पर्व 14 · अश्वमेधिक पर्व

महाभारत · Mahābhārata

पर्व 14 · अश्वमेधिक पर्व, यज्ञ-अश्व की देश-यात्रा और एक छुपा-संदेश

युधिष्ठिर की ग्लानि अभी पूरी नहीं मिटी थी। पाप-शोधन के लिए सब-कुछ चाहिए था। श्रीकृष्ण और व्यास ने अश्वमेध-यज्ञ का प्रस्ताव रखा। एक यज्ञ-अश्व छोड़ा गया, अर्जुन उसके साथ देश-यात्रा पर निकले। बीच में उन्हीं के पुत्र बभ्रुवाहन के हाथों उन्हें मरना-बचना पड़ा। यज्ञ अंत में हुआ, बहुत-धूम-धाम से, मगर एक छोटा-सा मोर-गोल्ड-नेवला आ कर सब-कुछ की पोल खोल गया।

अश्वमेधिक पर्व · कथा-रूप में संक्षेप · पर्व-सूची · पिछला: अनुशासन पर्व

1 · युधिष्ठिर की बची-हुई ग्लानि

भीष्म के देह-त्याग के बाद पाण्डव हस्तिनापुर लौटे। राज्य चल रहा था, धर्म-व्यवस्था स्थिर हो रही थी, मगर युधिष्ठिर के मन में अब भी एक काँटा था। रात-रात भर उन्हें नींद न आती। हर सुबह उठ कर वे श्रीकृष्ण के पास पहुँचते, “माधव, हमने इतना सीखा, इतना सुना, फिर भी मन शान्त नहीं होता।”

श्रीकृष्ण ने एक दिन कहा, “महाराज, आपका मन वहाँ अटका है जहाँ युद्ध के दौरान कुछ-कुछ नियम तोड़े गए। यह बोझ अब केवल एक बड़े-यज्ञ से उतरेगा। हम सलाह देते हैं, अश्वमेध कीजिए।”

व्यास जी भी आए, सहमत हुए, “वत्स, अश्वमेध-यज्ञ क्षत्रिय-राजा का अंतिम-गौरव-कर्म है। इसके फल से सब-पाप कट जाते हैं। यह कर लीजिए।”

युधिष्ठिर ने एक चिन्ता उठाई, “हुज़ूर, इस यज्ञ में बहुत-धन-स्वर्ण लगता है। हमारा कोष ख़ाली हो चुका है, युद्ध में सब-कुछ ख़र्च हो गया।”

व्यास मुस्कुराए, “इसकी चिन्ता मत कीजिए। हम जानते हैं कि उत्तर-दिशा में हिमालय की ओर एक पुराना मरुत-यज्ञ का स्थान है, जहाँ बहुत-स्वर्ण भूमि में दबा है। मरुत-राजा ने अपने यज्ञ का स्वर्ण वहीं छुपा दिया था, क्योंकि लूट-लेने वाले बहुत थे। आप जा कर वह स्वर्ण निकालिए।”

नकुल और कुछ-सैनिक उत्तर-दिशा गए, मरुत का स्वर्ण-कोष पाया, हस्तिनापुर लाए। अब अश्वमेध की तैयारी शुरू।

2 · अनुगीता, अर्जुन का दूसरा-सीखना

अश्वमेध-यज्ञ की तैयारी के बीच, अर्जुन को एक बात याद आई। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा, “हुज़ूर, युद्ध से पहले आपने हमें जो विशाल-उपदेश दिया था, गीता का सब-कुछ, वह उस समय हमारे मन में जम गया था। मगर अब, इतने वर्षों बाद, हम बहुत-कुछ भूल गए हैं। क्या आप वही उपदेश फिर से दे सकेंगे?”

श्रीकृष्ण मुस्कुराए, फिर एक खेद-भरी मुस्कान आई। “अर्जुन, उस समय हम योग-मुद्रा में थे, हम ब्रह्म-स्थित थे। वह उपदेश एक-विशेष-समय का था। हम वही शब्द-दर-शब्द दोहरा नहीं सकते, क्योंकि वह क्षण अब नहीं है। मगर हम कुछ-कुछ संबंधित-बात आपको सुनाएँगे।”

यहाँ श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिया, इसी का नाम “अनुगीता” है, यानी गीता के बाद की गीता। इसमें श्रीकृष्ण ने अनेक संवादों के माध्यम से आत्म-तत्त्व को समझाया। एक ब्राह्मण-पत्नी का संवाद, एक सिद्ध-योगी का संवाद, एक गुरु-शिष्य संवाद, सब के ज़रिए।

