महाभारत · Mahābhārata
पर्व 2 · सभा पर्व, अद्भुत महल और टूटा सम्मान
इन्द्रप्रस्थ की राजसभा बनती है, राजसूय-यज्ञ होता है, युधिष्ठिर “सम्राट्” की उपाधि पाते हैं। मगर एक हँसी और एक पासे के खेल ने सब-कुछ उलट दिया। द्रौपदी का सम्मान-हरण, बारह-वर्ष का वनवास, एक-वर्ष का अज्ञातवास, यह सारा भार इसी एक पर्व की देन है।
1 · मय-सभा, असुर-शिल्पी का उपहार
खाण्डव-वन के दहन के समय जो असुर बच कर निकला था, उसका नाम था मय। यह असुर-लोक का अद्भुत शिल्पकार था, स्वर्ग के विश्वकर्मा की तरह। अर्जुन और कृष्ण ने उसे जीवन-दान दिया था। मय ने आ कर निवेदन किया, “हुज़ूर, हमारे प्राण आपके हाथ में हैं। आज्ञा कीजिए, हम क्या सेवा कर सकते हैं?”
युधिष्ठिर ने मुलाहिज़ा किया, फिर बोले, “हमें कुछ नहीं चाहिए। मगर अगर आपकी इच्छा है, तो हमारे लिए एक राजसभा बना दीजिए, जो दुनिया में अद्वितीय हो।”
मय राज़ी हो गया। दो वर्षों में उसने ऐसा भवन तैयार किया, जो धरती पर कभी न देखा गया था। दीवारें ऐसी कि कहीं रत्न की मणि-छाया दिखाई दे, कहीं स्फटिक का जल-आभास। कहीं फूल जो मरते नहीं थे, कहीं पक्षी जो असली से भी असली लगते। बीच में एक विशाल आँगन, जिसकी फर्श कहीं-कहीं स्फटिक की थी, कहीं असली पानी जिस पर कमल खिले थे, और दोनों एक-समान दिखाई देते थे। यह एक ऐसा भ्रम-जाल था, जो साधारण आँख से पकड़ में नहीं आता।
राजसभा बन गई। पाण्डव-पुत्रों के मित्र-रिश्तेदार दर्शन के लिए आते-जाते रहे। इसी सभा में आगे जो घटना होने वाली थी, उसका बीज भी यहीं पड़ चुका था।
2 · नारद की भेंट, राजसूय-यज्ञ का संकल्प
एक दिन देव-ऋषि नारद इन्द्रप्रस्थ पधारे। राजसभा की भव्यता देख कर प्रसन्न हुए, मगर गहरी बात भी कह गए। उन्होंने स्वर्ग-लोक में देखे राजाओं की चर्चा की, हरिश्चन्द्र, मान्धाता, भगीरथ। एक प्रश्न रखा, “महाराज, क्या आपने कभी सोचा है कि अपने यश को सम्राट्-स्तर तक ले जाएँ? राजसूय-यज्ञ करवाएँ?”
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से मशवरा माँगा। कृष्ण आए, बैठ कर बात की। “हुज़ूर, राजसूय करना है तो पहले एक काँटा निकालना होंगे। मगध के राजा जरासन्ध ने अनेक राजाओं को बँदी बनाया हुआ है। जब तक वह जीवित है, और किसी सम्राट् को मान्यता नहीं देता, राजसूय अधूरा रह जाएगा। पहले उसका वध करना होंगे।”
युधिष्ठिर हिचके, “यह तो दूर की बात है, उसकी सेना अपार है, हम कैसे जीतेंगे?” कृष्ण मुस्कुराए, “महाराज, सेना से नहीं, चालाकी से। हम तीन जाएँगे, मैं, अर्जुन और भीम। ब्राह्मण-वेश में।”
3 · जरासन्ध-वध, ब्राह्मण-वेश में मगध-यात्रा
तीनों ब्राह्मण-वेश में मगध पहुँचे। राजा जरासन्ध ब्राह्मणों का बड़ा सम्मान करता था। मगर इन तीनों के व्यवहार में कुछ अजीब था। सीधे महल में जाने के बजाय, उन्होंने नगर-द्वार के पास के एक नगाड़े को तोड़ दिया, जो जरासन्ध का अहंकार-चिह्न था। फिर तीनों ने राजमहल में प्रवेश किया, मगर पुष्प-माला आदि नहीं लीं, सीधे सिंहासन की ओर बढ़े।
जरासन्ध को संदेह हुआ। पूछा,क्षत्रिय लगते हैं। क्या चाहते हैं?”
