महाभारत · Mahābhārata
पर्व 6 · भीष्म पर्व, युद्ध का पहला दौर, गीता-प्रकाश और पितामह का गिरना
शंख बजते हैं, और एक नई इतिहास-धारा शुरू होती है। पहले ही दिन, युद्ध-भूमि के बीच, अर्जुन के मोह से वह अमर संवाद प्रकट होता है जिसे “श्रीमद्भगवद्गीता” कहा गया है। फिर दस दिन, पितामह भीष्म की तलवार-छाँव में सेना का ध्वंस। दसवें दिन शिखण्डी का परदा, अर्जुन के बाण, और भीष्म का शर-शय्या पर लेटना, अपनी मृत्यु को अपने वश में रखते हुए।
1 · संजय की दिव्य-दृष्टि, धृतराष्ट्र का प्रश्न
व्यास जी ने धृतराष्ट्र को एक अनूठा वर देने का प्रस्ताव रखा था। “महाराज, क्या आप युद्ध स्वयं देखना चाहते हैं? हम आपको दिव्य-दृष्टि दे सकते हैं।” मगर धृतराष्ट्र ने ही मना कर दिया, “नहीं, हुज़ूर। हमने ज़िन्दगी भर अंधेरा देखा है। अब अपने पुत्रों का मरना अपनी आँखों से देखना हमसे नहीं होंगे।”
व्यास ने तब अपने सूत संजय को यह वरदान दिया। “आप जो भी कुरुक्षेत्र में हैं रहा है, सब अपने स्थान पर बैठे-बैठे देख सकेंगे, सुन सकेंगे। हर वार, हर शब्द, हर आँसू, सब आप तक पहुँचेगा। और अंत में, जब महाराज पूछें, तब आप उन्हें बता सकेंगे।”
इसी व्यवस्था से पूरा महाभारत हम तक पहुँचा है। धृतराष्ट्र अपने महल में बैठे थे, बग़ल में संजय, और बाहर युद्ध-भूमि में पच्चीस लाख से ऊपर लोग एक-दूसरे का सामना कर रहे थे।
2 · युधिष्ठिर का अद्भुत क़दम, बड़ों से आशीर्वाद माँगना
युद्ध शुरू होने ही वाला था। दोनों सेनाएँ ऐसे आमने-सामने जैसे दो विशाल समुद्र। शंख बजने को थे। तभी युधिष्ठिर ने एक अनहोनी की। बिना कवच, बिना शस्त्र, अपना मुकुट उतार कर, सीधे कौरव-सेना की ओर पैदल चल पड़े।
पाण्डव-पक्ष में चकित स्तब्धता। भीम बोले, “ज्येष्ठ, आप अकेले क्या कर रहे हैं? वे आपको मार डालेंगे।” अर्जुन ने रोकना चाहा। मगर कृष्ण मुस्कुराए, “रहने दीजिए। महाराज जानते हैं क्या करना है।”
युधिष्ठिर सीधे पितामह भीष्म के सामने पहुँचे। प्रणाम किया, “हुज़ूर, आपका आशीर्वाद चाहिए। हम आपसे कैसे लड़ें? आप हमारे पितामह हैं।”
भीष्म की आँखें भर आईं। “वत्स, धर्म से जो प्रश्न आप पूछ रहे हैं, उसका उत्तर यही है कि अधर्म के विरुद्ध युद्ध करना धर्म है। हम कौरव-पक्ष में हैं, यह मजबूरी है, हम हस्तिनापुर का अन्न खाते हैं। मगर हमारी इच्छा यही है कि आप जीतें। अब हमारा वध कैसे होंगे, यह भी एक बात है। हम स्त्री या पूर्व-स्त्री पर शस्त्र नहीं उठाएँगे, यह हमारा व्रत है। यहाँ शिखण्डी हैं, जो पूर्व-जन्म में स्त्री थीं। इसका लाभ उठाइए।”
युधिष्ठिर ने वही बात द्रोणाचार्य से पूछी। द्रोण बोले, “वत्स, हमारा वध तब होंगे जब हम शस्त्र छोड़ देंगे। और शस्त्र हम तभी छोड़ेंगे, जब कोई बहुत-ही-तगड़ी झूठ-बात हमारे कानों तक पहुँचे, जिसे हम सच मान लें।”