अनुगीता गीता की तरह प्रसिद्ध नहीं हुई, क्योंकि यह सीधे श्रीकृष्ण-मुख से नहीं थी, बल्कि उद्धरण-शैली में थी। मगर अपने आप में यह भी एक-गहरी-शिक्षा है। पाठकों के लिए यह संदेश है, हर महान-शिक्षा अपने समय में होती है, बाद में दोहराई जा सकती है मगर बिल्कुल-वही नहीं रहती।

3 · यज्ञ-अश्व का छोड़ना, अर्जुन का अनुयायी होना

अश्वमेध-यज्ञ के नियम कठोर थे। एक उत्तम-नस्ल का सफ़ेद-घोड़ा चुना गया, उसकी पूजा-संस्कार हुई। उसे एक-ख़ास-तरीक़े से चिह्नित किया गया, मस्तक पर तिलक, गर्दन में स्वर्ण-पट्टी। फिर उसे हस्तिनापुर से छोड़ा गया।

घोड़ा जहाँ चाहे जा सकता था, साल-भर। उसके पीछे एक-सेना चलती, अर्जुन उस सेना के प्रमुख। नियम यह था कि घोड़ा जिस राज्य में प्रवेश करे, उस राज्य के राजा या तो घोड़े को रोक कर अर्जुन से युद्ध करें (हार-जीत-निर्भर), या घोड़े को आगे जाने दें और यज्ञ-राजा (यानी युधिष्ठिर) को अपना श्रद्धा-कर भेजें।

अर्जुन साथ चले, मगर एक-सिद्धान्त लिए हुए, “हम किसी पर पहले-वार नहीं करेंगे। जो भी राजा हमारे रास्ते में आए, उससे पहले मित्रता का प्रस्ताव रखेंगे। मना करे, तब युद्ध।”

घोड़ा कई-राज्यों से गुज़रा। कुछ राजाओं ने तुरंत श्रद्धा दिखाई, कुछ ने रोकने की कोशिश की। अर्जुन ने हर युद्ध जीता, मगर हर-शत्रु को जीवन-दान देते रहे, क्योंकि यज्ञ-यात्रा का उद्देश्य वध नहीं था।

4 · बभ्रुवाहन से सामना, मणिपुर-राज्य का प्रवेश

घूमते-घूमते घोड़ा मणिपुर-राज्य में पहुँचा। यह एक विशेष-राज्य था। अर्जुन के एक पुत्र वहाँ राजा थे, बभ्रुवाहन। तीर्थ-यात्रा-काल में अर्जुन ने मणिपुर-राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह किया था, उन्हीं से बभ्रुवाहन। बभ्रुवाहन ने अपने पिता को कभी देखा नहीं था, क्योंकि अर्जुन ने मणिपुर तभी छोड़ दिया था जब वे लौटे।

बभ्रुवाहन ने अपने पिता के आने की ख़बर सुनी। बहुत-प्रसन्न हुए, सम्मान-स्वागत के लिए बाहर निकले। मगर एक छुपा-राज़ था। अर्जुन की एक और पत्नी, उलूपी (नाग-कन्या), जिनसे अर्जुन का एक और पुत्र इरावान था (जो भारत-युद्ध में मारा गया), वह भी इस यात्रा में थीं, और बभ्रुवाहन के पीछे-पीछे रहती थीं।

उलूपी ने बभ्रुवाहन को सलाह दी, “बेटा, आप पिता से ऐसे-स्वागत मत कीजिए। उन्होंने आपको त्याग दिया था, सालों तक ख़बर भी न ली। अगर आप क्षत्रिय-पुत्र हैं, तो उनसे युद्ध कीजिए, यह आपका कर्तव्य है।”

बभ्रुवाहन हिचके, “मगर माते, यह तो पिता-वध समान होंगे।” उलूपी ने ज़ोर दिया,धर्म पहले है।”

बभ्रुवाहन ने आख़िर अर्जुन को रोका। पहले विनम्र-प्रणाम किया, फिर युद्ध के लिए ललकारा।

5 · पिता-पुत्र युद्ध, अर्जुन का गिरना

अर्जुन को धक्का लगा। अपने ही पुत्र से युद्ध? मगर बभ्रुवाहन ने अपना रथ रोक दिया। मजबूरी में अर्जुन ने अपना गाण्डीव उठाया।

दोनों के बीच भीषण द्वंद्व हुआ। बभ्रुवाहन अद्भुत धनुर्धर था, अर्जुन का ही पुत्र, और शायद उन्हीं से बढ़ कर। उसने एक विशेष-बाण से अर्जुन को घायल किया। फिर एक और बाण से अर्जुन के सीने पर लगा, अर्जुन रथ से गिर पड़े, मूर्छा में।

बभ्रुवाहन को भी एक तीखा-बाण लगा, वह भी ज़मीन पर गिर पड़े। दोनों रथ से दूर पड़े थे।

