पर्व 7 · द्रोण पर्व

महाभारत · Mahābhārata

पर्व 7 · द्रोण पर्व, चक्र-व्यूह से अर्ध-सत्य तक

पाँच दिन, मगर इसमें इतना कुछ है कि आँख भर आती है। एक सोलह वर्ष का अभिमन्यु एक ऐसे व्यूह में अकेला फँसता है जिसके अंदर जाना तो आता था, बाहर निकलना नहीं। चौदहवें दिन एक झूठा सूर्यास्त, सोलहवें दिन एक अर्ध-सत्य जो गुरु को पराजित कर देता है। द्रोण-पर्व सबसे दिल-तोड़ने वाला पर्व है।

द्रोण पर्व · कथा-रूप में संक्षेप · पर्व-सूची · पिछला: भीष्म पर्व

1 · द्रोणाचार्य का सेनापति-अभिषेक, दुर्योधन की चाल

दसवें दिन की रात भीष्म शर-शय्या पर थे। ग्यारहवें दिन की सुबह, कौरव-शिविर में सेनापति-चयन हुआ। कर्ण ने स्वयं नाम सुझाया, “हुज़ूर, द्रोणाचार्य से बड़ा कोई नहीं। उन्हें सेनापति बनाइए।” दुर्योधन सहमत हुए।

द्रोण का अभिषेक हुआ। फिर दुर्योधन ने एक अद्भुत बात कही, “गुरुदेव, हम आपसे एक वर माँगते हैं। आप युधिष्ठिर को जीवित बँदी बना कर हमारे सामने ले आइए।”

द्रोण चकित, “वत्स, इसका क्या लाभ? उन्हें मार ही क्यों न डालें?” दुर्योधन मुस्कुराया, “गुरुदेव, हम युधिष्ठिर को मारना नहीं चाहते। हम उनसे फिर से द्यूत खेलना चाहते हैं। हार जाएँ, तो फिर तेरह वर्ष का वनवास। तब हम बिना युद्ध के विजयी होंगे।” यह योजना बहुत ही धूर्त थी। पाण्डव-कुल का संहार करने के बजाय, उन्हें फिर से नियम-जाल में डाल देना।

द्रोण ने हाँ की, मगर एक शर्त रखी, “अर्जुन को युद्ध-भूमि से दूर ले जाना होंगे। जब तक अर्जुन पास हैं, हम युधिष्ठिर को छू भी नहीं सकते।”

2 · संशप्तकों का चालाक हमला, अर्जुन का दूर हटना

त्रिगर्त-राज सुशर्मा के पुत्र संशप्तक नाम के एक विशेष दल, “मरते दम तक लड़ने वालों” के व्रत-बद्ध, ने अर्जुन को अलग खींचने का काम लिया। उन्होंने युद्ध-भूमि के एक तरफ़ से चिल्ला कर अर्जुन को ललकारा, “आइए, हमसे लड़ कर दिखाइए।” अर्जुन ने पाण्डव-नियम के अनुसार चुनौती स्वीकार की, और उनकी ओर रथ मोड़ दिया।

उसी समय, युद्ध-भूमि के दूसरी तरफ़, द्रोण ने अपनी सेना के साथ युधिष्ठिर पर हमला बोल दिया। चक्र-व्यूह, पद्म-व्यूह, सूची-व्यूह, हर तरह की रचना। मगर पाण्डव-पक्ष में सात्यकि-धृष्टद्युम्न-भीम कोई कम न थे।

पहले दो दिन उलझा-उलझा रहा। तीसरे दिन, यानी कुल युद्ध के तेरहवें दिन, द्रोण ने एक नया व्यूह बनाया, चक्र-व्यूह।

3 · चक्र-व्यूह की बात, अभिमन्यु का संकल्प

चक्र-व्यूह सात-पर्तों का घूमता-पहिया था। पहली पर्त, दूसरी पर्त, ऐसे अंदर तक। हर पर्त के द्वार पर एक महारथी। जो अंदर जाने का तरीक़ा जानता हैं, वही जा सकता है। जो बाहर आने का तरीक़ा जानता हैं, वही आ सकता है।

