पर्व 17 · महाप्रस्थानिक पर्व

महाभारत · Mahābhārata

पर्व 17 · महाप्रस्थानिक पर्व, हिमालय की अंतिम यात्रा

परीक्षित का राज्याभिषेक हुआ। पाँच पाण्डव और द्रौपदी, छह व्यक्ति, बिना मुकुट, बिना शस्त्र, बिना धन, हिमालय की ओर निकल पड़े। एक-एक करके चलते-चलते वे रास्ते में ही गिरते गए। केवल युधिष्ठिर और एक श्वान शेष। और वह श्वान कोई-साधारण-कुत्ता नहीं था।

महाप्रस्थानिक पर्व · कथा-रूप में संक्षेप · पर्व-सूची · पिछला: मौसल पर्व

1 · परीक्षित का राज्याभिषेक, वज्र की व्यवस्था

हस्तिनापुर लौट कर, अर्जुन ने व्यास की बात युधिष्ठिर को बताई। युधिष्ठिर ने सबको बुलाया, “भाइयों, हमारा समय अब आ गया है। अब हमें भी जाना है।”

द्रौपदी ने भी सहमति दी, “हमारे पतियों, हम आप पाँचों के साथ हैं। हमारे पाँच पुत्र पहले से जा चुके, माँ-पिता गए, भाई धृष्टद्युम्न गए, द्रुपद-पिता गए। हम भी इस-राज्य में अब क्यों ठहरें?”

पहले परीक्षित का राज्याभिषेक किया गया, बहुत-शान-शौकत से। परीक्षित अब लगभग सोलह-वर्ष का तरुण था, अद्भुत-कुशल। उसके चारों ओर अनुभवी-मंत्री बिठाए गए। कृपाचार्य अभी भी जीवित थे (वे चिरंजीवियों में से थे), उन्हें राज-गुरु बनाया गया।

वज्र, श्रीकृष्ण का परपौत्र, उसे मथुरा का राजा घोषित किया। यादव-स्त्रियाँ और बच्चे, जो अर्जुन बचा लाए थे, उन्हें मथुरा में बसाया गया।

2 · राज-वस्त्र उतारना, मूर्तियाँ-तज देना

एक तय-दिन, छह व्यक्ति, अपने राज-वस्त्र उतार कर, साधारण-वल्कल पहन कर, बिना-मुकुट, बिना-आभूषण, हस्तिनापुर के द्वार से बाहर निकले। पीछे-पीछे पूरा-नगर रोते-रोते देखता रहा।

पहले गंगा-तट पर पहुँचे। वहाँ अग्नि-देव प्रकट हुए। उन्होंने अर्जुन से कहा, “अर्जुन, आपका गाण्डीव-धनुष और अक्षय-तरकश हमारी ओर से ही आया था, खाण्डव-वन के समय। अब वह वापस कीजिए, क्योंकि आपका काम पूरा हुआ।” अर्जुन ने गाण्डीव और तरकश दोनों गंगा में अर्पित किए। गाण्डीव की रोशनी एक-क्षण चमकी, फिर पानी में लीन।

यह क्षण अर्जुन के लिए सबसे-गहरा-त्याग था। जिस-धनुष से वे एक-जीवन-भर पहचाने जाते थे, वह अब गया।

3 · छह की यात्रा, और एक श्वान जो जुड़ गया

छहों आगे चलते रहे। उत्तर की ओर, हिमालय की ओर। पहले मैदान, फिर पहाड़ी-तलहटी, फिर पहाड़।

एक स्थान पर, एक श्वान (कुत्ता) उनके पीछे चलने लगा। साधारण-दिखता-कुत्ता, मगर बहुत-शान्त, बहुत-शुद्ध। युधिष्ठिर को वह श्वान पसन्द आ गया। उन्होंने उसे साथ ले लिया।

सात-व्यक्ति-समान हो गए, छह-मनुष्य और एक-श्वान। यात्रा जारी रही।

4 · द्रौपदी का गिरना, युधिष्ठिर का स्पष्टीकरण

हिमालय की ऊँचाइयाँ बढ़ती गईं। हवा कम होती गई, साँस लेना कठिन होता गया। एक रास्ते पर, अचानक द्रौपदी पीछे रह गई, फिर गिर पड़ी।

भीम सबसे पहले रुके, “ज्येष्ठ, द्रौपदी गिर गई! आइए, हम उठाते हैं।”

युधिष्ठिर ने सिर हिलाया, “नहीं भीम। हम रुक नहीं सकते। यह यात्रा एक-तरफ़ा है। हम चलते रहेंगे।”

“मगर क्यों? द्रौपदी क्यों गिरी?”

