पर्व 13 · अनुशासन पर्व

महाभारत · Mahābhārata

पर्व 13 · अनुशासन पर्व, उपदेश का अंतिम-चरण और पितामह का देह-त्याग

शान्ति-पर्व का उपदेश अभी समाप्त नहीं हुआ था, सिर्फ़ एक पड़ाव था। अनुशासन-पर्व में भीष्म का उपदेश जारी रहता है, अब और भी कई-कई विषयों पर। दान-धर्म, स्त्री-धर्म, तीर्थ-माहात्म्य, शिव-स्तुति, कृष्ण-उमा का दार्शनिक संवाद। अंत में, उत्तरायण आने पर, पितामह अपनी देह त्यागते हैं, क्षत्रिय-इतिहास का एक अध्याय बंद होता है।

अनुशासन पर्व · कथा-रूप में संक्षेप · पर्व-सूची · पिछला: शान्ति पर्व

1 · उपदेश-क्रम का जारी रहना

शान्ति-पर्व के अंत में, हमने देखा कि पितामह भीष्म ने अपना उपदेश काफ़ी-कुछ पूर्ण किया था। मगर यह बात-चीत अभी आधी ही थी। अनुशासन-पर्व उसी कथा का अगला-दौर है। (परम्परागत-कथा में दोनों पर्व एक-दूसरे में बहते हैं, और पितामह का असली-देह-त्याग इसी अनुशासन-पर्व के अंत में आता है।)

एक दिन सुबह युधिष्ठिर फिर शर-शय्या के पास आ कर बैठ गए। बोले, “पितामह, हमारे मन में कुछ और प्रश्न हैं। आप अनुमति दें, तो हम पूछें।”

भीष्म ने मुस्कुरा कर हाँ की। “वत्स, हम जब तक यहाँ हैं, बोलते रहेंगे। आप पूछिए।”

युधिष्ठिर ने पहला प्रश्न रखा, “हुज़ूर, दान-धर्म पर हमें विशेष-उपदेश दीजिए। क्या देना श्रेष्ठ है, किसे देना श्रेष्ठ है, कब देना श्रेष्ठ है। हमारे राज्य में अब बहुत-कुछ दान-देना होंगे, हम सही-तरीक़ा सीखना चाहते हैं।”

2 · दान-धर्म, देने की कला

भीष्म ने दान-धर्म पर विस्तार से बोला।

“दान कई-कई प्रकार के होते हैं। अन्न-दान, गो-दान, भूमि-दान, स्वर्ण-दान, विद्या-दान, अभय-दान। हर एक का अपना महत्व है।”

“अन्न-दान सबसे सहज और सबसे प्रभावी। भूखे को खाना देने से बढ़ कर कोई कर्म नहीं। यह दान हर-कोई कर सकता है, चाहे अमीर हो या ग़रीब।”

“गो-दान सबसे शुभ। एक गौ देने वाला सात-पीढ़ियों तक स्वर्ग-लोक का अधिकारी होता है।”

“विद्या-दान, यानी किसी को शिक्षा देना, इसका कोई प्रत्यक्ष-फल नहीं दिखता, मगर अप्रत्यक्ष-फल सब से ऊँचा। एक विद्यार्थी आगे चल कर कई और लोगों को सिखा सकता है।”

“मगर सबसे ऊँचा दान है अभय-दान। यानी किसी जीव को भयमुक्त करना, जीवन-दान देना। एक डरते हुए प्राणी को शरण देना, यह दान सबसे ऊँचा।”

“दान देने में पात्र भी देखिए। योग्य-पात्र को दान देना उत्तम। अयोग्य-पात्र को दान देना मध्यम। बुरे-काम में लगे को दान देना अधर्म।”

“देने का समय भी देखिए। संकट में जो दान दिया जाए, वह सबसे क़ीमती। साधारण-समय में भी देना अच्छा, मगर संकट-समय में सौ-गुना।”

“और सबसे ज़रूरी, देने का भाव। दान-दे कर अहंकार करने वाले का दान फलित नहीं होता। ‘हम दे रहे हैं’ यह सोचना ही दान को कमज़ोर करता है। एक भाव हो, ‘भगवान् ने हमें इतना दिया, हम कुछ-कुछ लौटा रहे हैं।’ यह भाव हो तो दान पूर्ण होता है।”

3 · स्त्री-धर्म और स्त्री-स्थिति

द्रौपदी जो पास बैठी थी, उसकी ओर देख कर युधिष्ठिर ने अगला प्रश्न पूछा, “हुज़ूर, स्त्रियों के लिए धर्म क्या है? और घर में, समाज में, स्त्री की स्थिति क्या होनी चाहिए?”