श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया, और अर्जुन व भीम का भी। बोले, “हम आपसे द्वंद्व-युद्ध की भिक्षा माँगते हैं। आप जिसके साथ चाहें, बराबरी का लड़ें।”
जरासन्ध ने भीम को चुना। तीन-वर्षीय अग्र-तपस्या से प्राप्त उसका बल भी कम न था। तेरह दिन तक भीम और जरासन्ध एक-दूसरे से भिड़े रहे, बिना थके। कृष्ण देख रहे थे, समय आया तो भीम को संकेत दिया, एक तिनके को बीच में से चीर कर दिखाया। भीम समझ गए। उन्होंने जरासन्ध को उठा कर उल्टा खींचा, बीच से चीर डाला, और दोनों टुकड़े एक-दूसरे की उल्टी दिशा में फेंक दिए, ताकि वे फिर से न जुड़ें। (जरासन्ध जन्म से ही दो टुकड़ों का जोड़ था, इसलिए सीधा फेंकने पर फिर जुड़ जाता।)
मगध-राज मारा गया। तहख़ानों से बँदी राजा छुड़ाए गए, सबने पाण्डव-पक्ष माना। आधा काम पूरा।
4 · दिग्विजय, चार दिशाओं का जयदान
अब चार पाण्डव चार दिशाओं को निकले। अर्जुन उत्तर, भीम पूर्व, सहदेव दक्षिण, और नकुल पश्चिम। हर एक ने अपनी दिशा के राजाओं को जीता, उपहार माँगे, या तो बँधाई बँधी, या मित्रता बँधी। बहुत-से रत्न, धन, हाथी-घोड़े लौटे इन्द्रप्रस्थ की ओर।
विशेष कथा अर्जुन की, उन्होंने उत्तर में हिमालय-पार के अनेक देशों को जीता, हिरण्यपुर तक की यात्रा की। कहा जाता है कि अर्जुन ने वहाँ के यक्ष-गन्धर्व-किन्नर समूहों से भेंट ली, और उत्तर-कुरु की सीमा पर रुक गए, क्योंकि उसके आगे केवल देव-लोक है।
5 · राजसूय-यज्ञ, अग्र-पूजा का विवाद
सब कुछ तैयार था। यज्ञ शुरू हुआ। दूर-दूर के राजा, ऋषि, आचार्य, हस्तिनापुर से धृतराष्ट्र, गांधारी, भीष्म-द्रोण-कृपाचार्य-विदुर, सब आए। यहाँ तक कि दुर्योधन भी कौरव-दल के साथ पधारा।
यज्ञ के बीच एक परम्परा थी, “अग्र-पूजा”, यानी सबसे श्रेष्ठ अतिथि को पहले-सम्मान। भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा, “हुज़ूर, यह सम्मान आप श्रीकृष्ण को दीजिए। वही इस सभा के लिए सर्व-योग्य हैं।” युधिष्ठिर सहमत हुए, कृष्ण की पूजा की।
तभी एक स्वर उठा। चेदि-राज शिशुपाल खड़ा हुआ। यह कृष्ण का दूर का चचेरा भाई था, मगर बचपन से ही उनसे शत्रुता रखता था। शिशुपाल ने भरी सभा में कृष्ण की निंदा शुरू कर दी। “यह ग्वाला, यह माखन-चोर, यह गाँव का छोकरा, अग्र-पूजा का अधिकारी? यहाँ बैठे भीष्म जैसे महान् हैं, द्रोण जैसे आचार्य हैं, और आपने इसे चुना?”