“उसका एक-छुपा-दोष था। पाँच-पतियों के बीच, उसका हृदय अर्जुन की ओर अधिक झुका रहता था। पाँचों को बराबर का प्रेम न दे सकी। यह एक-छोटी-सी असमानता थी, मगर इसी-ने उसे आज रोक दिया। चलिए, अब आगे।”

भीम मन-भारी-कर के आगे चले। द्रौपदी की देह वहीं छूट गई।

5 · सहदेव, फिर नकुल का गिरना

थोड़ी-दूर और चले, तो सहदेव गिरे। फिर भीम ने पूछा, “और इनका?” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “सहदेव बहुत-ज्ञानी थे, सब-कुछ जानते थे। मगर उनके मन में एक-छुपा-अहंकार था, ‘मैं सब-जानता हूँ, मेरे बराबर कोई नहीं।’ यह अहंकार उन्हें ले डूबा।”

आगे, नकुल गिरे। “नकुल अद्भुत-सुन्दर थे, मगर उन्हें अपनी सुन्दरता पर थोड़ा-गर्व था। ‘पाँचों भाइयों में हम सबसे सुन्दर।’ यही-कारण उनका।”

दोनों की देह वहीं छूट गई, बिना-दफ़न।

6 · अर्जुन का गिरना

कुछ-और-दूर अर्जुन गिरे। यह सबसे-कठिन था, क्योंकि अर्जुन का सब-कुछ था, गाण्डीव, शक्ति, गीता का सम्मान-पाने वाले।

भीम बोले, “और इनका दोष? यह तो सबसे-शूर थे, सबसे-सत्यवान।”

युधिष्ठिर ने धीमे-से कहा, “भीम, अर्जुन ने एक बार प्रतिज्ञा की थी कि ‘हम एक-दिन में सब-कौरव-योद्धाओं को मार डालूँगा,’ मगर पूरी नहीं कर पाए। यह छोटा-सा झूठ नहीं था, मगर बड़ी-घोषणा थी जो अधूरी रही। यह दोष भी कम-नहीं था।”

“और एक बात, अर्जुन ने कई बार अन्य-योद्धाओं के बारे में अपशब्द कहे, उन्हें छोटा माना। यह छोटा-अहंकार उन्हें यहाँ रोक गया।”

अर्जुन गिरे, युधिष्ठिर रुके नहीं, आगे बढ़े। अब केवल भीम, युधिष्ठिर, और श्वान।

7 · भीम का गिरना

हिमालय और-ऊँचा होता गया। साँस लेना मुश्किल। भीम भी हाँफने लगे, फिर गिर पड़े।

गिरते-गिरते भीम ने अंतिम बार पूछा, “ज्येष्ठ, मेरा क्या दोष था?”

युधिष्ठिर ने पीछे मुड़ कर देखा, “भीम, आप एक बहुत-बड़े-खाने वाले थे। दूसरों को कितनी-भूख है, यह आप कभी-नहीं-देखते थे। आपने हमेशा अपना-पेट-पहले भरा। यही दोष आपका।”

भीम ने हाथ जोड़ कर सिर रखा, “ज्येष्ठ, आपकी बात सही।” उन्होंने आख़िरी साँस ली, देह वहीं।

अब केवल युधिष्ठिर और श्वान।

8 · इन्द्र का रथ, स्वर्ग का निमंत्रण

युधिष्ठिर अकेले-धैर्य से आगे चलते रहे, श्वान साथ-साथ। हिमालय का सबसे-ऊँचा-शिखर पास आया।