भीष्म ने धीमी आवाज़ में जवाब दिया, “वत्स, यह एक बड़ा-प्रश्न है। हमारे शास्त्रों में बहुत-कुछ कहा गया है, मगर हम आपको सार बताते हैं।”

“पहले एक बात साफ़ कर लीजिए, स्त्री और पुरुष दोनों का धर्म अंत में एक ही है, आत्म-ज्ञान। दोनों के लिए मोक्ष-मार्ग खुला है। शास्त्रों में जो कुछ अंतर-नियम हैं, वे जीवन के अलग-अलग पड़ावों में सहायक के लिए हैं, मगर अंतिम-लक्ष्य एक है।”

“गृहस्थ-स्थिति में, पति-पत्नी दोनों का धर्म एक-दूसरे का साथ देना है। एक के बिना दूसरे का धर्म अधूरा। यज्ञ-पाठ-दान, सब-कुछ पति-पत्नी मिल कर करते हैं। एक राजा अकेला राज्य नहीं चला सकता, उसी तरह।”

“स्त्री को घर में सम्मान मिलना चाहिए। शास्त्र कहता है, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः,’ यानी जहाँ स्त्रियाँ पूजी जाती हैं, वहाँ देवता रमते हैं। जहाँ स्त्री का अपमान होता है, वह घर समृद्धि से वंचित होता है।”

“और एक बात, द्रौपदी की ओर देख कर। आप जैसी स्त्रियाँ जो विपत्ति में भी धर्म पर अडिग रहती हैं, वह सारे राज्य के लिए दीपक-समान होती हैं। आपके धैर्य ने पाण्डव-कुल को बचाया है, यह सत्य है।”

द्रौपदी की आँखें भर आईं। उन्होंने पाँव छू कर आशीर्वाद लिया।

4 · तीर्थ-माहात्म्य, पवित्र-स्थलों का महत्व

युधिष्ठिर ने अगला प्रश्न रखा, “पितामह, तीर्थ-यात्रा का महत्व क्या है? हम पाण्डव वनवास-समय में बहुत-तीर्थ घूम चुके। मगर अब राज-कार्य से ख़ाली समय ही कम है। क्या तीर्थ-यात्रा फिर ज़रूरी है?”

भीष्म ने कहा, “वत्स, तीर्थ-यात्रा का महत्व एक-नहीं अनेक-कारणों से है। पहली बात, तीर्थ-स्थल पवित्र-शक्ति के केन्द्र हैं, जहाँ-जहाँ बड़े-तपस्वियों ने तपस्या की हो, या जहाँ-जहाँ कोई-कोई दैवी-घटना हुई हो। वहाँ की हवा-पानी-मिट्टी में एक स्थायी-पवित्रता रहती है।”

“दूसरी बात, तीर्थ-यात्रा एक-तरह की चलती-तपस्या है। आप घर छोड़ते हैं, अपनी सुविधा छोड़ते हैं, अजनबी-मार्ग पर चलते हैं। यह चलना ही एक साधना है।”

“तीसरी बात, तीर्थ-स्थल पर अनेक-तरह के लोग मिलते हैं, साधु-संत, ज्ञानी-तपस्वी, अलग-अलग-कुलों के यात्री। सबसे सत्संग का अवसर मिलता है।”

“मुख्य-तीर्थ काशी, गया, प्रयाग, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, गोदावरी, कावेरी, बद्रिकाश्रम। हर एक का अपना-महत्व है, अपनी-कथा है।”

“मगर एक बात याद रखिए। तीर्थ-यात्रा बाहरी है, असली-तीर्थ भीतर। अगर आपका हृदय शुद्ध है, तो आपका शरीर ही चलता-तीर्थ है। अगर हृदय अशुद्ध है, तो दुनिया भर के तीर्थ घूमने से कुछ नहीं होंगे।”

5 · कृष्ण-उमा संवाद, धर्म पर एक दार्शनिक चर्चा

एक दिन भीष्म ने एक बहुत-ख़ास कथा सुनाई, “श्रीकृष्ण और पार्वती के बीच एक संवाद।”

एक बार श्रीकृष्ण उपप्लव्य की पहाड़ियों पर तपस्या के लिए गए थे, अर्जुन के लिए शिव से पाशुपतास्त्र-समान कोई अस्त्र चाहते थे। वहाँ शिव-पार्वती मिले। पार्वती ने श्रीकृष्ण से कई-कई दार्शनिक प्रश्न पूछे।

“वासुदेव, सबसे श्रेष्ठ धर्म क्या है?” श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, “अहिंसा। मगर अहिंसा का अर्थ केवल जीव-हत्या न करना नहीं, मन-वचन-कर्म से किसी को न-दुखाना।”

“सबसे श्रेष्ठ ज्ञान?” “आत्म-ज्ञान। यह जान-लेना कि हम कौन हैं।”