कृष्ण की माता की बहन को कृष्ण ने वचन दिया था कि शिशुपाल की सौ ग़लतियाँ तक माफ़ करेंगे। उन्होंने गिन रखी थीं। शिशुपाल कहता ही जा रहा था, गालियों की लड़ी बँधी थी, सौ की संख्या पार हो गई। कृष्ण ने अपनी मुस्कुराहट छोड़ी, सुदर्शन-चक्र छोड़ा। शिशुपाल का सिर एक ही पल में धड़ से अलग। एक उज्ज्वल तेज शरीर से निकल कर कृष्ण में समा गया, यह उसका तत्व-स्वरूप था, मुक्ति।
राजसूय निर्विघ्न समाप्त हुआ। युधिष्ठिर “सम्राट्” घोषित हुए। मगर एक आदमी की आँखें जल रही थीं, दुर्योधन की।
6 · मय-सभा में दुर्योधन की चोट
यज्ञ समाप्ति के कुछ दिन और दुर्योधन इन्द्रप्रस्थ में रहा। एक दिन वह मय-सभा में अकेला घूम रहा था। पहले की बताई बात याद रखिए, यह सभा भ्रम का कारख़ाना थी।
दुर्योधन एक स्थान पर पहुँचा जहाँ स्फटिक की चमकती फर्श थी। उसने अपने राजसी वस्त्रों को ज़रा सम्भाला, कि कहीं भीगें न। आगे चला, तो असली पानी का तालाब आ गया, जो स्फटिक-सा दिखता था। दुर्योधन धोखे में चला गया, पैर पानी में, वस्त्र भीग गए। आगे एक दरवाज़ा दिखा, उसकी ओर बढ़ा, वह दरवाज़ा खुला हुआ नहीं था, वह दीवार थी, चित्रित दरवाज़े के साथ। दुर्योधन धड़ाक से दीवार में जा टकराया।
ऊपर बालकनी से द्रौपदी देख रही थी, हँस पड़ी। कुछ दासियाँ भी हँस उठीं। द्रौपदी से (कथा के एक संस्करण में) निकल गया, “अंधे का पुत्र अंधा।” यह वाक्य कई-कई बार दोहराया गया है, कुछ संस्करणों में यह सिर्फ़ हँसी है। मगर हँसी ही काफ़ी थी।
दुर्योधन का मुँह लाल हो गया। मन में पीड़ा भर गई। यह वही पीड़ा थी जिसने आगे चल कर महाभारत-युद्ध का दरवाज़ा खोल दिया। कभी-कभी एक हँसी सौ युद्ध से बड़ी हो जाती है।
7 · हस्तिनापुर लौट कर, शकुनि की ज़हरीली सलाह
दुर्योधन हस्तिनापुर लौटा। दिन-रात उसका चेहरा उतरा हुआ रहता। न खाना भाता, न नींद आती। एक दिन उसके मामा शकुनि ने कारण पूछा।
“मामाश्री, क्या बताएँ? पाण्डवों का राज्य देखा, सम्राट्-यज्ञ देखा, उनकी पत्नी की हँसी सुनी। हमसे यह सब सहा नहीं जाता। या तो वह राज्य हमारा हो, या यह जीवन हमें न रहे।”
शकुनि गन्धार-राज था, मगर उसके मन में हस्तिनापुर के लिए एक पुराना द्वेष था। उसकी बहन गांधारी का विवाह एक अंधे से कर के, उसने अपनी पूरी ज़िंदगी इस वंश से बदला लेने में लगाई थी। उसके पास एक अद्भुत हुनर था, पासे का खेल। उसके पासे, कहा जाता है, उसके पिता की हड्डियों से बने थे, और हमेशा शकुनि की मर्ज़ी से गिरते थे।
शकुनि ने सुझाव दिया, “हुज़ूर, युद्ध से तो आप कौरव पाण्डवों को कभी नहीं हरा सकते। उनके पक्ष में अर्जुन है, भीम है, श्रीकृष्ण है। मगर एक रास्ता है, द्यूत-क्रीड़ा। युधिष्ठिर को द्यूत का बहुत शौक है, मगर खेलना नहीं आता। हम बुलाएँगे, मैं खेलूँगा, और सब-कुछ छीन लेंगे।”
दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र पर दबाव डाला। धृतराष्ट्र ने हिचक के साथ मान लिया, “पुत्र के सुख के आगे क्या किया जा सकता है।” विदुर ने पुरज़ोर विरोध किया, “हुज़ूर, यह न्योता मत भेजिए, यह वंश-नाश का कारण बनेगा।” मगर दुर्योधन ने ज़िद पकड़ी, धृतराष्ट्र ने ज़िद के आगे झुक कर हाँ कह दी।
