महाभारत · Mahābhārata
पर्व 8 · कर्ण पर्व, दो दिनों का अग्नि-काण्ड
सिर्फ़ दो दिन, मगर इन्हीं दो दिनों में जीवन-भर का हिसाब चुकता हुआ। शल्य को सारथी बनाने की कर्ण की अनिवार्यता, बीच-बीच में मनोबल तोड़ने वाली टिप्पणियाँ, फिर अर्जुन-कर्ण का वह आख़िरी द्वंद्व, जिसके बीच में रथ का पहिया धरती निगल लेती है और तीन पुराने शाप एक-एक कर के सक्रिय हो जाते हैं। यह बहुत-कुछ खोने का पर्व है, दोनों पक्षों के लिए।
1 · कर्ण का सेनापति-अभिषेक, शल्य को सारथी माँगना
द्रोण के गिरने के बाद कौरव-शिविर में सन्नाटा था। दुर्योधन का हाथ-पैर ठंडा। उन्होंने कर्ण को बुलाया, “मित्र, अब आप ही हमारे एक-मात्र भरोसा हैं। सेनापति बनिए।”
कर्ण ने हाँ की, मगर एक शर्त रखी, “हुज़ूर, हमें एक सारथी चाहिए जो श्रीकृष्ण के बराबर का हो। केवल शल्य ही ऐसे हैं। हम उन्हीं को चाहते हैं।”
शल्य पाण्डव-पक्ष से रिश्ता रखते थे, मद्र-नरेश, नकुल-सहदेव के मामा। फिर भी कौरव-पक्ष में थे, दुर्योधन के आतिथ्य के कारण। मगर कर्ण के सारथी बनने में उन्हें एक अपमान-सा लगा, “हम राजा हैं, कर्ण सूत-पुत्र, हम इनके सारथी बनेंगे?”
दुर्योधन ने मीठे शब्दों से समझाया, “हुज़ूर, श्रीकृष्ण भी तो अर्जुन के सारथी बने हैं। यदि एक ब्रह्म-स्वरूप राजकुमार का सारथी बनना तो आपकी शोभा बढ़ाएगा।” शल्य मान गए, मगर अपने मन में एक चाल थी। याद कीजिए, उद्योग-पर्व में युधिष्ठिर ने उनसे एक छुपा वचन लिया था, “कर्ण के सारथी बनिए, बीच-बीच में उसका मनोबल तोड़ कर पाण्डव-पक्ष की सहायता कीजिए।”
कर्ण के पास जा कर शल्य बोले, “मित्र, हम सारथी बनेंगे, मगर एक शर्त पर। हम जब चाहें, आपसे जो चाहें कह सकेंगे, और आप क्रोध नहीं करेंगे।” कर्ण मुस्कुराए, “मंज़ूर हुज़ूर। हम आपकी हर बात सुनेंगे।”
2 · सोलहवाँ दिन, युधिष्ठिर पर कर्ण का हमला
युद्ध शुरू हुआ। कर्ण ने सीधे युधिष्ठिर पर ध्यान दिया, क्योंकि उन्हीं को बँदी बनाना दुर्योधन-की पुरानी इच्छा थी। कर्ण ने युधिष्ठिर को बुरी तरह घायल कर दिया, उनके रथ के सब घोड़े मार डाले, उनका धनुष कई बार तोड़ा।
अंत में, कर्ण ने युधिष्ठिर पर अंतिम-वार उठाया, मगर रुक गए। याद आया कुन्ती से किया वचन, “अर्जुन को छोड़ कर अन्य पाण्डवों को नहीं छुएँगे।” तलवार ज़मीन पर रखी, मुस्कुरा कर कहा, “महाराज, आप जा सकते हैं। हम आपको जीवन-दान देते हैं।”
युधिष्ठिर के लिए यह सबसे बड़ा अपमान था। हारा हुआ राजा, जीवन-दान पा कर लौटा। क्रोध से भर कर पाण्डव-शिविर पहुँचे। अर्जुन उनसे मिलने आए, और एक चीज़ कही जो ख़तरनाक थी, “महाराज, यह क्या? आप कर्ण से हार कर लौटे? आप अपनी रक्षा भी नहीं कर सकते? आपका गाण्डीव-धनुष कहाँ था?”
युधिष्ठिर बहुत आहत हुए। अर्जुन के बारे में कटु शब्दों में फूट पड़े, “आपका गाण्डीव कहाँ था? अपनी जान बचाने के लिए क्या आपसे कुछ नहीं हुआ? यह धनुष किस काम का? फेंक दीजिए इसे!”
