पर्व 1 · आदि पर्व

महाभारत · Mahābhārata

पर्व 1 · आदि पर्व, बुनियाद की कहानी

यहाँ बुनियाद रखी जाती है। कुरु-वंश का जन्म, राजा शान्तनु का गंगा से प्रेम, भीष्म की प्रतिज्ञा, व्यास का अवतरण, धृतराष्ट्र और पाण्डु का विभाजित भाग्य, पाण्डवों का दैव-जन्म, द्रोणाचार्य की कठोर शिक्षा, और एक रात अग्नि-गृह से जो भागे थे, वही आगे चल कर इन्द्रप्रस्थ बसाते हैं। महाभारत की समूची इमारत इसी पर्व पर खड़ी है।

आदि पर्व · कथा-रूप में संक्षेप · पर्व-सूची

1 · व्यास और गणेश, इस ग्रन्थ की रचना

महाभारत के रचयिता हैं महर्षि व्यास। पाण्डव-कौरव दोनों के परम-पितामह, जो स्वयं इस सारी कथा के साक्षी रहे। जब उनके मन में यह बात बैठी कि अब इस लम्बे, अद्भुत इतिहास को लिख डालना चाहिए, तो वे ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने सुझाव दिया कि लिखवाने के लिए श्री गणेश को बुलाइए। हुज़ूर गणेश ने एक शर्त रखी, “महर्षि, हमारी लेखनी एक बार चली, फिर रुकेगी नहीं। आप बीच में सोचने के लिए नहीं ठहरेंगे।”

व्यास जी मुस्कुराए। उन्होंने अपनी शर्त लगाई, “हुज़ूर, मंज़ूर है। मगर आप हर श्लोक का अर्थ ठीक से समझे बिना नहीं लिखेंगे।” गणेश जी राज़ी हो गए। इस तरह यह अद्भुत गुफ्तगू शुरू हुई। जहाँ व्यास को ज़रा सोचने का वक़्त चाहिए होता, वे एक उलझा हुआ श्लोक बोल देते, जिसे समझने में गणेश को कुछ पल लगते, और इतने में व्यास अगले हिस्से की रूप-रेखा तैयार कर लेते।

इस तरह एक लाख श्लोकों का यह विशाल ग्रन्थ रचा गया। आदि पर्व इसी का पहला हिस्सा है। बुनियाद।

2 · राजा शान्तनु और गंगा

हस्तिनापुर के राजा थे शान्तनु। एक दिन गंगा-तट पर सैर के दौरान उनकी मुलाक़ात एक अप्रतिम सुन्दरी से हुई। शान्तनु मोहित हो गए। उन्होंने आदर से पूछा, “आप कौन हैं? क्या हमारी रानी बनने का सम्मान देंगी?”

उस स्त्री ने अजीब शर्त रखी, “महाराज, हम आपकी रानी बनेंगे, मगर एक बात याद रहे, हम जो कुछ भी करें, आप कारण नहीं पूछेंगे। जिस दिन आपने सवाल किया, उसी दिन हम चले जाएँगे।” शान्तनु को शर्त बेजान लगी, मगर मुहब्बत में आकर मान ली।

शादी के बाद रानी ने एक-एक करके सात पुत्रों को जन्म दिया, और हर बार नवजात को गंगा-नदी में बहा देती। शान्तनु तड़पते, मगर शर्त याद रख कर चुप रहते। आठवें पुत्र के जन्म पर शान्तनु से रहा नहीं गया। उन्होंने रोक लिया, “बस! आख़िर आप यह क्यों कर रही हैं?”