8 · द्यूत का न्योता, युधिष्ठिर की कमज़ोरी
विदुर को दूत बना कर इन्द्रप्रस्थ भेजा गया, “एक मित्र-सभा होगी, खेल-तमाशा, राजकुमारों का स्नेह-मिलन। आप पधारिए।” विदुर का मन भारी था, मगर आदेश पालन उनका धर्म था।
युधिष्ठिर ने पूछा, “क्या आप उचित मानते हैं?” विदुर ने स्पष्ट कहा, “महाराज, इस आमंत्रण को अस्वीकार कर दीजिए। यहाँ कुछ अच्छा होने वाला नहीं।” मगर युधिष्ठिर के दिल में एक कमज़ोरी थी, क्षत्रिय-धर्म कहता था कि चुनौती से भागना नहीं चाहिए। और सच यह भी था कि वह द्यूत के शौक़ीन थे, इसलिए मना भी नहीं कर पाए।
पाण्डव-वंश हस्तिनापुर पहुँचा, द्रौपदी सहित। सभा सजी थी, एक तरफ़ कौरव-दल, बीच में दीवान-सी जगह जहाँ बिसात बिछी थी, सामने पाण्डव।
9 · पासे का खेल, क्रमशः सब-कुछ हारना
खेल शुरू हुआ। शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा, “महाराज, आज्ञा हो, तो पासे हम चलाएँ। दुर्योधन की ओर से।”
“क्या यह उचित है? आप दुर्योधन के मामा हैं, खेल तो उन्हीं को खेलना चाहिए।”
“शास्त्र-नियम है कि कोई भी प्रतिनिधि खेल सकता है।” युधिष्ठिर मान गए। यह उनकी पहली ग़लती थी।
पहली बाज़ी, युधिष्ठिर ने अपना एक रत्न लगाया। शकुनि ने बस इतना ही कहा, “जीता।” पासे गिरे, शकुनि की मर्ज़ी से। युधिष्ठिर ने अपना कोषागार दाँव पर लगाया। हारे। अपने रथ-घोड़े। हारे। अपने सैनिक। हारे। अपने हाथी। हारे। अपना समूचा राज्य। हारे।
विदुर बीच-बीच में रोकते रहे, “महाराज, रुकिए। अभी भी समय है।” मगर युधिष्ठिर पर एक नशा सवार था, जुए का नशा, जिसमें हर हार के बाद आदमी सोचता है, “अब अगली बाज़ी जीतेंगे, सब वापस होंगे।”
राज्य गया, तो भाइयों को लगाया। नकुल हारे। सहदेव हारे। अर्जुन हारे। भीम हारे। शकुनि बोला, “अब?”
युधिष्ठिर ने अपने आप को दाँव पर लगाया। हारे। अब वह स्वयं भी दास।
शकुनि ने आँख चमका कर कहा, “महाराज, एक बाज़ी और। आपके पास द्रौपदी हैं, अद्भुत स्त्री। उन्हें लगाइए।” विदुर खड़े हो कर चिल्लाए, “नहीं! एक हारा हुआ आदमी अब किसी का स्वामी नहीं रहा, वह अपनी पत्नी कैसे दाँव पर लगा सकता है?” मगर युधिष्ठिर के मन में अब विवेक नहीं रहा था। उन्होंने द्रौपदी को दाँव पर लगाया। और हारे।
10 · द्रौपदी-चीर-हरण, चीर का अंत न होना
दुर्योधन ने अपने भाई दुःशासन को आदेश दिया, “द्रौपदी को सभा में ले आएँ। अब वह हमारी दासी है।” दुःशासन अंतःपुर में गया, द्रौपदी एक-वस्त्र में थी, ऋतु-काल में थी। उसके केश पकड़ कर सभा में घसीट कर ले आया।
द्रौपदी ने भरी सभा में आँखें उठा कर सबसे पूछा, “मुझे एक प्रश्न का उत्तर दीजिए। क्या एक हारा हुआ आदमी अपनी पत्नी को दाँव पर लगा सकता है? पहले उसने अपने आप को हारा, फिर वह दास बना, और एक दास का अपनी पत्नी पर कोई अधिकार नहीं रहता। तो जो पासा चला ही नहीं जाना चाहिए था, उसका परिणाम मानने का प्रश्न ही कहाँ?”