उलूपी ने पास आ कर देखा। उसके मन में पल-भर में पछतावा भर गया, “मैंने यह क्या किया? पिता-पुत्र दोनों गिरे पड़े हैं।”

तभी उसे एक बात याद आई। उसके पास एक-अद्भुत-मणि थी, “मृत-संजीवनी-मणि।” इस मणि से किसी भी मरते-व्यक्ति को जीवित किया जा सकता था, मगर सिर्फ़ एक बार-कुल।

उलूपी ने वह मणि अर्जुन के सीने पर रखी। अर्जुन की साँस लौटी, आँखें खुलीं, उठ बैठे। फिर मणि से बभ्रुवाहन को जीवित किया।

तीनों, अर्जुन-बभ्रुवाहन-उलूपी, एक-दूसरे को गले लगा कर रोए। उलूपी ने सच बताया, “अर्जुन, हमने यह जान-बूझ कर किया। कारण यह था, आप पर एक छुपा-शाप था। आपने भीष्म-वध में शिखण्डी का प्रयोग किया था, अधर्म-समान। उस अधर्म का छुपा-दण्ड यह था कि आप अपने पुत्र से युद्ध करेंगे और हारेंगे। यह दण्ड पूरा हैं गया, अब आप मुक्त।”

अर्जुन को बात समझ आई। उन्होंने उलूपी के पाँव छुए, बभ्रुवाहन को गले लगाया, और सब-कुछ मधुर-हो गया। बभ्रुवाहन भी पिता के साथ हस्तिनापुर आने को तैयार हुए।

6 · अन्य मुठभेड़, साल-भर की यात्रा

घोड़ा फिर आगे चला। और भी कई-राज्यों से गुज़रा। कुछ ख़ास-मुठभेड़ हुईं।

एक थी सिन्धु-राज्य में, जो जयद्रथ का राज्य था। जयद्रथ तो युद्ध में मारे जा चुके थे, मगर उसकी पत्नी दुःशला (दुर्योधन की बहन) के साथ अर्जुन ने आदर से व्यवहार किया, राज्य पर अधिकार नहीं माँगा, बस मित्र-रिश्ता बनाया।

एक मुठभेड़ हुई एक तपस्वी-राजा के साथ।अर्जुन को बस इतना कहा, “हमारे राज्य में आप के पिता-पुत्र-संग्राम की ख़बर पहुँच चुकी है। हम जानते हैं आप एक-बहुत-कुछ-झेले-हुए-योद्धा हैं। आप जाइए, हमारी श्रद्धा यज्ञ-राजा को पहुँचेगी।”

साल-भर की यात्रा के बाद, अर्जुन और घोड़ा वापस हस्तिनापुर लौटे। पीछे-पीछे बहुत-से नए-मित्र-राजा, और उनके राज-कर।

7 · अश्वमेध-यज्ञ की भव्यता

हस्तिनापुर में यज्ञ-शाला सजाई गई। श्रीकृष्ण, व्यास, धौम्य, सब-ऋषि आए। सैकड़ों-ब्राह्मण, हज़ारों-अतिथि। अर्जुन ने यज्ञ-अश्व विधि-वत प्रस्तुत किया। (अश्व-मेध में घोड़ा यज्ञ में नहीं मरता, यह एक संकेत-वध है, असली-मांस-यज्ञ नहीं। शास्त्रकारों ने इसे प्रतीक-यज्ञ बताया है, बाद के काल में।)

युधिष्ठिर ने हाथ जोड़ कर सब-कुछ श्रद्धा से किया। द्रौपदी पट्टमहिषी-रूप में, सब-यज्ञ-कार्यों में पति का साथ दिया। यह दृश्य बहुत-मनमोहक था, पाण्डव-पाँच भाई एक-साथ, द्रौपदी, अब के युग में।

यज्ञ के अंत में, युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों को दान दिया। सोना-चाँदी-वस्त्र-गाय-भूमि-सब-कुछ। मरुत-कोष का पूरा-स्वर्ण इसी दान में निकल गया। साथ में दूसरे लोगों ने भी अपना दान जोड़ा।

दान-कार्यक्रम कई-दिन तक चला। हर कोई ख़ुश हुआ। यज्ञ-शाला से चलते हुए मुस्कुराहट के साथ निकले।

8 · आधा-सोने का नेवला, एक छुपा-संदेश

यज्ञ का अंतिम-दिन था। सब-कोई एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे। तभी एक अद्भुत-दृश्य हुआ। एक छोटा-नेवला यज्ञ-शाला में आया। उसकी एक तरफ़ का शरीर सोने का था, चमकता हुआ, और दूसरी तरफ़ साधारण-नेवला-रंग का।

नेवले ने यज्ञ-शाला की राख-मिट्टी पर अपने सोने-वाले शरीर के हिस्से को रगड़ा। फिर एक-दर्द-भरी आवाज़ में कहा, “हुज़ूर, हम सोचते थे आज हमारा शेष-शरीर भी सोना बन जाएगा, मगर यह नहीं हुआ। यह यज्ञ इतना-भव्य था, मगर हमारे-मन में जो-यज्ञ चल रहा था, उसकी एक-छोटी-तुलना से नहीं।”

सब-कोई हैरान। युधिष्ठिर ने पूछा, “हुज़ूर, यह क्या? आप कौन हैं?”

