महाभारत · Mahābhārata
पर्व 16 · मौसल पर्व, यदुवंश का स्वयं-संहार
कुरुक्षेत्र के छत्तीस-वर्ष बाद। गांधारी का शाप अब अपना-काम कर रहा है। द्वारका में बुरे-शकुन, एक ऋषि-शाप, एक लोहे का पीसा हुआ पाउडर समुद्र में बहाया जाता है, और एक उत्सव-यात्रा में नशे-में-धुत्त-यादव अपनी ही समाप्ति लिख जाते हैं। श्रीकृष्ण एक छोटी-सी अकस्मात्-घटना से देह त्यागते हैं। द्वारका समुद्र निगल लेता है। एक युग का अंत।
1 · छत्तीस वर्ष बाद, द्वारका में बुरे-शकुन
कुरुक्षेत्र-युद्ध को छत्तीस-वर्ष बीत चुके थे। हस्तिनापुर में युधिष्ठिर का राज्य चल रहा था, परीक्षित बड़े-तरुण हो गए थे। उधर द्वारका में श्रीकृष्ण का यदुवंश फलता-फूलता था, बारह-कोटि यादव, हर एक राजकुमार-समान।
मगर अचानक, द्वारका में बुरे-शकुन दिखने लगे। चूहे रात को घरों में सरकते दिखे, पक्षी असमय रोते, गाय-बैल अजीब-हरकत करते। ज्योतिषियों ने गणना की, “बारह-दिनों में कोई बड़ी-घटना होने वाली है।”
श्रीकृष्ण ने देखा। उन्हें मालूम था यह क्या है। गांधारी का शाप, उद्धव से पुरानी-बात, ब्राह्मणों के अनेक-छुपे-शाप, अब सब एक-साथ फलित होने को थे।
उन्होंने सब-यादवों को सूचित किया, “हुज़ूर, चलिए प्रभास-तीर्थ। वहाँ कुछ-तपस्या-यज्ञ कीजिए, शकुनों को टालने की कोशिश।” मगर असल-में, उन्हें मालूम था यह टालना नहीं, सहना ही था।
2 · ऋषि-शाप की पुरानी-कथा, लोहे का गर्भ
यहाँ एक पुरानी-घटना याद करनी चाहिए, जो यदुवंश के भविष्य का बीज बन गई थी।
कुछ-वर्ष पहले की बात है। द्वारका में कुछ-यादव-युवक, श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के नेतृत्व में, द्वैपायन-ऋषि (व्यास), विश्वामित्र, और कण्व-ऋषि की कुटिया के सामने आ कर मज़ाक करने लगे थे। साम्ब को स्त्री-वेश में सजा कर, पेट पर एक तकिया बाँध कर, “गर्भवती-स्त्री” बना दिया। फिर ऋषियों से पूछा, “हुज़ूर, यह स्त्री गर्भवती है। आप त्रिकाल-दर्शी, बताइए, इसका पुत्र होगा या पुत्री?”
ऋषि उस मज़ाक से चिढ़ गए। उन्होंने अपनी ध्यान-दृष्टि से साम्ब का असली-रूप देखा, और बोले, “अरे यादव-कुमार, आप हमें ठग रहे हैं? ठीक है, यह बात मज़ाक की नहीं। हम कहते हैं, इसके गर्भ से एक लोहे का पीसन (मूसल) पैदा होगा, और यही मूसल यदुवंश का अंत करेगा।”
युवक डर गए। साम्ब अपनी कुटिया लौटा, सच में, कुछ-दिन बाद, पेट में सूजन-सी हुई, और एक लोहे का मूसल उगलना पड़ा। यह कैसे, यह दैव-समझ-से-परे, मगर हुआ। मूसल भारी, ख़तरनाक।
श्रीकृष्ण ने आदेश दिया, “इस मूसल को पीस कर पाउडर बनाओ, और प्रभास-तीर्थ के समुद्र में बहा दो।” यादवों ने वही किया। मूसल को पीस-पीस कर लोहे का चूर्ण बनाया, बहा दिया।
