महाभारत · Mahābhārata
पर्व 10 · सौप्तिक पर्व, सोते हुए शिविर पर एक रात
महाभारत का सबसे छोटा पर्व, मगर सबसे अंधेरा। दुर्योधन की अंतिम-इच्छा को सिर पर रख कर अश्वत्थामा एक रात के अंदर वह सब कर डालते हैं जिसे “अधर्म” शब्द भी पूरी तरह नहीं पकड़ता। सोते हुए शिविर का संहार, धृष्टद्युम्न का अंत, पाँच उपपाण्डवों का बेसमय बलिदान। फिर ब्रह्मास्त्र-प्रहार जो एक अजात-बच्चे को मारने को निकलता है, और एक दिव्य-हस्तक्षेप उसे जीवन देता है।
1 · तीन बचे साथी, एक जंगल, एक रात
शाम हो रही थी। दुर्योधन की देह तप-तप कर साँस तोड़ रही थी। तीन ही कौरव-योद्धा शेष थे, अश्वत्थामा (द्रोण-पुत्र), कृपाचार्य (बुज़ुर्ग गुरु), और कृतवर्मा (यदुवंशी राजा जो दुर्योधन के पक्ष में था)। दुर्योधन के अंतिम-शब्द उन्हीं तीनों को निर्देश थे, “पाण्डवों से बदला लीजिए। हमारी जलती-राख इसी से ठंडी होगी।”
तीनों एक जंगल में पहुँचे, एक बरगद के पेड़ के नीचे ठहरे। शाम घनी हो गई, फिर रात उतर आई। तीनों चुप, क्या किया जाए?
अश्वत्थामा अपने पिता द्रोण की मृत्यु से अंदर ही अंदर जल रहे थे। उन्हें मालूम था कि पिता को धर्म-युद्ध के नियम तोड़ कर मारा गया था, धृष्टद्युम्न ने निशस्त्र-गुरु का सिर काटा था। उनके सीने में एक नया जहर पैदा हो रहा था।
2 · उल्लू-कौवों का दृश्य, एक ग़लत प्रेरणा
रात अंधेरी थी। बरगद के पेड़ पर हज़ारों कौवे सो रहे थे, घोंसलों में दुबके। तभी एक उल्लू, एकाकी, चुपके से आया, और एक-एक कौवे के सिर पर वार करने लगा। सोते-सोते कौवे मरते गए, बिना जागे। एक रात में, पूरे पेड़ की एक पीढ़ी समाप्त।
अश्वत्थामा ने यह देखा। उन्हें एक ख़ौफ़नाक प्रेरणा मिली। “क्या ऐसा ही हमें करना चाहिए? पाण्डव-शिविर सोया हुआ है। एक रात में सब का अंत?”
कृपाचार्य चौंक उठे, “बेटे, यह क्या बात? सोते हुए लोगों पर हमला? यह क्षत्रिय-धर्म से बहुत-दूर है। आप पागल हैं रहे हैं।”
अश्वत्थामा क्रोध से बोले, “हुज़ूर, क्षत्रिय-धर्म हमारे पिता के साथ टूट गया था। निशस्त्र-गुरु का सिर काटने वाला धृष्टद्युम्न, और झूठा-वचन बोलने वाला युधिष्ठिर, इन्हें क्षत्रिय-धर्म याद रहा था क्या? अब हम भी वही करेंगे। बल्कि उससे ज़्यादा।”
कृपा और कृतवर्मा दोनों ने मना किया, मगर अश्वत्थामा अड़ गए। बहुत-कोशिशों के बाद, दोनों ने यह तय किया कि वे शिविर के द्वार पर पहरेदारी करेंगे, ताकि कोई बाहर न निकल सके। मगर अंदर जा कर वार करना अश्वत्थामा का काम होंगे।
3 · शिव-तपस्या, एक अधर्म-शक्ति का वरदान
अश्वत्थामा शिविर के बाहर पहुँचे, पाण्डव-शिविर के बीच एक दरवाज़ा रोक रहा था। दरवाज़े पर एक विशालकाय द्वारपाल खड़ा था, जिसकी देह दीपशिखा-समान चमक रही थी। यह कोई साधारण द्वारपाल नहीं था, यह स्वयं भगवान् शिव का एक अंश-रूप था, पाण्डव-शिविर की रक्षा कर रहा था।
अश्वत्थामा ने अनेक-अस्त्र चलाए, द्वारपाल पर। मगर एक का भी असर नहीं हुआ। अंत में, अश्वत्थामा ने अपने पिता-गुरुओं द्वारा सिखाए हुए ज्ञान से समझा, कि यह स्वयं शिव हैं, और इन्हें केवल तपस्या से ही पार किया जा सकता है।