कृपाचार्य ने कहा, “हम अमर वरदान वाले हैं, हम तो लड़ते रहेंगे, मरेंगे नहीं।” शल्य ने आँख से इशारा कर के युधिष्ठिर को वही पुराना वचन याद दिलाया, कि कर्ण के सारथी बन कर उसका मनोबल तोड़ेंगे।
युधिष्ठिर पाण्डव-पक्ष में लौटे। यह क्षण महाभारत की एक सबसे ऊँची नैतिक चमक है, युद्ध से पहले शत्रु के बीच जा कर आशीर्वाद और मार्ग-दर्शन माँगना, बिना डर के।
3 · अर्जुन का विषाद, श्रीकृष्ण का गीता-उपदेश
शंख बजे। दोनों सेनाएँ एक-दूसरे की ओर बढ़ने को तैयार। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से रथ बीच में ले चलने को कहा, “हुज़ूर, ज़रा एक नज़र हम पर भी डालिए कि किनसे लड़ना है।”
कृष्ण रथ बीच में ले गए। अर्जुन ने देखा, सामने पितामह भीष्म, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, अपने ही चचेरे भाई। एक-एक चेहरा परिचित। उनके हाथ काँपने लगे, धनुष गिरने लगा, मन में मोह उमड़ पड़ा। “हम इन सबको मार कर क्या पाएँगे? यह स्वर्ग भी हमें नहीं चाहिए। हम युद्ध नहीं करेंगे।”
श्रीकृष्ण ने धीमे से रथ रोका। फिर शुरू हुआ वह संवाद जो आज भी जारी है, जो आज भी हर साधक के दिल में चलता है। यही श्रीमद्भगवद्गीता है, अठारह अध्याय, सात-सौ श्लोक। आत्म-तत्त्व, कर्म-योग, ज्ञान-योग, भक्ति-योग, सब-कुछ। अर्जुन के मोह से लेकर “करिष्ये वचनं तव” (आपकी आज्ञा मानेंगे) तक का सफ़र।
(पूरी गीता हमारे साइट पर अलग प्रकाशित है, यहाँ पढ़िए। इस पर्व में हम युद्ध के अन्य पहलुओं पर ध्यान देंगे।)
गीता के बाद अर्जुन ने अपना गाण्डीव उठाया, “हे माधव, हमारा मोह मिट चुका है। हम लड़ने को तैयार हैं।” युद्ध-घोष हुए, और पहला बाण चला।
4 · पहला दिन, भीष्म की तलवार
पहले दिन के युद्ध में एक तरफ़ भीष्म चले, दूसरी तरफ़ धृष्टद्युम्न। मगर भीष्म जैसा कोई नहीं था। उन्होंने पाण्डव-सेना में एक ऐसा तूफ़ान मचा दिया कि उस दिन के अंत तक दस-हज़ार से ऊपर पाण्डव-योद्धा गिर चुके थे। उत्तर-कुमार (विराट-राज का पुत्र, जो विराट-पर्व में बृहन्नला का सारथी बना था) उसी दिन शल्य के हाथों मारा गया। श्वेत नाम का पाण्डव-सेनापति भी।
पाण्डव-शिविर में रात उतरी, मगर कोई सोया नहीं। युधिष्ठिर का चेहरा उतरा हुआ था। “श्रीकृष्ण, पहले ही दिन इतना नुक़सान। अगर ऐसा ही चलता रहा, हम हार जाएँगे।” कृष्ण शान्त थे, “महाराज, धैर्य। यह तो शुरुआत है।”
5 · दूसरा-तीसरा-चौथा दिन, भीष्म का प्रचण्ड वेग
अगले कई दिन भीष्म ने युद्ध-भूमि पर अपना एक-छत्र राज्य रखा। उनकी विद्या, उनका वेग, उनकी बाण-वर्षा, सब अलौकिक थी। हर रोज़ पाण्डव-सेना में ख़ालीपन बढ़ता जा रहा था।