मगर शाप टला नहीं, सिर्फ़ रास्ता बदला। चूर्ण समुद्र-तट पर एक विशेष-तरह की घास (एरक-तृण) में बदल गया। यह घास साधारण-नहीं, इसकी हर एक डण्डी हाथ में आने पर मूसल-कठोरता-समान हो जाती थी।
3 · प्रभास-यात्रा, मद्य का बढ़ जाना
शकुनों के बाद यदुवंश का एक-समूह प्रभास-तीर्थ पहुँचा, श्रीकृष्ण और बलराम सहित। मगर यह तीर्थ-यात्रा साधारण हुई। यादवों ने अपने-मूल-स्वभाव से, बहुत-शराब बना ली थी। हर-ख़ेमे में मद्य-घड़े।
शाम होते-होते, सब-यादव नशे में धुत्त हो गए। पुरानी-बातें उभरने लगीं। सात्यकि, जो पाण्डव-पक्ष का सबसे-वफ़ादार था, ने नशे में कृतवर्मा को छेड़ा, “हुज़ूर, आपने कौरव-पक्ष में लड़ कर हमारे मित्रों को मारा। सौप्तिक-काण्ड में आप अश्वत्थामा के साथी थे, द्रौपदी के पाँच-पुत्रों के हत्यारे।”
कृतवर्मा ने ज़ोर से जवाब दिया, “और आपने, सात्यकि, क्या नहीं किया? आपने भूरिश्रवा को हाथ-कट-कर जब वे ध्यान में बैठे थे, मार दिया। यह कौन-सा क्षत्रिय-धर्म?”
दोनों के बीच कहा-सुनी बढ़ी। सात्यकि ने अपनी तलवार उठाई और कृतवर्मा का सिर एक-वार में काट डाला। कुछ-यादव कृतवर्मा के पक्ष में थे, कुछ सात्यकि के। दोनों-गुट भिड़ गए।
4 · एरक-तृण मूसल बनती है, सर्व-संहार
तलवारें थीं, मगर थोड़े-दूर समुद्र-तट पर बहुत-यादवों ने अपने शस्त्र पहले-छोड़ दिए थे, उत्सव-यात्रा थी। जो हाथ में आया, वही उठा लिया। और जो हाथ में आया, वह एरक-तृण की डण्डी थी।
हर डण्डी हाथ में आते ही लोहे के मूसल जैसी कठोर हो गई। अचानक हर-यादव-योद्धा के पास एक प्राकृतिक-गदा थी, बिना किसी निर्मित-शस्त्र के।
उनसे जो नर-संहार हुआ, वह कुरुक्षेत्र के संहार से कम-नहीं था। पिता ने पुत्र को मारा, भाई ने भाई को, मित्र ने मित्र को। एक-समय में पूरा बारह-कोटि का यदुवंश एक-दूसरे पर टूट पड़ा था।
श्रीकृष्ण और बलराम पास-खड़े देख रहे थे, बीच में नहीं आए। वे जानते थे कि यह दैव-निर्णय है, टाला नहीं जा सकता। श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, साम्ब, चारुदेष्ण, अनिरुद्ध-पुत्र, सब-सब-सब मारे गए। एक भी पुरुष-यादव-योद्धा नहीं बचा, बच्चे, बहुत-बूढ़े, और कुछ-स्त्रियाँ ही शेष।
5 · बलराम का देह-त्याग, शेषनाग का प्रकट होना
संहार के बाद बलराम जी एक-समुद्र-तट के पेड़ के नीचे जा कर बैठ गए। उन्होंने ध्यान-समाधि लगाई।
थोड़ी देर में, उनके मुँह से एक-विशाल-सर्प निकला, सहस्र-फणवाला। यह स्वयं शेषनाग थे, जिनके अंश-रूप बलराम थे। शेष ने अपनी फणें-फड़फड़ाई, समुद्र की ओर बढ़े, और लहरों में समा गए। बलराम की देह वहीं छूट गई, बिना-कष्ट, बिना-दर्द।
श्रीकृष्ण यह दृश्य देख रहे थे। उन्होंने एक गहरी-साँस ली। “हमारे ज्येष्ठ-भ्राता जा चुके। अब हमारी बारी।”
6 · श्रीकृष्ण का अर्जुन को संदेश, फिर वन में जाना