सभा में चुप्पी छा गई। भीष्म ने जवाब दिया, “बेटी, धर्म की यह सूक्ष्मता है, और हम इसका निर्णय नहीं दे पाते।” बाक़ी सब चुप। विकर्ण नाम के एक कौरव ने सच कहा, “द्रौपदी सही कह रही हैं, यह दाँव वैध नहीं था।” मगर कर्ण उठा, और घोर शब्द कहे, “द्रौपदी ने पाँच पुरुषों से विवाह किया है, वह एक वेश्या से कम नहीं। उसे निर्वस्त्र करो।”
दुर्योधन ने अपने जाँघ को ठोक कर इशारा किया, “द्रौपदी, आएँ हमारी जाँघ पर बैठो।” भीम ने भरी सभा में प्रतिज्ञा की, “मैं इस जाँघ को गदा से तोड़ूँगा, और दुःशासन के सीने का रक्त पीयूँगा।”
दुःशासन ने द्रौपदी की साड़ी का छोर पकड़ कर खींचना शुरू किया। द्रौपदी ने अपनी रक्षा के लिए मन में पुकार लगाई, “हे गोविन्द! हे द्वारकाधीश! हे कृष्ण! आप ही मेरे एक-मात्र शरण हैं।” कहा जाता है कि कृष्ण उस समय द्वारका में थे, मगर उन्होंने अनुभव किया। द्रौपदी की साड़ी का अन्त ही नहीं आया। दुःशासन खींचता गया, साड़ी आती गई, ढेर लगने लगा। थक कर वह बैठ गया। यह एक अद्भुत चमत्कार था, चीर का अनन्त होना। द्रौपदी का सम्मान बच गया, बाहरी रूप से।
मगर भीतर एक ज्वाला जल चुकी थी, जो अठारह दिन के युद्ध तक बुझने वाली नहीं थी।
11 · धृतराष्ट्र के तीन वर, सब-कुछ की वापसी
उसी समय भयानक शकुन हुए, सियार रोए, गधे रेंके। धृतराष्ट्र को डर लगा। उन्होंने द्रौपदी को बुलाया, बोले, “बेटी, हम आपसे कुछ माँगने को कहते हैं, तीन वर। आप जो चाहें माँग लीजिए।”
द्रौपदी ने पहला वर माँगा, “मेरे पति युधिष्ठिर दासत्व से मुक्त हों।” मिल गया। दूसरा वर, “मेरे शेष चारों पति भी अपने रथ-शस्त्र सहित मुक्त हों।” मिल गया। धृतराष्ट्र ने तीसरा वर पूछा। द्रौपदी मुस्कुराई, “हुज़ूर, बस इतना ही। एक क्षत्रिय-स्त्री के लिए तीन वर शोभा नहीं देते।”
धृतराष्ट्र ने आगे जा कर सब-कुछ लौटा दिया, राज्य, धन, दास, सब। पाण्डव अपमानित, मगर मुक्त। चल पड़े वापस इन्द्रप्रस्थ की ओर।
12 · दूसरा द्यूत, तेरह-वर्ष का देश-निकाला
दुर्योधन फिर अपने पिता पर चढ़ बैठा। “पिताजी, यह आपने क्या किया? सब-कुछ लौटा दिया? अब वह हमसे बदला लेंगे, यह तो निश्चित है। एक और मौक़ा दीजिए।”
विदुर ने रोकना चाहा, गांधारी ने रोकना चाहा। मगर दुर्योधन की ज़िद के सामने धृतराष्ट्र फिर हार गए। पाण्डवों को बीच रास्ते से वापस बुलाया गया। एक और बाज़ी का न्योता। इस बार शर्त एक थी, “जो हारेगा, वह बारह वर्ष का वनवास भोगेगा। तेरहवाँ वर्ष अज्ञातवास, जिसमें कोई पहचान न पाए। अगर तेरहवें वर्ष में पहचान हुई, तो फिर से बारह वर्ष का वनवास।”
युधिष्ठिर ने अब भी मना नहीं किया। शकुनि ने पासे चलाए। पाण्डव हारे।
राज-वस्त्र उतार कर वल्कल पहना। द्रौपदी सहित पाँचों भाई हस्तिनापुर से निकले। जाते-जाते भीम ने मुड़ कर कहा, “दुर्योधन! दुःशासन! कर्ण! आप तीनों के लिए हमारी प्रतिज्ञा याद रखिए। तेरह वर्ष बाद हम लौटेंगे, और यह क़र्ज़ चुकाएँगे।” अर्जुन ने वचन दिया कि कर्ण को वही मारेगा। सहदेव ने शकुनि को मारने का वचन दिया। नकुल ने कह दिया कि कौरव-वंश के शेष को वह देखेगा। पाँचों चल पड़े।
हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र अब काँप रहे थे। संजय से उन्होंने पूछा, “क्या यह सही था?” मगर अब उत्तर सम्भव नहीं था।
सभा-पर्व यहीं समाप्त होता है। अगला अध्याय जंगल का है, बारह वर्ष का। उसमें ज्ञान भी है, करुणा भी, और अंत में एक तेरहवाँ वर्ष भी, छद्म-वेश का।
आगे
वन-पर्व, बारह वर्ष का वनवास। पाण्डव हस्तिनापुर छोड़ कर जंगलों में। मगर ये जंगल साधारण जंगल नहीं हैं, ज्ञान की पाठशाला हैं। यहीं नल-दमयन्ती की कथा है, राम-कथा है, सावित्री है, यक्ष-प्रश्न है, और अर्जुन का दिव्य-अस्त्र-संग्रह भी।