अश्वत्थामा वहीं बैठ गए, अग्नि-कुण्ड जलाया, अपने आप को आहुति-समान चढ़ाने का संकल्प किया। उन्होंने अपना मांस-रक्त-सब-कुछ अग्नि में डालने का तय किया। यह “नर-यज्ञ” था, एक भयानक अनुष्ठान।
शिव प्रसन्न-से हो गए, मगर खेद से। बोले, “वत्स, हम आपको एक वरदान देते हैं। आज की रात के लिए, आप पर पाण्डव-शिविर का द्वार खुलेगा। मगर यह जान लीजिए, इस कर्म का फल आपको स्वयं भोगना है। हम सिर्फ़ रास्ता खोलते हैं।”
एक तलवार भी शिव ने अश्वत्थामा को दी, अपनी ही शक्ति से ओत-प्रोत। शिव अंतर्धान हो गए। शिविर का द्वार खुला, अश्वत्थामा अंदर घुसे, अकेले।
4 · धृष्टद्युम्न का अंत, बिना तलवार के
शिविर में चारों ओर शान्ति थी। दिन भर के युद्ध के बाद सब-कोई गहरी नींद में था। अश्वत्थामा ने पहले एक अंधेरे कोने में जा कर देखा। उनकी आँखें अब पंख-वाली बिल्लियों की तरह अंधेरे में देख रही थीं।
पहले उन्होंने धृष्टद्युम्न का तंबू खोजा। द्रौपदी का भाई, उनके पिता का हत्यारा, सो रहा था। अश्वत्थामा को एक क्षण कमज़ोरी आई, “तलवार से क्यों? यह तलवार के योग्य नहीं। हमारे पिता को जिसने निशस्त्र मारा, हम उसे पैरों से मारेंगे।”
उन्होंने धृष्टद्युम्न के बालों को पकड़ कर उठाया, जागते-जागते दबाने लगे। धृष्टद्युम्न ने उठने की कोशिश की, मगर अश्वत्थामा का बल बहुत-अधिक था। धृष्टद्युम्न ने मुश्किल से कहा, “क्या आप मुझे क्षत्रिय-तरीक़े से तलवार दे कर मारेंगे?” अश्वत्थामा ने हँसी से उत्तर दिया, “नहीं, हुज़ूर। आपके पिता ने हमारे पिता को क्षत्रिय-तरीक़े से नहीं मारा।”
उन्होंने धृष्टद्युम्न का गला अपने ही पैरों से दबा कर तोड़ डाला। शिविर में पहली बूँद रक्त की।
5 · शिविर में कोहराम, उपपाण्डवों का अंत
एक के बाद एक तंबू में अश्वत्थामा घुसते गए। शिखण्डी, जो भीष्म-वध का कारण बना था, सो रहा था। अश्वत्थामा ने उसे भी तलवार से दो टुकड़ों में किया।
फिर अश्वत्थामा एक तंबू में पहुँचे, जहाँ पाँच नौजवान सो रहे थे। अश्वत्थामा ने सोचा, “ये पाँच लोग, सोते में, पाण्डव होंगे।” उन्होंने एक-एक करके पाँचों का गला काट डाला।
मगर ये पाण्डव नहीं थे। ये द्रौपदी के पाँच पुत्र थे, उपपाण्डव, जो हर पाण्डव से एक-एक हुए थे। प्रतिविन्ध्य (युधिष्ठिर का पुत्र), सुतसोम (भीम का), श्रुतकर्मा (अर्जुन का), शतानीक (नकुल का), श्रुतसेन (सहदेव का)। पाँचों युवक थे, अभिमन्यु की पीढ़ी के, अब सब चले गए।
अश्वत्थामा को अपनी ग़लती का पता नहीं चला। उन्होंने सोचा कि पाण्डव-वध हो गया। वे अन्य तंबुओं में गए, सोते हुए सैनिकों-योद्धाओं को मारते रहे। हज़ारों-हज़ार सेना उस रात पाण्डव-पक्ष की कट गई।
6 · श्रीकृष्ण की पूर्व-दृष्टि, पाँचों पाण्डवों की रक्षा
एक बात बहुत महत्वपूर्ण थी। उसी रात, श्रीकृष्ण ने कोई अंतर-संकेत पाया था, या यों कहें, उन्हें मालूम था कि कुछ-कुछ बुरा होने वाला है। शाम को उन्होंने पाँचों पाण्डवों से कहा था, “महाराज, आज रात आप सब अलग शिविर में रहें। मुख्य-शिविर में नहीं। बहुत-दूर एक नदी-तट पर हम सब बैठेंगे।”
