महाभारत · Mahābhārata
पर्व 15 · आश्रमवासिक पर्व, बूढ़ों का वन-गमन और एक रात की पुनर्-मिलन
पन्द्रह वर्ष की शान्ति के बाद, धृतराष्ट्र-गांधारी-कुन्ती-विदुर वन में जाते हैं। बीच में एक भीम का कटु-वाक्य उन्हें झकझोरता है। फिर एक चमत्कारी रात आती है, जब व्यास के संकल्प से कुरुक्षेत्र के सब-मारे-गए-योद्धा एक रात के लिए नदी से उठ कर आते हैं, अपने रिश्तेदारों से मिलने।
1 · पन्द्रह वर्ष की हस्तिनापुर-शान्ति
अश्वमेध-यज्ञ के बाद हस्तिनापुर में पन्द्रह-वर्ष की शान्ति रही। राज्य चला, परीक्षित बड़े हुए, युधिष्ठिर-धर्म-राज की उपाधि से शोभा पाते रहे।
धृतराष्ट्र और गांधारी राज-महल में ही रहे। अंधे-राजा अब बहुत-बूढ़े हो चुके थे, मगर इज़्ज़त-सम्मान में कोई कमी नहीं। युधिष्ठिर हर-सुबह उनके पाँव छू कर ही दिन शुरू करते। द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा सब-स्त्रियाँ गांधारी और कुन्ती की सेवा में लगी रहतीं। यह एक-आदर्श-परिवार लग रहा था, मगर अंदर एक-काँटा बाक़ी था।
विदुर भी हस्तिनापुर में थे, अब साधु-समान, बहुत-ध्यान-समाधि में, मगर समय-समय राज-सलाह में आते।
2 · भीम का कटु-वाक्य, धृतराष्ट्र का छुपा-आघात
बाहर से सब-कुछ शान्त था, मगर भीम के मन में अभी भी कुछ-कुछ जल रहा था। उन्होंने सौ-कौरव-भाइयों को अपने हाथों से मारा था, और जब-जब वे धृतराष्ट्र को सम्मान-देते-देखते, उन्हें भीतर बेचैनी होती।
एक दिन भीम अपने मित्रों के साथ बैठे थे, धृतराष्ट्र के निकट-कक्ष में। वे जोश में बोल पड़े, “हुज़ूर, हम क्या कहें? यह अंधे-राजा हमारे मेहमान बन कर हमारी-कमाई खा रहे हैं, हमारी-पकाई-रोटी, हमारा-पानी। मगर हम भूले नहीं कि इन्हीं के बेटों को हमने मार-मार के ज़मीन में दफ़न किया था। यह न्याय का दिलासा है, या ज़हर का घूँट?”
भीम सोच कर नहीं बोले थे, बस-मन-की-बात निकल गई। मगर पास के कमरे में बैठे धृतराष्ट्र ने सुन ली। उन्होंने सिर झुका लिया। आँखों से आँसू बहे। उन्होंने गांधारी से कहा, “देवी, अब हमें यहाँ नहीं रहना चाहिए। हम हस्तिनापुर के लिए अब बोझ हैं, हम लोगों के दुख की वजह हैं। चलिए, अब वन में जाएँ।”
गांधारी ने सहमति दी। उन्हें भी यह स्थिति बेचैन कर रही थी।
3 · वन-गमन की अनुमति, युधिष्ठिर का दुख
सुबह धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को बुलाया, “वत्स, हम और गांधारी अब वन में जा कर तपस्या-समाधि में रहना चाहते हैं। हम बूढ़े हो चुके, हमारा समय आ गया है। आप अनुमति दीजिए।”
युधिष्ठिर का चेहरा सूख गया। उन्हें भीम की कल वाली बात पता थी (दासियाँ बता चुकी थीं)। उन्होंने भीम को बुला कर डाँटा भी था। अब वही-बात ने यह कांड कर दिया।
युधिष्ठिर ने पाँव छुए, “हुज़ूर, माफ़ कीजिए। हमारे भीम के मुख से एक-कटु-शब्द निकला, मगर वह उनका इरादा नहीं था। आप यहीं रहिए, हम और सम्मान देंगे।”
धृतराष्ट्र मुस्कुराए, “वत्स, बात भीम के मुख से निकली, मगर उसमें सच्चाई थी। हम अब यहाँ रहने में सहज नहीं। हम जाएँगे।”
कुन्ती ने एक-निर्णय और लिया। “हम भी जाएँगे। यह स्थान अब हमारे-लिए-भी बहुत-कुछ ले कर भारी है। हम अपनी सेवा गांधारी की करेंगे, वन में।”