पाण्डव-पक्ष में चक्र-व्यूह में जाने-आने-दोनों जानने वाला केवल अर्जुन था। और श्रीकृष्ण। मगर वे दोनों उसी समय दूर थे, संशप्तकों से उलझे हुए।

युधिष्ठिर परेशान हो गए। तब अभिमन्यु, अर्जुन और सुभद्रा का सोलह-वर्षीय पुत्र, सामने आया। “ज्येष्ठ ताया जी, हम जाने का तरीक़ा जानते हैं। बस बाहर निकलना नहीं आता।”

यहाँ एक मीठी कथा है। अभिमन्यु जब सुभद्रा के पेट में था, सुभद्रा को अर्जुन ने एक बार चक्र-व्यूह में प्रवेश का तरीक़ा सुनाया था। बच्चा माँ के पेट में सब सुन रहा था। मगर सुभद्रा को नींद आ गई, और अर्जुन ने बाहर आने का तरीक़ा अधूरा छोड़ दिया। इसलिए अभिमन्यु को अंदर जाना आता था, बाहर आना नहीं।

“हुज़ूर, हमें अंदर भेजिए। हम युधिष्ठिर-काका की रक्षा करेंगे। आप सब हमारे पीछे आइए। पाँच पाण्डव और हम छह, हम चक्र-व्यूह तोड़ देंगे।” युधिष्ठिर हिचके, मगर अंत में मान गए। यह एक गहरी ग़लती थी, क्योंकि उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए था कि “पीछे आना” इतना आसान होंगे।

4 · अभिमन्यु अकेला, सात महारथियों का घेरा

अभिमन्यु ने रथ बढ़ाया। पहली पर्त तोड़ी, दूसरी, तीसरी। चक्र-व्यूह के द्वार बंद होते जा रहे थे। पाण्डव-पक्ष पीछे से आ रहा था।

तभी जयद्रथ सामने आया। याद कीजिए, यह वही जयद्रथ था जिसने वन-पर्व में द्रौपदी का अपहरण किया था, फिर भीम ने उसके बाल काट कर पाँच चोटियाँ बनाई थीं। उसने उस अपमान के बाद शिव की तपस्या की थी, और एक वर पाया था, “एक दिन वह सभी पाण्डवों को रोक देगा, अर्जुन को छोड़ कर।” अब वह दिन था।

जयद्रथ ने भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, द्रौपदी के पाँच पुत्र, सब को चक्र-व्यूह के द्वार पर रोक लिया। उसकी शक्ति इतनी थी कि पाण्डव सेना घंटों कोशिश करती रही, मगर अंदर नहीं घुस सकी। अभिमन्यु अकेला अंदर रह गया।

अंदर अभिमन्यु ने कोहराम मचाया। अकेले उसने हज़ारों कौरव-योद्धा गिराए। दुर्योधन का पुत्र लक्ष्मण मारा गया, कई अन्य कौरव-कुमार भी। ख़ुद दुर्योधन के सामने उसकी तलवार चल रही थी।

द्रोण ने देखा कि अकेले इस लड़के से सात महारथी मिल कर भी नहीं जीत पा रहे। तब उन्होंने एक अमर्यादित आदेश दिया, “इसे एक साथ घेरो। बिना नियम। यह अकेला सोलह-वर्षीय है, मगर बहुत ख़तरनाक हो रहा है।”

सात महारथी, द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, बृहद्बल, और दुःशासन-पुत्र, सब एक साथ उस पर टूट पड़े। बच्चे पर सात बूढ़े, मगर अधर्म पर अधर्म जोड़ा गया।

5 · अभिमन्यु का बलिदान

कर्ण ने पीछे से चुपके अभिमन्यु का धनुष काट डाला। यह क्षत्रिय-धर्म-विरुद्ध था, पीछे से वार। फिर रथ का सारथी मारा गया। अभिमन्यु ने तलवार उठाई, उसका हाथ कटा। फिर ढाल। फिर रथ का एक पहिया उखाड़ कर हाथ में लिया, गदा-समान।