पाण्डव हिचके थे, “श्रीकृष्ण, आज जीत का दिन है, हम अपने शिविर में क्यों न रहें?” मगर कृष्ण ने ज़ोर दिया, “महाराज, हमारी बात पर भरोसा कीजिए।” पाण्डव माने।
उसी रात मुख्य-शिविर में हम-शिविरी-सब लोग सोए थे, जो लोग पाण्डव-वंश के लिए लड़े थे, उनके मित्र, सम्बन्धी, सब। पाँचों पाण्डव और श्रीकृष्ण ही नदी-तट पर थे, सुरक्षित।
अश्वत्थामा ने जब “पाँच” के मारने का विचार किया, वे उपपाण्डव थे जो उनकी आँख में पड़े, और वही पाँच, “पाण्डव-नाम-धारी,” समझे गए।
7 · शिविर में आग, अश्वत्थामा का बाहर निकलना
संहार पूरा कर के अश्वत्थामा ने पूरे शिविर में आग लगा दी। पीछे से कृपा और कृतवर्मा भी आ कर मदद में आए। हज़ारों तंबू आग की लपटों में। आसमान लाल हो उठा।
तीनों रथ पर चढ़ कर वहाँ से निकले, सीधे दुर्योधन के पास पहुँचने को, जो अब भी अपनी टूटी जाँघों के साथ साँस ले रहे थे।
दुर्योधन को जब बताया गया कि “पाण्डव-वध हो गया, पाँचों मारे गए,” उन्हें एक अंतिम ख़ुशी मिली। बोले, “अब हम चैन से जा सकेंगे। हमारी विजय हुई।” इतना कह कर देह त्याग दी। मगर वे अंत तक नहीं जान पाए कि वे जिन्हें “पाण्डव-वध” समझ रहे थे, वे असल में पाण्डवों के पुत्र थे, पाण्डव स्वयं जीवित।
8 · सुबह, द्रौपदी का शोक, पाण्डवों का पीछा
सुबह जब पाण्डव और श्रीकृष्ण मुख्य-शिविर लौटे, उन्होंने राख और रक्त के ढेर देखे। द्रौपदी के पाँचों पुत्र, धृष्टद्युम्न (जो उनके भाई थे), शिखण्डी, सब चले गए।
द्रौपदी ज़मीन पर बैठ गई। उसकी आवाज़ भी नहीं निकल रही थी, बस आँसू। फिर अंत में बोली, “अब हम जीत कर भी क्या पाए? पाँच पुत्रों को जन्म दे कर पाला, पाँचों एक रात में। हमें अश्वत्थामा का सिर चाहिए। और उसके मस्तक की वह मणि, जो जन्म से उसके माथे पर है, हम अपने पतियों के पाँव में रखेंगे।”
पाण्डव और श्रीकृष्ण निकले। अश्वत्थामा ने व्यास के आश्रम की ओर शरण ली थी। पाण्डव वहाँ पहुँचे।
9 · ब्रह्मशिर-अस्त्र, दो अस्त्रों का सामना
आश्रम के पास अश्वत्थामा ने पाण्डव-दल को आते देखा। उन्होंने एक तृण उठा कर, उसे ब्रह्म-शिर-अस्त्र में बदल दिया। यह सबसे ख़तरनाक दिव्य-अस्त्र था, जो एक-वार में पूरी पीढ़ी का अंत कर सकता था।
“पाण्डवों का अंतिम-कुल भी अब नहीं रहेगा। हम इस अस्त्र से उत्तरा के गर्भ पर वार करेंगे, ताकि वह बच्चा, जो भविष्य का राजा हो सकता है, भी न जन्म ले सके।”
अर्जुन ने यह सुना। उन्होंने भी अपना ब्रह्म-शिर-अस्त्र निकाला, उसे प्रकट किया, सामने रखा। “हम भी प्रकट करेंगे। मगर हम इसे केवल आपके अस्त्र को रोकने के लिए चलाएँगे।”
दोनों अस्त्र हवा में टकराने जा रहे थे। तभी श्रीकृष्ण-व्यास दोनों बीच में कूद पड़े, हाथ उठा कर। “ठहरिए! दोनों अस्त्रों को वापस कीजिए, नहीं तो पूरी पृथ्वी जल जाएगी। यह दिव्य-अस्त्र हैं, इनका टकराव विनाशकारी।”
अर्जुन ने अपना अस्त्र वापस ले लिया, उन्हें इसकी विद्या आती थी। मगर अश्वत्थामा को विद्या नहीं आती थी, क्योंकि द्रोण ने यह विद्या अधूरी सिखाई थी (अश्वत्थामा अधीर थे, गुरु-वचन तोड़े थे)।
