पर्व 9 · शल्य पर्व

महाभारत · Mahābhārata

पर्व 9 · शल्य पर्व, अठारहवें दिन का अंत और कौरव-सेना का समापन

सिर्फ़ एक दिन। मगर इसी एक दिन में शल्य का अल्प-नेतृत्व, मामा के हाथों मामा का अंत, सहदेव के हाथों शकुनि की मृत्यु, और शाम होते-होते दुर्योधन का सरोवर में छिप जाना। फिर वह दृश्य, जिसकी प्रतीक्षा भीम तेरह वर्षों से कर रहे थे, गदा-युद्ध, और एक उल्टे प्रहार से दुर्योधन की जाँघ का टूटना। कौरव-सेना अब समाप्त, मगर युद्ध का अंत अभी नहीं।

शल्य पर्व · कथा-रूप में संक्षेप · पर्व-सूची · पिछला: कर्ण पर्व

1 · शल्य का सेनापति-पद, अंतिम अल्प-दिन

कर्ण के गिरने के बाद कौरव-शिविर में रात भर शोक रहा। दुर्योधन ने सुबह अपने बचे हुए साथियों को एकत्र किया, “अब कौन सेनापति बनेगा?” कृपाचार्य ने सुझाव दिया, “अब आप-जैसा अनुभवी कोई नहीं। मगर हम सब आपका साथ देंगे।”

अंत में शल्य को सेनापति बनाने का तय हुआ। शल्य मद्र-राज, बूढ़े, अनुभवी, और कर्ण के सारथी होते-होते पाण्डव-पक्ष के साथ छुपा वचन रखे हुए थे। मगर अब वह वचन काम नहीं आ सकता था, सेनापति-स्वयं हो कर पीछे से तोड़-फोड़ करने का कोई रास्ता नहीं था।

दुर्योधन ने अपना अंतिम-निर्णायक हमला तय किया। “आज जो भी होंगे, आर-पार। हमारी सेना अब लगभग ख़त्म है, मगर हमारे मन की लड़ाई अभी ज़िंदा है।”

2 · युधिष्ठिर का अपने मामा से सामना

शल्य रथ पर सजे, सेना के आगे चले। उन्होंने आज पूरी ताक़त से लड़ने का तय किया था, कौरव-पक्ष में रहते हुए, अपना धर्म निभाने का।

दिन की शुरुआत में ही शल्य ने पाण्डव-सेना में कोहराम मचा दिया। भीम के बहुत-से सैनिक मारे गए। धृष्टद्युम्न को भी पीछे हटना पड़ा।

अब वह क्षण आया जिसकी एक पुरानी व्यवस्था थी। उद्योग-पर्व में याद कीजिए, युधिष्ठिर ने भीष्म-द्रोण से पूछा था, “हम आपको कैसे मारें?” युधिष्ठिर ने स्वयं घोषणा की थी कि “शल्य-वध हम करेंगे।” यह उनकी विशेष-प्रतिज्ञा थी।

युधिष्ठिर अब आगे आए। शल्य से सीधा सामना। दोनों रथ-पर-रथ। बाण-वर्षा शुरू हुई। शल्य का बल अधिक, युधिष्ठिर का धैर्य अधिक। कई-कई घड़ी एक-दूसरे पर वार होते रहे।

अंत में, युधिष्ठिर ने एक विशेष-शक्ति-अस्त्र चलाया, जो ब्रह्म-दण्ड-सम था। उन्होंने मन में स्मरण किया अपने पिता धर्म-राज को, और बाण छोड़ा। बाण शल्य के सीने में लगा, वे रथ से गिर पड़े, चले गए। यह युद्ध-इतिहास का एक अनोखा दृश्य था, धर्म-राज द्वारा अपने ही मामा का वध, मगर पूरी विधि से, बिना किसी छल के।

3 · शकुनि का अंत, सहदेव के हाथों

शल्य के गिरते ही कौरव-सेना का साहस टूटने लगा। शकुनि अब रण-भूमि में अपने पुत्र उलूक के साथ। उन्होंने ज़बरदस्त कोशिश की कौरव-सेना को इकट्ठा रखने की।