श्रीकृष्ण ने एक-तेज़-संदेशवाहक को अर्जुन के पास भेजा, “अर्जुन तक यह बात पहुँचाइए, द्वारका तुरंत आइए। यादवों का अंत हुआ है, द्वारका जल्द-जल्द समुद्र में डूबने वाली है। हमारे जो भी स्त्रियाँ-बच्चे शेष हैं, उन्हें बचाइए, हस्तिनापुर ले जाइए। हमारे अंतिम-वारिस वज्र (अनिरुद्ध-पुत्र) को मथुरा का राजा बनाइए।”
संदेशवाहक चल पड़ा। श्रीकृष्ण फिर अपने सारथी दारुक से बोले, “अब आप जाइए, हस्तिनापुर पाण्डवों को बताइए, हमारी समाप्ति की बात।” दारुक रोते-रोते निकले।
स्वयं श्रीकृष्ण एक-समुद्र-तट के घने-पेड़ के नीचे, समुद्र की ओर मुख करके, बैठ गए। योग-समाधि लगाई। उनकी देह बिल्कुल स्थिर हो गई, साँस धीमी-धीमी।
7 · जरा-शिकारी का बाण, श्रीकृष्ण की देह का अंत
उसी जंगल में एक-शिकारी आ निकला, जिसका नाम था जरा (अर्थ “बुढ़ापा” या “जर्जरता”)। उसकी आँखें कमज़ोर थीं, और दूर से पेड़ के नीचे एक-हलकी-हरकत दिखी, श्रीकृष्ण के पैर के अंगूठे की।
जरा ने सोचा, “वह एक-हिरण का कान है, छुपा हुआ।” उसने अपनी तीर ली, बहुत-तेज़, साधा, चलाया।
तीर सीधे श्रीकृष्ण के पैर के अंगूठे में लगा। एक छोटी-सी-घाव, मगर श्रीकृष्ण की देह का अंत-संकेत यही था। (कथा यह भी कहती है, यह तीर रामायण-काल का एक-पुराना-बदला था, जब श्रीराम ने वालि को पेड़ के पीछे से तीर मारा था, और वही वालि का ही पुनर्जन्म यह जरा शिकारी था। चक्र-पूरा।)
जरा भागा, देखा कि शिकार हिरण नहीं, मनुष्य था। डर के मारे और-पास आया, और देखा यह तो स्वयं श्रीकृष्ण हैं। जरा ने पैर पकड़ कर रोना शुरू किया, “हुज़ूर, हमने यह क्या किया? हमें क्षमा कीजिए।”
श्रीकृष्ण ने मुस्कुरा कर कहा, “जरा, आप दोषी-नहीं। यह सब-कुछ पहले से तय था, आप केवल-माध्यम थे। अब आप जाइए, अपना कर्तव्य पूरा हुआ।” फिर श्रीकृष्ण ने अपनी आँखें बंद कीं, ब्रह्म में लीन हुए।
उनकी देह वहीं छूट गई। एक-तेज प्रकाश ऊपर उठा, अंतर्धान हो गया। एक-युग समाप्त।
8 · अर्जुन का द्वारका आगमन, द्वारका का डूबना
दारुक हस्तिनापुर पहुँचा, पाण्डवों को सब-कुछ बताया। युधिष्ठिर-भीम-नकुल-सहदेव अवाक्। द्रौपदी, सुभद्रा-सब-स्त्रियाँ रोने लगीं।
अर्जुन तुरंत द्वारका के लिए निकले। पहुँच कर देखा, सब-यादव शव-रूप में बिछे पड़े थे, ख़ुद श्रीकृष्ण-बलराम भी। अर्जुन ने सबका अंतिम-संस्कार करवाया। हज़ारों चिताएँ जलीं।
श्रीकृष्ण-स्थापित द्वारका-नगरी अब समुद्र की ओर झुकती दिखाई दे रही थी। श्रीकृष्ण के अंत के साथ ही, समुद्र-देव ने अपना-वादा निभाना शुरू किया, द्वारका की भूमि जो श्रीकृष्ण को उधार दी थी, अब वापस ली जा रही थी।