पहिया हाथ में, अभिमन्यु ने भी कई और कौरव-योद्धा गिराए। मगर एक सीमा थी। अंत में, दुःशासन के पुत्र (जिसका नाम परम्परा में कई जगह “लक्षण” या “दुर्मासन” मिलता है, सबसे प्रचलित “अश्व-केतु” है) ने अभिमन्यु पर गदा से प्रहार किया। पहले पैर पर, फिर पीठ पर, फिर सिर पर। अभिमन्यु गिर गया।

एक सोलह वर्ष का लड़का, अपनी पत्नी उत्तरा (विराट-राज की पुत्री) से नया-नया विवाह कर के, गर्भ में अपनी एक नई पीढ़ी छोड़ कर, अकेले सात अनुभवी महारथियों के बीच, बिना शस्त्र के, मारा गया। यह दृश्य महाभारत की सबसे दुख-भरी छवियों में से एक है।

शाम तक पाण्डव-पक्ष को कुछ पता नहीं था। अर्जुन संशप्तकों को हरा कर लौटे। पहली ही नज़र में चेहरे पढ़ लिए, “अभिमन्यु कहाँ है?”

6 · अर्जुन की प्रतिज्ञा, जयद्रथ-वध का संकल्प

अर्जुन को सब बताया गया। चक्र-व्यूह की चाल, संशप्तकों का खींचना, अभिमन्यु का अकेला फँसना, जयद्रथ का द्वार पर रुकना, अंत में सात-योद्धा-घेराव। अर्जुन की आँखें लाल हो गईं, फिर पानी बहा।

थोड़ी देर वह बस रोते रहे। फिर एक ज्वाला उठी। उन्होंने उठ कर भरी सभा में प्रतिज्ञा की, “कल सूर्यास्त से पहले हम जयद्रथ को मार डालेंगे। अगर नहीं, तो हम अग्नि में स्वयं प्रवेश कर के अपने प्राण समाप्त कर लेंगे।”

यह प्रतिज्ञा युद्ध-इतिहास में अद्वितीय थी। एक-दिन-सीमित। अगर पूरी न हो, तो प्रतिज्ञा-कर्ता का स्वयं अंत। दुर्योधन के शिविर में यह ख़बर पहुँची तो ज़बरदस्त हलचल मच गई। दुर्योधन ने कहा, “हमें जयद्रथ की रक्षा करनी है। उसे सबसे पीछे रखो, उसके पास सबसे बड़ी सुरक्षा-व्यवस्था।”

7 · चौदहवाँ दिन, श्रीकृष्ण की चालाक रणनीति

चौदहवें दिन का प्रात:काल। श्रीकृष्ण ने रात भर सोचा था। सुबह अर्जुन से बोले, “पार्थ, यह काम आसान नहीं। द्रोण ने जयद्रथ को इतनी पीछे रखा है कि उस तक पहुँचना ही असम्भव सा है। मगर हम कुछ कर सकते हैं।”

उन्होंने अर्जुन को विधिवत रथ पर बिठाया। द्रौपदी की ओर देख कर एक मुस्कान दी। फिर रथ बढ़ाया। दिन भर अर्जुन ने भयानक संहार किया। हर व्यूह तोड़ा, हर पर्त तोड़ी। सूर्य ढलने लगा, मगर जयद्रथ अभी भी दूर था, सुरक्षित।

दुर्योधन और कौरव-पक्ष ख़ुश थे। “अब बस कुछ घड़ी और रहीं। अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं कर सकेंगे। अग्नि-प्रवेश तय है।”

8 · सूर्यास्त का भ्रम, जयद्रथ का अकाल अंत

शाम होने को थी। श्रीकृष्ण को मालूम था, सीधा-सादा रास्ता नहीं चलेगा। उन्होंने अपनी योग-शक्ति से सुदर्शन-चक्र को सूर्य के सामने रख दिया। आकाश में अंधेरा छा गया, सूर्य ढल गया-सा लगा। कौरव-शिविर में हर्ष की लहर। दुर्योधन ने जयद्रथ से कहा, “अब बाहर निकलिए, चलिए, अर्जुन को मरते देखेंगे।”