रानी मुस्कुरा कर बोली, “हुज़ूर, हम गंगा हैं। ये आठों पुत्र वसु हैं, वसिष्ठ-शाप के कारण मनुष्य-जन्म लेने पर मजबूर। पहले सात को मुक्ति दे चुके। यह आठवाँ धरती पर रहेगा, यह हमारा वचन था। मगर आप शर्त तोड़ चुके, तो अब हम विदा लेते हैं। यह बालक हम आपको देते हैं।” इतना कह कर गंगा बालक के साथ अन्तर्ध्यान हो गई। शान्तनु अकेले रह गए।

3 · भीष्म की प्रतिज्ञा

कुछ वर्ष बाद वही बालक, अब युवक देवव्रत, गंगा के पास से वापस आया। शान्तनु ने अपने पुत्र को सीने से लगाया, युवराज घोषित किया। हस्तिनापुर खुशियाँ मनाने लगा।

एक दिन शान्तनु फिर शिकार पर निकले। यमुना-तट पर एक मछुआरे की सुन्दर पुत्री सत्यवती से मुलाक़ात हुई। शान्तनु ने पिता-निषादराज से माँगा। निषादराज ने आदर से अर्ज़ किया, “महाराज, हमें यह रिश्ता मंज़ूर है, मगर एक शर्त है। मेरी पुत्री से जो सन्तान होगी, हस्तिनापुर का राजा वही बनेगा।”

शान्तनु ठगे रह गए। देवव्रत पहले से युवराज घोषित हो चुके थे। राजा बिना कुछ कहे लौट आए, मगर दिल में टीस थी। देवव्रत ने पिता का उतरा हुआ चेहरा देखा, और अकेले निषादराज के पास जा पहुँचे।

“पिताजी, आप जो शर्त चाहें, मैं स्वीकार करता हूँ। राज्य पर मेरा कोई अधिकार नहीं रहेगा।”

निषादराज ने और गहरी बात उठाई, “हुज़ूर, और आपके पुत्र भी हैं सकते हैं, जो आगे चल कर मेरी पुत्री की संतान से सिंहासन छीन सकते हैं।”

देवव्रत क्षण-भर ठहरे, फिर देवताओं को साक्षी मान कर बोले, “मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा। न विवाह करूँगा, न संतान।” आकाश से देवताओं की पुष्प-वर्षा हुई। उसी दिन से वे भीष्म कहलाए, “जिसने भीषण प्रतिज्ञा की।” इस एक प्रतिज्ञा से, जो पिता की मुहब्बत के लिए की गई थी, आगे चल कर पूरे कुरु-वंश का भाग्य उलझ जाने वाला था।

4 · सत्यवती, चित्रांगद, विचित्रवीर्य

शान्तनु और सत्यवती के दो पुत्र हुए, चित्रांगद और विचित्रवीर्य। शान्तनु के देहान्त के बाद चित्रांगद राजा बने, मगर एक गन्धर्व से युद्ध में मारे गए। फिर विचित्रवीर्य गद्दी पर बैठे, अभी जवान भी न थे।

भीष्म ने अपने भाई के लिए तीन कन्याओं, अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका, का काशी-राज से स्वयंवर में अपहरण-विवाह कर लिया। अम्बा ने कहा कि वह पहले से ही शाल्व-राज को मन से दे चुकी, इसलिए भीष्म ने उसे लौटा दिया। मगर शाल्व ने अम्बा को स्वीकार नहीं किया। अम्बा का दुःख आगे चल कर शिखण्डी के रूप में लौटने वाला था, और भीष्म-वध का कारण बनने वाला था।

अम्बिका और अम्बालिका विचित्रवीर्य से विवाह कर हस्तिनापुर लाई गईं। मगर विचित्रवीर्य कुछ ही वर्षों में टी.बी. से (शास्त्र-भाषा में “यक्ष्मा”) मर गए। कोई संतान नहीं छोड़ी। कुरु-वंश संकट में पड़ गया।

5 · व्यास का आगमन, धृतराष्ट्र-पाण्डु-विदुर का जन्म

सत्यवती बहुत चिंतित थीं। उन्हें अपने एक राज़ की याद आई। बहुत वर्ष पहले, जब वह यमुना में नाव चलाती थीं, उन्हें ऋषि पराशर से दर्शन मिले थे, और उन्हीं की कृपा से एक पुत्र हुआ था, द्वैपायन व्यास। यह पुत्र पैदा होते ही तपस्या को निकल गया था।