“सबसे श्रेष्ठ भक्ति?” “निष्काम-भक्ति। भगवान् से कुछ माँगे बिना, सिर्फ़ प्रेम के लिए।”

“सबसे श्रेष्ठ-कर्म?” “निष्काम-कर्म। कर्म-फल की चिन्ता छोड़ कर कर्म।”

“अंतिम-सत्य क्या है?” यहाँ श्रीकृष्ण ने पार्वती की ओर मुस्कुरा कर देखा। “माते, अंतिम-सत्य वह है जो आप पहले से जानती हैं। आप ही महामाया हैं, आप ही प्रकृति, आप ही शक्ति। हम पुरुष-तत्त्व हैं, आप शक्ति-तत्त्व। दोनों मिल कर एक हैं, और यही अंतिम-सत्य।”

पार्वती-शिव दोनों प्रसन्न हुए। शिव ने श्रीकृष्ण को आशीर्वाद दिया, और अर्जुन के लिए पाशुपतास्त्र की पुष्टि की।

6 · शिव-स्तुति, सहस्र-नामों का प्रकाश

जैसे शान्ति-पर्व में विष्णु-सहस्रनाम था, वैसे ही अनुशासन-पर्व में शिव-सहस्रनाम है। भीष्म ने सब को शिव के एक-हज़ार नाम सुनाए। हर नाम एक रूप, एक गुण, एक ध्यान-केन्द्र।

श्रीकृष्ण की उपस्थिति में, यह विशेष-महत्वपूर्ण था। श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा, “पितामह, हम विष्णु-स्वरूप हैं, मगर हम भी शिव की पूजा करते हैं। शिव और विष्णु एक ही ब्रह्म के दो रूप हैं। जो हम में भेद देखता है, उसने हमें नहीं जाना।”

“यह जो शिव-सहस्रनाम है, इसका नियमित-पाठ करने वाला सब-पापों से मुक्त होता है, और शिव-कृपा से मोक्ष पाता है।”

7 · पितृ-तर्पण और श्राद्ध-विधि

अगला विषय पितृ-कार्य का था। भीष्म ने कहा, “वत्स, अब आप का राज्य है, बहुत-से पूर्वज इस युद्ध में मारे गए। उनके लिए तर्पण और श्राद्ध करना आपका कर्तव्य है।”

“तर्पण क्या है? पितरों को जल और तिल अर्पण करना। यह बहुत-सरल है, मगर इसका फल बहुत-बड़ा। हर-दिन सुबह सूर्य को अर्घ्य देते समय अपने पितरों को भी जल दीजिए। यह आपके बच्चों को भी फलित करता है, क्योंकि सात-पीढ़ी ऊपर, सात-पीढ़ी नीचे जुड़ी हुई हैं।”

“श्राद्ध साल में एक बार करना चाहिए, अपने पिता या माता के निधन-तिथि पर। अन्न-वस्त्र-दान, ब्राह्मण-भोजन, यह सब इस अवसर पर करना चाहिए।”

“और एक बात, वत्स। आपके चाचा-ताऊजी और कौरव-कुल के सब-लोग जो युद्ध में मारे गए, उनके लिए भी आप ही तर्पण करेंगे। आप ही अब इस कुल के ज्येष्ठ हैं। कर्ण के लिए भी विशेष-तर्पण करते रहिए, क्योंकि वे आपके बड़े-भाई थे।”

युधिष्ठिर ने सिर हिला कर सब-निर्देश स्वीकार किए।

8 · छोटी-छोटी कथाएँ, बीच-बीच की चमकती कड़ियाँ

भीष्म ने उपदेश के बीच-बीच कई छोटी-कथाएँ सुनाईं। हर कथा एक-न-एक नैतिक-बिन्दु को दर्शाने वाली।

एक थी “अष्टावक्र की कथा।” एक छोटे-बच्चे ने अपने पिता को अभिशाप से मुक्त किया, और मिथिला-राजा जनक से शास्त्रार्थ जीत कर अपना यश पाया। यह कथा युवा-शक्ति और गहरी-समझ की कथा है। (अष्टावक्र की पूरी गीता हमारी साइट पर अलग है।)

एक कथा थी “जाजलि और तुलाधार” की। एक तपस्वी जाजलि अपनी तपस्या पर गर्व कर रहा था, क्योंकि उसके सिर पर पक्षियों ने घोंसला बना कर बच्चे पाले थे। उन्हें एक आकाशवाणी ने कहा, “तुलाधार के पास जा कर देखिए, उसका धर्म आपसे बड़ा है।” तुलाधार एक तराज़ू-वाला बनिया था, सीधा-व्यापारी। जाजलि उसके पास गया, पाया कि वह बस ईमानदारी से तौलता था, सबसे एक-समान व्यवहार करता था। उसका साधारण-कर्म-धर्म तपस्या से बड़ा था।