जयद्रथ खुश हो कर बाहर आया, सेना-सुरक्षा के घेरे से बाहर निकल कर मध्य-स्थल में जा कर खड़ा हुआ, अर्जुन का अग्नि-प्रवेश देखने को।

उसी क्षण, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को संकेत किया, “पार्थ, अभी। जयद्रथ अब आपकी दृष्टि में है।” चक्र हटा, सूर्य फिर चमका। अर्जुन ने एक विशेष-बाण निकाला, अंजलि-कमल नामक, जिसका सिर बहुत बारीक तेज़ी से कटता है।

एक और बात याद रखनी थी। जयद्रथ के पिता ने पुरानी तपस्या से एक वर पाया था, “जो भी मेरे पुत्र का सिर ज़मीन पर गिराएगा, उसी क्षण उसका अपना सिर भी फट जाएगा।” अर्जुन को यह नहीं पता था, मगर कृष्ण को पता था।

कृष्ण ने अर्जुन को निर्देश दिया, “बाण ऐसा चलाइए कि सिर सीधे जयद्रथ के पिता की गोद में जा गिरे, जो दूर तपस्या कर रहे हैं।” अर्जुन ने वैसा ही बाण चलाया। जयद्रथ का सिर कटा, फिर हवा में उड़ा, बहुत-दूर पहुँचा, उसके पिता की समाधि-स्थली पर, सीधे उनकी गोद में।

पिता तपस्या-समाप्ति पर उठे, गोद में पुत्र का सिर देख कर चौंके, “यह क्या?”, उठ खड़े हुए, सिर लुढ़क कर ज़मीन पर गिरा। उसी क्षण पिता का सिर भी फट गया, स्वयं के वर के प्रभाव से। यह बहुत सटीक रणनीति थी।

अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हुई, और जयद्रथ-पिता-पुत्र दोनों गए।

9 · रात्रि-युद्ध, घटोत्कच का बलिदान

चौदहवें दिन का अंत हुआ, मगर दुर्योधन ने रात में भी युद्ध जारी रखने का आदेश दिया, ताकि अर्जुन को आराम न मिले। यह नियम-विरुद्ध था, मगर अब नियम बहुत कमज़ोर हो चुके थे।

रात में राक्षसों का बल बढ़ जाता है। यह घटोत्कच के लिए एक स्वर्णिम अवसर था। घटोत्कच भीम और हिडिम्बा का पुत्र, माया का स्वामी, उसने कौरव-सेना पर ज़बरदस्त हमला बोला। एक अकेले घटोत्कच के माया-राक्षस-दल ने हज़ारों कौरव-योद्धा गिराए। दुर्योधन के मरने का संकट हो गया।

तब कर्ण को सामने आना पड़ा। मगर घटोत्कच पर साधारण-अस्त्र काम नहीं कर रहे थे। एक ही उपाय बचा, इन्द्र की वासवी-शक्ति। याद कीजिए, यह वही अस्त्र था जो इन्द्र ने कर्ण को कवच-कुण्डल के बदले में दिया था, एक बार चलाने के लिए। कर्ण ने इसे अर्जुन-वध के लिए बचा रखा था।

मगर अब घटोत्कच को रोकने के लिए कोई और रास्ता नहीं था। कर्ण ने भारी मन से वासवी-शक्ति चलाई। घटोत्कच को लगी, मगर मरते-मरते उसने अपनी देह विशाल कर ली, और गिरते समय अपने नीचे हज़ारों कौरव-सैनिकों को कुचल कर मार डाला। यह उसका अंतिम योगदान था।

पाण्डव-शिविर में रोना मच गया, घटोत्कच मारा गया। मगर श्रीकृष्ण नाच उठे। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा, “महाराज, यह ख़ुशी की बात है। आज कर्ण ने अपनी वासवी-शक्ति घटोत्कच पर ख़र्च की। अब अर्जुन सुरक्षित है। घटोत्कच ने अपने प्राण से अर्जुन के प्राण बचाए।” इस गहरी बात ने सबको चुप करा दिया।