अर्जुन ने जल्दी-जल्दी सब-बची-स्त्रियों, बच्चों, बूढ़ों को इकट्ठा किया। वज्र, श्रीकृष्ण के परपौत्र, को सबसे-आगे रखा। काफ़िले को हस्तिनापुर की ओर निकाला। जैसे ही सब लोग नगर से बाहर हुए, द्वारका की दीवारें ढहने लगीं, बहुत-तेज़, और समुद्र-लहरें घुस आईं। कुछ-घड़ी में पूरी-द्वारका पानी-नीचे।
9 · अर्जुन का गाण्डीव-कमज़ोर पड़ जाना, बंजारों का हमला
काफ़िला बहुत-धीमे चल रहा था। बूढ़े, बच्चे, घायल-स्त्रियाँ, अनेक-गाड़ियाँ। रास्ते में रेगिस्तान पड़ा। और वहीं पर एक-नई-विपत्ति आई।
आभीर-नाम के बंजारे (डाकू-समान, साधारण-कुलों के लोग) देख रहे थे। उन्होंने सोचा, “इतनी-स्त्रियाँ-धन-गाड़ी-वाले-काफ़िले-को लूटें।” वे टूट पड़े।
अर्जुन ने अपना गाण्डीव उठाया, बाण-वर्षा शुरू की। मगर अजीब-बात, उनके बाण कमज़ोर पड़ रहे थे। गाण्डीव खींचने में हाथ काँप रहे थे, जो हज़ारों-कौरव-योद्धाओं के सामने नहीं काँपा था। ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र, सब-दिव्य-अस्त्र, मंत्र-भूल जा रहे थे। अर्जुन कुछ नहीं कर पाए।
बंजारों ने काफ़िले के बड़े-हिस्से को लूटा। बहुत-स्त्रियाँ छीन ली गईं, बहुत-धन। केवल वज्र और कुछ-बूढ़े-स्त्रियाँ बच निकलीं, अर्जुन के बहुत-कोशिश से।
अर्जुन को आघात लगा। उनकी समूची-वीरता खोखली निकली। समझ नहीं आ रहा था क्या-हुआ।
10 · व्यास से मुलाक़ात, समय का संदेश
अर्जुन हस्तिनापुर लौटे, बहुत-कमज़ोर मन से। पहले व्यास से मिलने गए, उनके आश्रम।
“हुज़ूर, हमारा क्या हुआ? हम वही अर्जुन हैं जिनके गाण्डीव से कौरव-सेना भागती थी। आज कुछ-साधारण बंजारों से हम पराजित हो गए। यह दैव-क्या-है?”
व्यास ने मुस्कुरा कर कहा, “वत्स, यह दैव-कुछ-नहीं। यह बस-समय है। आप जिन-शक्तियों से लड़ते थे, वे श्रीकृष्ण की उपस्थिति से जुड़ी थीं। श्रीकृष्ण ने जब अपनी देह त्यागी, आपकी सब-दिव्य-शक्तियाँ भी उनके साथ चली गईं। आप अब साधारण-क्षत्रिय हैं, न अधिक, न कम।”
“आपका समय अब आ गया है। पाण्डवों का राज्य-कार्य पूरा हुआ। अब आपको हिमालय की ओर निकलना चाहिए, अंतिम-यात्रा पर।”
अर्जुन ने सिर हिलाया। हस्तिनापुर लौट कर युधिष्ठिर को सब बताया। युधिष्ठिर को भी यह समझ आ गया।
11 · मौसल-पर्व का समापन
मौसल-पर्व यहीं समाप्त। पाण्डवों का सबसे-निकट-मित्र-और-गुरु-और-भगवान्, श्रीकृष्ण, गए। उनके साथ बलराम भी। यदुवंश समाप्त। द्वारका पानी-नीचे।
हस्तिनापुर में पाण्डवों ने एक-तय-कार्य किया, परीक्षित का राज्याभिषेक। वज्र को मथुरा का राजा घोषित किया। फिर पाण्डव-दल हिमालय की ओर निकलने को तैयार हुआ। अंतिम-यात्रा।
आगे
महाप्रस्थानिक-पर्व, पाँच पाण्डव और द्रौपदी, छह-व्यक्ति, हिमालय की ओर निकलते हैं। एक-एक करके चलते-चलते गिरते हैं। केवल युधिष्ठिर और एक-श्वान (कुत्ता) शेष। और वह कुत्ता असल में बहुत-कुछ है।