तभी सहदेव सामने आए। याद कीजिए, द्यूत-समय सहदेव ने प्रतिज्ञा की थी कि “शकुनि-वध हम करेंगे।” तेरह वर्षों से वह वचन साँस ले रहा था। आज पूरा होने का दिन था।

सहदेव बहुत-शान्त स्वभाव के थे, पाँचों भाइयों में सबसे कम बोलने वाले। मगर आज उनकी आँखों में एक ज्वाला थी। उन्होंने पहले उलूक को मारा, फिर सीधे शकुनि पर। शकुनि के पास उनके वही पुराने पासे थे, मगर रण-भूमि में पासे काम नहीं आते।

सहदेव ने एक तीखे बाण से शकुनि की तलवार तोड़ी, फिर अगले बाण से धनुष, फिर तीसरे बाण से सिर। शकुनि के सिर के साथ-साथ उनके पाँव से बँधे वे जादुई पासे भी गिरे, चूर-चूर। यह एक अंतिम संकेत था, अधर्म-यंत्र का अंत।

4 · कौरव-सेना का सम्पूर्ण ध्वंस

शाम होते-होते कौरव-सेना का बहुत-कुछ ख़त्म हो चुका था। दुःशासन और कर्ण-शल्य-शकुनि सब जा चुके। दुर्योधन के सौ भाइयों में से अधिकांश गिर चुके थे। पाण्डव-सेना भी भारी-घायल थी, मगर कौरव की तुलना में बहुत बेहतर।

शिविर में दुर्योधन एकदम अकेले रह गए। बच्चपन से जिन्होंने साथ देखा था, अब कोई नहीं था। केवल अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा, तीन ही शेष। दुर्योधन ने अपना मुकुट उतार दिया, अपने हाथ में गदा ले ली, और बिना किसी को बताए, बाहर निकल गए।

5 · दुर्योधन का सरोवर में छिपना, स्तम्भन-योग

दुर्योधन को एक यौगिक-विद्या आती थी, “जलस्तम्भन।” इस विद्या से पानी अपनी सतह कठोर कर लेता है, या व्यक्ति पानी के अंदर भी श्वास रोक कर रह सकता है। दुर्योधन एक सरोवर तक पहुँचे, “द्वैत-सरोवर” इसका नाम था (पाण्डव-वनवास का याद-पुराना नाम)। उसमें कूद गए, पानी के नीचे, स्तम्भन-योग से।

सुबह उठ कर अश्वत्थामा-कृपा-कृतवर्मा ने दुर्योधन को ढूँढा, मगर कहीं नहीं मिले। उधर पाण्डव-शिविर में जश्न जैसा माहौल था, मगर अधूरा, क्योंकि “दुर्योधन कहाँ हैं?”

श्रीकृष्ण और पाण्डव ढूँढने निकले। बहुत-दूर तक खोज की, हर शिविर, हर तंबू, हर सड़क।

6 · शिकारियों की सूचना, सरोवर तक पहुँचना

अंत में, कुछ शिकारी जो जंगल में पशु-पक्षी पकड़ने आए थे, उन्होंने कौरव-वंश के एक राजकुमार को सरोवर में जाते देखा था। ख़बर लग कर पाण्डव-दल पहुँचा।

सरोवर के किनारे पर खड़े हो कर, युधिष्ठिर ने पुकार लगाई, “हुज़ूर दुर्योधन, आप यहाँ हैं हम जानते हैं। बाहर आइए। एक राजा सरोवर में छिपा रहे, यह क्षत्रिय-शोभा नहीं।”

दुर्योधन ने भीतर से उत्तर दिया, “हम छिप नहीं रहे, थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं। हमारा राज्य चला गया, हमारे भाई गए, हमारे मित्र गए। अब हम क्या लड़ें? आप ले जाइए राज्य, हम वन में जाएँगे।”

भीम ने हँस कर कहा, “हुज़ूर, यह क्या बात? आप क्षत्रिय हैं, युद्ध से भागना? बाहर आइए, एक ही गदा-युद्ध में सब-कुछ का फैसला हो जाए।”

