महाभारत · Mahābhārata
पर्व 12 · शान्ति पर्व, शर-शय्या से बहता हुआ धर्म-उपदेश
महाभारत का सबसे बड़ा पर्व, लगभग चौदह-हज़ार श्लोक। युद्ध के बाद का गहन-विषाद, युधिष्ठिर की संन्यास-प्रवृत्ति, फिर रिश्तेदारों-ऋषियों का समझाना, राज्याभिषेक, और अंत में शर-शय्या पर लेटे भीष्म से एक विशाल धर्म-उपदेश। राज-धर्म, आपद्-धर्म, मोक्ष-धर्म, तीन भागों में बँटा यह उपदेश महाभारत का दार्शनिक हृदय है। विष्णु-सहस्रनाम भी यहीं से।
1 · युधिष्ठिर का संन्यास-प्रस्ताव
अंतिम-संस्कारों के बाद पाण्डव और श्रीकृष्ण-दल हस्तिनापुर लौटे। राज-गद्दी ख़ाली थी, राज-तिलक होना बाक़ी था। मगर युधिष्ठिर का मन अभी भी टूटा हुआ था।
उन्होंने सबको एकत्र कर के घोषणा की, “हम राजा नहीं बनेंगे। हम वन में जाएँगे, संन्यास लेंगे, बाक़ी जीवन तपस्या में बिताएँगे। यह राज्य हमें कौरव-वंश के सौ-पुत्रों के रक्त की क़ीमत पर मिला है, और हमारे ज्येष्ठ-भ्राता कर्ण को, हमारे सब-पुत्रों को, हमारे मित्रों को बलि चढ़ा कर। हमारे लिए यह सिंहासन कोयले की भट्टी समान है।”
“नकुल राजा बन सकते हैं, सहदेव या अर्जुन। मगर हम नहीं। हम युधिष्ठिर थे, अब केवल युधि-हीन-स्थिर रहना चाहते हैं।”
द्रौपदी, भीम, अर्जुन, सब-कोई स्तब्ध। उनसे यह उम्मीद नहीं थी।
2 · सब-कुछ का तर्क-दल, समझाने वालों की पंक्ति
श्रीकृष्ण ने पहले बात की। “महाराज, क्षत्रिय का धर्म है राज्य चलाना। एक नागरिक हो कर हम संन्यास ले सकते हैं, मगर एक क्षत्रिय जिसने युद्ध से राज्य पाया, उसका धर्म है राज्य-संचालन। इसी से धर्म-व्यवस्था चलती है।”
व्यास जी आए, “वत्स, आप सोच रहे हैं कि आपने पाप किया। मगर पाप तब है जब कर्ता अपने स्वार्थ के लिए कर्म करता है। आपने धर्म-स्थापना के लिए युद्ध किया, यह स्वार्थ का काम नहीं था।”
विदुर बोले, “महाराज, याद कीजिए, हम पहले ही कहते आए कि न्याय-पथ कठिन है। आज इसका भार है, मगर इसे उठाना ही धर्म है। संन्यास-समय अब नहीं है, बाद में आएगा।”
देवस्थान ऋषि, नारद, मार्कण्डेय, सब आए। हर एक ने अपने-अपने तरीक़े से समझाया।
द्रौपदी ने भी कहा, “हुज़ूर, हमारे पाँच पुत्रों का बलिदान अगर इस गद्दी की क़ीमत था, तो हम चाहती हैं कि यह बलिदान फलित हो, बंजर न जाए।”
अंत में युधिष्ठिर मान गए। मगर एक शर्त रखी, “हम भीष्म से धर्म-उपदेश लेंगे पहले। वे शर-शय्या पर हैं, उत्तरायण की प्रतीक्षा में। उनके पास इतना ज्ञान है, उसे संगृहीत कर लेना हमारा कर्तव्य है। उसके बाद ही हम सिंहासन सम्भालेंगे।”
3 · राज्याभिषेक
एक तय-समय पर हस्तिनापुर में युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ। श्रीकृष्ण ने स्वयं अभिषेक-जल डाला। धृतराष्ट्र भी उपस्थित थे, उन्होंने युधिष्ठिर को सिंहासन सौंपा। यह एक अनोखा क्षण था, हारे हुए राजा द्वारा विजयी को राज-तिलक।