सत्यवती ने व्यास को बुलाया। भीष्म से सलाह कर के दोनों रानियों, अम्बिका और अम्बालिका, को व्यास से नियोग करवाया, यानी संतान-उत्पत्ति के लिए शास्त्रीय व्यवस्था।

व्यास तपस्वी थे, उग्र-तेजस्वी, उलझे केश, उग्र रूप। जब अम्बिका के पास पहुँचे, वह डर के मारे आँखें मूँद लीं। जो पुत्र हुआ, वह जन्म-अन्ध, धृतराष्ट्र। जब अम्बालिका की बारी आई, उसका रंग पीला पड़ गया। जो पुत्र हुआ, वह पीला, कमज़ोर, पाण्डु। सत्यवती दुखी हुईं, फिर एक बार अम्बिका को भेजा। मगर अम्बिका ने अपनी जगह दासी को भेज दिया। दासी ने आदर-पूर्ण व्यवहार किया। उसका पुत्र हुआ, स्वस्थ, बुद्धिमान, मगर दासी-पुत्र, इसलिए सिंहासन से बाहर, विदुर।

तीन भाई, तीन भिन्न नियतियाँ। धृतराष्ट्र अंधा, पाण्डु राजा, विदुर सलाहकार। यह असमान विभाजन आगे जा कर महाभारत का बीज बन गया।

6 · गांधारी, कुन्ती, माद्री

तीनों भाइयों के विवाह हुए। धृतराष्ट्र की पत्नी बनी गांधार-नरेश की पुत्री गांधारी। पति के अंधे होने का सुन कर उसने अपनी आँखें भी कपड़े से बाँध लीं,हमें कैसे शोभा देती है।” यह त्याग प्रसिद्ध हो गया।

पाण्डु को दो रानियाँ मिलीं, कुन्तिभोज की पालक-पुत्री कुन्ती, और मद्र-देश की राजकुमारी माद्री। कुन्ती को बचपन में महर्षि दुर्वासा की सेवा का सौभाग्य मिला था। प्रसन्न हो कर दुर्वासा ने उसे एक अद्भुत मंत्र दिया था, “जिस देवता का स्मरण करेंगी, वही प्रकट हो कर पुत्र देंगे।”

कुन्ती ने जिज्ञासा-वश इस मंत्र की परीक्षा कर ली थी, अकेले में सूर्य का स्मरण किया। सूर्य प्रकट हो गए, बात रुकी नहीं, पुत्र दे कर चले गए। कुन्ती कुँवारी थी, समाज से डर कर उस बालक को पेटी में डाल कर नदी में बहा दिया। यही पुत्र बाद में सूत-राज द्वारा पाला गया, कर्ण के नाम से जाना गया। माँ-बेटे की यह पहचान महाभारत के अंत तक राज ही रही।

7 · पाण्डवों का जन्म, कौरवों का जन्म

पाण्डु शिकार पर थे। एक हिरण-युगल को सम्भोग-काल में देखा, धनुष चलाया। पहचान न पाई कि वह दरअसल किन्दम-ऋषि और उनकी पत्नी थे, मायावी रूप में। मरते-मरते ऋषि ने शाप दिया, “हे राजन्, आप जब भी अपनी रानी के साथ सम्भोग करेंगे, उसी क्षण देह त्याग देंगे।”

पाण्डु ने राज-पाट छोड़ दिया, वन में चले गए। मगर सन्तान-हीनता ने सताया। कुन्ती ने अपने मंत्र की बात बताई। पाण्डु प्रसन्न हुए। कुन्ती ने तीन देवताओं का आह्वान किया, धर्म-राज से युधिष्ठिर (इसलिए सदा सत्य-प्रिय), वायु से भीम (अद्भुत बल), इन्द्र से अर्जुन (अप्रतिम धनुर्धर)। फिर माद्री की चाह पर मंत्र दे दिया। माद्री ने अश्विनी-कुमारों का स्मरण किया, जुड़वाँ नकुल और सहदेव हुए।

एक दिन वसन्त ऋतु, पाण्डु से रोका नहीं गया, माद्री के साथ निकटता ली, और शाप पूरा हुआ। माद्री ने अपने आप को चिता में डाल दिया, अनुगमन किया। कुन्ती पाँचों बच्चों को ले कर हस्तिनापुर लौटी।