दुर्योधन का अहंकार जागा। उन्होंने हाँ की, “ठीक है। मगर एक-पर-एक। सब आप मिल कर हमला नहीं करेंगे।” युधिष्ठिर ने वचन दिया, और एक अजीब-सा वचन भी जोड़ा (जो एक भारी-ग़लती था), “हम पाँच में से जिसे आप चुनेंगे, वह आपसे लड़ेगा। उसे हराइए, राज्य आपका।”

श्रीकृष्ण के मुख की चमक हट गई। उन्होंने युधिष्ठिर को अकेले ले जा कर समझाया, “महाराज, यह आपने क्या किया? दुर्योधन गदा-युद्ध में अद्वितीय है। उसका सामना केवल भीम कर सकते हैं। आपने हमें फँसा दिया।”

मगर दुर्योधन समझदार थे। उन्होंने भीम को ही चुना, क्योंकि सिर्फ़ उसी से उनकी सबसे पुरानी दुश्मनी थी, द्यूत-काल से।

7 · गदा-युद्ध, बल और कौशल की भिड़ंत

दुर्योधन सरोवर से बाहर निकले, पानी छिटकाते हुए। गदा हाथ में। भीम भी अपनी विशाल गदा ले कर सामने। दोनों अद्भुत गदा-योद्धा। बल-कुशल दोनों में हो, मगर कौशल में दुर्योधन कुछ-कुछ आगे, क्योंकि बलराम जी (कृष्ण के बड़े भाई) के ही शिष्य थे, और बलराम गदा-विद्या के सर्वोच्च गुरु थे।

घंटों गदा-युद्ध चला। एक-दूसरे की गदाएँ टकराती, चिंगारी निकलती। हर वार ज़मीन हिला देता। बीच-बीच में कोई पीछे हटता, कोई आगे बढ़ता।

देर-देर बाद, यह स्पष्ट हो गया कि गदा-कौशल में दुर्योधन भीम से कुछ ऊपर ही थे। वे भीम की हर चाल पहले से जान लेते। भीम के माथे से पसीना बहने लगा, गदा गिरने को थी।

8 · श्रीकृष्ण का संकेत, जाँघ-तोड़ने वाला प्रहार

श्रीकृष्ण ने यह देखा। यह वही क्षण था जिसके लिए तेरह वर्ष पहले भीम ने प्रतिज्ञा की थी, “हम दुर्योधन की जाँघ तोड़ूँगा।” मगर गदा-युद्ध का एक नियम था, “नाभि के नीचे प्रहार नहीं होता।” यह “धर्म-युद्ध” का अंग था।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आँख से इशारा किया। अर्जुन ने अपनी जाँघ ठोक कर भीम को संकेत दिया। भीम समझ गए। यह एक पुरानी प्रतिज्ञा का संकेत था।

अगले क्षण भीम ने उछल कर गदा से सीधा दुर्योधन की जाँघों पर प्रहार किया। एक ज़बरदस्त ‘क्र-र-र-च!’ की आवाज़, और दुर्योधन की दोनों जाँघें टूट गईं। वे ज़मीन पर गिर पड़े, खून बहता हुआ।

भीम ने ख़ुश हो कर अपना पैर दुर्योधन के सिर पर रखा, नृत्य-सा करने लगा। द्रौपदी का अपमान, अभिमन्यु का बलिदान, सब-कुछ याद कर रहे थे।

9 · बलराम का आगमन, क्रोध, फिर त्याग

उसी समय बलराम जी पहुँचे। वे तीर्थ-यात्रा से लौटे थे, युद्ध में हिस्सा नहीं लिया था (यह उनका तय किया था, क्योंकि एक तरफ़ शिष्य दुर्योधन, दूसरी तरफ़ भाई कृष्ण)। आते-आते उन्होंने भीम का यह कांड देख लिया।

बलराम क्रोध से लाल हो गए। अपनी हलधर-हल उठाई, सीधे भीम पर चढ़े, “आपने अधर्म किया है। गदा-युद्ध में नाभि के नीचे प्रहार वर्जित है। हम आपको मारेंगे।”