युधिष्ठिर ने भीम को युवराज बनाया, अर्जुन को सेनापति, सहदेव को मंत्री-गण के साथ, नकुल को सैन्य-व्यवस्था का प्रधान। विदुर को मुख्य-सलाहकार। संजय को भी एक ख़ास पद, धृतराष्ट्र की देखभाल का।
राज्य चलना शुरू हुआ। मगर युधिष्ठिर का अधूरा-काम अभी भी था, भीष्म से धर्म-उपदेश लेना।
4 · भीष्म के पास पहुँचना, उत्तरायण की प्रतीक्षा में
श्रीकृष्ण-पाण्डव-दल कुरुक्षेत्र पहुँचा। भीष्म अभी भी शर-शय्या पर, अनेक बाणों से बँधे हुए, मगर साँस अब भी चल रही थी। उत्तरायण आने में अभी कुछ-कुछ समय था (शास्त्र-काल-गणना से कुछ-कुछ हफ़्ते)।
युधिष्ठिर ने पाँव छू कर कहा, “पितामह, हम आपके पास आए हैं। हमारे ऊपर सिंहासन का भार है, मगर हम राज-धर्म नहीं जानते। आप हमें सिखाइए।”
भीष्म मुस्कुराए, “वत्स, हमारी जीवन-भर की पढ़ाई आज काम आ रही है। हम जो जानते हैं, सब आप तक पहुँचा देंगे। तीन-चार-पाँच रोज़ का काम है, मगर समय हम लेंगे, मगर हम धैर्य से कहेंगे।”
श्रीकृष्ण ने भी कहा, “पितामह, आपकी स्मृति अद्भुत है, आज हम सब-कुछ सुनेंगे।”
भीष्म का उपदेश तीन-भाग में चला, और शान्ति-पर्व इन्हीं तीन भागों में बँटा है।
5 · राज-धर्म, राजा का प्राथमिक उत्तरदायित्व
पहला भाग था “राज-धर्म,” यानी राजा के कर्तव्य। भीष्म ने विस्तार से समझाया।
“महाराज, राजा का पहला कर्तव्य है प्रजा की रक्षा। न्याय-व्यवस्था जो हर-नागरिक के लिए एक हो। अमीर-गरीब का भेद न रहे, क्षत्रिय-ब्राह्मण-वैश्य-शूद्र, सब के लिए न्याय एक हो।”
“राजा अकेले राज्य नहीं चला सकता। मंत्री होने चाहिए, सलाहकार, सेनापति, गुप्तचर। हर एक को अपनी जगह सम्भालनी चाहिए। मगर राजा को हर एक की रिपोर्ट सीधे सुननी चाहिए, बीच में कोई न रहे।”
“दण्ड-व्यवस्था। यह सबसे कठिन। दण्ड कब, कितना, किस-तरह, यह तय करना राजा का बहुत-बड़ा बोझ। अधिक-दण्ड भी अधर्म, कम-दण्ड भी अधर्म। मध्य-मार्ग चलाइए।”
“कर। प्रजा से कर लीजिए, मगर ऐसे कि गाय से दूध लेने जैसा हो, उसे चोट न पहुँचे। एक राजा जो प्रजा को निचोड़ता है, वह स्वयं ख़त्म होंगे।”
“सेना। सदा तैयार रखिए, मगर बिना-कारण युद्ध मत कीजिए। और जब करें, तब धर्म-युद्ध के नियमों का पालन कीजिए।”
राज-धर्म का यह सब-कुछ, और सैकड़ों उप-नियम, भीष्म ने धैर्य से कहे। बीच-बीच में युधिष्ठिर के प्रश्न आते, भीष्म जवाब देते।
6 · आपद्-धर्म, संकट-समय का अलग-धर्म
दूसरा भाग “आपद्-धर्म।” यानी जब साधारण-धर्म नहीं चल सकता, संकट-समय का अलग-नियम।
“वत्स, कई-बार जीवन में ऐसी स्थिति आती है कि साधारण-धर्म नहीं चलता। तब आपद्-धर्म का सहारा लेना पड़ता है।”
“उदाहरण के लिए, एक ब्राह्मण साधारण-दिनों में दाल-रोटी से जीता है। मगर अकाल आए, घर में बच्चे भूख से मर रहे हों, तो वह क्षत्रिय या वैश्य का काम भी कर सकता है। यहाँ तक कि अगर-अगर बहुत-कठिन हो, माँस भी खा सकता है। साधारण-दिनों में यह वर्जित होता, मगर संकट-समय में नियम बदल जाते।”