उधर हस्तिनापुर में गांधारी से सौ पुत्र और एक पुत्री हुए, मगर अद्भुत तरीक़े से। गांधारी का गर्भ दो वर्षों तक रहा, फिर एक मांस-पिण्ड निकला। व्यास ने उसे एक सौ एक टुकड़ों में बाँट कर घी के घड़ों में रख दिया। समय आने पर एक-एक करके बच्चे जन्मे, दुर्योधन सबसे पहले। दुर्योधन के जन्म-समय भयंकर शकुन हुए, सियार रोए, गधे रेंके। विदुर ने राजा को सलाह दी, “हुज़ूर, इस बालक का त्याग कर दीजिए, यह कुल का नाश करेगा।” मगर पुत्र-मोह के आगे विदुर की बात अनसुनी रही।

8 · बचपन, द्रोणाचार्य, एकलव्य

पाण्डव-कौरव साथ-साथ बड़े हुए, मगर शुरू से बेमेल। भीम की देह-शक्ति देख कर दुर्योधन जलते। एक बार खाने में विष मिला कर भीम को बेहोश कर के नदी में डाल दिया। भीम नाग-लोक तक पहुँच गए, वहाँ नागों ने उन्हें ऐसा अमृत-रस पिला दिया कि वह सहस्र-हाथी-बल वाले हो गए।

शिक्षा के लिए पितामह भीष्म ने द्रोणाचार्य को बुलाया। द्रोण असाधारण धनुर्विद्या के ज्ञाता थे, मगर ग़रीब, अपने बेटे अश्वत्थामा को दूध तक पिला नहीं पाते थे। यहाँ रहना मंज़ूर किया। सब राजकुमारों को सिखाने लगे। अर्जुन उनके सबसे प्रिय शिष्य निकले, क्योंकि एकाग्रता अद्भुत थी।

एक दिन एक भील-कुमार एकलव्य द्रोण के पास आया, “आचार्य, मुझे शिष्य बना लीजिए।” द्रोण ने राजकुमारों को ही पढ़ाने का व्रत लिया हुआ था, मना कर दिया। एकलव्य निराश नहीं हुआ। उसने जंगल में द्रोण की मिट्टी की मूर्ति बनाई, उसी के सामने स्वयं अभ्यास करता रहा। ऐसी सिद्धि पाई कि अर्जुन से भी ऊँचा निशानेबाज़ बन गया।

एक दिन शिकार के दौरान द्रोण-पाण्डवों ने एक कुत्ते को देखा, जिसका मुँह सात तीरों से बिना घाव दिए सीला हुआ था। हैरान हो कर पूछा, “किसने किया?” एकलव्य सामने आया, “गुरुदेव, आपकी ही कृपा से।” द्रोण को भीतर ही भीतर डर लगा, कि अर्जुन से बढ़ कर कोई कैसे बने। उन्होंने गुरु-दक्षिणा माँगी, “आप अपने दाएँ हाथ का अंगूठा हमें दे दीजिए।” एकलव्य ने बिना कुछ कहे अंगूठा काट कर अर्पित कर दिया। एकलव्य की कथा महाभारत की सबसे करुण कहानियों में से एक है, गुरु-दक्षिणा कितनी ऊँची और कितनी क्रूर हो सकती है, इसका जीवित उदाहरण।

9 · रंग-भूमि का प्रदर्शन, कर्ण का प्रवेश

सब राजकुमार सीख गए, तो द्रोण ने एक भव्य प्रदर्शन रखा। सब ने अपने-अपने कौशल दिखाए। अर्जुन ने अद्भुत बाण-चलाई की, सब दर्शक स्तब्ध रह गए।

तभी रंग-भूमि में एक नौजवान आया, कुण्डल-कवच पहने, सूर्य के समान तेजस्वी। बोला, “आचार्य, हम भी अपना कौशल दिखाना चाहते हैं।” अर्जुन से होड़ ले ली। यह कर्ण था, सूत-पुत्र होने का संदेह सब के मन में, मगर वह स्वयं को कुलीन समझता था। दुर्योधन ने तुरंत उसे अंग-देश का राजा घोषित कर दिया, मित्रता बाँध ली। दुर्योधन समझदार था, उसे अर्जुन के ख़िलाफ़ एक शक्तिशाली योद्धा चाहिए था।