युधिष्ठिर ने रोकने की कोशिश की, “माते, आप क्यों? आप हमारी माँ हैं।” कुन्ती ने कहा, “हम जानते हैं कि हमारे जीवन का यह अंतिम-पड़ाव है। और हमने अपने ज्येष्ठ-पुत्र कर्ण को भी खो दिया है, उसका शोक हमें वहीं तपस्या से समाप्त करना है।”
विदुर पहले से ही समाधि-स्थ-जैसे थे, उन्होंने भी जाने का तय किया। चार-बूढ़े, धृतराष्ट्र, गांधारी, कुन्ती, विदुर, वन में जाने को तैयार।
4 · वन में डेरा, व्यास से मुलाक़ात
चारों एक-शुभ-दिन निकले। हस्तिनापुर के बहुत-नागरिक उन्हें रोते-रोते विदा करने आए। एक-तरह से यह उनका जीवित-शव-यात्रा थी, क्योंकि अब वे वापस नहीं आने वाले थे।
पहले कुरुक्षेत्र पहुँचे, जहाँ अंत में हस्तिनापुर के सब-कौरव-सेना के दाह-संस्कार हुए थे। फिर गंगा-तट के साथ-साथ चलते हुए, हिमालय की ओर निकले।
एक स्थान पर व्यास का आश्रम था। व्यास ने उन्हें स्वागत किया। “आप-सब का वन-गमन हमें मालूम था, हम प्रतीक्षा में थे।” उन्होंने एक-शान्त-कुटिया तैयार करवा रखी थी, सरस्वती-तट पर।
चारों वहीं रुक गए। तपस्या-समाधि शुरू हुई। धृतराष्ट्र अब केवल फल-कन्द खाते, गांधारी पानी पीतीं, कुन्ती सुबह-शाम सूर्य की उपासना में बैठतीं। विदुर सबसे गहरी समाधि में, बिना खाए-पिए, बस-ध्यान।
5 · पाण्डव-दल का दर्शन-यात्रा, छह-महीने बाद
छह-महीने बाद, युधिष्ठिर ने पाण्डव-दल के साथ आश्रम में बूढ़ों से मिलने की यात्रा का तय किया। द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा, छोटे परीक्षित, और कुछ-सेवक भी साथ।
आश्रम पहुँच कर देखा, सब-बूढ़े बहुत-कमज़ोर हो चुके थे, मगर चेहरे पर एक-शान्ति थी जो हस्तिनापुर में कभी नहीं थी। कुन्ती ने अपने पाँच-पुत्रों को आँखें भर कर देखा, बहुत-दिनों बाद।
द्रौपदी ने अपनी सास-सी कुन्ती के पाँव छुए, बहुत-देर सिर रखा। दोनों बिना-शब्द एक-दूसरे का दुख समझती थीं, एक की पाँच-बेटे-कुछ-दूर-थे-तो-गए, दूसरी की पाँच-पाण्डव-पुत्र-गए, और एक-छुपा-कर्ण।
शाम को व्यास आए। उन्होंने एक-बहुत-ख़ास-बात कही। “महाराज धृतराष्ट्र, आप अपने पुत्रों को एक-बार और देखना चाहते हैं?”
धृतराष्ट्र ने सिर हिलाया, “हुज़ूर, हम जानते हैं वे चले गए, फिर भी हाँ। एक बार और।”
6 · एक रात का पुनर्-मिलन, नदी से उठते हुए स्वर्गीय
व्यास ने सब को गंगा-तट पर बुलाया, रात-अर्धरात्रि के समय। चाँदनी रात थी, चुप्पी पसरी थी।
व्यास ने मंत्र-पाठ शुरू किया। बहुत-गहरा संकल्प मन में बाँधा। फिर कहा, “आइए, सब-कुरुक्षेत्र के मरे-हुए-योद्धा, एक-रात के लिए।”
गंगा से एक-धुएँ-समान-चमकती-धारा उठी। उसमें से एक-एक करके लोग प्रकट होने लगे। पहले भीष्म, फिर द्रोण, फिर कर्ण। फिर दुर्योधन और दुःशासन। फिर अभिमन्यु, घटोत्कच, द्रौपदी के पाँचों पुत्र। एक-एक करके सब। यह दृश्य हज़ारों-हज़ार लोगों का था, मगर हर एक स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
गांधारी ने पट्टा खोला, अंतिम बार। अपने सौ-पुत्रों को देखा, उनके चेहरों पर अब कोई-दुश्मनी नहीं थी। दुर्योधन ने आ कर पाँव छुए, बोले, “माते, हमें माफ़ कीजिए। हमारी ग़लती से यह सब हुआ। मगर अब हम स्वर्ग में आराम पा रहे हैं।”