तभी एक अद्भुत-दृश्य प्रकट हुआ। आसमान से एक स्वर्णिम-रथ उतरा, चमकता हुआ, उसमें इन्द्र-देव खड़े थे, अप्सराओं के साथ।

“महाराज युधिष्ठिर, आइए, बैठिए। हम आपको स्वर्ग में लेने आए हैं। आप अकेले-शरीर सहित स्वर्ग जा सकेंगे, यह सम्मान सिर्फ़ आपका।”

युधिष्ठिर ने प्रणाम किया। फिर बोले, “हुज़ूर, हम आज्ञा-पालन करते हैं। मगर एक-शर्त, यह श्वान भी हमारे साथ जाएगा। यह हमारे साथ चला है रास्ते-भर, हम इसे यहाँ अकेला नहीं छोड़ सकते।”

इन्द्र हँसे, “महाराज, यह तो एक साधारण-कुत्ता है। स्वर्ग में कुत्तों का प्रवेश-वर्जित। आप इसे यहीं छोड़िए, चलिए।”

युधिष्ठिर ने रथ-पर-चढ़ने से मना किया। “हुज़ूर, हमने जीवन-भर एक-बात सीखी है, जो हमारी शरण में आया, उसे हम छोड़ नहीं सकते। यह कुत्ता हमारी शरण में था, यात्रा-भर। यह हमारा-संगी था। हम इसे छोड़ कर स्वर्ग नहीं जाएँगे। बल्कि अगर इसे नहीं ले-जा-सकते, तो हम यहीं रह जाएँगे।”

9 · श्वान का असली-रूप, यम-धर्म का प्रकट होना

इन्द्र ने मुस्कुरा कर पीछे की ओर देखा। उसी क्षण, श्वान की रूप बदलना शुरू हुआ। साधारण-कुत्ता की देह में एक-तेज़-चमक उठी, और उसकी जगह स्वयं यम-धर्म खड़े थे, जो असली में युधिष्ठिर के पिता थे (युधिष्ठिर यम-धर्म-पुत्र हैं)।

यम-धर्म ने आगे बढ़ कर पुत्र को गले लगाया। “वत्स, यह आपकी अंतिम-परीक्षा थी। आप जीवन-भर धर्म-स्थित रहे, मगर मरते-समय भी अगर एक-छोटी-स्वार्थ की झलक रहती, तो स्वर्ग का सम्पूर्ण-फल नहीं मिलता। आपने एक-साधारण-कुत्ते के लिए स्वर्ग ठुकरा दिया, यह सबसे-बड़ी-धर्म-साधना है। आप पाण्डव-पाँच में सच्चे-धर्म-राज हैं।”

“अब आप स्वर्ग आइए, बिना-किसी-संदेह के।”

युधिष्ठिर ने पाँव छुए। फिर इन्द्र-रथ पर चढ़े। यम-धर्म भी साथ। रथ ऊपर उठा, स्वर्ग की ओर।

10 · महाप्रस्थानिक-पर्व का समापन

महाप्रस्थानिक-पर्व यहीं समाप्त। एक-संक्षिप्त, मगर बहुत-गहरा पर्व। हर पाण्डव का एक-छुपा-दोष प्रकट हुआ, और उसी-दोष-से उनका रास्ता रुका। केवल युधिष्ठिर, जिनका जीवन-भर का धर्म लगभग-निर्दोष था, अंत तक चले।

मगर युधिष्ठिर की कथा अभी समाप्त नहीं। स्वर्ग में भी एक-अंतिम-परीक्षा बाक़ी है। और एक-दृश्य जो उनके मन को हिला देगा।

आगे

स्वर्गारोहण-पर्व, अंतिम-पर्व। युधिष्ठिर स्वर्ग पहुँचते हैं। पहले एक-चौंकाने-वाला-दृश्य देखते हैं, दुर्योधन सिंहासन पर, और पाण्डव-दल कहीं-नहीं। फिर एक नर्क-दर्शन, और अंत में सच्चाई का खुलासा, एक-समापन।

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स्रोत: महर्षि व्यास रचित मूल संस्कृत महाभारत; गीता-प्रेस संस्करण से सत्यापित। यहाँ कथा-सार है, श्लोक-दर-श्लोक नहीं।