एक कथा “स्वेतकेतु” की। एक बालक ब्रह्म-विद्या के रहस्य जानता है, अपने पिता उद्दालक के सहयोग से। (यह कथा छान्दोग्य उपनिषद् में है।)

हर कथा का एक-विशेष-धर्म-बिन्दु था, हर कथा से युधिष्ठिर कुछ नया सीखते थे।

9 · पितामह की अंतिम-अनुमति, “बस अब हम जाएँगे”

उपदेश-काल चलते-चलते दिन-हफ़्ते-महीने बीत गए। अंत में, उत्तरायण का पहला-दिन आ गया। यह वही दिन था जिसकी पितामह प्रतीक्षा कर रहे थे।

“वत्स,” भीष्म ने धीमे-स्वर में कहा, “अब हमारी बात-चीत समाप्त हुई। आपके सब-प्रश्नों के उत्तर हमने दिए, जितना हमें ज्ञात था। और कुछ बाक़ी है, तो आप व्यास से पूछिए। हम अब जाने को तैयार हैं।”

पाण्डव सब, श्रीकृष्ण, धृतराष्ट्र, गांधारी, कुन्ती, द्रौपदी, सब इकट्ठे हुए। भीष्म ने आँखें एक-एक के साथ मिलाईं, अंतिम-संदेश दिए।

श्रीकृष्ण से बोले, “माधव, आप जानते हैं हम कौन हैं। हम अष्ट-वसुओं में से एक हैं, शाप के कारण मनुष्य-जन्म लेने पर मजबूर थे। अब वह शाप समाप्त, हम अपने मूल-स्थान को लौटते हैं।”

श्रीकृष्ण ने नमन किया, “पितामह, आपके बिना यह धरती ख़ाली होगी। मगर आपकी कथा सदा-कहीं-न-कहीं सुनी जाती रहेगी, यह हमारा वचन।”

10 · भीष्म का देह-त्याग, बाणों का निकलना

भीष्म ने अपनी आँखें बंद कीं। योग-निद्रा-समान ध्यान में चले गए। एक-एक बाण उनके शरीर से निकलने लगा, अपने आप, बिना किसी बाहरी-हाथ के। पूरी कुरुक्षेत्र-भूमि पर सन्नाटा।

उनके शरीर के अंदर से एक तेज-चमक उठी, ऊपर की ओर निकली, सूर्य-मण्डल में जा कर समा गई। यह उनकी आत्मा थी, अष्ट-वसुओं के लोक में लौटती हुई।

शर-शय्या ख़ाली हो गई। शरीर बिल्कुल शान्त, चेहरे पर एक आख़िरी मुस्कान।

युधिष्ठिर ने अंतिम-संस्कार की व्यवस्था की। एक भव्य-चिता बनाई गई, मगर शास्त्र-विधि से, क्योंकि भीष्म ब्रह्मचारी थे, उनका संस्कार सामान्य-गृहस्थ-संस्कार से अलग होता था।

चिता को अग्नि दी गई। अग्नि ने भीष्म की देह को धीरे-धीरे लिया। राख गंगा में बहाई गई, क्योंकि गंगा उनकी माँ थीं। कहा जाता है कि गंगा-नदी एक बार तेज़ी से उमड़ी, अपने पुत्र का स्वागत करने।

11 · अनुशासन-पर्व का समापन

अनुशासन-पर्व यहीं समाप्त। शान्ति और अनुशासन, दोनों पर्व मिल कर महाभारत का दार्शनिक-दर्शन-कोश हैं। यहाँ राज-धर्म से मोक्ष-धर्म तक, दान से पितृ-तर्पण तक, सब-कुछ बँधा है।

पाण्डव अब हस्तिनापुर लौटे, और राज्य-कार्य पर पूरा-ध्यान देने लगे। मगर एक और काम बाक़ी था, अश्वमेध-यज्ञ, जो विजय-राजा का पारम्परिक-धर्म-कार्य था।

आगे

अश्वमेधिक-पर्व, युधिष्ठिर का राज-सूर्य-यज्ञ-समान अश्वमेध। एक यज्ञ-अश्व छोड़ा जाता है, अर्जुन उसके साथ देश-यात्रा करते हैं, हर रोकने वाले से युद्ध। अनुगीता, श्रीकृष्ण-अर्जुन का दूसरा संवाद। मणिपुर-कथा।

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स्रोत: महर्षि व्यास रचित मूल संस्कृत महाभारत; गीता-प्रेस संस्करण से सत्यापित। यहाँ कथा-सार है, श्लोक-दर-श्लोक नहीं।