अर्जुन के लिए यह असहनीय हो गया। अर्जुन की एक पुरानी प्रतिज्ञा थी कि “कोई भी हमें कहेगा कि गाण्डीव फेंक दो, हम उसका सिर काट देंगे।” यानी अब अपने ज्येष्ठ भाई को मारना पड़ेगा? अर्जुन ने तलवार उठाई।
श्रीकृष्ण ने बीच में आ कर रोका। “अर्जुन, ठहरिए। ज्येष्ठ को सीधा मारना अधर्म। शास्त्र-संकेत है कि ज्येष्ठ का अपमान भी एक प्रकार का वध-समान है। आप युधिष्ठिर-काका का सिर्फ़ नाम-ले कर अपमान कर दीजिए, यह आपकी प्रतिज्ञा पूरी कर देगा।”
अर्जुन ने कुछ कटु शब्द कह दिए, फिर पीछे से पैर पकड़ कर माफ़ी माँगी। युधिष्ठिर ने भी सम्भाला। दोनों भाइयों का संकट टला।
3 · भीम का दुःशासन-वध, वचन का पूरा होना
सोलहवें दिन ही एक और प्रतिज्ञा-पूर्ति हुई। द्यूत-समय याद कीजिए, भीम ने भरी सभा में संकल्प लिया था, “हम दुःशासन के सीने का रक्त पीयूँगे, और उसका रक्त ले कर द्रौपदी के बालों का जल बनाऊँगा।”
उसी दिन रण-भूमि में भीम ने दुःशासन को सामने पाया। दोनों भयानक क्रोध से एक-दूसरे पर टूटे। भीम ने अपनी गदा से दुःशासन का रथ तोड़ दिया। फिर ज़मीन पर पटक दिया। फिर अपनी प्रतिज्ञा को याद कर के, अपने दाँतों से उसकी छाती चीरी।
“देखो दुर्योधन, देखो कर्ण, देखो शकुनि!” भीम चिल्लाए। “तेरह वर्ष पहले इसी हाथ ने द्रौपदी के बाल पकड़े थे। आज हम इस छाती का रक्त पीते हैं।” भीम ने रक्त की एक चुसकी ली, मुँह भी रंगा। फिर बचा हुआ रक्त एक भगौने में भर कर ले गए।
द्रौपदी के पास पहुँचे, “देवी, आज वचन पूरा हुआ। आपके केश-जल के लिए यह रक्त।” द्रौपदी ने अपने पतियों के साथ खड़ी हो कर रक्त से अपने केश धोए। तेरह वर्षों से खुले बँधे, अब बँध गए।
यह दृश्य कुछ-कुछ अंधेरा है, मगर महाभारत की एक मूल बात कहता है, अधर्म का दण्ड बिना समय की सीमा के मिलता है, कभी भी मिल जाता है।
4 · शल्य का मनोबल-तोड़ना, कर्ण की चिढ़
उसी सोलहवें दिन से, शल्य ने अपनी असली भूमिका शुरू की। हर बार जब कर्ण कोई बढ़-चढ़ कर बात कहते, शल्य उनका मखौल उड़ाते। “कर्ण, आप अपने आप को अर्जुन से बढ़ कर समझते हैं? हम जानते हैं अर्जुन को, उसकी बराबरी कौन कर सकता है? आप तो सूत-पुत्र हैं, क्षत्रिय-कुल का बल आपमें कहाँ?”