नेवले ने एक-कथा सुनाई।

“बहुत-समय पहले, एक अकाल पड़ा था। एक-गाँव में एक-गरीब ब्राह्मण-परिवार रहता था, पति-पत्नी और एक-बेटा-बहू। उनके पास खाने को कुछ नहीं था। एक-दिन उन्हें कहीं से थोड़ा-सा अनाज मिला। पकाया, चार-थोड़े-थोड़े हिस्से किए।”

“खाने जा रहे थे, तभी एक-भिखारी आया, ‘हुज़ूर, हमें भूख से जान जा रही है।’ ब्राह्मण ने अपना-हिस्सा दे दिया। भिखारी अभी भी भूखा था। ब्राह्मण-पत्नी ने अपना-हिस्सा दिया। फिर बेटा, फिर बहू। चारों ने अपने-अपने हिस्से दे दिए।”

“चारों भूख से मर गए। मगर उनके दान का फल इतना-बड़ा था कि उस-घर की राख चमकने लगी। हम एक-नेवला थे, उस राख में लोटे, और हमारा-शरीर एक-तरफ़ से सोने का हो गया।”

“तब से हम घूम-घूम कर हर-बड़े-यज्ञ में जाते हैं, राख में लोटते हैं, सोचते हैं कि शायद आज हमारा बचा-हुआ-शरीर भी सोने का हो जाए। मगर कहीं-नहीं हुआ। आज भी नहीं। आपके इस-भव्य-यज्ञ का दान, उस-गरीब-ब्राह्मण के एक-सेर अनाज के दान से कम है।”

यह कह कर नेवला अंतर्धान हो गया।

युधिष्ठिर सिर झुकाए बैठे रहे। श्रीकृष्ण ने हाथ रखा, “महाराज, यह एक-सीख है। बड़ा-दान देने वाले से बड़ा वह है जो अपनी-कमी से देता है। आपका यज्ञ श्रेष्ठ है, मगर परम-दान वह जो प्राण-छूते-हुए दिया जाए।” यह क्षण अश्वमेध-पर्व का सबसे-मार्मिक-संदेश है।

9 · पाण्डव-वंश की शान्ति, उत्तरा के पुत्र परीक्षित

यज्ञ समाप्त होने के बाद के वर्षों में, हस्तिनापुर में शान्ति रही। उत्तरा के पुत्र परीक्षित अब बड़े हो रहे थे, अद्भुत-बालक। युधिष्ठिर उन्हें अपनी गोद में बिठा कर शास्त्र-कथाएँ सुनाते। यह उनकी अगली-पीढ़ी थी।

श्रीकृष्ण भी समय-समय आते, द्वारका से। द्रौपदी का स्वास्थ्य कुछ-कुछ गिरता-सा था, मगर वह अभी भी सबकी देखभाल में रहती थी। अर्जुन और सुभद्रा भी साथ। यह एक शान्त-काल था, मगर यह जानते-समझते कि यह स्थायी-नहीं है।

10 · अश्वमेध-पर्व का समापन

अश्वमेधिक-पर्व यहीं समाप्त। एक पाप-शोधन-यज्ञ, एक माँसवाला-नेवला, एक छुपा-दान-संदेश। और एक नई-पीढ़ी की शुरुआत।

आगे का पर्व, आश्रमवासिक, एक शान्त-दुख-भरा पर्व है। धृतराष्ट्र, गांधारी, कुन्ती, विदुर, चार-बूढ़े, अंत में अपने-धर्म को मानते हुए वन-गमन करते हैं।

आगे

आश्रमवासिक-पर्व, बूढ़ों का वन-गमन। धृतराष्ट्र, गांधारी, कुन्ती, विदुर, सब वन में जा कर तपस्या-समाधि में लग जाते हैं। अंत में दावाग्नि से देह-त्याग, एक शुद्ध-समाप्ति।

स्थायी URL: /mahabharata/ashvamedhika-parva/

स्रोत: महर्षि व्यास रचित मूल संस्कृत महाभारत; गीता-प्रेस संस्करण से सत्यापित। यहाँ कथा-सार है, श्लोक-दर-श्लोक नहीं।