10 · पन्द्रहवाँ दिन, द्रोण का अजेय बल

रात-भर का युद्ध समाप्त, पन्द्रहवाँ दिन शुरू हुआ। अब द्रोण और भी क्रोधित थे। उन्होंने ब्रह्मास्त्र-समान दिव्य-अस्त्र चलाने शुरू किए। पाण्डव-सेना का बहुत-बड़ा हिस्सा सूख-सा गया, जलने लगा।

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, “महाराज, यह अब साधारण-युद्ध से नहीं रुकेंगे। एक उपाय है। द्रोण को सच के माध्यम से रोकना होंगे।” युधिष्ठिर चौंके, “श्रीकृष्ण, हम झूठ नहीं बोलते। यह आप जानते हैं।”

“महाराज, झूठ नहीं। अर्ध-सत्य। द्रोण को बस यह सुनना है कि उनके पुत्र अश्वत्थामा का अंत हो गया। शोक में वे शस्त्र छोड़ देंगे। फिर हमारा रास्ता खुलेगा।”

“मगर अश्वत्थामा तो जीवित है। हम कैसे कहें?”

श्रीकृष्ण ने धीमे-धीमे अपनी योजना समझाई।

11 · अश्वत्थामा-हाथी की मृत्यु, “हतः, नरो वा कुञ्जरो वा”

पाण्डव-सेना में एक अश्वत्थामा नाम का हाथी था (कौरव-सेना में अश्वत्थामा एक मनुष्य, यानी द्रोण-पुत्र)। श्रीकृष्ण ने भीम से कहा, “उस हाथी को मार डालिए, फिर ज़ोर से चिल्ला कर कहिए, ‘अश्वत्थामा हतः!’”

भीम ने वही किया। एक गदा से हाथी को मार दिया, फिर युद्ध-भूमि में चिल्ला कर सब को सुना कर कहा, “अश्वत्थामा हतः! अश्वत्थामा हतः!” यानी “अश्वत्थामा मारा गया।”

द्रोण के कानों तक बात पहुँची। एक ओर शोक, दूसरी ओर संदेह। उन्होंने सोचा, “भीम तो हमेशा बढ़-चढ़ कर बोलते हैं, यह सच नहीं हो सकता। मगर युधिष्ठिर कभी झूठ नहीं बोलते। उन्हीं से पुष्टि करूँगा।”

द्रोण ने युधिष्ठिर का रथ देखा, उनसे पूछा, “वत्स युधिष्ठिर, क्या हमारा अश्वत्थामा सचमुच मारा गया है?”

युधिष्ठिर रथ पर खड़े हुए, एक क्षण ठहरे। उनके मन में धर्म-संकट था। उन्होंने धीरे से कहा, “अश्वत्थामा हतः, नरो वा कुञ्जरो वा।” यानी “अश्वत्थामा मारा गया, मनुष्य हो या हाथी।”

श्रीकृष्ण ने उसी क्षण अपना पाञ्चजन्य शंख फूँक दिया। शंख की गरज में “नरो वा कुञ्जरो वा” वाला हिस्सा दब गया। द्रोण ने केवल “अश्वत्थामा हतः” सुना। उनका धनुष हाथ से छूट गया, रथ पर बैठ गए, ध्यानमुद्रा में चले गए, शोक से समाधि-स्थ-से।

(कथा यह भी कहती है कि उसी क्षण युधिष्ठिर का रथ, जो हमेशा ज़मीन से चार उँगली ऊपर चलता था अपनी सत्यवादिता से, ज़मीन पर उतर आया। यह उनकी इकलौती असत्य-सम्बद्ध बात का प्रतीक था।)

12 · द्रोण का अंत, धृष्टद्युम्न का जन्म-धर्म पूरा

द्रोण ध्यान में थे। निशस्त्र, अहिंसक। उसी क्षण धृष्टद्युम्न आगे बढ़ा। याद कीजिए, द्रुपद ने यज्ञ कर के दो संतानें माँगी थीं, धृष्टद्युम्न (जो द्रोण का वध करेगा) और कृष्णा (द्रौपदी)। धृष्टद्युम्न का जन्म ही द्रोण-वध के लिए हुआ था।