भीष्म ने यहाँ अनेक कथाएँ सुनाईं। एक कथा थी विश्वामित्र की, जो अकाल-समय में चाण्डाल के घर का माँस चुरा कर खाने को मजबूर हुए, क्योंकि और कोई रास्ता नहीं था। मगर बाद में उन्होंने प्रायश्चित्त किया।
“राजा के लिए भी आपद्-धर्म होता है। शत्रु बहुत-बड़ा हैं, सीधा-युद्ध न हो सके, तो छल-कपट का सहारा लेना पड़े। मगर इसका भी एक नियम है, यह दीर्घ-कालिक नहीं हो सकता, केवल आपात-स्थिति में।”
“धर्म और अधर्म के बीच की एक रेखा बहुत बारीक है। साधारण-धर्म कहता है, झूठ मत बोलिए। मगर अगर एक हत्यारा एक मासूम को मारने के लिए ढूँढ रहा हैं, और आपको मासूम के छुपने का स्थान पता हैं, तो क्या आप सच बताएँगे? नहीं। यहाँ झूठ बोलना धर्म है।”
यहाँ युधिष्ठिर की अपनी ग्लानि कम हुई। उन्हें यह समझ आया कि अश्वत्थामा-हतः वाला अर्ध-सत्य आपद्-धर्म का अंग था, धर्म-स्थापना के लिए ज़रूरी।
7 · मोक्ष-धर्म, अंतिम-स्वतंत्रता का मार्ग
तीसरा और सबसे बड़ा भाग था “मोक्ष-धर्म।” यानी जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होने का मार्ग। यहाँ भीष्म ने वेदान्त-सांख्य-योग, सब-कुछ का सार बताया।
“वत्स, अंत में सब-कुछ मोक्ष की ओर ले जाता है। राज्य, धन, यश, ये सब रास्ते के पड़ाव हैं, मंज़िल नहीं। मंज़िल एक है, आत्म-ज्ञान।”
“आत्मा क्या है? यह वही चेतना है जो हम सबमें है। जन्म-मरण से अप्रभावित। आप अपने शरीर को ‘मेरा शरीर’ कहते हैं, मन को ‘मेरा मन।’ यह ‘मेरा-मेरा’ कौन कहता है? वही आत्मा।”
“शरीर मरता है, मन भी अंत में जाता है। मगर आत्मा? आत्मा सदा रहती है। इसी आत्मा को जान कर मनुष्य मुक्त होता है।”
भीष्म ने यहाँ कई-कई कथाएँ सुनाईं, जो आत्म-ज्ञान का संकेत देती हैं।
जनक की कथा। मिथिला के राजा जनक एक ही समय राजा भी थे, और ब्रह्म-ज्ञानी भी। उन्होंने सिंहासन पर बैठ कर मोक्ष पाया, बिना संन्यास के। एक बार उनके राज-महल में आग लगी, खबर पहुँची, उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, “मिथिला जल रही है, मगर इसमें मेरा कुछ नहीं जल रहा।” यह आत्म-स्थित-दृष्टि है।
शिकारी-कबूतर की कथा। एक भयानक तूफ़ान में एक शिकारी जंगल में खो जाता है, ठंड से मरने लगता है। एक पेड़ पर बैठा कबूतर-दम्पति यह देखता है। उन्होंने अपनी पंखुड़ियाँ नीचे गिरा कर शिकारी को आश्रय दिया, फिर पंख जला कर उसे गर्मी दी। शिकारी जब हट गया, कबूतरों ने अपने आप को आग में डाल कर बलिदान कर दिया, “हमारा अतिथि-धर्म पूरा हुआ।” यह एक छोटी-कथा है, मगर बलिदान-धर्म का परम-उदाहरण।
इस तरह की सैकड़ों कथाएँ भीष्म ने सुनाईं, हर एक का एक धार्मिक-तत्त्व था।
8 · विष्णु-सहस्रनाम, हज़ार-नामों का प्रकाश
उपदेश-काल के बीच एक बहुत-ख़ास क्षण आया। युधिष्ठिर ने पूछा, “पितामह, सबसे श्रेष्ठ देवता कौन है, सबसे पवित्र नाम कौन-सा है, सबसे आसान साधना क्या है?”