एक बार तीसरे दिन, जब कौरव-सेना ने गरुड़-व्यूह बनाया (गरुड़-पक्षी के आकार में), तो भीम और सात्यकि ने मिल कर ख़ूब कोहराम मचाया। दुर्योधन को धमका कर भीष्म के पास भेजा गया, “हुज़ूर, आप पूरी ताक़त से नहीं लड़ रहे। हम पर एहसान कर रहे हैं।” भीष्म को बहुत दुख हुआ, मगर अगले दिन उन्होंने अपनी सेना को नया उत्साह दिया।
6 · श्रीकृष्ण का प्रथम क्रोध, चक्र-उठाने को तैयार
एक दिन, कथा का अनुमान है कि तीसरा या चौथा दिन, भीष्म ने अर्जुन और कृष्ण के रथ पर इतनी भीषण बाण-वर्षा की कि अर्जुन के बाण कम लगने लगे, अर्जुन की आँखें भर आईं। कृष्ण से नहीं देखा गया। उन्होंने वचन भूल कर रथ से छलाँग लगाई, अपने सुदर्शन-चक्र को मानसिक रूप से बुलाया, और भीष्म की ओर दौड़े।
भीष्म ने अपनी धनुष-डोरी ढीली कर दी, हाथ जोड़ लिए। बोले, “आइए, माधव। आप ही मेरे प्रिय हैं। आपके हाथों मरना मेरे लिए सौभाग्य है।” भीष्म ने धनुष नीचे रख दिया।
अर्जुन रथ से कूद पड़े, कृष्ण के पैर पकड़े। “हुज़ूर, क्या कर रहे हैं? आपने वचन दिया था कि शस्त्र नहीं उठाएँगे। आपके वचन पर हमारी प्रतिज्ञा है। ठहरिए, रुकिए।” कृष्ण का क्रोध शान्त हुआ, चक्र वापस गया, वे रथ पर लौटे। यह दृश्य लाखों योद्धाओं के सामने हुआ, और सबने एक नई बात देखी, कृष्ण भले ही शस्त्र न उठाएँ, मगर अपनी प्रिय-जन के लिए वचन भी तोड़ सकते हैं।
(कुछ कथाओं में यह घटना दो बार होती है, एक बार तीसरे दिन और एक बार नौवें दिन। दोनों घटनाओं में पैटर्न समान, अर्जुन की मंद-गति, कृष्ण का क्रोध, फिर अर्जुन का रोकना।)
7 · इरावान की हत्या, घटोत्कच की तबाही
आठवें दिन एक अनूठी घटना हुई। अर्जुन के एक पुत्र थे इरावान, जो उलूपी नाग-कन्या से पैदा हुए थे। उलूपी ने अर्जुन के तीर्थ-यात्रा-काल में उन्हें कुछ समय अपने पास रखा था (इस की कथा आदि-पर्व में है)। इरावान ने अपनी माँ-नाग-वंश की सेना ले कर पाण्डव-पक्ष में लड़ाई में हिस्सा लिया।
आठवें दिन इरावान ने कौरव-पक्ष के छह शकुनि-पुत्रों को मार डाला। यह दुर्योधन को बहुत खटका। उन्होंने अलंबुष नामक एक राक्षस को छोड़ा, जो माया का स्वामी था। इरावान और अलंबुष का भीषण द्वंद्व हुआ, अंत में अलंबुष ने माया से इरावान का सिर काट लिया।
घटोत्कच, भीम और हिडिम्बा का पुत्र, यह ख़बर सुन कर भयानक क्रोध में आया। उसने रात के समय कौरव-सेना पर हमला किया, राक्षस-शक्ति से। पूरी रात तबाही मचाई। दुर्योधन का जीवन-संकट हो गया, अंत में भीष्म को आना पड़ा। घटोत्कच पीछे हट गया, मगर कौरव-सेना का काफ़ी नुक़सान हो चुका था।
8 · शिखण्डी की कथा, अम्बा का बदला
नौवें दिन तक पाण्डव-शिविर में चिंता बढ़ चुकी थी। भीष्म रुकते ही नहीं थे। श्रीकृष्ण ने आख़िर एक रास्ता बताया, “अब शिखण्डी का प्रयोग करना होंगे।”