धृष्टद्युम्न ने अपनी तलवार उठाई, रथ पर चढ़ कर द्रोण के पास पहुँचा। अर्जुन और अन्य पाण्डव चिल्लाए, “रुकिए! वे निशस्त्र हैं, ध्यान में हैं। यह क्षत्रिय-धर्म नहीं।” मगर धृष्टद्युम्न नहीं रुका। उसने द्रोण के बाल पकड़ कर सिर काट डाला, फिर सिर को युद्ध-भूमि में फेंक दिया।

यह सब-कुछ अधर्म पर अधर्म था। एक अर्ध-सत्य, एक निशस्त्र-वध, एक गुरु की हत्या। मगर श्रीकृष्ण कहते हैं, “धर्म-युद्ध में जब अधर्म ज़्यादा हो जाता है, तो धर्म-पक्ष को भी कुछ-कुछ अधर्म करना पड़ता है। यह क्षण-आपात-धर्म है।”

द्रोण मारे गए। कौरव-सेना में हाहाकार।

13 · अश्वत्थामा का क्रोध, नारायणास्त्र का प्रहार

अश्वत्थामा को जब अपने पिता की मृत्यु की ख़बर मिली, और मरने का तरीक़ा भी, वह बेसुध हो गया। पहले रोया, फिर क्रोध-ज्वाला बन गया।

उसने अपने पिता से सीखा हुआ एक भयानक अस्त्र चलाया, नारायणास्त्र। यह अस्त्र पाण्डव-सेना पर बाण-वर्षा करने लगा, हज़ारों-हज़ारों बाण, हर तरफ़ से। श्रीकृष्ण ने तुरंत समझा, बोले, “सब लोग अपने शस्त्र फेंक दीजिए, रथ से उतर जाइए, भूमि पर लेट जाइए। यह अस्त्र अहंकार पर हमला करता है। जो विनीत है, उस पर असर नहीं होंगे।”

सब पाण्डव शस्त्र फेंक कर लेट गए। केवल भीम ने एक बार ज़िद की, “हम नहीं लेटेंगे।” उन पर अस्त्र का असर शुरू हुआ। श्रीकृष्ण और अर्जुन ने उन्हें ज़बरदस्ती नीचे खींच लिया। अस्त्र बेअसर हो गया।

अश्वत्थामा ने एक और अस्त्र, आग्नेय-अस्त्र, चलाया। अर्जुन ने प्रति-अस्त्र, वारुण-अस्त्र, चला कर उसे शान्त किया। यह दिन यहीं समाप्त।

14 · द्रोण-पर्व का समापन

द्रोण-पर्व यहीं समाप्त। पाँच दिन, पन्द्रहवें दिन तक। दो प्रिय आत्माएँ खोईं, अभिमन्यु और द्रोण। दोनों पक्ष की नैतिकता पर अमिट दाग़।

आगे का सेनापति है कर्ण। मगर वह सिर्फ़ दो दिन। उसके बाद शल्य, फिर अश्वत्थामा। युद्ध अब अपने अंतिम-दौर में है। कौरव-सेना तेज़ी से सिकुड़ रही है, मगर पाण्डव-पक्ष में भी बहुत-कुछ चला गया।

आगे

कर्ण-पर्व, कर्ण के सेनापति-काल के दो दिन। शल्य उनके सारथी बने, और अपने पुराने वचन के अनुसार बीच-बीच में कर्ण का मनोबल तोड़ते रहे। अंत में अर्जुन-कर्ण का वह द्वंद्व जिसकी प्रतीक्षा कई वर्षों से थी। रथ का पहिया धरती में धँसना, कर्ण का अंत।

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स्रोत: महर्षि व्यास रचित मूल संस्कृत महाभारत; गीता-प्रेस संस्करण से सत्यापित। यहाँ कथा-सार है, श्लोक-दर-श्लोक नहीं।