भीष्म ने मुस्कुरा कर एक हज़ार नाम सुनाए, श्री विष्णु के एक हज़ार पवित्र नाम। यह “विष्णु-सहस्रनाम” है, जो आज तक सब-कुछ हिन्दू-गृहों में नित्य-पाठ किया जाता है। हर नाम विष्णु के एक रूप या गुण को दर्शाता है, हर नाम अपने आप में एक ध्यान-केन्द्र।
(विष्णु-सहस्रनाम सम्पूर्ण रूप में हमारे साइट पर अलग प्रकाशित है, यहाँ पढ़िए।)
“वत्स,” भीष्म ने अंत में कहा, “जो कोई इस सहस्र-नाम का नियमित-पाठ करता है, उसे न जन्म-मरण का चक्र छूता है, न रोग, न शोक। यह एक सरल मगर पूर्ण-साधना है।”
9 · उत्तरायण का आगमन, भीष्म की प्रतीक्षा का अंत
उपदेश-काल कई-दिन चला, यहाँ तक कि कई-हफ़्ते। बीच-बीच में युधिष्ठिर हस्तिनापुर लौटते, राज-कार्य देखते, फिर आ कर बैठते। द्रौपदी, अर्जुन, सब-कोई भीष्म के पास आ कर सुनते।
अंत में, उत्तरायण आया, यानी सूर्य का उत्तर-दिशा में जाने का काल। यह वह शुभ-समय था जिसकी भीष्म प्रतीक्षा कर रहे थे, अपनी देह छोड़ने के लिए।
भीष्म ने अपना उपदेश समाप्त किया, “वत्स, हमने जो कुछ कहा, उसे ध्यान से रखिए। अब हमारी देह जाने का समय है।” उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं, अपने भीतर ध्यान लगाया, और एक के बाद एक बाण उनके शरीर से निकलने लगे।
एक दिव्य-तेज उनके शरीर से निकल कर सूर्य-मण्डल में चला गया। शर-शय्या ख़ाली हुई। पाण्डव, श्रीकृष्ण, सब-कोई आँख में आँसू भर कर खड़े हुए।
भीष्म के अंतिम-संस्कार पूरे-विधि से किए गए। एक विशेष-समाधि बनाई गई, जिसे आज भी कहीं-कहीं “भीष्म-कुण्ड” कहा जाता है।
10 · शान्ति-पर्व का समापन
शान्ति-पर्व यहीं समाप्त। यह पर्व लम्बा है, मगर इसमें महाभारत का दार्शनिक-हृदय बसा है। राज-धर्म, आपद्-धर्म, मोक्ष-धर्म, ये तीन शीर्षक मिल कर एक पूर्ण-जीवन-दर्शन बनाते हैं।
युधिष्ठिर हस्तिनापुर लौटे, अब एक भारी-मन से नहीं, बल्कि एक स्थिर-मन से। उन्हें राज-धर्म का मार्ग साफ़ था। मगर भीष्म का उपदेश एक-दौर में समाप्त नहीं हुआ था, और भी कुछ बाक़ी था, जो अनुशासन-पर्व में मिलेगा।
आगे
अनुशासन-पर्व, भीष्म के उपदेश का जारी-भाग। दान-धर्म, स्त्री-धर्म, तीर्थ-माहात्म्य, शिव-स्तुति। अंत में भीष्म का देह-त्याग का विस्तृत-वर्णन।