उधर कुन्ती दूर से देख रही थी। उसका दिल कहता था, “यह मेरा वही बेटा है।” मगर ज़बान बँद रही।

10 · द्रुपद, द्रोण की गुरु-दक्षिणा, युवराज-घोषणा

द्रोण ने अंत में गुरु-दक्षिणा माँगी, “पांचाल-राज द्रुपद, हमारा पुराना मित्र था, मगर राजा बन कर हमें भूल गया। उसे बँधी अवस्था में हमारे सामने लाओ।” यह द्रोण की एक पुरानी जलन थी। द्रुपद ने उन्हें कभी अपमानित किया था।

कौरव पहले गए, हार कर लौटे। फिर पाण्डव गए, द्रुपद को बाँध कर ले आए। द्रोण ने द्रुपद से कहा, “अब मैं आपका मित्र हुआ, बराबरी का। आधा राज्य मेरा, आधा आपका।” द्रुपद ने सहना तो था, मगर भीतर ही भीतर एक ज्वाला सुलगने लगी। उसने एक यज्ञ रचाया, जिसके फलस्वरूप उसे दो संतानें मिलीं, एक पुत्र जो द्रोण को मारेगा (धृष्टद्युम्न), और एक पुत्री (द्रौपदी, “कृष्णा”), जो आगे जा कर इतिहास बदलने वाली थी।

हस्तिनापुर में युधिष्ठिर सबसे बड़े पाण्डव थे, इसलिए उन्हें युवराज घोषित किया गया। दुर्योधन तिलमिला उठा, “बड़े होने का मतलब क्या? हम भी तो बड़े हैं। यह सिंहासन हमारा है।” यहीं से षड्यंत्र शुरू।

11 · लाक्षा-गृह की साज़िश

दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि और भाई दुःशासन के साथ मिल कर एक चाल चली। पाण्डवों को वारणावत भेजने का सुझाव दिया, “वहाँ एक उत्सव हो रहा है, पाण्डव कुछ दिन वहाँ रहें।” मगर पीछे से कारीगर पुरोचन को बुला कर वहाँ लाख का बना घर तैयार करवाया, जो दिखने में सामान्य महल लगे, मगर एक चिंगारी से धू-धू कर जल उठे।

विदुर को इस साज़िश की भनक लग गई। उन्होंने पाण्डवों से गूढ़-भाषा में कह कर सतर्क किया, “मार्ग में सुरंग बनाओ, सही समय पर निकल जाएँ।” युधिष्ठिर ने इशारा समझा। उन्होंने एक सुरंग खुदवाई, बाहर के जंगल तक।

एक रात कुन्ती के साथ पाँचों भाई महल में बैठे थे। उसी रात एक भील-स्त्री अपने पाँच पुत्रों के साथ वहाँ भिक्षा-अन्न पाने आ गई, और सब वहीं सो गए। पाण्डवों ने ख़ुद ही महल में आग लगा दी, सुरंग से भाग निकले। महल जल कर राख। जब लोग सुबह उठे, तो छह जली लाशें मिलीं, समझा कि पाण्डव और कुन्ती मारे गए। दुर्योधन ने सम्भवतः जश्न मनाया। मगर पाण्डव बच गए थे।

12 · छद्म-वेश, बकासुर-वध

पाण्डव वन-वन भटकने लगे, ब्राह्मण-वेश में। एक नगर एकचक्रा में रुके, एक ब्राह्मण के घर में आश्रय लिया। वहाँ एक भयंकर रिवाज था, हर रोज़ एक नागरिक को अपने नंबर पर बकासुर नाम के राक्षस के पास भोजन-स्वरूप जाना पड़ता था। जिस दिन पाण्डव पहुँचे, उस घर की बारी थी। ब्राह्मण-दम्पति विलाप कर रहे थे, “कौन जाए? पति जाएँ तो पत्नी विधवा, पुत्र जाए तो वंश-नाश।”