कर्ण क्रुद्ध होते, मगर अपने वचन के कारण कुछ कहते नहीं। बीच-बीच में कुछ उत्तर देते, “हुज़ूर, हम क्षत्रिय हैं, आपको पता नहीं। हम कुन्ती के पुत्र हैं।” शल्य हँस देते, “हाँ-हाँ, हम भी राक्षस के पुत्र हैं।”
यह बातें कर्ण के दिल में चुभती रहीं। उनका मन उतरने लगा।
5 · सत्रहवाँ दिन, अंतिम-द्वंद्व का प्रारम्भ
सत्रहवें दिन की सुबह, दोनों सेनाएँ फिर तैयार। आज इतिहास के सबसे प्रतीक्षित द्वंद्वों में से एक होने वाला था, अर्जुन और कर्ण का।
दोनों के रथ बीच-मैदान पहुँचे। एक तरफ़ श्रीकृष्ण-अर्जुन, दूसरी तरफ़ शल्य-कर्ण। चारों ओर अन्य सब-योद्धा हट गए, यह एक-पर-एक का युद्ध था।
पहले बाण-विमर्श हुआ। दोनों के बाण एक-दूसरे के बाणों से टकराते, हवा में तब्दील हो जाते। यह वैसा ही था जैसे दो आँधियाँ आपस में लड़ रही हों। कई-कई घंटे यह चलता रहा।
एक मौक़े पर कर्ण ने नाग-अस्त्र चलाया। यह एक बड़ा अस्त्र था, सर्प-आकार में, जो अर्जुन के सिर का अचूक लक्ष्य रखता था। कर्ण की चाल थी, “अर्जुन का सिर ही उतार लेंगे।”
श्रीकृष्ण ने यह आते देखा। उन्होंने रथ को इतनी तेज़ी से नीचे दबा दिया कि घोड़े घुटनों तक धरती में धँस गए, और रथ का बाक़ी हिस्सा झुक गया। नाग-अस्त्र ऊपर से निकल गया, अर्जुन के मुकुट को छूते हुए, मगर सिर नहीं लगा। मुकुट उड़ गया।
नाग-अस्त्र वापस आया, उसने कर्ण से कहा, “मुझे फिर चलाइए, मैं अर्जुन का अंत कर देता हूँ।” कर्ण ने हिचक के साथ मना किया, “नहीं, क्षत्रिय एक ही अस्त्र दूसरी बार नहीं चलाता।” नाग-अस्त्र निराश हो कर लौट गया। यह नाग असल में अर्जुन के एक पुराने शत्रु-नाग का जीवित रूप था, अश्वसेन।
6 · तीन पुराने शाप, एक-एक कर के सक्रिय
कर्ण के जीवन पर तीन पुराने शाप मँडरा रहे थे। आज सब-कुछ एक साथ टूट पड़ा।
पहला शाप, परशुराम का। कर्ण ने ब्राह्मण-वेश में परशुराम से अस्त्र-शिक्षा ली थी, क्योंकि परशुराम क्षत्रियों को नहीं सिखाते थे (वे क्षत्रिय-वंश के नाश के लिए प्रतिबद्ध थे)। एक दिन परशुराम सो रहे थे, उनका सिर कर्ण की गोद में था। एक भौंरा कर्ण की जाँघ में काटने लगा, ख़ून निकलने लगा। कर्ण ने हिला नहीं, गुरु की नींद न टूटे। ख़ून परशुराम तक पहुँचा, वे जागे, “कोई ब्राह्मण इतना सह नहीं सकता। आप क्षत्रिय हैं, सच कहिए।” कर्ण ने सच कहा। परशुराम ने शाप दिया, “जब आपको ब्रह्मास्त्र की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी, उसका मंत्र भूल जाएँगे।”
दूसरा शाप, एक ब्राह्मण का। कर्ण से बचपन में एक ब्राह्मण की गाय का बच्चा अनजाने मारा गया था। उस ब्राह्मण ने शाप दिया, “जब आप युद्ध-संकट में सबसे अधिक होंगे, आपके रथ का पहिया धरती में धँस जाएगा।”
तीसरी बात, धरती-माता की। कर्ण ने एक बार धरती में दबा हुआ एक छोटी-सी गाय का जो दूध माँगा था, जो बचपन में किसी से ले लिया था, उस पर एक पुरानी प्रतिज्ञा थी। अनेक संस्करण हैं, मगर सार यह है कि धरती-माता कर्ण से कुछ रुष्ट थीं।
सत्रहवें दिन के द्वंद्व के बीच, अचानक कर्ण के रथ का पहिया धरती में धँसने लगा। रथ झुक गया। कर्ण के मन में भी एक अंधेरा छाया, उन्हें ब्रह्मास्त्र-मंत्र याद आना बंद हो गया, सोचते-सोचते भूल जाते। तीन-तीन शाप एक-साथ।
7 · “धर्म-युद्ध” की बहस, श्रीकृष्ण का कड़ा उत्तर
कर्ण ने तलवार-धनुष नीचे रखे, रथ से उतर पड़े, पहिये को हाथ से निकालने लगे। अर्जुन की ओर देख कर बोले, “अर्जुन, एक क्षण रुकिए। हम निशस्त्र हैं, पहिया निकाल रहे हैं। धर्म-युद्ध का नियम है कि निशस्त्र पर वार नहीं होता।”
अर्जुन हिचके। उनके हाथ में बाण था, मगर चलाने में संकोच। यह वही पुराना अर्जुन था, जो धर्म से कभी नहीं हटा।
श्रीकृष्ण ने तुरंत हस्तक्षेप किया। उन्होंने कर्ण की ओर देखा, फिर तीखे शब्दों में बोले, “कर्ण, अब आप धर्म की बात करते हैं? तब कहाँ था धर्म जब आपने भरी सभा में द्रौपदी को ‘वेश्या’ कहा था, उसके निर्वस्त्र होने का आदेश दिया था? तब कहाँ था धर्म जब आपने और छह अन्य महारथियों ने मिल कर सोलह-वर्षीय अभिमन्यु को घेर कर मारा, उसका धनुष पीछे से काट कर? तब कहाँ था धर्म जब आपने युधिष्ठिर का जुआ-षड्यंत्र देखा और हँसते रहे?”