कर्ण कुन्ती के पास आए। कुन्ती ने उन्हें छाती से लगा कर अब बिना-छुपाव-रो दिया, “हमारे बेटे, हम तुम्हें माँ के अधिकार से छाती से लगा रहे हैं, पहली बार, और शायद अंतिम।” कर्ण ने सिर झुका कर कहा, “माते, हम इसी रिश्ते के लिए एक-जीवन-भर तरसते रहे।”
द्रौपदी ने अपने पाँचों पुत्रों को देखा, अभिमन्यु को देखा, उत्तरा ने अपने पति अभिमन्यु को। पाँचों पाण्डवों ने अपने ज्येष्ठ-भाई कर्ण से आँख-मिलाई, अब विरोध नहीं था।
एक-रात-भर सब-कोई एक-दूसरे से मिले, गले-लगे, बात-कही, माफ़ी-माँगी, माफ़ी-दी। पुराने-घाव बहुत-कुछ शान्त हो गए। यह दृश्य महाभारत का सबसे-मार्मिक-संगम है।
सुबह होते-होते सब-स्वर्गीय आकृतियाँ फिर गंगा में समा गईं। पीछे रह गए जीवित, मगर एक-नए-शान्त-मन के साथ।
7 · पाण्डव-दल की हस्तिनापुर-वापसी
कुछ-दिन और रुक कर पाण्डव हस्तिनापुर लौटे। चारों बूढ़ों को अंतिम-नमन किया, मगर इस बार के पाँव-छूने में कोई-दुख नहीं था, एक-गहरा-स्वीकार था।
हस्तिनापुर लौट कर युधिष्ठिर ने अपने आपको पहले से अधिक स्थिर पाया। अब वह सच में राजा-स्थित थे, मन से।
8 · दावाग्नि, बूढ़ों का देह-त्याग
लगभग दो-वर्ष और बीते। एक दिन हस्तिनापुर में ख़बर पहुँची, “वन-आश्रम में एक-दावाग्नि लगी थी, बहुत-तेज़, और चारों बूढ़े उसमें समा गए।”
शुरू में युधिष्ठिर को धक्का लगा, “क्या आग में फँस कर मरना उनके लिए था?” मगर ख़बर देने वाले ने पूरा-विवरण दिया।
“हुज़ूर, यह दावाग्नि साधारण नहीं थी। चारों बूढ़े बहुत-गहरी समाधि में थे। आग आ कर लगी, सब-कोई कुटिया से भाग सकते थे, मगर वे चारों स्थिर रहे। उन्होंने स्वयं-अग्नि-समर्पण किया, यह उनकी इच्छा थी। यह ‘अग्नि-समाधि’ है, शास्त्र-संकेत-मार्ग।”
“विदुर तो पहले ही जा चुके थे, बहुत-समय पहले, समाधि-में। उनकी देह तपस्या में ही सूख गई थी, चाँद-समान।”
युधिष्ठिर सुनते-सुनते रोए, मगर उनके आँसू अब दुख के नहीं थे, एक-समझ-स्वीकार के थे। उन्होंने अंतिम-संस्कार-तर्पण की व्यवस्था की।
9 · विदुर का असली-रूप, यम-धर्म का अंश
विदुर के विषय में युधिष्ठिर को एक-छुपी-बात अब समझ आ रही थी। विदुर असल में स्वयं यम-धर्म थे, एक-शाप के कारण मनुष्य-जन्म लेने पर मजबूर हुए (एक-ऋषि ने उन्हें शाप दिया था कि एक छोटी-सी ग़लती के लिए वे शूद्र-कुल में जन्म लें)।
जब विदुर अपनी देह त्याग रहे थे, उन्होंने अपनी सब-ऊर्जा एक-योग-शक्ति से युधिष्ठिर में डाल दी। यह “योग-समावेश” था। युधिष्ठिर के अंदर पहले से ही यम-धर्म का अंश था (क्योंकि वे यम-धर्म-पुत्र थे), अब वह और-भी सबल हो गया।
श्रीकृष्ण ने यह व्यास से सुना, और युधिष्ठिर को बताया। “महाराज, आप जो धर्म-राज हैं,अब आप वस्तुतः यम-धर्म का जीवित-अवतार हैं। यह आपका सौभाग्य है, और आपका अब-वाला-कर्तव्य भी।”
10 · आश्रमवासिक-पर्व का समापन
आश्रमवासिक-पर्व यहीं समाप्त। चार-बूढ़े गए, और एक-तरह से पुराने-पीढ़ी का अंत हुआ। अब पाण्डव अकेले-शीर्ष-पीढ़ी थे, और परीक्षित नीचे-पीढ़ी।
हस्तिनापुर शान्त। श्रीकृष्ण अब भी द्वारका से समय-समय आते। मगर एक-छुपी-घंटी सब-सुन रहे थे, गांधारी का छत्तीस-वर्ष-शाप।
आगे
मौसल-पर्व, यदुवंश का अंत। द्वारका में यादवों का आपसी-कलह, गांधारी-शाप का फलित होना, समुद्र का द्वारका को निगल जाना। श्रीकृष्ण का देह-त्याग एक तुच्छ-शिकारी के बाण से।