10 · उत्तरा के गर्भ पर अस्त्र, श्रीकृष्ण का हस्तक्षेप
अश्वत्थामा ने धमकी दी, “अस्त्र वापस नहीं ले सकते। तो हम इसे एक लक्ष्य दे रहे हैं, उत्तरा के गर्भ। पाण्डव-वंश का अंत यहीं हो।”
व्यास ने व्याकुल हो कर श्रीकृष्ण की ओर देखा। श्रीकृष्ण ने अपनी आँखें बंद कीं, मन ही मन एक संकल्प किया। बोले, “ठीक है। अस्त्र को उस गर्भ की ओर भेज दीजिए। हम वचन देते हैं कि हम उस अजात-बच्चे को पुनः जीवन देंगे, चाहे यह असम्भव हो।”
अश्वत्थामा का अस्त्र चला, हस्तिनापुर की ओर निकला, उत्तरा के गर्भ तक पहुँचा।
व्यास और श्रीकृष्ण ने अब अश्वत्थामा को घेर लिया। श्रीकृष्ण बोले, “अश्वत्थामा, आपकी मणि निकाल दीजिए, द्रौपदी को दीजिए। और आपका दण्ड हम तय करते हैं। आप तीन-हज़ार वर्षों तक धरती पर भटकते रहेंगे, जिस जगह से मणि निकलेगी, वहाँ एक न-भरने वाला घाव रहेगा, मवाद बहता रहेगा। न आप मरेंगे, न मुक्त होंगे। यह आपका शाप है।”
अश्वत्थामा ने अपनी मणि निकाली, माथे पर एक कटा हुआ निशान रह गया, जिससे रक्त-मवाद बहने लगा। मणि श्रीकृष्ण को दी। श्रीकृष्ण ने वह मणि द्रौपदी को दी, द्रौपदी ने अपने पतियों के पाँव में रखी, फिर एक नौकर को दे कर युधिष्ठिर के मुकुट में जुड़वा दी।
अश्वत्थामा वहाँ से निकले। तीन-हज़ार वर्षों की वह यात्रा शुरू हुई, जो कहा जाता है कि आज भी जारी है। कुछ-कुछ संतों-तपस्वियों ने उन्हें हिमालय की दूर-दराज़ की खोहों में देखा है, यह लोक-कथा है।
11 · श्रीकृष्ण का परीक्षित को पुनर्-जीवन
हस्तिनापुर पहुँच कर श्रीकृष्ण ने उत्तरा के पास जा कर देखा। बच्चा गर्भ से मरे-समान निकल चुका था, अस्त्र की शक्ति से। उत्तरा रोते-रोते बेहोश थी। श्रीकृष्ण ने बच्चे को गोद में लिया।
उन्होंने एक संकल्प किया, “मेरा जीवन-भर का सत्य अगर सच है, मेरी हर तपस्या अगर शुद्ध है, मेरा हर-कर्म अगर निष्काम-कर्म रहा है, तो इस बच्चे को जीवन मिले।” फिर बच्चे के ऊपर अपनी हथेली रखी।
एक क्षण के बाद, बच्चे की साँस लौटी, एक छोटी-सी रोना, फिर तेज़ रोना। उत्तरा होश में आई, “मेरा बच्चा!” कुन्ती, द्रौपदी, गांधारी, सब इकट्ठी हो गईं।
बच्चे का नाम रखा गया “परीक्षित,” यानी “जिसकी (मृत्यु-समान अवस्था से) परीक्षा हुई।” यही परीक्षित आगे चल कर अभिमन्यु के बाद पाण्डव-वंश का राजा बनेगा, और महाभारत-शास्त्र के मुख्य-श्रोता बनेगा। श्रीमद्भागवत-पुराण इसी परीक्षित को शुकदेव-मुनि सुनाते हैं।
12 · सौप्तिक-पर्व का समापन
एक रात, एक दुःस्वप्न, फिर भी एक नई-जीवन-धारा। महाभारत की सबसे अंधेरी रात समाप्त हुई।
पाण्डव विजयी, मगर सब-कुछ हार कर। एक पीढ़ी पूरी की पूरी समाप्त। द्रौपदी निरंतर रोती रहीं, युधिष्ठिर के हृदय में एक भारी पत्थर बैठ गया। आगे का पर्व, स्त्री-पर्व, इस शोक का ही विस्तार है।
आगे
स्त्री-पर्व, युद्ध-भूमि में स्त्रियों का विलाप। गांधारी, कुन्ती, द्रौपदी, और कौरव-पक्ष की रानियाँ, सब एक साथ कुरुक्षेत्र पहुँचती हैं, अपने पुत्रों-पतियों के शव खोजने। गांधारी का श्रीकृष्ण को वह कठोर शाप, जो आगे चल कर मौसल-पर्व का बीज बनता है।