कुन्ती ने अपनी आज्ञा दी, “हमारे भीम जाएँगे।” भीम ने भोजन के साथ रथ ले लिया, बकासुर के पास पहुँचे, फिर उसी का भोजन उसी के सामने खा गए। बकासुर क्रोध से दौड़ा, मगर भीम ने उसे चीर डाला। नगर ख़ुश हो गया। पाण्डव कुछ दिन और ठहरे, फिर आगे चल दिए।

13 · द्रौपदी-स्वयंवर

द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर रचाया। शर्त रखी, “जो ऊँचे चक्र पर घूमती मछली की आँख, उसके नीचे पानी में प्रतिबिम्ब देख कर, तीर से बेधेगा, उसी के साथ मेरी पुत्री का विवाह होंगे।” यह कठिनतम चुनौती थी, असली निशाना तो छुपा हुआ था।

देश-देश के राजकुमार आए। कर्ण भी आए। मगर द्रौपदी ने कर्ण को सूत-पुत्र कह कर मना कर दिया, यह एक करारी चोट थी, जिसकी टीस उसके आख़िरी दिन तक रही।

एक के बाद एक राजा निशाना चूकते रहे। तभी एक ब्राह्मण-वेश में अर्जुन उठे, धनुष पर डोरी चढ़ाई, और बिना हिले एक ही बाण से मछली की आँख बेध दी। द्रौपदी ने उनके गले में जयमाला डाली।

पाण्डव अपनी ब्राह्मण-झोपड़ी में लौटे, बाहर से माँ कुन्ती को आवाज़ दी, “माते, देखिए हम क्या लाए हैं।” कुन्ती ने भीतर से बिना देखे कहा, “जो भी लाए हैं, पाँचों भाई आपस में बाँट लो।” बाद में देखा, तो स्तब्ध रह गई। मगर माँ का वचन था। शास्त्रीय व्यवस्था के अनुसार द्रौपदी पाँचों की पत्नी बनी। यह व्यवस्था बहुत असाधारण है, और इसके बारे में बहुत-कुछ कहा-सुना गया है, मगर आदि-पर्व इसे एक माँ की आज्ञा के पालन के रूप में प्रस्तुत करता है।

14 · पहचान, राज्य-विभाजन, इन्द्रप्रस्थ

द्रुपद ने जब जाना कि वर असल में पाण्डव हैं, हर्ष की सीमा न रही। उन्हीं की सबसे बड़ी दुश्मनी कौरवों से थी।

हस्तिनापुर में जब ख़बर पहुँची कि पाण्डव ज़िंदा हैं, और एक शक्तिशाली राजा द्रुपद से रिश्ता जोड़ चुके हैं, धृतराष्ट्र को राज्य आधा बाँटना पड़ा। आधा कौरवों को मिला (हस्तिनापुर के साथ), आधा पाण्डवों को मिला, जो बंजर खाण्डव-प्रस्थ नामक भूमि थी।

पाण्डव वहाँ पहुँचे, श्रीकृष्ण भी आ मिले। दोनों ने मिल कर खाण्डव-वन जलाया (जिसमें अग्नि-देव को भोजन देने का वायदा था), उसी की राख पर इन्द्रप्रस्थ नगरी बसाई। स्वर्ग जैसी राजधानी। महाभारत की भूमिका लगभग तैयार थी। आदि-पर्व यहीं समाप्त होता है।

आगे

सभा-पर्व में अगली कहानी। इन्द्रप्रस्थ की राजसभा, अद्भुत मय-निर्मित महल, युधिष्ठिर का राजसूय-यज्ञ, फिर वही द्यूत-क्रीड़ा जो पासे के एक खेल पर सब-कुछ ले डूबती है।

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स्रोत: महर्षि व्यास रचित मूल संस्कृत महाभारत, गणेश-पाठ; गीता-प्रेस संस्करण से सत्यापित। यहाँ कथा-सार है, श्लोक-दर-श्लोक नहीं।