिया था, अब समय है कि वह भी समाप्त हो। आप सही हैं, हम युद्ध रोक सकते थे, मगर यह युद्ध एक धर्म-यज्ञ था, अधर्म-वर्षों का दण्ड था। हम केवल माध्यम थे।”
गांधारी ने आँखें फिर बंद कर लीं, पट्टे को कस कर बाँधा। पट्टा अब फिर कभी नहीं खुलने वाला था।
6 · अंतिम-संस्कार, सामूहिक चिता
युधिष्ठिर ने आदेश दिया, “हर एक का सम्मान-संस्कार होंगे। चाहे कौरव-पक्ष का हो या पाण्डव-पक्ष का, हर योद्धा क्षत्रिय था, हर एक का धर्म-वध-संस्कार होना चाहिए।”
व्यास, धौम्य, और कई-कई ऋषि एकत्र हो कर मंत्र-पाठ करते रहे। कई-कई चिताएँ जलाई गईं। हस्तिनापुर के सब-गुरु, कुरुक्षेत्र-निवासी ब्राह्मण, सब इस संस्कार-यज्ञ में लग गए। दिन-रात आग जलती रही।
भीष्म अभी भी शर-शय्या पर थे, मगर उत्तरायण की प्रतीक्षा में, उन्होंने अभी देह नहीं त्यागी थी।
अंत में, सब चिताओं की राख गंगा में बहाई गई। कुछ-कुछ राख का जल नदी को लाल कर गया। कई दिन यह चलता रहा।
7 · कुन्ती का राज़ खोलना, कर्ण की पहचान
अंतिम-संस्कार के बीच, कुन्ती ने एक कठिन काम किया। अपने पाँच जीवित पुत्रों को एक तरफ़ ले जा कर कहा, “वत्स, हम आपको एक बात बतानी है। आज पहली बार। हमारी आत्मा और नहीं छुपा सकती।”
“युद्ध से पहले, कर्ण ने सूर्य-स्तुति के समय हमसे एक मुलाक़ात की थी। हम उससे मिले थे, और एक सच्चाई कहनी थी। कर्ण, जो आज पाण्डव-पक्ष का सबसे बड़ा शत्रु था, वह असल में हमारा ज्येष्ठ पुत्र था। आपका बड़ा भाई।”
पाँच पुत्रों के चेहरे ज़मीन की ओर पीले हो गए। युधिष्ठिर सीधे ज़मीन पर बैठ गए। “माते, आप यह बात पहले क्यों नहीं बताईं? हम अपने ज्येष्ठ-भाई को अपने हाथों मरने दिए। अर्जुन ने अपने ज्येष्ठ-भाई पर बाण चलाया, बिना जाने।”
अर्जुन के हाथ काँपे। उनके मुख से कुछ नहीं निकला। बस आँसू, और एक भीतर का गिरना।
युधिष्ठिर ने आख़िर खड़े हो कर कहा, “माते, हम आपके सत्य का सम्मान करते हैं कि अब भी आपने बताया। मगर आज से, कोई भी स्त्री किसी से कोई बात नहीं छुपा सकेगी। यह हमारा एक छुपा-शाप है, एक माँ-पुत्र-संवाद के दर्द से उठा हुआ।” यह शाप क्षणिक-क्रोध में दिया गया, मगर सदियों तक चला।
युधिष्ठिर वहीं ज़मीन पर बैठ गए, फिर सिर थाम लिया। “हम अब और राजा नहीं बनना चाहते। हम संन्यास लेंगे, वन में चले जाएँगे। हमने अपनी पीढ़ी के सब-कुछ खो कर यह राज्य पाया है। यह राज्य हमें अब अंगारों जैसा लगता है।”
8 · कर्ण के लिए तर्पण
युधिष्ठिर ने आदेश दिया कि कर्ण के लिए विशेष तर्पण किया जाए। कर्ण को ज्येष्ठ-पाण्डव माना जाए, सब प्रथाओं में पहला नाम उनका हो।
श्रीकृष्ण ने एक बात और बताई। “महाराज, कर्ण की पत्नी और उसके दो पुत्र अभी जीवित हैं, अंग-देश में। उन्हें भी राज-कुल में बुलाइए, और कर्ण के पुत्र को अंग-देश का राजा बनाइए, ताकि कर्ण की वंश-धारा बनी रहे।” यह किया गया।
कुन्ती ने स्वयं कर्ण के तर्पण-जल चढ़ाए, सात-सौ बार। हर बार मुख से निकलता, “हमारे ज्येष्ठ पुत्र को क्षमा कीजिए, हमारी ग़लती को क्षमा कीजिए।”
9 · द्रौपदी का अंतिम-शोक
द्रौपदी अब भी एक कोने में बैठी थी। उसने अपने पाँच पुत्रों के शव देखे थे, अपने पाँच भाइयों के, अपने पिता द्रुपद के, अपने भाई धृष्टद्युम्न के। वह एक-साथ इतना सब खो चुकी थी कि उसकी आँखों से अब आँसू भी नहीं निकल रहे थे, बस सूखी एक देख-रही-निगाह।
श्रीकृष्ण उसके पास बैठे। “बहन, सब-कुछ चला गया है, हम जानते हैं। मगर आपको एक काम और करना है। आपके पतियों को सम्भालिए। युधिष्ठिर अब अपराध-बोध में डूब रहे हैं, उन्हें सिंहासन से दूर नहीं हटने देना। यह आपका अंतिम-राज-धर्म है।”
द्रौपदी ने हाथ जोड़े, “माधव, हम आपकी आज्ञा निभाएँगे। मगर अब से हम अपने केश फिर खुले छोड़ रहे हैं। न जाने कब इन्हें फिर बँधने का कारण मिले।”
10 · स्त्री-पर्व का समापन
स्त्री-पर्व यहीं समाप्त। यह पर्व सबसे छोटा है मगर सबसे भारी। महाभारत के सब विजय-गीत, अब विधवाओं के रुदन में दब चुके थे। राजगद्दी अभी खाली थी, युधिष्ठिर तैयार नहीं थे।
आगे का पर्व, शान्ति-पर्व, इसी विषाद से शुरू होता है। शर-शय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर को धर्म-उपदेश देंगे, जिससे एक नई-शान्ति, एक नई-व्यवस्था का जन्म होंगे।
आगे
शान्ति-पर्व, महाभारत का सबसे बड़ा पर्व (लगभग चौदह-हज़ार श्लोक)। शर-शय्या पर लेटे भीष्म, युधिष्ठिर को राज-धर्म, आपद्-धर्म, मोक्ष-धर्म का विशाल उपदेश देते हैं। महाभारत का दार्शनिक हृदय। विष्णु-सहस्रनाम भी इसी पर्व में। (विष्णु-सहस्रनाम पहले से प्रकाशित है, यहाँ पढ़िए।)