“कर्ण, धर्म-युद्ध के नियम वे लोग याद करते हैं जो उन्हें सदा निभाते आए हैं। आप जैसे लोगों के मुख से ‘धर्म’ शब्द एक मखौल है। अर्जुन, बाण चलाइए।”
कर्ण ने सिर झुका लिया, चुप रहे। उनके पास इसका कोई जवाब नहीं था।
8 · अंजलिक-अस्त्र, कर्ण का अंत
अर्जुन ने अंजलिक-अस्त्र निकाला, जिसका सिर अर्ध-चन्द्र-समान, बारीक, अति-तीक्ष्ण। बाण छूटा।
कर्ण रथ-पहिये के पास खड़े थे, सिर झुकाए। बाण लगा, सिर कट कर गिर गया। एक अद्भुत-तेज प्रकाश शरीर से निकल कर सूर्य-मण्डल में जा मिला, क्योंकि सूर्य ही कर्ण के असली पिता थे।
कर्ण-वध हो गया। पाण्डव-सेना में हर्ष-नाद। दुर्योधन के लिए यह आख़िरी झटका था, उनके सबसे प्रिय मित्र, सबसे बड़े आश्रय, का अंत।
कौरव-पक्ष में हाहाकार। मगर अर्जुन के मन में एक अजीब-सी रिक्तता थी, जो उन्हें समझ नहीं आ रही थी। यह कोई साधारण विजय नहीं थी।
9 · सूर्य का पीला होना, कुन्ती का छुपा शोक
उस शाम सूर्य कुछ-कुछ पीला डूबा। आसमान में एक अजीब-सी उदासी थी। हस्तिनापुर में बैठी कुन्ती ने आँखें भर लीं। उन्होंने अपने सबसे बड़े पुत्र को खोया था, मगर सब को बता नहीं सकती थीं।
उन्होंने केवल इतना कहा अपनी सखियों से, “आज एक तेजस्वी आत्मा गई। एक माँ बेसमय विधवा हुई जैसी।” लोग समझ नहीं पाए।
कौरव-शिविर में दुर्योधन रात भर रोते रहे। बार-बार कहते, “मित्र, मित्र। हमने आपको पाया था, अब खो दिया।”
10 · कर्ण की असली पहचान, बाद का खुलासा
युद्ध के बाद कुन्ती ने सच बताया कि कर्ण उनका ज्येष्ठ पुत्र था। पाण्डवों के लिए यह वज्र-समान आघात था। युधिष्ठिर ने कुन्ती को कहा, “माते, यह बात आपने पहले क्यों न बताई? हमने अपने ज्येष्ठ भ्राता को अपने ही हाथों मरने दिया। आज से किसी भी स्त्री के दिल में कोई बात छुपी नहीं रह सकेगी, यह हमारा शाप है।”
यह शाप आधा-तंग की रूप में कहा गया, क्षणिक-क्रोध में। मगर माँ-बेटे के बीच यह बात युधिष्ठिर के लिए जीवन-भर खटकती रही। उन्होंने कर्ण के लिए तर्पण किए, जैसे अपने जन्म-पिता के लिए करते।
कथा कहती है कि एक बार युधिष्ठिर ने स्वर्ग में कर्ण को दूर देखा, और दौड़ पड़े, “ज्येष्ठ भ्राता!” कर्ण ने पीछे मुड़ कर पहली बार उन्हें भाई-स्वीकार किया। यह पुनर्मिलन धरती पर नहीं था, स्वर्ग में था।
11 · कर्ण-पर्व का समापन
कर्ण-पर्व यहीं समाप्त। एक भयानक प्रतिभा का अंत, अधर्म-पक्ष में रहने के कारण। मगर अधर्म-पक्ष भी अपने भीतर एक तरह की गरिमा रखता है, मित्र-धर्म, वचन-धर्म, दान-धर्म, ये कर्ण की चमक हैं, जो ज़माने भर के अंधेरे में भी जलती रहीं।
अब आगे का सेनापति है शल्य, मगर सिर्फ़ कुछ घड़ी के लिए। फिर खुद दुर्योधन का अंत है।
आगे
शल्य-पर्व, अठारहवें दिन का युद्ध। शल्य का अल्प-सेनापति-काल। फिर दुर्योधन का सरोवर में छिप जाना, भीम के साथ गदा-युद्ध, और जाँघ-तोड़ने वाली प्रतिज्ञा का अंतिम पूरा होना। कौरव-सेना का सम्पूर्ण अंत।