श्रीकृष्ण बीच में आए। “भैया, ठहरिए। द्रौपदी के अपमान के समय दुर्योधन ने अपनी जाँघ ठोक कर उसे बुलाया था। यही जाँघ है, इसी जाँघ का दण्ड है। भीम ने केवल अपना वचन पूरा किया है।”

बलराम का क्रोध शान्त नहीं हुआ। बोले, “कृष्ण, आप जो भी कहें, यह धर्म-विरुद्ध है। हम अब किसी का पक्ष नहीं लेंगे। हम जा रहे हैं।” उन्होंने हलधर नीचे रखी, और वहाँ से चले गए, फिर कभी इस युद्ध-भूमि में नहीं लौटे।

यह एक मार्मिक क्षण था। दो भाई, अलग-अलग धर्म-दृष्टि से देख रहे थे एक ही घटना।

10 · दुर्योधन का अंतिम-शाप

दुर्योधन गिरे हुए थे, मगर साँस अभी थी। उन्होंने कृष्ण की ओर देख कर कहा, “वासुदेव, आपने यह सब किया। आपने अधर्म पर अधर्म जुड़वाया। भीष्म को शिखण्डी के पीछे से मरवाया, द्रोण को झूठ से रुकवाया, कर्ण को निशस्त्र-काल में मरवाया, मुझे नियम-तोड़ कर। आप तो अधर्म-धारी हैं।”

“मगर हम संतुष्ट हैं। हम क्षत्रिय थे, क्षत्रिय-रूप में जिए, क्षत्रिय-रूप में मर रहे हैं। स्वर्ग में अप्सराएँ हमारी प्रतीक्षा करेंगी। आप जिन पाण्डवों को विजय दिला रहे हैं, उन्हें राज्य तो मिलेगा, मगर वह राज्य बंजर होंगे, बिना पुत्रों के, बिना मित्रों के, बिना भाइयों के। और आप, श्रीकृष्ण, आपका वंश भी आपस में लड़ कर समाप्त होंगे। यह हमारा अंतिम-शाप है।”

श्रीकृष्ण ने मुस्कुरा कर सिर हिलाया। उन्हें यह सब पहले से पता था। यदुवंश का अंत भविष्य में होने वाला था, और मौसल-पर्व में यह दिखेगा। मगर अभी, दुर्योधन की पीड़ा को सहना और सुनना ही था।

11 · दुर्योधन के तीन शेष-साथी, सौप्तिक-पर्व की पीठिका

पाण्डव अपने शिविर लौटे, दुर्योधन को मरते हुए छोड़ कर। मगर सरोवर के दूर एक झाड़ी में तीन कौरव-योद्धा शेष थे, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा। उन्होंने दूर से सब-कुछ देखा।

तीनों ने दुर्योधन के पास जा कर सर झुकाया। दुर्योधन ने अपनी मरती-साँस से कहा, “अश्वत्थामा, आप हमारे अंतिम-सेनापति बनिए। आप ही हमारा बदला ले सकते हैं। पाण्डवों के पाँचों भाइयों को मार डालिए।”

अश्वत्थामा ने प्रतिज्ञा की, “हुज़ूर, हम आज रात ही पाण्डव-शिविर पर हमला करेंगे।” यह सौप्तिक-पर्व की भूमिका है, “सोते हुए लोगों पर रात-वार।”

शल्य-पर्व यहीं समाप्त। कौरव-सेना का सम्पूर्ण अंत, मगर एक नया अंधेरा-काल अभी आना बाक़ी है।

आगे

सौप्तिक-पर्व, रात्रि-काण्ड। अश्वत्थामा-कृपा-कृतवर्मा का सोते हुए पाण्डव-शिविर पर हमला। द्रौपदी के पाँचों पुत्रों (उपपाण्डवों) का संहार। अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र-प्रहार उत्तरा के गर्भ पर। श्रीकृष्ण द्वारा अजात-परीक्षित की रक्षा। अश्वत्थामा का अनन्त-शाप।

स्थायी URL: /mahabharata/shalya-parva/

स्रोत: महर्षि व्यास रचित मूल संस्कृत महाभारत; गीता-प्रेस संस्करण से सत्यापित। यहाँ कथा-सार है, श्लोक-दर-श्लोक नहीं।