शिखण्डी कौन था? यहाँ पुरानी कथा है। आदि-पर्व में याद कीजिए, भीष्म ने तीन कन्याओं का काशी से अपहरण किया था, अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका। अम्बा का प्रेम पहले से शाल्व से था। भीष्म ने उसे लौटाया, मगर शाल्व ने उसे न लिया। अम्बा ने अपने अपमान का बदला लेने का संकल्प किया, भीष्म से। तपस्या की, शिव से वर पाया, “अगले जन्म में आप ही भीष्म-वध का कारण बनेंगी।” फिर शिव-आज्ञा से अपने आप को अग्नि में डाल कर, द्रुपद के यहाँ कन्या-रूप में पैदा हुई।
द्रुपद ने पुत्र की कामना थी, इसलिए उस कन्या को पुत्र-रूप में पाला। बाद में, एक यक्ष से लिंग-बदलवा कर, शिखण्डी पुरुष बने। मगर भीष्म जानते थे कि वह पूर्व-जन्म में स्त्री थीं, और इसी कारण भीष्म-व्रत के अनुसार उन पर शस्त्र नहीं उठाएँगे।
अर्जुन को शिखण्डी के पीछे छिप कर लड़ने का सुझाव दिया गया। मगर अर्जुन हिचके, “हुज़ूर, यह अनुचित है। शिखण्डी का परदा बना कर हम अपने पितामह को मारेंगे? यह क्षत्रिय-धर्म नहीं।” कृष्ण समझाते रहे, “अर्जुन, यह भीष्म की ही इच्छा है। उन्होंने ही युधिष्ठिर को बताया था। यह यह उनका अंतिम-दान है।” अंत में अर्जुन मान गए।
9 · दसवाँ दिन, पितामह का गिरना
दसवें दिन का प्रात:काल। पाण्डव-सेना के अग्र-पंक्ति में शिखण्डी आगे, उनके पीछे अर्जुन, उनके पीछे अन्य रथ-योद्धा।
शिखण्डी ने भीष्म पर बाण चलाने शुरू किए। भीष्म ने अपना धनुष नीचे रख दिया, मुस्कुराए, सिर हिलाया। यह उनके वचन का पालन था। उन्होंने स्वयं ही जान दिया।
शिखण्डी के पीछे से अर्जुन ने अपने बाण चलाए। बाण-दर-बाण, भीष्म के शरीर में लगते गए। उनका कवच पहले ही तोड़ चुका था, अब हर अंग में बाण थे। फिर भी वे रथ पर खड़े रहे, बाण-वर्षा सहते रहे।
अंत में, इतने बाण लगे कि एक भी इंच ख़ाली नहीं बची। भीष्म रथ से गिरे, मगर ज़मीन तक नहीं पहुँचे, क्योंकि बाण-शय्या ने उन्हें थाम लिया। उनका सिर ज़रा झुका हुआ था, सहारा नहीं था।
“वत्स अर्जुन,” भीष्म बोले, “हमें सिर के नीचे सहारा चाहिए। आप कोई तकिया दीजिए।” कौरव-पक्ष के सेवक तत्काल रेशमी तकिए ले आए। भीष्म ने मना किया। “नहीं, यह क्षत्रिय का सम्मान नहीं। अर्जुन, आप अपने बाण से तकिया बनाइए।”
अर्जुन ने तीन बाण ज़मीन में मार कर भीष्म के सिर के नीचे तकिया-समान सहारा बनाया। भीष्म प्रसन्न हुए, “अब ठीक है।”
10 · अर्जुन का गंगा-जल लाना, भीष्म का संकल्प
भीष्म ने प्यास की बात कही, “हमें जल चाहिए।” फिर सेवकों के पानी-घड़े मना कर दिए। “नहीं, यह सब बासी जल है। अर्जुन, आप ही जल दीजिए, धरती से।”
अर्जुन ने पार्जन्य-अस्त्र चलाया, धरती को बेधा, और एक अद्भुत स्रोत निकल आया, जिसका जल बिल्कुल शुद्ध, मधुर, ठंडा था। यह गंगा का ही पिता-जन्म वाला स्रोत था, क्योंकि भीष्म गंगा के पुत्र थे। माँ ही पुत्र को जल दे रही थी, अर्जुन के माध्यम से।
भीष्म ने जल पीया, फिर अपने बारे में एक बात बताई जो सबको नहीं पता थी। उनके पिता शान्तनु ने उन्हें इच्छा-मृत्यु का वर दिया था, “जब आप चाहें, तब अपनी देह त्यागें।” अब उन्होंने तय किया कि उत्तरायण आने तक देह नहीं त्यागेंगे, क्योंकि उत्तरायण में देह त्याग करना शुभ माना जाता है।
“वत्स अर्जुन, सब पाण्डव, कौरव, सब आइए। हम अभी कुछ समय यहीं रहेंगे, इसी शर-शय्या पर। जब उत्तरायण आएगा, तब हम जाएँगे। इस बीच, युद्ध जारी रहे, और बाद में, युधिष्ठिर हमसे राज-धर्म और मोक्ष-धर्म का उपदेश लेंगे।”
यह वचन शान्ति-पर्व का बीज है। भीष्म कई दिनों तक शर-शय्या पर रहेंगे, और बाद में युधिष्ठिर को विस्तृत उपदेश देंगे।
11 · कर्ण का प्रवेश, दसवें दिन के बाद
दिलचस्प बात यह कि कर्ण ने पहले दस दिनों में युद्ध में हिस्सा ही नहीं लिया था। कारण? भीष्म और कर्ण की पुरानी तकरार थी। भीष्म कर्ण को “अर्ध-रथी” मानते थे (पूर्ण-रथी से कम कोटि का योद्धा), जबकि कर्ण अपने आप को “अति-रथी” (पूर्ण-रथी से ऊँचा) मानता था। कर्ण ने प्रतिज्ञा की थी, “जब तक भीष्म सेनापति हैं, हम युद्ध में नहीं उतरेंगे।”
दसवें दिन भीष्म के गिरने के बाद, कर्ण उनसे मिलने पहुँचे। भीष्म ने उन्हें अपनी असली पहचान बताई, “कर्ण, हम आपकी असली कुल जानते हैं। आप कुन्ती के पुत्र हैं, पाण्डवों के बड़े भाई। अब भी समय है, पाण्डव-पक्ष में आ जाइए।” मगर कर्ण ने वही बात फिर कही जो कुन्ती से कही थी, “हुज़ूर, बहुत देर हो चुकी। हम दुर्योधन के पक्ष में ही रहेंगे।” भीष्म ने आशीर्वाद दिया, “तब आप वही कीजिए जो आपका धर्म कहता है। मगर अर्जुन के सामने जब आप जाएँ, सोच लीजिए कि वह आपका छोटा भाई है।”
अगले दिन से कर्ण युद्ध में उतरे। मगर सेनापति वे नहीं थे, सेनापति बने द्रोणाचार्य।
12 · भीष्म-पर्व का समापन
दस दिन। एक पितामह का गिरना। एक गीता का प्रकट होना। एक अमर शर-शय्या जो अगले अनेक दिन तक एक सजीव-संग्रहालय की तरह रहेगी, हर कोई पितामह से सलाह माँगने जाएगा।
भीष्म-पर्व यहीं समाप्त। अब आगे का सेनापति है द्रोण, और द्रोण-पर्व अपने आप में बहुत-कुछ ले कर , चक्र-व्यूह, अभिमन्यु का बलिदान, जयद्रथ-वध, और अंत में गुरु-द्रोण का स्वयं गिरना, एक ज़बरदस्त अर्ध-सत्य के कारण।
आगे
द्रोण-पर्व, द्रोणाचार्य के सेनापति-काल के पाँच दिन। सबसे दिल-दहलाने वाला पर्व, अभिमन्यु का चक्र-व्यूह में फँसना, सात महारथियों का अकेले उसे घेर कर मारना। फिर अर्जुन की जयद्रथ-वध-प्रतिज्ञा। और अंत में युधिष्ठिर के “अश्वत्थामा हतः” अर्ध-सत्य का परिणाम।